भारत में जनसंख्या समस्या (PROBLEMS OF POPULATION)

भारत में जनसंख्या समस्या (PROBLEMS OF POPULATION)

भारत में जनसंख्या की समस्या अत्यन्त गम्भीर है। जैसा कि हम अध्ययन कर चुके हैं किजनसंख्या की दृष्टि से भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ है। 1901 की जनगणना के अनुसार, इस वर्ष देश की जनसंख्या 23.83 करोड़ थी। इस प्रकार 110 वर्ष की अवधि में देश की जनसंख्या में 97 करोड़ से अधिक की वृद्धि हुई है। यदि इसे सापेक्षिक रूप से धीमी आर्थिक संवृद्धि के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह निश्चित ही जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion) की स्थिति है, "जिसमें देश की जनसंख्या उत्पादन और आय से सम्बन्धित इच्छित जीवन-स्तर की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से बढ़ती है।"

जनाधिक्य की समस्या (PROBLEM OF OVER POPULATION) अथवा जनसंख्या में तीव्र वृद्धि एवं जनसंख्या विस्फोट (RAPID GROWTH IN POPULATION AND POPULATION EXPLOSION)

जनसंख्या की वृद्धि या कमी निम्नलिखित तीन प्रमुख घटनाओं के कारण होती है- 1. जन्म, 2. मृत्यु, एवं 3. देशान्तरण चूँकि राजनीतिक प्रतिबन्धों के कारण देशान्तरण आसानी से सम्भव नहीं है, इसलिए जनसंख्या में वृद्धि मुख्यतः जन्म व मृत्यु पर निर्भर करती है।

(A) जन्म दर अधिक होने के कारण (Causes of High Birth Rate)- भारत में ऊँची जन्म दर होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

I. सामाजिक व धार्मिक कारण (Social and Religious Factors)

भारत में ऊँची जन्म दर के सामाजिक व धार्मिक कारण निम्नलिखित हैं-

1. विवाह की व्यापकता (Universality of Marriage)-भारत में विवाह एक धार्मिक प्रथा तथा सामाजिक दृष्टि से अनिवार्य कृत्य है। अत: हर व्यक्ति शादी करके सन्तान उत्पन्न करना अनिवार्य समझता है।

2. बाल-विवाह (Child Marriage)-यद्यपि वह प्रथा शिक्षा व सामाजिक चेतना के विकास के साथ कम हो गयीं है, तथापि बाल-विवाह प्रथा आज भी देश में विद्यमान है। अतएव उनका सन्तानोत्पादन काल अधिक होता है जिससे वे अधिक बच्चों को जन्म देती है।

3.धार्मिक और सामाजिक अन्धविश्वास (Religious and Social Blind Faitha)- साधारण भारतीय सन्तान का जन्म ईश्वर की देन समझता है और उसमें वह किसी प्रकार का हस्तक्षेप ठीक नहीं समझता। फलत: जन्म दर अधिक रहती है।

4. संयुक्त परिवार प्रथा (Joint Family System)- भारत में अब भी संयुक्त परिवार प्रणाली जीवित है। संयुक्त परिवार का आर्थिक दबाव सम्मिलित रूप से सभी सदस्यों पर रहता है। इसलिए लोगों में उत्तरदायित्व की भावना कम और वे अन्धाधुन्ध सन्तानों की उत्पत्ति करते हैं।

5. ऊँची प्रजनन दर (High Fertility Rate)- इस दर का अर्थ होता है कि 1,000 स्त्रियाँ एक वर्ष में कितनी भावी माताओं को जन्म देती हैं। इस दर के अधिक होने का अर्थ है कि बच्चे पैदा करने वाली अवस्था की स्त्रियों की संख्या बढ़ जाती है। भारत में यह दर 2.9 प्रति हजार है, जबकि जापान में 1.2 प्रतिशत तथा इंग्लैण्ड में 1.3 प्रतिशत है।

