औद्योगिक नीति-1948,1956 एवं वर्तमान औद्योगिक नीति (INDUSTRIAL POLICY : 1948, 1956 AND PRESENT INDUSTRIAL)

औद्योगिक नीति-1948,1956 एवं वर्तमान औद्योगिक नीति (INDUSTRIAL POLICY : 1948, 1956 AND PRESENT INDUSTRIAL)

 औद्योगिक नीति का अर्थ (MEANING OF INDUSTRIAL POLICY)

औद्योगिक नीति का तात्पर्य सरकार द्वारा की जाने वाली ऐसी औपचारिक घोषणा से है जिसके द्वारा सरकार उद्योगों के प्रति अपनायी जाने वाली सामान्य नीतियों का उल्लेख करती है। किसी भी औद्योगिक नीति के मुख्य रूप से दो भाग हैं-प्रथम, सरकार की विचारधारा जो औद्योगीकरण का स्वरूप निश्चित करती है तथा द्वितीय, इसको कार्यान्वित करने वाले नियम तथा सिद्धान्त जो इस नोति के पीछे विद्यमान विचारधारा को निश्चित स्वरूप प्रदान करते हैं। इस प्रकार औद्योगिक नीति एक व्यापक विचारधारा है जो उद्योगों की स्थापना और कार्य-प्रणाली के लिए नीति सम्बन्धी ढाँचा और मार्ग-दर्शन प्रदान करती है।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत की औद्योगिक नीति (POST-INDEPENDENCE INDUSTRIAL POLICY OF INDIA)

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारा औद्योगिक ढाँचा बहुत कमजोर था और जो भी थोड़े बहुत उपभोग-वस्तु उद्योग थे, वे भी अनेक समस्याओं, जैसे-पूँजी की कमी, औद्योगिक अशान्ति, कच्चे माल की कमी से ग्रसित थे। इस स्थिति में दिसम्बर, 1947 में औद्योगिक वातावरण की अनिश्चितता को समाप्त करने के उद्देश्य से सरकार ने एक औद्योगिक सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में देश के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था की संकल्पना को स्वीकार किया गया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् अब तक 6 बार औद्योगिक नीतियों की घोषणा की जा चुकी हैं जिन्हें 1. औद्योगिक नीति, 1948; 2. औद्योगिक नीति, 1956; 3. औद्योगिक नीति, 19773 4. औद्योगिक नीति, 1980; 5. औद्योगिक नीति. 1990 व 6. औद्योगिक नीति. 1991 के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर हम नई औद्योगिक नोति, 1991 की ही विस्तृत चर्चा करेंगे।

1991 की वर्तमान औद्योगिक नीति (PRESENT INDUSTRIAL POLICY OF 1991)

वर्तनान औद्योगिक नीति जुलाई, 1991 से लागू है। इसका प्रतिपादन दो चरणों में किया गया। एक तो 24 जुलाई, 1991 को जिसका सम्बन्ध बड़े व मध्यम उद्योगों से है और दूसरा 6 अगस्त, 1991 को जो लघु उद्योगों से सम्बन्धित है। बह औद्योगिक नीति अब तक की सभी नीतियों से हटकर है इसलिए इसे खुली, उदार एवं क्रान्तिकारी नीति कहा गया है।

इस नीति में मुख्य रूप से विदेशी सहयोग बढ़ाने, अर्थव्यवस्था को अनावश्यक नियन्त्रणों से मुक्त करने, सार्वजनिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्द्ध के योग्य बनाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने एवं निरन्तरता के साथ परिवर्तन आदि पर विशेष बल दिया गया। इस नीति से निजी क्षेत्र को काफी सीमा तक उन्मुक्त होकर कार्य करने का अवसर मिलेगा और वह अपने आपको प्रतिस्पर्धा के योग्य साबित कर सकेगा।

नई औद्योगिक नीति के उद्देश्य (Objectives of New Industrial Policy)

नई औद्योगिक नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. अर्थव्यवस्था में खुलापन लाना।

2. विदेशी सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना।

3. पिछड़े क्षेत्रों का औद्योगिक विकास करना।

4. निजी क्षेत्र को कार्य करने की स्वतन्त्रता प्रदान करना।

5. आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था का विकास करना ।

6. उत्पादन क्षमता में विस्तार को बढ़ावा देना।

7. निर्यात बढ़ाने के लिए आयातों को उदार बनाना।

वर्तमान औद्योगिक नीति की प्रमुख बातें या विशेषताएँ (MAIN CONTENTS OR FEATURES OF PRESENT INDUSTRIAL POLICY)

