कृषि की समस्याएँ व सम्भावनाएँ (PROBLEMS AND PROSPECTUS OF AGRICULTURE)

कृषि की समस्याएँ व सम्भावनाएँ (PROBLEMS AND PROSPECTUS OF AGRICULTURE)

 भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व (IMPORTANCE OF AGRICULTURE IN INDIAN ECONOMY)

प्राचीन काल से ही भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भारत के आर्थिक विकास में कृषि का महत्व निम्नलिखित बातों से परिलक्षित होता है-

1.रोजगार का प्रमुख स्रोत (Main Source of Employment) – भारत जैसे अर्द्ध विकसित देश में जहाँ पर कि पूँजी की कमी की वजह से कृषि क्षेत्र का धीमा विकास होता है और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होती है, वहाँ कृषि ही रोजगार का प्रमुख स्रोत होता है। भारतीय कृषि 52 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करने का स्त्रोत है। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत-से लोग पदार्थों के व्यापार, परिवहन आदि में लगकर अपनी आजीविका चलाते हैं। इसलिए भारतीय कृषि देश के लोगों के लिए जीवन निर्वाह का सबसे महत्वपूर्ण साधन है।

2. राष्ट्रीय आय में योगदान (Contribution in National Income) कृषि क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय आय का आज भी एक प्रमुख स्रोत है। योजना काल में राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का योगदान विभिन्न वर्षों में क्रमशः घटता गया है। सन् 1950-51 में कृषि क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान 59 प्रतिशत था परन्तु, 2015-16 में यह का होकर 17 प्रतिशत रह गया है।

इस सन्दर्भ में दो महत्त्वपूर्ण बातें ध्यान देने योग्य हैं-

(i) भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का आज भी बड़ा हिस्सा है।

(ii) राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा लगातार घट रहा है, जो अल्पविकसित अर्थव्यवस्था से विकसित अर्थव्यवस्था की ओर गमन का सूचक है।

3, औद्योगीकरण का आधार (Base of Industrialisation)—भारत जैसे अर्द्ध-विकसित देशों में आर्थिक बिकास की प्रारम्भिक अवस्था में कृषि का औद्योगिक विकास में कई कारणों से महत्वपूर्ण योगदान होता है। कृषि से-(i) उद्योगों को कच्चा माल-कपास, जूट, गन्ना, तिलहन, रबड़, अनाज आदि प्राप्त होता है।

(ii) कृषि में उत्पादकता बढ़ने के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की माँग कम हो जायेगी। ये श्रमिक उद्योगों में काम कर सकेंगे। इसलिए औद्योगिक विकास के लिए अबश्यक श्रमिक कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त हो सकेंगे

(iii) औद्योगिक विकास के कारण लोगों की आय बढ़ने पर अनाज की माँग में वृद्धि होती है, इसलिए कृषि का विकास होना आवश्यक है।

(iv) कई कुटीर व लघु उद्योगों; जैसे-हथकरघा, बुनाई, तेल निकालना, रस्सी बनाना इत्यादि अपने कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं।

(v) कृषि के विकास के कारण लोगों की आय में वृद्धि होगी। वे उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं की अधिक माँग करेंगे इसके फलस्वरूप उद्योगों के बाजार का विस्तार होगा।

4. आर्थिक विकास का आधार (Base of Economic Development)-भारत की कृषि, देश के आर्थिक विकास का आधार है। इसका कारण यह है कि एक कृषि क्षेत्र के विकास से अन्य क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए पूंजी प्राप्त होती है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री साइमन कुजनेट्स के अनुसार, कृषि की आर्थिक विकास की देन तीन भागों में बाँटी जा सकती है-

(i) साधन सम्बन्धी देन-कृषि को साधन सम्बन्धी मुख्य देन हैं-औद्योगिक तथा गैर-कृषि क्षेत्र के लिए श्रमिक प्रदान करना, निवेश के लिए बचत तथा नये उद्यमी।

(ii) उत्पादन सम्बन्धी देन कृषि की उत्पादन सम्बन्धी मुख्य देन हैं—गैर-कृषि क्षेत्र को भोजन, उद्योगों को कच्चा माल, निर्यात, लाभ में वृद्धि, कृषक परिवारों को अधिक आय, उत्तम भोजन जिसके फलस्वरूप श्रम की उत्पादकता में वृद्धि होती है।

(iii) बाजार सम्बन्धी देन-बाजार सम्बन्धी मुख्य देन हैं-उपभोक्ता वस्तुओं के ग्रामीण बाजार में विस्तार, मशीनरी, खाद तथा कृषि सम्बन्धी अन्य उत्पादनों जो उद्योगों से प्राप्त होते हैं, की माँग में वृद्धि।

भारत के आर्थिक विकास के लिए कृषि का इन तीनों कारों के लिए हो महत्वपूर्ण योगदान है।

5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में महत्त्व (Importance in Foreign Trade) भारत के विदेशी व्यापार का अधिकांश भाग कृषि से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2013-14 में 13.8 प्रतिशत रहा, किन्तु 2014-15 में यह पुनः गिरकर 12.1 प्रतिशत रह गया। वर्ष 2010-11 के दौरान कृषिगत आयात देश के कुल आयात का 3.0 प्रतिशत था। 2012-13 में यह 3.4 प्रतिशत हो गया तथा 2013-14 में 8.2 प्रतिशत रहा वर्ष 2014-15 में यह 5.82 प्रतिशत रहा।

6. खाद्य सामग्री की पूर्ति (Supply of Food-grains)—कृषि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्र उपलब्ध कराना है। भारत में इस समय 121 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं। इनकी खाद्यान्नों की आपूर्ति कृषि द्वारा ही होती है। यद्यपि अब भारत खाद्यानों की आपूर्ति में आत्म-निर्भर हो गया है।

7. राजस्व में योगदान (Contribution in Revenue)—प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का राजस्व कृषि क्षेत्र से प्राप्त होता है। इसके अलावा कृधि कर तथा कृषि से निर्मित वस्तुओं के निर्यात पर निर्यात 'कर' से भी सरकार को आय प्राप्त होती है।

8. व्यापार और परिवहन की निर्भरता (Dependence of Trade Transport) कृषिजन्य पदार्थ व्यापार और परिवहन के विकास की आधारशिला होते हैं। इन पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में व्यापार और परिवहन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार ये दोनों क्षेत्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

9. पूँजी-निर्माण (Capital Formulion) हमारे देश की अधिकतर पूँजी कृषि में लगी हुई है। स्थायी गूंजी की दृष्टि से खेतों का स्थान देश में सबसे ऊँचा है। देश की करोड़ों रुपये की पूँजी सिंचाई के साधनों, पशुओं, खोती के औजारों, ट्रेक्टरों तथा अन्य प्रकार की कृषि मशीनों, गोदामों आदि में लगी हुई है। कृषि क्षेत्र का मानवीय पूँजो (Human Capital) के निमाण में भी महत्वपूर्ण योगदान है। इस क्षेत्र के द्वारा श्रमिकों को उचित भोजन प्राप्त होता है। इसके फलस्वरूप उनकी कुशलता में वृद्धि होती है।

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात के रूप में कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्रों में सकल पूँजो निर्माण (The Gross Capital Formation in Agriculture and Allied Sectors as a Proportion to the GDP) में हिस्सा 2011-12 में 7.0 प्रतिशत था जो 2013-14 में मामूली वृद्धि के साथ 7.4 प्रतिशत हो गया।

सीएसओ द्वारा जारी संशोधित अनुमानों के अनुसार कृषि से जीवीए (जीडीपी) में कृषि और सम्बद्ध में जीसीएफ का प्रतिशत शेयर में 2011-12 में 18.3 प्रतिशत से 2014-15 में 15.8 प्रतिशत तक गिरावट में प्रवृत्ति भी देखी गई।

सारणी 1-कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र में जीवीए और सकल पूँजी निर्माण

10. क्रान्तियों का इन्द्रधनुष (Rainbow of Revolutions) भारतीय कृषि में क्रान्तियों का इन्द्रधनुष दृष्टिगोचर हो रहा है। जैसे-कृषि के खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हरित क्रान्ति' (Green Revolution), तिलहन में पीली क्रान्ति' (Yellow Revolution), मत्स्य पालन में नीली क्रान्ति' (Blue Revolution), उर्वरकों की भूरो क्रान्ति' (Grey Revolution) तथा दूध में श्वेत क्रान्ति' (White Revolution) प्राप्त हुई है।