6.औसत आयु में वृद्धि (Increase in Average Life)-भारत में लोगों का औसत जीवनकाल 1951 में 32 वर्ष था जो 2013 में बढ़कर 67.5 वर्ष हो गया। इसके फलस्वरूप भी जनसंख्या में वृद्धि हुई है।

7.स्त्रियों की निम्न सामाजिक स्थिति (Low Social Status of Women)_'भारत में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफी निम्न है। उन्हें केवल सन्तान पैदा करने का साधन समझा जाता है। स्त्रियों की कदर उनके बच्चों की संख्या से होती है। वे स्वतन्त्र भी नहीं होती तथा पति को प्रसन्न करना हो उनका धर्म समझा जाता है। इससे भी जन्म-दर बढ़ती है।

II. आर्थिक कारण (Economic Factors).

भारत में ऊँची जन्म-दर के आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं-

1. निर्धनता (Poverty)- भारत एक निर्धन देश है। इस निर्धनता के कारण गरीब पिता को यह आशा रहती है कि उसके बच्चे उसके साथ काम करके उसकी आय में वृद्धि करेंगे। इसलिए वह अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित होता है।

2. कृषि पर निर्भरता (Dependence on Agriculture)-भारत में कृषि मुख्य व्यवसाय है और यहाँ अल्प आयु से ही बच्चे पशुओं को चराने, खेतों की रखवाली करने आदि में पिता का हाथ बँटाने लगते हैं। अत: कृषि कार्य में लगे हुए व्यक्तियों के लिए बच्चे दीर्घकाल तक भार सिद्ध नहीं होते। इसलिए वे अधिक सन्तानों का होना बुरा नहीं समझते। ऐसी स्थिति में जन्म-दर अधिक होना स्वाभाविक है।

3. विचित्र आर्थिक दृष्टिकोण (Unique Economic Views)-भारत में एक बात यह भी है कि शिक्षा तथा दूरदर्शिता के अभाव में लोगों का आर्थिक दृष्टिकोण कुछ विचित्र है। अधिकांश ग्नामीण जनता को यह धारणा है कि जो एक पेट के साथ आता है, उसे भरने के लिए वह अपने साथ दो हाथ और दो पैर भी लाता है। फलत: अधिक बच्चे पैदा करना अभिशाप नहीं बल्कि एक वरदान है।

III. अन्य कारण (Other Factors)

भारत में ऊँची जन्म-दर के अन्य कारण निम्नलिखित हैं-

1. जलवायु में उष्णता (Warm Climate)-भारत की जलवायु गर्म है। गर्म जलवायु के कारण यहाँ लड़कियाँ बहुत कम उम्र में युवावस्था को प्राप्त कर लेती हैं। अत: उनकी शादी कम उम्र में हो जाती है और वे अधिक सन्तान उत्पन्न करती है।

2.शिक्षा का अभाव (Lack of Education)-भारत में अधिकांश जनता अशिक्षित है और जब तक लोग अशिक्षित रहेंगे, उनमें चेतना नहीं होगी तो जनसंख्या वृद्धि की दर ऊँची ही रहेगी।

3. सन्तान निरोधकों की कमी (Shortage of Contraceptives)-भारत में सन्तान निरोधक विधियों का प्रयोग सीमित हैं। इसका कारण प्रथम तो अज्ञानता है और साथ ही वे साधन महँगे हैं। इन उपायों के अभाव में हमारे देश में सन्तानों की वृद्धि होती जा रही है और जनसंख्या को दर बहुत ऊँची है।

(B) घटती हुई मृत्यु-दर (Declining Death Rate)- भारत में तीव्र गति से घटती हुई मृत्यु-दर के लिए उत्तरदायी कारण संक्षेप में निम्नलिखित हैं-