नई औद्योगिक नीति की प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं-

I. सार्वजनिक क्षेत्र के सम्बन्ध में नीति ।

II. निजी क्षेत्र के सम्बन्ध में नीति।

III. विदेशी विनियोग नीति ।

IV. विदेशी तकनीक के समझौते ने के सम्बन्ध में नीति।

V. एकाधिकार तथा बड़े घराने के सम्बन्ध में नोति ।

VI. श्रमिकों के सम्बन्ध में नीति।

VII. अन्य विशेषताएँ।

I. सार्वजनिक क्षेत्र के सम्बन्ध में नीति (Policy for Public Sector)

नवीन औद्योगिक नीति विवरण में सार्वजनिक क्षेत्र के सम्बन्ध में प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं-

1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उपक्रमों में कमी (Reduction in Reserved Enter- prises in Public Sector) उदारीकरण की नीति अपनाने के क्रम में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों की संख्या में कमी की है। 1991 में इनकी संख्या 17 से घटकर 8 कर दी गयी जिसे 1993 में पुन: घटाकर 6 कर दिया गया है। बाद में यह संख्या घटाकर 3 कर दी गयी। वर्तमान में केवल 2 उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया है-(i) परमाणु ऊर्जा और (ii) रेल परिवहन।

2. रुग्ण उपक्रमों की पुनर्स्थापना या पुनर्निर्माण (Revival of Sick Industries) जो सार्वजनिक उपक्रम निरन्तर रूप से रुग्ण चले आ रहे हैं तथा जिनके ठीक होने की सम्भावना भी नहीं है, उनके पुनर्निर्माण या पुनर्स्थापना की योजना बनायी जायेगी। यह कार्य औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड या ऐसी ही किसी संस्था को सौंपा जायेगा। इस योजना से प्रभावित होने वाले श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए सामाजिक सुरक्षा की योजना भी बनायी जायेगी।

3. सहमति समझौतों के काम-काज में सुधार (Reforms in Working of Memorandum of Understandings) इस नीति में यह कहा गया है कि सार्वजनिक उपक्रमों के काम-काज में सुधार लाने के लिए सहमति समझौतों (Memorandum of Understanding) पर अधिक बल दिया जायेगा तथा उन्हें जवाबदेय बनाया जायेगा। सरकार की ओर से इन समझौतों में भाग लेने वाले पक्षों का तकनीकी स्तर भी ऊँचा उठाया जायेगा।

4. सार्वजनिक उपक्रमों के अंशों का विक्रय (Sale of Public Sector Shares) सरकार वित्तीय संसाधन जुटाने की दृष्टि से अपने द्वारा धारित सार्वजनिक उपक्रमों के कुछ अंशों को बाजार में बेचेगी। ये अंश सहयोग निधियों (Mutual Funds), वित्तीय संस्थाओं, कर्मचारियों तथा सामान्य जनता को बेचे जायेंगे।

5. पेशेवर प्रबन्ध एवं अधिक शक्तियाँ (Professionalisation of Public Sector Management) सार्वजनिक उपक्रमों के संचालन मण्डल को अब अधिक पेशेवर बनाया जायेगा तथा उन्हें अधिक शक्तियाँ प्रदान की जायेंगी।

II. निजी क्षेत्र के सम्बन्ध में नीति (Policy for Private Sector)

इस नवीन नीति विवरण में निजी क्षेत्र के सम्बन्ध में वर्णित प्रमुख बातें निम्नानुसार हैं-

1. लाइसेंस व्यवस्था समाप्त (Elimination of Licensing System)—पाँच उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग को समाप्त कर दिया गया है, विनियोग का स्तर चाहे जो भी हो। जिन उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग आवश्यक है, उन्हें परिशिष्ट 1 में रखा गया है। ये पाँच उद्योग हैं-शराब, सिगरेट, खतरनाक रसायन, सुरक्षा का सामान तथा औद्योगिक विस्फोटक। परन्तु इन उद्योगों में जो मदें लघु क्षेत्र के लिए आरक्षित हैं, उनका उत्पादन करने के लिए लघु क्षेत्र की इकाइयों को लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी।

2. क्रमागत निर्माण कार्यक्रम (Phased Manufacturing Programme) से मुक्ति-अब नये उपक्रमों को क्रमागत निर्माण कार्यक्रम के प्रावधानों से मुक्ति प्रदान की गयी है।

3. ऋणों का पूँजी में परिवर्तन :Conversion of Debts into Capital)—अब वित्तीय संस्थाओं के ऋणों का पुँजी में परिवर्तित करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है।

III. विदेशी विनियोग नीति (Foreign Investment Policy)

नवीन औद्योगिक नीति में विदेशी विनियोग (Foreign Investment) को प्रोत्साहित करने के लिए निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