11. बचत का स्त्रोत (Sources of Surplus) हरित क्रान्ति के पश्चात् कृषि बचत का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है। अभी तक हरित क्रान्ति का प्रभाव केवल धनी कृषकों पर ही पड़ रहा है, वे अधिक धनी हो गये हैं।

12. सामाजिक तथा राजनीतिक महत्व (Social and Political Significance)-कृषि के विकास में सामाजिक तथा राजनीतिक महत्व भी बहुत अधिक है। देश के लगभग तीन-चौथाई मतदात गाँवों में रहते हैं। इसलिए विभिन्न राजनीतिक दल कृषि के विकास द्वारा उनकी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

13. अग्रणी राष्ट्र (Forward National)—भारत दूध, दालों, जूट और जूट जैसे रेशों के उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर चावल, गेहूँ, गन्ना, मूंगफली, सब्जियों, फलों तथा कपास के उत्पादन में दूसरे स्थान पर एवं मसालों, रोपण फसलों, पशुधन, मत्स्यकी तथा कुक्कुट पालन में तीसरे स्थान पर है।

14. निर्धनता निवारण में भूमिका (Role in Poverty Eradication)—विश्व भर में भारत सर्वाधिक निर्धन व कुपोषित लोग निवास करते हैं इसलिए कृषि को प्राथमिकता देने से गरीबी तथा कुपोषण कम करने में तथा समावेशीय संवृद्धि (Inclusive Growth) प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। जैसा कि भारत सरकार की रिपोर्ट State of Indian Agriculture, 2011-12, में कहा गया है, सकल घरेलू उत्पाद में 8-9 प्रतिशत प्रति वर्ष की वृद्धि दर भी गरीबी निवारण नहीं कर सकती जब तक कि कृषि विकास और तेज गति से नहीं होता।

सारणी 2 वैश्विक कृषि के सन्दर्भ में भारत की स्थिति (2013)

भारतीय कृषि की विशेषताएँ (CHARACTERISTICS OF INDIAN AGRICULTURE)

भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. आजीविका का प्रमुख साधन (Main Source of Livelihood) हमारे देश में कार्यशील जनसंख्या का लगभग 52 प्रतिशत भाग कृषि से आजीविका प्राप्त करता है और जनसंख्या का 70 प्रतिशत भाग गाँवों में रहता है जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है।

2. अदृश्य बेरोजगारी (Disguised Unemployment) भारतीय कृषि से किसानों एवं कृषि श्रमिकों को वर्ष भर रोजगार नहीं मिल पाता। इसी कारण कृषि क्षेत्र में मौसमी या अदृश्य बेरोजगारी देखने को मिलती है।

3. श्रम-प्रथान कृषि (Labour-intensive Agriculture)—हमारे देश की कृषि पूँजी-प्रधान न होकर श्रम-प्रधान है। इसी कारण खेती में कृषि के अधुनिक तरीकों एवं कृषि औजारों का उपयोग कम होता है।

4. कृषि की मानसून पर अत्यधिक निर्भरता (Excessive Dependence of Agriculture on Monsoon)—भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है। दस पंचवर्षीय योजनाओं के पूरा होने के बाद भी मानसून पर निर्भरता में कोई विशेष कम नहीं आयी है। देश में सिंचाई के साधन पर्याप्त मात्रा में मौजूद नहीं हैं।

5. जोतों का छोटा आकार (Small Size of Holdings)—भारतीय कृषि की एक विशेषता यह भी है कि वहाँ जोतों का आकार बहुत छोटा है। यहाँ की 12 प्रतिशत जोतें 2 हेक्टेअर या इससे छोटी हैं। जोतों का आकार अनार्थिक या छोटा होने से विकसित देशों की तुलना में हमारे यहाँ कृषि की उत्पादकता का स्तर भी काफी निम्न है।

6. निम्न उत्पादकता (Low Productivity) भारतीय कृषि में प्रति एकड़ व प्रति व्यक्ति उत्पादन अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। एक अनुमान के अनुसार भारत में एक हेक्टेअर में 2,810 किलो गेहूँ पैदा होता है, जबकि ग्रेट ब्रिटेन में 8,281 किलो पैदा होता है।

7. प्राचीन एवं दोषपूर्ण कृषि पद्धति (Old and Defective Agricultural Method)- इतने वर्षों में नियोजित विकास के बाद अभी भी देश में कृषि परम्परागत तरीकों से की जाती है जिसमें लकड़ी के हल ब बक्खर की प्रमुखता है। परम्परागत तरीकों से खेती होने के कारण देश में प्रति एकड़ व प्रति व्यक्ति उत्पादन कम है।

8. खाद्यान्न फसलों की प्रचुरता (Predominance of Food Crops)—कृषि क्षेत्र में हमारे देश में मुख्यतः खाद्यानों क

पादन किया जाता है। जहाँ जितनी काम में लायी जाती है, उसका लगभग 94.0 प्रतिशत भाग खाद्यान्न फसलों में शेष 6 प्रतिशत भाग व्यापारिक फसलों के काम में आता है।

कृषि-उत्पादन व उत्पादकता की प्रवृत्तियाँ (AGRICULTURE : TRENDS IN PRODUCTION AND PRODUCTIVITY)

1. कृषि-उत्पादन की प्रवृत्तियाँ (Trends of Agricultural Production)-भारत में आर्थिक नियोजन को शुरू किये जाने के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के विकास को विशेष महत्व दिया गया है। फलत: कृषि उपजों के उत्पादन एवं उत्पादकत्ता दोनों में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। फिर भी देश में व्यापक गरीबी, बेरोजगारी, आय एवं धन की असमानत के साथ क्षेत्रीय विषमता है। ऐसी स्थिति में कृषि उत्पादन एवं इसकी उत्पादकता का विश्लेषण महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत में कृषि उत्पादन को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-

(i) खाद्यान्नों (Foodgrains) के अन्तर्गत चावल, गेहूँ, चार, बाजरा जैसे प्रमुख अनाज (Cereals) एवं दालों (Pulses) को शामिल किया जाता है।

(ii) वाणिज्यिक फसलों (Commercial Crups) के अन्तर्गत तिलहनों, गन्ना, कपास, पटसन एवं आलू को शामिल किया जाता है।

खाद्यानों की तुलना में वाणिज्यिक फसलों के अधिक उत्पादन करने से किसानों की आय बढ़ती है और उनका जीवन-स्तर भी ऊँचा होता है।

2. खाद्य फसलों में उत्पादन की प्रवृत्तियाँ-भारत में खाद्य फसलों के उत्पादन की प्रवृत्तियों को नीचे सारणी में दर्शाया गया है-

सारणी3-खाद्यान्न उत्पादन (मिलियन टन में)

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि-

(i) वर्ष 1949-50 से 2014-15 की 65 वर्षों की अवधि में खाद्यान्न का उत्पादन 55 मिलियन टन से बढ़कर 252.02 मिलियन टन हो गया है। इस प्रकार खाद्यान्न का उत्पादन बढ़कर 42 गुना हो गया

(ii) अनाजों में चावल का उत्पादन वर्ष 1919-50 में 24 मिलियन टन था जो बढ़कर वर्ष 2011- में 105.48 मिलियन टन हो गया है। इस प्रकार 65 वर्षों में चावल का उत्पादन बढ़कर 4 गुना हो गया है।

(iii) गेहूँ का उत्पादन वर्ष 1949-50 में 6 मिलियन टन था जो बढ़कर 2014-15 में 86.53 मिलियन टन हो गया है। इस अवधि में इसका उत्पादन बढ़कर लगभग 14 गुना हो गया है।

(iv) मोटे अनाजों (Conrse Cereals) का भाग जो 1949-50 में 30 प्रतिशत था कम होकर केवल 17 प्रतिशत रह गया। इससे जाहिर है कि कमजोर वर्गों द्वारा मोटे अनाजों का प्रतिस्थापन चावल और गेहूँ द्वारा किया जा रहा है।

(v) दलहनों का उत्पादन वर्ष 1949-50 में 8 मिलियन टन था जो बढ़कर वर्ष 2014-15 में 17.15 मिलियन टन हो गया है और इसका उत्पादन 65 वर्षों में बढ़कर मात्र 2 गुना हो गया है। इससे स्पष्ट है कि खाद्यान्न के उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि अनाजों के उत्पादन में हुई और अनाजों के उत्पादन में भी यह वृद्धि गेहूँ के उत्पादन में हुई है।

भारत में खाद्यान्न फसलों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण हम निम्नलिखित तीन अवधियों में कर सकते हैं-