1. चिकित्सा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार,

2. शिशु मृत्यु दर में कमी,

3. रहन-सहन का उच्च स्तर,

4. प्रसूति सुविधाओं में वृद्धि,

5. स्त्रियों की शिक्षा में वृद्धि,

6. विवाह आयु में वृद्धि,

7. मनोरंजन के साधनों का विस्तार ।

जनसंख्या विस्फोट के परिणाम अथवा जनसंख्या वृद्धि का भारत के आर्थिक विकास पर प्रभाव (CONSEQUENCES OF POPULATION EXPLOSION OR EFFECT OF INCREASE IN POPULATION ON ECONOMIC DEVELOPMENT OF INDIA)

आज हमारा देश जनाधिक्य के जाल में उलझकर किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पा रहा है। बढ़ती हुई जनसंख्या ने हमारी प्रगति पर पूर्ण विराम लगा दिया है। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के शब्दों में, "जनसंख्या के तीव्र गति से बढ़ते रहने से आयोजित विकास करना बहुत कुछ ऐसी भूमि पर मकान खड़ा करने के समान है जिसे बाढ़ का पानी बराबर बहाकर ले जा रहा है।" हमारे देश में बढ़ती हुई जनसंख्या आर्थिक विकास के लिए अनेक रूप से बाधक सिद्ध हो रही है जिसको दर्शाने वाले प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं

1. प्रति व्यक्ति आय में गिरावट (Decline in per Capita Income)- जनसंख्या की वृद्धि का प्रति व्यक्ति आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए हर सम्भव प्रयत्न के बाद भी योजनावधि में प्रति व्यक्ति आय में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि न होने के कारण लोगों के जीवन स्तर में आशातीत वृद्धि नहीं हो पायी है। उदाहरण के लिए, 1999-2000 की कीमतों पर 1990-91 और 2013-14 की अवधि में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 6.2 प्रतिशत रही, जबकि इस अवधि में प्रति व्यक्ति उत्पाद (आय) में वृद्धि दर मात्र 5.0 प्रतिशत थी। इस प्रकार भारत में विकास योजनाओं के अन्तर्गत जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि बहुत सीमा तक निष्फल होती जा रही है, जिससे प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर में पर्याप्त वृद्धि नहीं हो सकी है।

2. जनसंख्या और पूँजी-निर्माण (Population and Capital Formation)- जनसंख्या विस्फोट की स्थिति में राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग उपभोग कार्यों पर ही व्यय कर दिया जाता है व बचत के लिए बहुत कम धनराशि बचती है। कम बचत के कारण देश में पूँजी-निर्माण का स्तर भी कम है। पूँजी-निर्माण के अभाव में विनियोग का स्तर कम रहता है जिसके परिणामस्वरूप देश में उत्पादकता का स्तर भी निम्न रहता है

3. भूमि पर बढ़ता दबाव (Increasing Pressure on Land)- देश में उपलब्ध भूमि पर जनसंख्या का बोझ पहले से ही बहुत ज्यादा है और निरन्तर बढ़ता जा रहा है। उदाहरण के लिए प्रति व्यक्ति कृषि भूमि जो 1961 में 0.33 हेक्टेअर थी, 1991 में कम होकर मात्र 0.17 हेक्टेअर रह गई। भूमि पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव से कृषि जोतों का उपविभाजन (Sub-division) तथा विखण्डन (Fragmentation) भी हो रहा है। इन छोटे-छोटे भूमि के टुकड़ों पर कृषि उत्पादकता बढ़ाने की सम्भावनाएँ बहुत सीमित हैं।

4. जनसंख्या और खाद्य आपूर्ति (Population and Food Supply)-जनसंख्या में वृद्धि के कारण खाद्यान्नों और अन्य भोज्य पदार्थों की बढ़ती हुई माँग की समस्या उत्पन्न हो जाती है। यद्यपि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में खाद्यान्नों के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई है किन्तु आज भी लगभग एक-तिहाई लोगों को दो वक्त का भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पाता। भारत में प्रति वर्ष लगभग एक मिलियन बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्नों की शुद्ध प्रति व्यक्ति उपलब्धि जो 1961 में 469 ग्राम थी वह घटकर 2015 में 442 ग्राम रह गई।