1. विदेशी पूँजी विनियोग (Foreign Capital Investment )-48 उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में विदेशी पूँजी निवेश सीमा को बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दिया गया है। खनन की क्रियाओं से सम्बन्धिन 3 उद्योगों में विदेशी पूँजी निवेश सीमा 50 प्रतिशत तथा 9 अन्य उद्योगों में विदेशी पूँजी निवेश की सीमा को 74 प्रतिशत और फिर 100% तक दिया गया। वर्तमान में अधिकतर सेक्टरों में स्वतः अनुमोदन आधार पर 100 प्रतिशत तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश करने का अधिकार है। केवल निम्नलिखित सेक्टरों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर प्रतिबन्ध है-(1) खुदरा व्यापार या फुटकर व्यापार (एकल ब्रांड उत्पादन खुदरा व्यापार के अलावा), (2) परमाणु ऊर्जा, (3) लॉटरी का धंधा, तथा (4) जुआ एवं सट्टा। 1991 के बाद की अवधि में विदेशी निवेश और विदेशी प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं उनका विस्तृत ब्यौरा अध्याय 26 "विदेशी पूँजी एवं बहुराष्ट्रीय निगम' में प्रस्तुत किया गया है।

2. गैर-निवासी भारतीयों को निवेश की छूट (Relaxation for Investment for NRIs)- गैर-निवासी भारतीयों तथा भारतीय मूल के लोगों को आधारभूत संरचना सम्बन्धी क्रियाओं, जैसे- भवन निर्माण, राजमार्गों का निर्माण, विद्युत् उत्पादन, आधारभूत दूरसंचार सेवाएँ आदि में निवेश की अनुमति दी गयी है।

1996-99 से अनिवासी भारतीयों के लिए व्यक्तिगत निवेश की सीमा 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत ( अब 10 प्रतिशत) तथा कम्पनी के लिए 5 प्रतिशत से बढ़ाकर अब 40 प्रतिशत कर दी गयी है।

अनिवासी भारतीयों एवं समुद्र पार निर्गमित संस्थाओं (OCBs) को 22 उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 100 प्रतिशत तक अंश निवेश की इजाजत दी गयी है।

3. पूँजी की स्वदेश वापसी की सीमा में वृद्धि (Growth in the Limit of Return of Capital to own Country)-विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए विदेशी निवेश की स्वदेश वापसी की सीमा को बढ़ाया गया है। अनिवासी भारतीयों विदेशी निगम निकायों और विदेशी संस्थागत निवेशकों के सम्बन्ध में कुल पोर्ट फोलियो निवेश सीमा हेतु गौजूदा 24 प्रतिशत की उच्चतम सीगा को निर्देशक मण्डल के अनुमोदन से तथा कम्पनी को साधारण सभा द्वारा पारित विशेष प्रस्ताव से उसकी निर्गमित तथा चुक्ता पूँजी को 10 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।

4. बोर्डों का गठन (Formation of Boards) नई औद्योगिक नीति में यह भी प्रावधान किया गया है कि कुछ चुने हुए क्षेत्रों में सीधे विदेशी पूँजी विनियोग के लिए विशेषाधिकार प्राप्त बोड़ों का गठन किया जायेगा जो देश में उपक्रम लगाने के बारे में बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों के साथ सभी बातें तय करेगा। यह एक विशेष कार्यक्रम के अन्तर्गत किया जायेगा, ताकि नवीन तकनीक प्राप्त की जा सके, साथ ही भारी मात्रा में विदेशी पूँजी विनियोग को आकर्षित कर सके तथा भारत को पहुँच विश्व भर की मण्डियों में हो सके।

5. आयात की सुविधाएँ (Import. Facilities) इस नीति के अनुसार 2 करोड़ रुपये से अथवा कुल पूँजी के 25 प्रतिशत से कम की उत्पादन मशीनें बिना किसी अनुमति के आयात की जा सकेंगी।

6. अन्य विदेशी पूँजी प्रस्तावों का पूर्वानुमोदन (Pre-approval of Other Foreign Capital Proposals) अन्य कोई भी विदेशी पूँजी प्रस्ताब (जिसमें 51 प्रतिशत पूँजी भी हो सकती है) जो पूँजीगत आयात के लिए आवश्यक विदेशी मुद्रा विदेशी पूँजी से नहीं जुटा पाते हैं उन्हें पहले की तरह ही पूर्वानुमति लेनी पड़ेगी।

IV. विदेशी तकनीक के समझौते के सम्बन्ध में नीति (Policy for Foreign Technology)

विदेशी तकनीक के आयात करने तथा अपनाने के सम्बन्ध में नवीन औद्योगिक नीति में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

1. विदेशी तकनीक (Foreign Technology) उच्च प्राथमिकता प्राप्त 35 उद्योगों के लिए विदेशी तकनीक के समझौतों के स्वतः अनुमोदन (Automatic Approval) का प्रावधान किया गया है। साथ ही विदेशी मुद्रा की माँग न करने वाले अन्य उद्योगों के लिए विदेशी तकनीक के समझौतों के स्वत: अनुमोदन की व्यवस्था की गयी है।