प्रथम अवधि (1949-50 से 1964-65)-यह 'हरित-क्रान्ति' के पहले की अवधि है और इसमें 'गहन जिला कृषि कार्यक्रम' (Intensive Agricultural Districtl. Programme) एवं 'गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम' (Intensive Agricultural Area Programme) का प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ा है।

इस अवधि के दौरान खाद्यान्न के उत्पादन में 3.2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त हुई। मुख्य अनाजों अर्थात् चावल और गेहूँ में उच्च वृद्धि दरें रिकॉर्ड की गई अर्थात् क्रमशः 3.5 प्रतिशत और 4 प्रतिशत किन्तु मोटे अनाजों और दालों में सापेक्षत : कम वृद्धि-दरें रिकॉर्ड की गईं।

द्वितीय अवधि (1965-66 से 1990-91)- यह हरित क्रान्ति' की अवधि है। इसमें अधिक उपज देने वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक दवाइयों एवं कृषि-यन्त्रों का प्रभाव कृषि पर पड़ा है।

इस अवधि में सरकार ने जीव रसायन टेक्नोलॉजी कृषि में इस उम्मीद से चालू को और इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन एवं कृषि उत्पादकता में उन्नति करने में कोई बहुत आश्चर्यजनक भूमिका नहीं निभाई. इसके सिवाय कि गेहूँ के उत्पादन में 50 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हुई और अन्य सभी फसलों के उत्पादन में वृद्धि दर निम्न ही रहीं। मोटे अनाजों और दालों में तो यह बृद्धि नाममात्र की ही थी।

तृतीय अवधि (1991-92 से 2015-16)-इसे हम आर्थिक सुधार के बाद की अवधि या वर्तमान अवधि कह सकते हैं। इस अवधि में चाहे कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है किन्तु यह निरन्तर नहीं हुई बल्कि फसलों के उत्पादन में साल-दर-साल लगातार उच्चावचन होते रहे हैं। 2001- 02 से 2007-08 के दौरान खाद्यान्नों के उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर 1.74 प्रतिशत रह गयी जो जनसंख्या की 1.8 प्रतिशत की वृद्धि दर से भी कम थी। 2009-10 में खराब दक्षिण पश्चिम मानसून से और इसके बाद खरीफ खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट परन्तु अच्छी रबी फसल के कारण इसमें 0.4 प्रतिशत तक मामूली सुधार हुआ। सापेक्षतया अच्छे मानसून की वजह से मौजूदा वर्ष में स्थिति में सुधार हुआ और कृषि क्षेत्र में के अग्निम अगुमानों के आसार 5.4 प्रतिशत विकास को आशा है तथा कुल उत्पादन 271.96 मिलियन टन होने की सम्भावना है।

संक्षेप में, भारत में कृषि उत्पादन की प्रवृत्तियों को विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) जबकि हरित-क्रान्ति से पूर्व के काल के दौरान क्षेत्र विस्तार ने कृषि उत्पादन को उन्नति में काफी योगदान दिया, वहाँ 1965 के बाद के काल में कृषि उत्पादिता (Agricultural Productivity) में वृद्धि कृषि उत्पादन में वृद्धि का मुख्य कारण थी।

(ii) गेहूँ को छोड़कर आधुनिक कृषि-टेक्नोलॉजी को अपनाने के बावजूद उत्पादन को वृद्धि दर कायम न रखी जा सकी।

(iii) खाद्यान्न उत्पादन के विभिन्न अंगों से संकेत मिलता है कि जहाँ 1950-51 में अनाजों (Cereals) का भाग खाद्यान्नों में 84 प्रतिशत था उनका भाग बढ़कर 2015-16 में 95 प्रतिशत हो गया, परन्तु इसके विरुद्ध दालों का भाग इसी अवधि में 16 प्रतिशत से घटकर केवल 5 प्रतिशत रह गया।

3. गैर खाद्य फसलों या व्यापारिक फसलों में वृद्धि-योजना काल में गैर–खाद्य फसलों या व्यापारिक फसलों के उत्पादन में होने वाले परिवर्तनों को नीचे सारणी में स्पष्ट किया गया है-

सारणी-व्यापारिक फसल का उत्पादन (मिलियन टन में)

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि-

(i) गैर खाद्य फसलों के क्षेत्र में कपास और पटसन (जूट) के उत्पादन में रुक रुक कर तथा धीमी प्रगति हुई है, जबकि गन्ने के उत्पादन में सतत् रूप से वृद्धि हुई है।

(ii) तिलहनों का उत्पादन वर्ष 1949-50 के 5 मिलियन टन से बढ़कर 2015-16 में 25.25 मिलियन टन हो गया और इसका उत्पादन भी बढ़कर 7 गुना हो गया है।

(iii) गन्ने का उत्पादन 1949-50 के 50 मिलियन टन से बढ़कर 2015-16 में 348.4 मिलियन टन हो गया है अर्थात् इसका उत्पादन भी बढ़कर 7 गुना हो गया है। यह भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

(iv) कपास का उत्पादन वर्ष 19-19-50 में 3 मिलियन गाँठ था जो बढ़कर 2015-16 में 30.15 मिलियन गाँठ हो गया और इसका उत्पादन इन अवधियों में बढ़कर 12 गुना हो गया है। मोटे तौर पर स्पष्ट होता है कि वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन में इन 66 वर्षों में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

भारतीय कृषि की उत्पादकता की प्रवृत्तियाँ (TRENDS OF INDIAN AGRICULTURAL PRODUCTIVITY)

कृषि उत्पादकता का अध्ययन दो प्रकार से किया जाता है-

(1) प्रति हेक्टेअर उत्पादकता या भूमि की उत्पादकता (Productivity per Tectare or Land Productivity)

(2) प्रति श्रमिक उत्पादकता (Per Labour Productivity)|

'भूमि की उत्पादकता' का अर्थ प्रति हेक्टेअर उत्पादन की मात्रा से है, जबकि 'प्रति श्रमिक उत्पादकता' का अर्थ प्रति श्रमिक उपज के मूल्य से होता है। इसके अन्तर्गत एक खेत के कुल उत्पादन को कीमत को उसमें कार्य करने वाले श्रमिकों की संख्या से भाग देकर प्रति श्रमिक उत्पादकता प्राप्त की जाती है।

भारत में कृषि की उत्पादकता का विश्लेषण प्रति हेक्टेअर उत्पादन की मात्रा तथा प्रति श्रमिक उपज की कीमत दोनों दृष्टियों से की जाती है।

राष्ट्रीय आय समिति के अनुमान के अनुसार 1950-51 में कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय र 500 थी जबकि वर्ष 2010 में यह बढ़कर प्रचलित मूल्यों पर र 57,700 हो गई। अतएव योजनाकाल में कृषि क्षेत्र में श्रम की उत्पादकता में थोड़ा-सा सुधार हुआ है, परन्तु अभी भी यह विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है।

प्रति हेक्टेअर उत्पादकता की प्रवृत्तियाँ- भारत में स्वतन्त्रता काल का मुख्य लक्षण सामान्य रूप में कृषि उत्पादिता में गिरावट और विशेषकर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के पहले तीन वर्षों में एक सीमा तक बनी रही जिसे 1950-51 में आयोजन द्वारा दूर किया गया। सिंचाई में विस्तार और कृषि की सघन प्रणाली के उपयोग और साथ ही आधुनिक कृषि व्यवहारों जिनमें संकर बीज (Hybrid Seeds) भी शामिल थे, द्वारा सभी फसलों के प्रति हेक्टेअर उत्पादन में धीरे-धीरे और लगातार वृद्धि प्राप्त की गई। सारणी 3 में प्रति हेक्टेअर उत्पादन में वृद्धि सम्बन्धी आँकड़े दिए गए हैं।

सारणी 5 -प्रमुख फसलों की प्रति हेक्टेअर उत्पादकता (किलोग्राम प्रति हेक्टेअर)

उपर्युक्त सारणी के अंकों से स्पष्ट होता है कि-

1. सभी खाद्यान्नों को प्रति हेक्टेअर उत्पादकता 67 वर्षों में तीन गुना से अधिक हो गई (1950- 51 में 552 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर से बढ़कर 2012-13 में 2,415 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर) । इस अवधि में चावल की उत्पादकता में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है।

2. सर्वाधिक वृद्धि गेहूँ की उत्पादकता में हुई जो 1950-51 में 655 किलोग्राम प्रति हेक अर से बढ़कर 2014-15 में 3,145 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर हो गई अर्थात् लगभग 4 गुनी बृद्धि हुई है।