5. शिक्षा, आवास एवं स्वास्थ्य पर बढ़ता व्यय भार (Burden on Education, Medical and Housing)- जनसंख्या में वृद्धि के कारण बालकों की संख्या बढ़ती है जिससे शिक्षा व प्रशिक्षण पर व्यय बढ़ता है। साथ ही स्वास्थ्य कार्यों पर भी अधिक विनियोग करना पड़ता है। जनसंख्या से आवास की समस्या भी दिन-प्रतिदिन जटिल होती जाती है।

6. जनसंख्या और जीवन-स्तर (Population and Living Standard)- जनसंख्या वृद्धि की समस्या ने हमारे जीवन-स्तर को एक प्रकार से चुनौती दी है। उच्च जीवन-स्तर हेतु हमें प्राकृतिक साधनों के दोहन के साथ ही जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण लगाना होगा, तभी देश का आर्थिक विकास हो सकता है।

7. भुगतान सन्तुलन की समस्या (Problem of Balance of Payment)- तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या भुगतान-सन्तुलन की समस्या को अधिक गम्भीर बना देती है। अधिक जनसंख्या के कारण निर्यात योग्य आधिक्य कम रहता है लेकिन आयात की आवश्यकता बढ़ जाती है। इस दिशा का भी आर्थिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

8. कीमत-स्तर में वृद्धि की समस्या (Problem of Increasing in Price Level)- जनसंख्या बढ़ने से वस्तु की माँग बढ़ती है अर्थात् देश में प्रभावी माँग में वृद्धि हो जाती है, जबकि उत्पादन में आशातीत वृद्धि नहीं होती। परिणामस्वरूप कीमतें बढ़ती हैं जिसका देश के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

9. जनसंख्या और बेरोजगारी (Population and Unemployment)- जनसंख्या में वृद्धि से श्रम की पूर्ति बढ़ जाती है। सरकार विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में श्रम-शक्ति की वृद्धि के अनुपात में रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं करा पायो है। फलतः हमारी बेरोजगारों को समस्या विकट हो गयी है।

10. जनसंख्या और ऊर्जा (Energy and Population)- बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण भारत में ऊर्जा के उपभोग में वृद्धि हुई है। फलत: ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास होता जायेगा, वैसे-वैसे ऊर्जा की मांग भी बढ़ती जायेगी साथ ही यदि जनसंख्या भी बढ़ती गयी तो मात्र बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबन्ध करना होगा। उदाहरणार्थ, यदि जनसंख्या वर्तमान दर से बढ़ती रही तो प्रत्येक परिवार को केवल 40 वाट के दो बल्बों के प्रयोग की औसत के आधार पर हमें इस वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रत्येक तीसरे महीने 250 मेगावाट क्षमता वाले एक नये बिजलीघर की जरूरत होगी। स्पष्ट रूप से बढ़ती जनसंख्या देश के सीमित साधनों पर गतिरोध उत्पन्न कर रही है।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या भारतवासियों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में बाधक है। पंचवर्षीय योजनाओं में प्रगति के बाद भी बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हमारी आवश्यकताओं की मात्रा हर समय बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप देश में भोजन, वस्त्र, आवास, जल पूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बेरोजगारी, गरीबी आदि की अनेक समस्याएँ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आम जीवन में असन्तोष, निराशा, चिड़चिड़ाहट, विद्रोह, अपराध, भ्रष्टाचार आदि तेजी से बढ़ रहा है है। कवि नीरज मानते हैं कि आज के युग में अधिक सन्तान उतनी ही अव्यवस्था कर देती है, जितना कि छोटे-से घर में बहुत सारे मेहमान-

"छोटा हो कमरा और छोटा बिछौना हो।

ज्यादा मेहमान घर बुलाना एक गलती है।।

परवरिश नहीं जो हम कर पायें फूलों की।

घर में फुलवारी लगाना एक गलती है।।"

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