2. गैर-उच्च प्राथमिकता वाले उद्योग (Non-high Priority Industries)—किसी भी अन्य उद्योग के लिए भी विदेशी तकनीक के समझौते को स्वत: अनुमति प्राप्त हो जायेगी यदि उसके किसी भी शुगतान के लिए खुली विदेशी मुद्रा (Free Foreign Exchange) की गाँग नहीं की जाती है।

3. विशेष अनुमोदन (Special Approval) उपर्युक्त दोनों ही दशाओं को छोड़कर किसी भी अन्य स्थिति में उद्योग को विदेशी तकनीक का समझौता करना है तथा विदेशी मुद्रा को आवश्यकता है तो उस उद्योग को सभी आवश्यक अनुमोदन प्राप्त करने होंगे। अनुमोदन प्राप्त होने के बाद ही समझौता किया जा सकता है।

4. तकनीकी विशेषज्ञ (Technical Specialist)—नई औद्योगिक नीति के अनुसार विदेशी तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त करने अथवा देश में विकसित तकनीकों का विदेशों में परीक्षण कराने के लिए विदेशी मुद्रा भुगतान की इजाजत लेने की आवश्यकता समाप्त कर दी गयी है।

V. एकाधिकार तथा बड़े घरानों के सम्बन्ध में नीति (Policy for Monopoly and Big Business)

एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम में संशोधन (Modificationin MRTP Act) इस अधिनियम में संशेधन किया जायेगा जिससे नयी कम्पनियों को स्थापित करने, एक कम्पनी का दूसरी में विलय करने, दो कम्पनियों का आपसी मिलान, एक कम्पनी द्वारा दूसरो को खरीदने | कुछ परिस्थितियों में कम्पनी निदेशकों को नियुक्ति करने के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व-अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन नयी शक्तियों वाले एम.आर.टी.पो. पर आयोग का अधिकार होगा कि वह एकाधिकार बाली प्रतिबन्धित तथा गैर-प्रतिबन्धित व्यापारिक गतिविधियों की अपने आप जाँच करे या उपभोक्ताओं की शिकायतों पर जाँच करे। अब एम.आर.टी.पी. कम्पनियों की सम्पत्तियों की कोई अधिकतम सीमा नहीं होगी।

VI. श्रमिकों के सम्बन्ध में नीति (Policy for Labour)

श्रमिकों के सम्बन्ध में इस नीति विवरण में निम्नलिखित बातों का उल्लेख किया गया है-

1. श्रमिकों के हितों को पूर्ण सुरक्षा की जायेगी तथा उनके कल्याण में अभिवृद्धि के लिए प्रयास किये जायेंगे।

2. तकनीकों के परिवर्तनों के अनुरूप उन्हें ठीक से तैयार किया जायेगा।

3. प्रगति एवं समृद्धि में श्रमिकों को बराबर का भागीदार बनाया जायेगा।

4. उद्योगों के प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जायेगा।

5. रुग्ण उद्योगों को ठीक करने की योजनाओं में भागीदारी देने के लिए श्रमिक सहकारी समितियों को प्रोत्साहित किया जायेगा।

VII. अन्य विशेषताएँ (Other Features)

1. लघु उद्योग क्षेत्र (Small Industry Sector) नवी औद्योगिक नीति में लघु उद्योगों को यह विकल्प दिया गया है कि वे अपनो अंशधारिता का 24 प्रतिशत तक बड़े और अन्य औद्योगिक उपक्रों को दे सकते हैं। इससे उनको अधिक मात्रा में पूँजी और प्रौद्योगिकी प्राप्त हो सकेगी। इसके अतिरिक्त, कच्चे माल के आवण्टन में इन उद्योगों को सरकार द्वारा उच्च प्राथमिकता दी जायेगी। इनके उत्पार्दो की बिक्री बढ़ाने में सहकारी समितियों, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों एवं अन्य व्यावसायिक एजेन्सियों को विशेष कार्य-भार सौंपा गया है।

2. स्थानीयकरण (Localisation) दस लाख से कम जनसंख्या वाले नगरों में 15 अनिवार्य लाइसेंसिंग वाले उद्योगों को छोड़कर शेष उद्योगों के स्थानीयकरण के लिए केन्द्रीय सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है। प्रदूषण न फैलाने वाले (जैसे-इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर लॉफ्टवेवर, प्रिंटिंग आदि) ऐसे उद्योगों का स्थानीयकरण दस लाख से कम जनसंख्या वाले बड़े नगरों की परिधि से 25 किमी. की दुरी पर करने की व्यवस्था की गयी है। नई नीति औद्योगिक विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देती है।

3.औद्योगिक रुग्णता के सम्बन्ध में नीति (Policy for Industrial Sickness)—सरकार ने रुग्ण औद्योगिक इकाइयों को समाप्त करने अथवा बेचने अथवा श्रमिक सहकारी समितियों को सौंपने की नीति बनायो है। इससे श्रमिकों को होने वाले नुकसान को क्षतिपूर्ति के लिए राष्ट्रीय नवीनीकरण कोष' बनाया गया है। औद्योगिक रुग्णता की समस्या से निपटने के लिए औद्योगिक तथा वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड' को दायित्व सौंपा गया है।