3. आधुनिक टेक्नोलॉजी को विश्वस्त वर्षा वाले क्षेत्रों या अच्छी सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में लागू करने के परिणामस्वरूप मोटे अनाजों और दालों का उत्पादन अटिया भूमियों को ओर धकेल दिया गया। अत: इन फसलों में उत्पादकता में अधिक वृद्धि प्राप्त नहीं की जा सकी।

4. सबसे निराशाजनक-प्रदर्शन दालों के क्षेत्र में रहा है। वस्तुत: 2001-02 में दालों को उत्पादकता उसी स्तर पर थी जो चार दशक पूर्व 1960-61 में थी। परन्तु 2014-15 में दालों की उत्पादकता कुछ बढ़कर 744 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर हो गई।

5. जहाँ तक मोटे अनाजों का सम्बन्ध है, हाल के वर्षों में मक्का की उत्पादकता में काफी वृद्धि हुई है, जबकि ज्वार व बाजरा की उत्पादकता सापेक्षित रूप से कम बढ़ी है।

अन्य देशों की तुलना में भारत में कृषि उत्पादकता (AGRICULTURAL PRODUCTIVITY IN COMPARISON WITH OTHER COUNTRIES)

योजना काल में यद्यपि भारत में कृषि-उत्पादकता में वृद्धि हुई है, परन्तु विकसित देशों की तुलना में प्रति हेक्टेअर उत्पादकता कम है जैसे कि सारणी के अंकों से स्पष्ट हो जायेगा।

सारणी 6-उच्चतम फसल उत्पादकता : भारत व विश्व (2011-12)

यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश कृषि फसलों में भारत विश्व के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। उदाहरण के लिए, विश्व में धान (चावल) तथा गेहूँ के अधीन भारत में सर्वाधिक क्षेत्र है तथा वह इसका दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, परन्तु उत्पादकता में चावल में भारत का स्थान 52वाँ तथा गेहूँ में 38वाँ है। दालों के अधीन भारत में सर्वाधिक क्षेत्र है और वह विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है परन्तु उत्पादकता में उसका स्थान 138वाँ है।

भारतीय कृषि की कम उत्पादकता के कारण (CAUSES OF LOW PRODUCTIVITY OF INDIAN AGRICULTURE)

कृषि की उत्पादकता के अन्तर्राष्ट्रीय तुलनात्मक अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि भारतीय कृषि की उत्पादनशीलता बहुत कम है। इसके लिए उत्तरदायी कारणों को हम निम्न रूप में मुख्यत: विभाजित कर सकते हैं-

(I) प्राकृतिक कारण (Natural Causes)

1. वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainties of Rains) भारतीय कृषि प्रकृति पर निर्भर है जिसमें विशेष रूप से वर्षा पर, परन्तु वर्षा निश्चित नहीं है। कभी न्यून और कभी अधिक होती है। इसी कारण भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है।

2. भूमि-क्षरण (Land-erosion) शताब्दियों से निरन्तर प्रयोग में आने के कारण भारतीय कृषि-भूमि का ह्रास हो गया है। निरन्तर क्षरण से उर्वरा-शक्ति का ह्रास हुआ है तथा भारतीय भूमि की उत्पादकता बहुत कम हो गयी है।

3. प्राकृतिक प्रकोप (Natural Calamitics) शीत ऋतु में कई बार शोत लहर हमारी फसलों को हानि पहुँचा देती है। इसके अतिरिक्त बाढ़, आँधी तथा कीड़े मकोड़े, टिड्डी आदि भी कृषि को नुकसान पहुंचाते हैं। इन सभी बाधाओं का कृषि की उत्पादकता एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(II) तकनीकी कारण ('Technological Causes,

1. उत्पादन की पुरानी तकनीक (Old Techniques of Production—आज भी अधिकांश किसान उत्पादन की पुरानी तकनीक-लकड़ी के हल व खुरपी को काम में ला रहे हैं, जबकि बाजार में आधुनिक इस्पात के हल, ट्रैक्टर, श्रेसिंग मशीन, पानी के लिए डीजल पम्प आदि उपलब्ध हैं।

2. उत्तम बीज का अभाव (Shortage of Improved Seeds) भारतीय किसान फसलों की बुआई के समय अच्छे बीज की ओर विशेष ध्यान नहीं देता है। प्रथम, वह अच्छा-बुरा सब प्रकार का बीज बो देता है। दूसरे, अच्छे बीज भी उपलब्ध नहीं होते। वह प्रायः महाजन से बीज खरीदता है जो उससे मूल्य अधिक लेकर भी खराब बोज देता है। तीसरे, भारत में अच्छे बीजों का अभाव है और किसान को उसका ज्ञान भी नहीं है। इस कारण प्रति हेक्टेअर उत्पादकता का स्तर निम्न रहता है।

3. अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ (Inadequacy of Irrigation Facilities) भारतीय कृषि अधिकांशतः मानसून पर ही निर्भर है और गानसून अक्सर अनियगित रहता है। अतः ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है किन्तु दुर्भाग्य है कि देश में आज भी सिंचाई केक्षसाधनों का घोर अभाव बना हुआ है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना अत्यधिक कठिन होता है। परिणामस्वरूप भारतीय कृषि को दशा सुधर नहीं सकी है।

4. फसलों की असुरक्षा (Insecurity of Crops)—भारत में निम्न उत्पादकता का एक कारण फसलों की कीड़े मकोड़ों व रोगों से सुरक्षा न कर पाना भी है। राष्ट्रीय व्यावहारिक आर्थिक शोष संस्थान के अनुसार, भारत में कुल खाद्यान्नों का 16 प्रतिशत भाग इन कीड़ों व रोगों से नष्ट हो जाता है।

5. खाद की कमी (Shortage of Fertilizers) खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए खाद का बहुत अधिक महत्व है परन्तु भारत के किसान उचित मात्रा में खाद का उपयोग नहीं करते हैं। गोबर की खाद जो बहुत उपयोगी व सस्ती है, उसका 60 प्रतिशत भाग जला दिया जाता है। रासायनिक खाद महँगी होती है और काफी मात्रा में विदेशों से मंगवानी पड़ती है। इसलिए रासायनिक खाद पूरी मात्रा में नहीं मिलती है।

(III) संस्थागत कारण (Institutional Causes)

1. भूमि का उप-विभाजन एवं अपखण्डन (Sub-division and Fragmentation of Land)—भारत में उत्तराधिकारी नियमों के कारण भूमि का बँटवारा होता रहता है। इससे खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। ये छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए हैं। इस कारण आधुनिक यन्त्रों द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

2. दोषपूर्ण भू-धारण प्रणाली (Defective Tenure System) भारत में दोषपूर्ण भू-धारण प्रणाली होने के कारण सरकार, भूमि स्वामी एवं जींदार आदि ने कृषि की स्थिति को सुधारने के लिए रुचि नहीं ली। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय कृषि आज भी पिछड़ी हुई हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् यद्यपि जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया गया है किन्तु फिर भी देश में बटाई फसल व काश्तकारी प्रथाएँ आज भी पायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त भूमि सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हुआ। फलतः भारतीय कृषि की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है।

(IV) आर्थिक कारण (Economic Causes)

1. भारतीय कृषकों की ऋणग्रस्तता (Indebtness of Indian Farmers) भारतीय कृषक ऋण के बोझ से लदे हैं। अंग्रेज़ शोधकर्ता सर मैल्कम डार्लिंग ने 1925 में कहा था, "भारतीय कृषक ऋण में जन्म लेता है, ऋण में जीवन व्यतीत करता है और ऋण में ही प्राण त्याग देता है।" अतः भारतीय कृषकों के सामने वित्तीय कठिनाइयाँ हैं और वे भूमि सुधार आदि में पर्याप्त पूँजी लगाने में असमर्थ हैं। इसके कारण भी हमारी कृषि की उपज कम है।

2. पूँजी का अभाव (Shortage of Capital)—भारत अर्द्ध-विकसित देश है जहाँ प्रति व्यक्ति आय कम है तथा भारतीय कृषि में प्रति हेक्टेअर व प्रति व्यक्ति उत्पादन अपेक्षाकृत कम है जिसकी वजह से भारतीय कृषक के पास पर्याप्त मात्रा में बचत नहीं हो पाती। बचत कम होने पर कृषक, कृषि क्षेत्र में उत्तम साधनों का प्रयोग करने में असमर्थ रहता है। इसी कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता निम्न है तथा पिछड़ी हुई अवस्था में बनी हुई है।

3. दोषपूर्ण कृषि बाजार व्यवस्था (Defective Agricultural Marketing System)- भारत में कृषि वस्तुओं के क्रय विक्रय के लिए सुसंगठित और सुव्यवस्थित बाजार का अभाव रहा है। अतः वे अपनी कृषि-उत्पादित वस्तुओं की बिक्री उचित मूल्य पर नहीं कर पाते।

4. साख-सुविधाओं का अभाव (Lack of Credit Facilities) ग्रामीण क्षेत्रों में साख- सुविधाओं का आज भी अभाव बना हुआ है। अतः कृषकों को अपनी वित्त पूर्ति के लिए गाँव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। गाँव का साहूकार ऊँची ब्याज दर तो वसूल करता ही है किन्तु साथ हो कृषकों के साथ धोखाधड़ी भी करता है। एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फँस जाता है, उसका बाहर निकलना कठिन हो जाता है।

5. बढ़ती हुई कृषि उत्पादन लागत (Increasing Agricultural Production Costs)- स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में सिंचाई के लिए पानी-दर, रासायनिक खादों के मूल्य एवं भूमि-कर में काफी वृद्धि हुई है जिसके कारण कृषि-क्षेत्र में उत्पादन लागत काफी अधिक हो गयी है। उत्पादन लागत अधिक होने से बचतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बचत कम होने पर कृषि क्षेत्र में विनियोग नहीं हो पाता तथा विनियोग के अभाव में कृषि अविकसित हो जाती है।

(V) अन्य घटक (Other Causes)

1. कृषि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव (Excessive Pressure of Population on Agriculture)–भारत की लगभग 52 प्रतिशत जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है परन्तु इस 52 प्रतिशत कृषि जनसंख्या द्वारा कुल राष्ट्रीय आय का वर्तमान में केवल 18.5 प्रतिशत भाग उत्पन्न किया जाता है। इसका कारण यह है कि कृषि पर आवश्यकता से अधिक लोग आश्रित हैं। यह उत्पादकता कम होने का एक प्रमुख कारण है।

2. धार्मिक एवं सामाजिक कारण (Religious and Social Causes) भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अन्धविश्वासी है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा ब्याह-शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से भी अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

3. शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता (Physical and Mental Weakness)—कृषि की अवनति का एक प्रमुख कारण किसानों की शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता है जिस कारण वे खेत में अधिक परिश्रम नहीं कर पाते हैं। ये आये दिन बीमार रहते हैं, इस प्रकार कृषि उत्पादन घट जाता है।

योजनाओं में कृषि विकास (AGRICULTURAL DEVELOPMENT IN PLANS)

विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि एवं सम्बन्ध क्षेत्र पर कुल व्यय एवं कृषि क्षेत्र में वृद्धि दर को नीचे सारणी में दर्शाया गया है

सारणी 7-विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि क्षेत्र में परिव्यय एवं वृद्धि दर ।

उपर्युक्त सारणी के अंकों से स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि विकास दर अत्यन्त अनियमित रही है।

कृषि क्षेत्र को ग्यारहवीं योजना (2007-2012) में विशेष प्राथमिकता दी गयी है। ग्यारहवीं योजना में कृषि तथा सम्बन्धित क्रियाओं के विकास पर ₹ 1,36,381 करोड़ खर्च किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस योजना में कृषि विकास दर को वर्तमान 2 प्रतिशत से दुगुना करके 1 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

11वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर 2007-08 में 5.8 प्रतिशत, 2008-09 में (-) 0.1 प्रतिशत, 2009-10 में 0.4 प्रतिशत तथा वर्ष 2010-11 में 7 प्रतिशत अनुमानित को गई थी। 11वीं योजना की लक्षित वार्षिक औसत 4 प्रतिशत की दर प्राप्त करने के लिए 2011-12 में 8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर प्राप्त करने की आवश्यकता थी, किन्तु 11वीं योजना के दौरान औसत वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत ही अनुमानित की गई है। बारहवीं योजना के दो वर्षों 2012-13 तथा 2013-11 में कृषि विकास दरें क्रमश: 1.4 प्रतिशत तथा 4.7 प्रतिशत दर्ज की गई हैं। राष्ट्रीय आय लेखांकन को संशोधित विधि के अनुसार स्थिर कीमतों (2011-12) पर सकल मूल्यवर्द्धन (Gross Value Added) में विकास दर 2016-17 में 4.1 प्रतिशत आकलित की गई है, जबकि 2015-16 में यह 1.2 प्रतिशत थी।

देश में कृषिगत उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हेतु 12वीं पंचवर्षीय योजना में संचालित केन्द्रीय मिशन एवं अन्य योजनाएँ

मिशन

1. नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन (NFSM)

2. नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर ( NMSA)

3. नेशनल मिशन ऑन ऑइलसीड्स एण्ड ऑइल पाम (NMOOP)

4. नेशनल मिशन ऑन एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन एण्ड टेक्नोलॉजी (NMART)

5. मिशन ऑफ इण्टीग्रेड डेवलपमेण्ट ऑफ हॉर्टीकल्चर। (MIDH)

केन्द्रीय योजनाएँ

1. नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस स्कीम (NCIS)

2. इण्टीग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चर कोऑपरेशन (ISAC)

3. इण्टीग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चर मार्केटिंग (ISAM)

4. इण्टीग्रेटेड स्कीम ऑन एग्रीकल्चर सेंसज इकोनॉमिक्स एण्ड स्टेटिस्टिक्स (ISACE & S)

5. सेक्रेटेरिएट इकोनॉमिक सर्विस (SES)

राज्य योजना के तहत् योजना

1. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)

उपर्युक्त जानकारी केन्द्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्य मन्त्री द्वारा लोक सभा में 22 जुलाई, 2014 को दी गई।

उपर्युक्त पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत कृषि के पिछड़ेपन, उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए जो कार्यक्रम किए गए हैं उनका संक्षेप में वर्णन नीचे किया जा रहा है

कृषि उत्पादकता में वृद्धि हेतु सरकार द्वारा उठाये गये कदम (कृषि नीति) (STEPS TAKEN BY THE GOVERNMENT TO INCREASE AGRICULTURAL PRODUCTIVITY (AGRICULTURAL POLICY)

सन् 1951 के पश्चात् कृषि विकास के लिए अपनाये गये उपायों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है-

I. तकनीकी उपाय तथा II. संस्थागत उपाय।

I. तकनीकी उपाय (TECHNOLOGICAL METHODS)

1. अधिक उत्पादन देने वाले बीज (H.Y.V. Seeds)—भारत में अधिक उपज देने वाले बीजों का बीजारोपण सन् 1964-65 से शुरू हुआ है। इससे भारतीय कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि सम्भव हो सकी है। चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का व कपास के अधिक उपज देने वाले बीज तैयार करके इन्हें समुचित रूप से कृषकों के मध्य वितरित करने तथा इनके उत्पादन में वृद्धि हेतु राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना की गयी है।

18 जून, 2002 को राष्ट्रीय बीज नीति, 2002 का अनुमोदन किया गया। नई पौध प्रजातियों के विकास हेतु अनुसन्धान को बढ़ावा देकर बीज क्षेत्र के नियोजित विकास के लिए इस क्षेत्र में विनियोग को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से बौद्धिक सम्पदा संरक्षण (Intellec | Property Protection) का पर्याप्त प्रावधान इस नीति के तहत् है।

2. उर्वरक का अधिक उपयोग (More Use of ilizers)—कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हेतु खाद के उपयोग में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। पशुओं के गोबर को ईंधन की तरह उपयोग करने के बजाय खाद के रूप में उपयोग करने के लिए समुचित प्रयास किये गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कम्पोस्ट खाद के निर्माण में वृद्धि हुई है, साथ ही रासायनिक खादों का प्रयोग भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2009-10 में उर्वरकों का कुल उत्पादन 162.2 आयात 95.5 लाख टन था।

3. सिंचाई का विस्तार (Expansion of Irrigation)—कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हेतु सिंचाई के साधनों का बहुत अधिक विस्तार किया गया है। नियोजन काल के दौरान भारत में अनेक छोटी-बड़ी सिंचाई योजनाएं शुरू की गयी हैं। 1951 में जहाँ मात्र 18 प्रतिशत भूमि पर सिंचाई की व्यवस्था हो पाती थी, वहाँ अब यह प्रतिशत बढ़कर लगभग 50 प्रतिशत हो गया है। देश में बहु-उद्देशीय योजनाओं तथा ट्यूबवैलों के निर्माण से सिंचित क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