4. लघु उद्योगों को आरक्षण (Reservation for Small Scale Industries) वर्ष 2006 में लघु उद्योग ऐसे उद्योगों को कहा गया है जिनके प्लाण्ट तथा मशीनरी में र 5 करोड़ से अधिक का निवेश न हो। नई नीति में लघु उद्योगों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इस सम्बन्ध में सुविधाओं की अलग से घोषणा की गई है। लघु उद्योगों के लिए 239 वस्तुओं का उत्पादन सुरक्षित रखा गया है। इनका उत्पादन मध्यम स्तरीय उपक्रम व बड़े उद्योग नहीं कर सकते।

5. सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उपक्रमों की नई परिभाषा (New Definition of Micro, Small and Medium Enterprises)—वर्ष 2006 में सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उपक्रमों की नई परिभाषा दी गई है। इस परिभाषा में निर्माणी उद्योगों के साथ-साथ सेवा उपक्रमों को भी शामिल किया गया है। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम मन्त्रालय द्वारा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रों में प्लाण्ट एवं मशीनरी में निवेश को सीमा बढ़ाने के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम विकास (संशोधन) विधेयक, 2015, 20 अप्रैल, 2015 को लोक सभा में पेश किया गया।

इस विधेयक में निवेश की प्रस्तावित सीमा निम्नलिखित है-

(A) विनिर्माणी उपक्रम

 

एमएसएमई अधिनियम 2006

एमएसएमई अधिनियम 2015

(i) सूक्ष्म उपक्रम

 ₹ 25 लाख तक

₹ 50 लाख तक

(ii) लघु उपक्रम

 ₹ 25 लाख से अधिक, किन्तु ₹5 करोड़ तक

₹50 लाख से अधिक, किन्तु ₹10 करोड़ से तक

(iii) मध्यम उपक्रम

 ₹ 5 करोड़ से अधिक, किन्तु ₹ 10 करोड़ तक

₹10 करोड़ से अधिक, किन्तु ₹ 30 करोड़ तक

(B) सेवाएँ प्रदान करने वाले उपक्रम

(i) सूक्ष्म उपक्रम

₹10 लाख तक

₹ 20 लाख तक

(ii) लघु उपक्रम

₹ 10 लाख से अधिक, किन्तु 2 करोड़ तक

₹20 लाख से अधिक, किन्तु ₹5 करोड़ तक

(iii) मध्यम उपक्रम

₹ 2 करोड़ से अधिक, किन्तु ₹5 करोड़ तक

₹ 5 करोड़ से अधिक, किन्तु ₹15 करोड़ तक

औद्योगिक नीति में नवीन प्रवृत्तियाँ (RECENT TRENDS IN INDUSTRIAL POLICY)

भारत सरकार ने सन् 1991 में नवीन औद्योगिक नीति की घोषणा की। उसके उपरान्त समय समय पर इस नीति में संशोधन होते रहे हैं। इस नीति में किये गये कुछ प्रमुख संशोधन निम्नलिखित हैं-

1. अब किसी भी उपक्रम के विदेशी प्रस्तावों के स्वतः अनुमोदन के लिए यह आवश्यक नहीं है कि लायी जाने वाली विदेशी पूँजी, पूँजीगत समान आयात के लिए अपर्याप्त होंगे।

2. 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश को स्वतः अनुमोदन वाली 35 उद्योगों की सूची में उद्योगों की संख्या को बढ़ाकर 48 कर दिया गया है।

3. विदेशी संस्थागत निवेशक, अनिवासी भारतीय आदि मिलकर पहले किसी भी सूचीबद्ध कम्पनी को 24 प्रतिशत तक अंश पूँजी क्रय कर सकते थे, किन्तु अब वे 48 प्रतिशत अंश पूँजी क्रच कर सकते हैं।

4. विदेशी संस्थागत निवेशक असूचीबद्ध कम्पनियों की अंश पूँजी में 10 प्रतिशत तक विनियोग कर सकते हैं

5. उच्च प्राथमिकता वाले 48 उद्योगों तथा तीन खनन उद्योगों में अनिवासी भारतीयों तथा विदेशी निगमों को 100 प्रतिशत तक पूँजी निवेश की छूट दे दी गई है। इसके अतिरिक्त कुछ उद्योगों को छोड़कर सभी उद्योगों को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की स्वत: अनुमति दे दी गयी है।

6. बीमा क्षेत्र की कम्पनियों को अंश पूँजी में 26 प्रतिशत तक पूँजी निवेश करने की छूट विदेशी कम्पनियों संस्थाओं को दी गयी है।

7. बीमा क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के एकाधिकार को समाप्त कर इसे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। निजी क्षेत्र की बीगा कम्पनियों की स्थापना एवं बीगा गध्यरथों की नियुक्ति की प्रक्रिया प्राराभ हो गयी।