4. पौध संरक्षण (Plant Protection)—फसलों को रोगों तथा कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किये गये हैं। इस हेतु 14 केन्द्रीय फसल संरक्षण केन्द्रों की स्थापना की गयी है।

5. कृषि विकास हेतु विभिन्न संस्थाओं की स्थापना (Establishment of Different Institutions for Agriculture Development)— कृषि विकास की योजनाओं के क्रियान्वयन एवं कुशल प्रशासन हेतु हरित क्रान्ति में अनेक संस्थाएँ स्थापित की गयी हैं। जैसे-1963 में राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना, कृषि वित्त व्यवस्था के लिए कृषि पुनर्वित्त निगम, उर्वरकों की पूर्ति के लिए उर्वरक निगम आदि।

6. कृषि सेवा केन्द्र (Agro-service Centre) तकनीकी व्यक्तियों में व्यावसायिक साहस की क्षमता को विकसित करने के उद्देश्य से कृषि सेवा केन्द्र स्थापित करने की योजना लागू की गयी है।

इस योजना में पहले व्यक्तियों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर इनसे कृषि सेवा केन्द्र स्थापित करने के लिए कहा जाता है।

7. बहुफसली कार्यक्रम (Multiple Cropping Pattern)—बहुफसली कार्यक्रम का उद्देश्य एक ही भूमि पर वर्ष में एक से अधिक फसल उगाकर उत्पादन बढ़ाना है। यह कार्यक्रम 1976-68 में लागू किया गया था। इसके लिए इस समय 57 अग्रगामी परियोजनाएँ चलायी जा रही हैं जिनमें से दो या तीन फसलों को पैदा करने से सम्बन्धित प्रयोग एवं प्रदर्शन किये जाते हैं।

8. यन्त्रीकरण (Mechanisation)—कृषि यन्त्रों, ट्रैक्टरों तथा अन्य उपकरणों के प्रयोग को लोकप्रिय बनाने के लिए कई प्रयत्न किये जा रहे हैं। छोटे किसानों को सहकारी समितियों, सामुदायिक विकास खण्डों तथा बैंकों से कृषि यन्त्रों को खरीदने के लिए सस्ती ब्याज पर पूँजी प्राप्त होती है। लगभग सभी राज्यों में इस उद्देश्य के लिए कृषि उद्योग निगम स्थापित किये गये हैं।

9. वैज्ञानिक ढंग से कृषि (Scientific Method of Agriculture)—पंचवर्षीय योजनाओं में वैज्ञानिक ढंग से खेती करने पर बहुत अधिक बल दिया गया। इसके अन्तर्गत फसलों, उनको किस्मों का चुनाव, भूमि की तैयारी, फसल हेर-फेर, बीज का चुनाव, खाद का उचित प्रयोग, सूखी खेती आदि से सम्बन्धित बढ़िया कृषि विधियों को अपनाने के प्रयत्न किये गये हैं।

10. कृषि भूमि का विकास (Development of Agriculture Land)-पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कृषि भूमि के विकास के लिए काफी प्रयत्न किये जा रहे हैं। भूमि को समतल बनाने, उसे ढलान देने, कण्टूर बनाने, सीढ़ीदार खेत बनाने आदि के प्रबन्ध किये गये हैं तथा भूमि सर्वेक्षण किया जा रहा है।

11. पशुपालन में सुधार (Improvement of Animal Husbandry)—पंचवर्षय योजनाओं के अन्तर्गत पशुओं को गस्ल सुधारने के लिए आधार ग्राम योजना (Key Village Scheme) शुरू की गयी है। पशुओं की बोमारी का इलाज करने के लिए चिकित्सालय खोले गये हैं।

12. ग्रामीण विद्युतीकरण (Rural Electrification) कृषि क्षेत्र की बिजली उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (Rural Electrification Corporation) की स्थापना की गयी है। 1950-51 में केवल 3,000 गाँवों को बिजली मिलती थी, 31 मार्च, 2015 तक लगभग 99% गाँवों का विद्युतीकरण किया जा चुका है।

13. भूमि परीक्षण (Land Testing) हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए भूमि परीक्षण का कार्यक्रम भी बनाया गया है। इसके अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टियों का परीक्षण सरकारी प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है। इन परोक्षों द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में किस प्रकार की खाद का प्रयोग किया जाये तथा कौन से बीज बोये जायें जिनके फलस्वरूप उचित फसलों का उत्पादन किया जा सके।

14. अन्य तकनीकी आय

(i) कृषि अनुसन्धान पर अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है।

(ii) जैव-प्रौद्योगिकी फसलों को विकसित किया जा रहा है।

(iii) टो.बी., रेडियो चैनलों द्वारा कृषकों को शिक्षित किया जा रहा है।

(iv) कृषि सम्बन्धी समस्याओं पर विशेषज्ञों की सलाह के लिए किसान सेण्टरों को शुरुआत की गई है।

II. संस्थागत उपाय (INSTITUTIONAL METITODS)

1. फसलों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि (Increase in the Area of Undercultivation)- किसी भी देश के फसलों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि मुख्यतः दो कारणों से होती है-शुद्ध बोये गये क्षेत्र में बृद्धि से तथा बहुफसली कृषि से जिसमें कि एक ही क्षेत्र में एक ही वर्ष के दौरान एक से अधिक फसलें उगायी जाती हैं। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत दोनों उपायों द्वारा फसलों के अधीन कृषि विकास को पूरा किया गया है। योजना काल में फसलों के अधीन क्षेत्र में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

2. भूमि-सुधार (Land Reform) स्वतन्त्रता के पश्चात् सरकार ने भूमि सम्बन्धी कई महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। जैसे-[i) जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया गया है। खेती करने वाले काशाकारों को भी भूमि का दायित्व या मारूसी काश्तकार के अधिकार प्राप्त हो गये हैं। (ii) काश्तकारी प्रथा में सुधार करने के लिए विभिन्न राज्यों में कानून पास किये गये हैं। (i) भूमि को जोतों पर उच्चतम सीमा निर्धारित कर दी गयी है। (iv) एक बड़े क्षेत्र की भूमि को चकबन्दी कर दी गयी थी। (v) सहकारी खेती को प्रोत्साहित किया गया।

3. साख्न सम्बन्धी सुविधाओं में सुधार (Improvement in Credit Facilities)-कृषि विकास के लिए सरकार ने साख सुविधाओं के विस्तार के लिए कई उपाय किये, ताकि किसानों को कम ब्याज पर उचित समय में उचित मात्रा में पर्याप्त ऋण मिल जये। जैसे-सहकारी साख समितियों, भूमि विकास बैंकों, ग्रामीण क्षेत्रीय बैंकों व किसान सेवा समितियों की स्थापना की गयी। कृषि वित्त सम्बन्धी सर्वोच्च संस्था राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक नाबाई (National Bank for Agriculture and Rural Development) को स्थापना की गयी है।

4. बिक्री में सुधार (Improvement.in Marketing) कृषि वस्तुओं बिक्री में सुधार का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनको उपज की लंचित कीमत दिलवाना है। इसके लिए विशेष रूप से निम्नलिखित दशाओं में प्रयत्न किया गया है-

(i) नियमित मण्डियाँ (Regulated Markets) नियमित मण्डियों का प्रबन्ध सरकार द्वारा नियुक्त बिक्री समिति (Marketing Committee) करती है। इनका उद्देश्य किसानों को मध्यस्थों के शोषण से बचाना है। इन मण्डियों में बाँटों की मीट्रिक प्रणालो प्रयोग की जाती है।

(ii) न्यूनतम समर्थन कीमत (Minimum Support Price)—इसके अधीन सरकार उत्पादकों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम कीमत देने का विश्वास दिलाती है। सरकारी व्यापारी एजेन्सियाँ समर्थन कीमत पर किसानों द्वारा बेची जाने वाली सारी मात्रा के खरीदने का प्रबन्ध करती हैं। गेहूँ, चावल, कपास, चने आदि अनाजों पर यह नीति लगू की गयी है।

(iii) सहकारी बिक्री समितियाँ (Co-operative Marketing Societies)—सहकारी बिक्री समितियों की स्थापना भो कृषि बिक्री में सुधार करने के लिए की गयी है। ये समितियाँ अपने सदस्यों की उपज उचित कीमत पर बेचती हैं तथा अपने सदस्यों की उपज की ग्रेडिंग का प्रबन्ध भी करती हैं। ये समितियाँ भण्डार तथा गोदाम की सुविधाएँ भी प्रदान करती हैं।