8. बैंकों को अन्य संस्थाओं की भागीदारी के साथ बीमा क्षेत्र में प्रवेश की दे दी गयी है।

9. विदेशी निवेश क्रियान्वयन प्राधिकरण की स्थापना कर दी गयी है जो विदेशी निवेशक तथा सरकार के बीच प्रत्यक्ष सम्पर्क बनाये रखेगी तथा विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देगी। प्राधिकरण को एकीकृत व्यापक अनुमतियाँ (Composite/Comprehensive Approvals) जारी करने का अधिकार भी दिया गया है।

10. विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम के स्थान पर विदेशी मुद्रा प्रबन्ध अधिनियम (FEMA) पारित कर दिया गया है। इससे देश में विदेशी मुद्रा का उदार बाजार विकसित होगा।

11. निजी क्षेत्र में 'सॉफ्टवेयर पार्क' स्थापित करने की छूट दे दी गयी है।

12. ई कॉमर्स को बढ़ावा देने के लिए देश को संसद ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पारित कर दिया है।

13. उद्योगों में कर्मचारियों की भागीदारी को प्रभावी बनाने हेतु परिश्रम समता अंश (Sweat Equity Share) जारी करने की छूट दे दी गयी है।

14. विद्युत् क्षेत्र में विदेशी निवेश की ₹ 15 अरब की सीमा को हटा दिया गया है।

15. तेल शोधन एवं इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य (E-Commerce) के क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर शत-प्रतिशत कर दी गयी है।

16. कोरियर सेवा, होटल तथा पर्यटन, नगरीय विकास, हवाई अड्डे तथा औषधियों के क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को शत-प्रतिशत कर दिया गया है।

17.आधारभूत दूरसंचार सेवाओं के सभी क्षेत्रों (Local Long Distance Calls and Cellular) को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। इन क्षेत्रों में निवेश की सीमा को 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दिया गया है।

18. आधारभूत संरचना उद्योगों के लिए 15 वर्ष का कर अवकाश (Tax Holiday) घोषित किया गया है।

19. सभी महानगरों में त्वरित परिवहन प्रणाली (Rapid Transport System) में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश करने की छूट दी गयी है।

20. रक्षा उत्पादन भी निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। निजी क्षेत्र के साहसी लाइसेंस लेकर इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।

21. औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में नए उद्योगों के लिए और भारत में कहीं भी विद्युत् उत्पादन करने के लिए पाँच वर्ष तक कर की छूट पहले से ही लागू की जा रही है।

22 वर्ष 2008-09 के बजट में सामान्य सेनवैट (CENVAT) की 16 प्रतिशत की दर को घटाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। 2008-09 के बजट प्रस्तावों में अधिक से अधिक उत्पादों को 14 प्रतिशत सेनवैट की परिधि में लाने का विचार प्रस्तुत किया गया है।

23. सेवा कर की दर को 2006-07 के बजट में 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया था। 2007-08 के बजट में इसे 12 प्रतिशत ही बनाये रखा गया है।

24. सीमा शुल्क की संरचना में परिवर्तन करते हुए 2007-08 के कर प्रस्तावों में गैर कृषि उत्पादों के लिए सीमा शुल्क की उच्चतम 12.5 प्रतिशत दर को घटाकर 10.0 प्रतिशत किया गया था। 2008-09 के बजट में इस 10.0 प्रतिशत की दर को ही बनाये रखा है, किन्तु अन्य अनेक उत्पादों-पूँजीगत उत्पादों तथा मध्यवर्ती वस्तुओं आदि पर सीमा शुल्क में कटौतियाँ की गई हैं।

25. औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में नये उद्योगों के लिए और भारत में कहीं भी विद्युत् उत्पादन करने के लिए पाँच वर्ष तक कर की छूट पहले ही लागू की जा रही है।

नई औद्योगिक नीति के पक्ष में तर्क (ARGUMENTS IN FAVOUR OF NEW INDUSTRIAL POLICY)

1. उदारवादी (Liberalism)-नई औद्योगिक नीति मुख्य उद्देश्य औद्योगिक विकास के मार्ग से प्रशासनिक बाधाओं को हटाकर अर्थव्यवस्था को अधिक उदारवादी बनाना है।

2. उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production)—विदेशी विनियोग तथा पूँजी तकनीकी समझौतों का मुख्य उद्देश्य तकनीक विपणन, विदेशी पूँजी तथा प्रबन्धकीय कुशलता को आकर्षित करना है।

3. प्रतियोगिता में वृद्धि (Increase in Competition) एकाधिकार प्रतिबन्धात्मक एवं उचित व्यापार (MRTP) के नियन्त्रण तथा नियमन पर अधिक बल दिये जाने के फलस्वरूप एकाधिकार तथा अल्पाधिकारी प्रवृत्ति कम होगी फलस्वरूप प्रतियोगिता को प्रोत्साहन मिलेगा।

4. सार्वजनिक क्षेत्र की कुशलता में वृद्धि (Increase in Efficiency of Public Sector) – सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित 17 उद्योगों को कम करके 6 किये जाने तथा बीमार इकाइयों को बन्द करने के फलस्वरूप सार्वजनिक की कुशलता में वृद्धि होगी।

5. श्रमिकों के कल्याण में वृद्धि (Increase in Welfare of Labours)—देश की प्रगति तथा संवृद्धि में श्रमिकों को पूर्ण भागीदार बनाया जायेगा तथा सरकार श्रमिकों के कल्याण को बढ़ाने तथा उनकी कुशलता में वृद्धि करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न करेगी।

6. लघु स्तर के उद्योगों को उचित महत्व (Proper Importance to Small Scale Industries) इस औद्योगिक नीति में लघु स्तर के उद्योगों को उचित महत्व दिया गया है क्योंकि देश में पहली बार लघु उद्योगों के विकास के लिए एक पृथक् नीति घोषित की गयी है।

7.शोध एवं विकास को प्रोत्साहन (Encouragement to Research and Development) इस नोति में कहा गया है कि शोध एवं विकास के लिए विदेशी तकनीशियनों को नियुक्त करने तथा उत्पादनों के परीक्षण को फीस देने के लिए विदेशी मुद्रा आसानी से उपलब्ध कर दी जायेगी। इसके परिणामस्वरूप देश में शोध एवं विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहन मिल सकेगा।

8. क्षमता का पूर्ण उपयोग (Full Utilisation of Capacity)—इस नीति में उद्योगों के लिए विशद् वर्गीकरण की नीति को अपनाने का प्रावधान किया गया है। फलत: अब कोई भी उद्योग अपने विद्यमान विनियोग से किसी भी प्रकार की वस्तु का उत्पादन कर सकेगा। इससे देश के उद्योगों की क्षमता का पूर्ण उपयोग किया जायेगा।

9. नवीन उद्योगों का विकास (Development of New Industries)-इस नीति में अब और अधिक निजी क्षेत्र के लिए द्वार खोल दिये गये हैं। इससे देश में नवीन उद्योगों का विकास हो सकेगा।

10. क्षमता का विस्तार (Expansion of Capacity)-अब कोई भी विद्यमान उद्योग अपनी क्षमता का स्वमेव विस्तार कर सकेगा। इसके लिए उसको पूर्व-अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी।

11. सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण (Privatisation of Public Enterprises)— इस नीति के पालन से देश में सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की प्रक्रिया भी आरम्भ हो सकेगी। ऐसा सार्वजनिक उपक्रमों के अंशों के विक्रय से सम्भव हो सकेगा।

नई औद्योगिक नीति के विपक्ष में तर्क (ARGUMENTS AGAINST NEW INDUSTRIAL POLICY)

उपर्युक्त गुणों के होते हुए भी नई औद्योगिक नीति की निम्नलिखित आलोचनाएँ की जाती हैं-

1. आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण (Centralisation of Economic Power)-नई औद्योगिक नीति के कारण आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण में वृद्धि होगी क्योंकि एकाधिकार एवं प्रतिबन्धक व्यापार व्यवहार (MRTP) कानून में संशोधन करके इस नीति में धनी तथा बड़े औद्योगिक घरानों को अपना विस्तार करने की आर्थिक स्वतन्त्रता दे दी गयी है।

2. क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि (Increase in Regional Inexualities)—नई औद्योगिक नीति के फलस्वरूप क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि होगी; लाइसेंसिंग नीति के उदारवादी किये जाने तथा उद्योगों को स्थापना पर से प्रतिबन्ध हटाने के फलस्वरूप उद्यमो नये उद्योग विकसित क्षेत्रों में ही लगाना पसन्द करेंगे। फलतः क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि होगी क्योंकि पिछड़े इलाकों में कम उद्योग स्थापित किये जायेंगे।

3. आर्थिक प्रभुसत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Effect. on Economic Sovereignty)- विदेशी पूँजी तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बहुत अधिक स्वतन्त्रता देने का देश की आर्थिक प्रभुसत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। फलस्वरूप देश पर विदेशी ऋण का बोझ भी बढ़ जायेगा।

4. लघु स्तर के उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Effect on Small Scale Industries) श्री जे. सी. सन्देसारा के अनुसार विदेशी पूँजो को छूट, विदेशी कम्पनियों को अधिक स्वतन्त्रता, नई उदारवादी नीतियों आदि के फलस्वरूप देश में प्रतियोगिता तो बढ़ेगी, लेकिन लघु उद्योग, बड़े उद्योगों तथा विदेशी कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर सकेंगे। फलत: उनके विकास पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

5. सार्वजनिक क्षेत्र के महत्व में कमी (Decline in Importance of Public Sectors)-नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के महत्व को कम कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों की संख्या 6 रह गयी है। लई सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को बन्द कर