(iv) एकल बाजार (Single Market)-कृषि में अभी भी विद्यमान विभिन्न नियन्त्रणों और प्रतिबन्धों को हटाने के लिए सम्पूर्ण देश को किसान के लिए एकल्न बाजार के रूप में स्थापित कर दिया गया है।

(v) ई राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM)—कृषि विपणन में मध्यस्थों की भूमिका को कम से कम करके कृषकों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाने के उद्देश्य से 14 अप्रैल, 2016 को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने E-NAM नामक राष्ट्रीय कृषि बाजार का शुभारम्भ किया। इस बाजार के माध्यम से देश की प्रमुख 21 बड़ी मण्डियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से आपस में जोड़ दिया गया। e-NAM एकीकृत बाजार प्रणाली है, जिसमें अन्तत : देश को 2477 प्रमुख मण्डियाँ 4843 छोटी पण्डियाँ आपस में जुड़ जाएंगी। इस बाजार का सारा लेन-देन इलेक्ट्रॉनिक रूप से ऑनलाइन होगा। मण्डियों में लाए जाने वाले उत्पाद की गुणवत्ता एवं श्रेणीयन निर्धारण को व्यवस्था की जाएगी। इस प्रणाली को अपनाने से पूर्व सम्बन्धित राज्य सरकारों को कृषि उत्पादन मण्डी समिति अधिनियम में संशोधन करना पड़ेगा।

(vi) कृषि में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी- खेती में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, जिसे ई-कृषि भी कहते हैं, का काफी तेजी से विकास हो रहा है और कृषि पर प्राथमिक ध्यान के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में ई-कृषि के प्रयोग के नए तरीके अजमाए जा रहे हैं। कृषि में आई सीटी खेती की कुछ चुनौतियों के विभिन्न प्रकार के समाधान पेश करती है। इसे उभरत हुआ क्षेत्र माना जा रहा है जो बेहतर सूचना एवं संचार प्रक्रियाओं के जरिए कृषि तथा ग्रामीण विकास में तेजी लाने पर केन्द्रित हैं। राष्ट्रीय कृषक नीति में भी किसानों के सही सलाह एवं आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए आई सोटी के उपयोग पर जोर दिया गया है।

5. अन्य संस्थागत सुझाव-

(i) सरकार विभिन्न फसलों के लिए वसूलो व समर्थन कोमतों की प्रतिवर्ष घोषणा करती है।

(ii) सिंचाई, बिजलो तथा उर्वरक आदि पर सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं।

(iii) खाद्य सुरक्षा हेतु व्यापक वितरण प्रणाली की स्थापना की गई है।

(iv) ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।

(v) राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की शुरुआत की गई है।

(vi) ग्रामीण आर्थिक संरचन को मजबूत किया जा रहा है।

(vii) वैज्ञानिक भण्डारण व गोदाम की व्यवस्था की जा रही है।

(viii) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना शुरू की गई है।

भारतीय कृषि के सन्तोषजनक विकास के लिए सुझाव व सम्भावनाएँ (SUGGESTIONS AND PROSPECTS OF FOR SATISFACTORY AGRICULTURAL DEVELOPMENT OF INDIA)

देश में आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के लिए कृषि विकास अनिवार्य है। कृषि विकास के लिए कृषि उत्पादकता को बढ़ाना आवश्यक है। इस हेतु निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं-

1. सिंचाई सुविधाओं का विकास एवं विस्तार (Development and Expansion of Irrigation)—चूंकि भारतीय कृषि अधिकांश रूप से मानसून पर आधारित है । अत: सिंचाई के साधनों को बढ़ाने का प्रयत्न करना आवश्यक है। उनमें सिंचाई की छोटी, बड़ी तथा मध्यम तीनों ही श्रेणियों के साधनों का विकास किया जाना चाहिए और इसका पूरे देश में आवश्यकतानुसार विस्तार एवं विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए।

2. साख की सुविधाओं में सुधार (Improvement in Credit Facilities) कृषि क्षेत्र में नवीन तकनीक को प्रोत्साहन देने के लिए किसान को पर्याप्त साख-सुविधाएँ उचित शर्तों पर उपलब्ध होनी चाहिए जिससे वह आधुनिक औजार व रासायनिक खाद आदि क्रय कर सकें।

3. जनसंख्या का दबाव कम किया जाये (Reduction in Population Pressure) कृषि पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना की जाय, ताकि ग्रामों में कृषि कार्य पर लगा हुआ जनसंख्या का कुछ हिस्सा इन उद्योगों में रोजगार प्राप्त कर सके। ग्रामों में उद्योगों की स्थापना के लिए पर्याप्त विद्युत व्यवस्था करना भी आवश्यकता होगा।

4. कृषि विपणन-व्यवस्था का विकास (Development of Agricultural Marketing System) कृषकों को उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त होना आवश्यक है, तभी उनकी स्थिति में सुधार हो सकता है और कृषि उत्पादन बढ़ाने में उन्हें प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके लिए अधिकाधिक कृषि विपणन समितियाँ एवं मण्डियाँ स्थापित की जानी चाहिए।

5. श्रेष्ठतर तकनीकों और उन्नत औजारों को अपनाना (Adoption of Best Techniques and Best Equipment) उत्पादकता में वृद्धि के लिए, श्रेष्ठतर तकनीकों और उन्नत औजारों को अपनाया जाना जरूरी है परन्तु भारत में किसानों का संकुचित दृष्टिकोण, निर्धनता व अशिक्षा आदि के कारण उन्नत और आधुनिक फार्म मशीनरी का अधिक उपयोग नहीं हो रहा है फिर भी विगत वर्षों में कुछ उद्यमी कृषकों ने इस दिशा में प्रगति की है।

6. उन्नत बीजों का उपयोग (Use of Improved Seeds) उन्नत बीजों के द्वारा उत्पादन को बहुत अधिक बढ़ाया जा सकता है। हर्ष की बात यह है कि भारत में कृषि विभाग, इण्डियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च, नेशनल सीड कॉरपोरेशन आदि अनेक संस्थाओं ने उनत बीजों के विकास और उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत प्रयत्न किये हैं। राष्ट्रीय बीज नीति, 2002 के तहत् उन्नत बीजों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

7. उर्वरक उपभोग-स्तर को बढ़ाना (Increase in Fertilizer Consumption)-भूनि की उर्वरा-शक्ति को बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उर्वरक के उपभोग-स्तर के बढ़ जाने से कृषि उत्पादन और उत्पादकता को दर बढ़ेगी।

8. भूमि-सुधार (Land R:forIns) कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सुझाव दिया जाता है कि भूमि-सुधार कानूनों को प्रभावकारी ढंग से लागू लिया जाना चाहिए जिससे कि वास्तविक कृषक भूमि का मालिक बन सके तथा भूमि की जोत का आकार भी । बहुत छोटा न हो सके।

9. मिश्रित खेती (Mixed Agriculture) भारत में मिश्रित खेती होनी चाहिए। फसलों का गाना, पशुपालन तथा सब्जियाँ व फल उगाना साथ-साथ होना चाहिए। डेरी फार्मिंग के काम को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए। इससे एक तो पशुओं को दशा सुधरेगी। दूसरे, किसानों को अधिक पौष्टिक भोजन मिलेगा जिससे वे अधिक बलबान होंगे।

10. कृषि विपणन में सुधार (Improvement in Agricultural Marketing) कृषि क्रय-विक्रय में सुधार किया जाना चाहिए जिससे किसानों को अपनी फसल का पूरा धन मिल सके। इसके लिए नियन्त्रित मण्डियाँ (Regulated Markets) खोली जानी चाहिए। सहकारी समितियाँ (Co-operative Marketing Societies) स्थापित की जानी चाहिए। गोदाम बनाये जाने चाहिए जिनमें किसान अपनी फसल रख सकें। यातायात के साधनों का विकास किया जाना चाहिए।

11. पशुओं की स्थिति में सुधार (Improvement in Animals Condition)-पशु धन कृषि की महत्वपूर्ण पूँजी है किन्तु हमारे देश में इसको स्थिति बड़ी दयनीय है। अत: इसमें सुधार करने का प्रयत्न हमें इनके लिए चारा, चिकित्सा एवं नस्ल-सुधार की व्यवस्था करके करना चाहिए।

12. किसानों के शिक्षण एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था (Education and Training of Farmers) कृषि की नई व आधुनिक प्रणालियों से हमारे किसान अनभिज्ञ हैं। कृषि की नई रीतियों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। योग्य एवं शिक्षित भारतीय कृषकों को विदेशों में प्रशिक्षण हेतु भेजा जाना चाहिए।

13. कृषि-अनुसन्धान का विस्तार (Expansion of Agriculture Research)—भारतीय कृषि प्रणाली में अनेक प्रकार के अनुसन्धानों का पर्याप्त क्षेत्र है। अत: इसमें अनुसन्धान का विस्तार किया जाना चाहिए और किये गये अनुसन्धानों को व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाया जाना चाहिए। इससे कृषि में सर्वांगीण सुधार हो सकता है। इस दिशा में भी प्रयत्न तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। कई कृषि अनुसन्धान संस्थान स्थापित किये जा चुके हैं।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि (ACRICULTURE IN TWELFTH FIVE YEAR PLAN)

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि को समावेशी विकास के साथ-साथ ग्रामीण गरीबी कम करने वाले प्रभावी उपकरण के रूप में पहचाना गया है। इससे न केवल भू-स्वामी किसानों की कृषि-आय में वृद्धि होती हैं, बल्कि भूमिहीन मजदूरों की आय बढ़ाने में भी सहायक है। यही कारण है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 4% की कृषि संवृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया है।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार, इस संवृद्धि दर को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्य करने की आवश्यकता है-

(i) जल प्रबन्धन, (ii) मृदा पोषण का प्रबन्धन, (iii) रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कुशलता, (iv) फार्म क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराना, (v) वर्षा सिंचित कृषिको बढ़ावा देना, (vi) बीज बैंकों की रचना, (vii) पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्रों को सुदृढ़ करना, (viii) लघु उत्पादकों को बाजार से जोड़ना, (ix) विपणन में सुधार ।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना तथा कृषि क्रियाओं का एकीकरण- मिशन-बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए RKVY को छोड़कर शेष सभी क्रियाओं को नीचे दिए गये मिशनों में मिला दिया गया है-

(i) राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन;

(ii) नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट;

(iii) नेशनल मिशन ऑन ऑवलसीड्स एण्ड ऑयल मॉम;

(iv) नेशनल मिशन ऑल एग्रीकल्चरल एक्सटेन्सन एण्ड टेक्नोलॉजी;

(v) नेशनल हॉर्टीकल्चर मिशन ।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में प्रौद्योगिकी को कृषि विकास का इंजन घोषित करते हुए कृषि अनुसन्धान पर विशेष बल दिए जाने की बात कही गई है। बारहवीं योजना में सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर विशेष बल दिया गया है ताकि कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ाया जा सके।

नई राष्ट्रीय कृषि नीति, 2000 (NEW NATIONAL AGRICULTURAL POLICY, 2000)

उद्देश्य (Object)—केन्द्र सरकार ने नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा 28 जुलाई, 2000 को की है। नई राष्ट्रीय कृषि नीति के मुख्य उद्देश्य निम्न प्रकार हैं-

1. कृषि क्षेत्र में प्रति वर्ष 4 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर प्राप्त करना।

2. वृद्धि, जो संसाधनों के कुशल उपयोग पर आधारित है तथा अपनी गदा, जल और जैव विविधता का संरक्षण करना।

3. साम्य वृद्धि अर्थात् वृद्धि, जो क्षेत्र-दर-क्षेत्र तथा किसान-दर-किसान व्याप्त है।

4. ऐसी वृद्धि जो माँग के अनुसार हो और स्वदेशी बाजारों की माँग को पूरा करे तथा आर्थिक उदारीकरण और विश्वव्यापीकरण से उत्पन्न चुनौतियों की स्थिति में कृषि उत्पादों के निर्यात से अधिकतम लाभ मिल सके।

5. वृद्धि, जो प्रौद्योगिकीय, पर्यावरणीय तथा वित्तीय रूप से दीर्घकालीन हो।

विशेषताएँ (Features)—नई राष्ट्रीय कृषि नीति को प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए नई तकनीक का उपयोग करना।

2. कृषि वस्तुओं को बायदा आजारों (Puture Markets) के क्षेत्र में चरणबद्ध तरीके से लाना।

3. देश की निर्यात आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य निश्चित करना, बन्धक वित्तीयन (Pledge Financing) को बढ़ावा देना।

4. जोखिम प्रबन्धन एवं विकास प्रक्रिया को तेज करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना।

5. कृषि क्षेत्र को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान का उपयोग करना।

6. विश्व व्यापार संगठन (WTO) के दुष्प्रभाव से कृषकों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक उपाय करना।

7. व्यापार सम्बद्ध बौद्धिक सम्पदा अधिकार (TRIPS) समझौतों के अन्तर्गत भारत की बाध्यता के अनुरूप एक कानून बनाकर शोध एवं नई प्रजातियों के प्रजनन द्वारा विशेष रूप से निजी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के पादपों का संरक्षण करना।

8. भूमि-सुधार के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में ग्रामीण गरीबों को अधिकाधिक समृद्ध करना।

9. प्रौद्योगिकी तथा संसाधनों का प्रभावी प्रयोग सुनिश्चित करना।

10. कृषकों को उनकी समग्र आवश्यकताओं के अनुरूप साख मुहैया कराना।

11. मौसमी तथा कीमतगत उच्चावचनों से कृषकों को संरक्षण प्रदान करना

राष्ट्रीय कृषक नीति, 2007 (NATIONAL POLICY FOR FARMERS,2007)

भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषक आयोग की सिफारिशों को मानते हुए और राज्य सरकारों से परामर्श करने के बाद राष्ट्रीय कृषक नीति को मन्जूरी दे दी है। राष्ट्रीय कृषक नीति में अन्य बातों के साथ-साथ फार्म क्षेत्र के विकास के लिए सम्पूर्ण पहुँच प्रदान कर दी है। इसकी कवरेज में व्यापक क्षेत्र शामिल हैं। जैसे-

1. किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उत्पादन व उत्पादकता में सुधार।

2. कृषक परिवारों की परिसम्पत्तियों में सुधार।

3. जल का कुशलतापूर्वक उपयोग।

4. नई प्रौद्योगिकियों का उपयोग।

5. राष्ट्रीय कृषि जैव सुरक्षा प्रणाली का समन्वय ।

6. लघु कृषि को बढ़ावा

7. महिलाएँ जो पूरे दिन खेतों और जंगलों में काम करती हैं, उनके लिए उचित सहायता सेवाएँ।

8. किसानों को उचित दर पर ऋण उपलब्ध कराना।

9. फार्म, स्कूल की स्थापना।

10. कृषकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना।

11. पूरे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य कार्यप्रणाली लागू करना।

12. भोजन सुरक्षा का विस्तार किया जाना।

नीति के कार्यान्वयन को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए एक अन्तर-मंत्रालयीय समिति का गठन किया है

राष्ट्रीय कृषक आयोग एवं नई कृषि नीति (NATIONAL FARMERS COMMISSION AND NEW AGRICULTURE POLICY)

किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए कार्ययोजना का सुझाव देने के लिए वर्ष 2004 में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय कृषक आयोग ने दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, दिसम्बर 2005, अप्रैल 2006 तथा अक्टूबर 2006 में अपनी अन्तरिम रिपोर्ट प्रस्तुत को हैं।

चौथी रिपोर्ट केन्द्रीय कृषि मन्त्री शरद पवार ने 13 अप्रैल, 2006 को प्रस्तुत की थी जिसमें किसानों के लिए एक विस्तृत नीति के निर्धारण की संस्तुति की गई है।

संक्षेप में, नई कृषि नीति के लिए निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया है-

1. सभी कृषिगत उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ।

2. मूल्यों में उतार-चढ़ाव से किसानों की सुरक्षा हेतु मार्केट रिस्क स्टेबलाइजेशन फण्ड का सुझाव।

3. सूखे एवं वर्षा सम्बन्धी जोखिमों से बचाव हेतु एग्रीकल्चर रिस्क फण्ड का सुझाव।

4. सभी राज्यों में राज्य स्तरीय किसान आयोग के गठन का सुझाव।

5. किसानों के लिए बीमा योजनाओं का विस्तार।

6. कृषि सम्बन्धी मामलों स्थानीय पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि।

7. राज्य सरकारों द्वारा कृषि हेतु अधिक संसाधनों के आवण्टन की संस्तुति।

8, केन्द्र एवं राज्यों में कृषि मन्त्रालयों का नाम बदलकर कृषि एवं कृषक कल्याण मन्त्रालय करने का सुझाव।

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