दिया गया है और कई ऐसे उद्योगों का निजीकरण किया जा रहा है। यह सच सार्वजनिक क्षेत्रों के घटते हुए महत्व का प्रतीक है।

6. कुशलता में वृद्धि नहीं (Efficieney will not Increase) इस नीति में मान्यता की गयी है कि उद्योगों के निजीकरण के फलस्वरूप उनकी कुशलता में स्वमेव वृद्धि हो जायेगी, किन्तु गलत है क्योंकि भारत में निजी क्षेत्र में भी बहुत सी इकाइयाँ बीमार हैं। वस्तुतः एक उद्योग चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में हो, तभी कुशल माना जायेगा जब वह प्रतियोगिता क सामना कर सके।

7. सामाजिक उद्देश्यों की अवहेलना (Social Objectives Ignored) नई औद्योगिक नीति में योजनाओं के सामाजिक उद्देश्यों, जैसे-आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण में कमी, निजी क्षेत्र की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्व, लघु उद्योगों को प्रोत्साहन आदि की अवहेलना की गयी है।

8. कृषि एवं उद्योगों में दूरी (Gap between Agriculture and Industries)—इस नीति से देश के उद्योगों तथा कृषि के बीच दूरी बढ़ जायेगी। प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. के. एन. काबरा ने भी कहा है कि "इससे कृषि एवं उद्योगों की दूरी और बढ़ेगी।"

9. श्रम संघों का विरोध (Opposition by Trade Union)—इस नीति का श्रम संघों ने भी विरोध किया है। वे यह तक देते हैं कि राजकीय उपक्रमों के अंश बाजार में बेचने से धीरे-धीरे इनका निजीकरण हो जायेगा। इससे श्रमिकों एवं स्वामियों के बीच संघर्ष बढ़ेगा तथा श्रमिकों का विदोहन किया जाने लगेगा।

10. विकास नीति अस्पष्ट (Ambiguous Exist Policy)—इस नीति में बीमार उद्योगों के विकास की नीति को स्पष्ट नहीं किया गया है। अत: रुग्ण इकाइयों की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

11. पूँजीगत माल आयात की सीमा (Limit of Import of Capital Goods)—इस नीति में बिना लाइसेन्स को पूँजीगत माल के आयात की अधिकतम सीमा र दो करोड़ रखी गयी है। यह सीमा बहुत कम है।

12. विदेशी विनियोग की सीमा (Limit of Foreign Investment)—कुछ उद्योग संघ तथा उद्योगपतियों ने विदेशी पूँजी को 51 प्रतिशत की अधिकतम सीमा निर्धारित करने की आलोचना की है। उनका तर्क है कि भारतीय व्यवसायी स्वयं ही अपने हितों की सुरक्षा कर सकते हैं।

नई औद्योगिक नीति का प्रभाव (EFFECTS OF NEW INDUSTRIAL POLICY)

नई औद्योगिक नीति का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं-

I. अनुकूल प्रभाव (Tavourable Effects)

1. औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि (Increase in Industrial Productiori)-1991 के बाद से औद्योगिक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1990-91 में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर लगभग 6% थी परन्तु 2013-14 में घटकर 4.5 प्रतिशत हो गयी।

2. विदेशी विनियोग में वृद्धि (Increase in Foreign Investment)—नई औद्योगिक नीति से विदेशी विनियोग में तीन गति से वृद्धि हुयी है। अप्रैल, 2000 से लेकर फरवरी, 2015 तक भारत में कुल 365 अरब डॉलर का FDI आ चुका है।

3. संतुलित क्षेत्रीय विकास (Balanced Regional Development) नई औद्योगिक नीति में पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक विकास के लिए बहुत-से प्रोत्साहन दिये गए हैं जिसके कारण देश में संतुलित क्षेत्रीय विकास करने में सहायता मिली है।

4. सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकूल प्रभाव (Favourable Impact on Public Enterprisc)- नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र में किए जाने वाले 'सुधारों' से उत्पादन पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। इन सुधारों के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को निजी क्षेत्र के हाथ बेचने की व्यवस्था है, क्योंकि निजी क्षेत्र की कार्यक्षमता बेहतर है, इसलिए इस बिक्री से उत्पादन बढ़ेगा। दूसरी ओर, अक्षम व कमजोर सार्वजनिक इकाइयों को बन्द करने से इनमें लगे संसाधन बेहतर उपयोग के लिये इस्तेगाल किए जा सकेंगे। निजीकरण के परिणामस्वरूप, स्टॉक एक्सचेन्ज पर सार्वजनिक इकाइयों के निष्पादन में सुधार होने की सम्भावना है।

5. प्रतिस्पर्धात्मक शक्तियों को प्रोत्साहन (Incouragement to Competitive Forces) MRTP आयोग का ध्यान अब औद्योगिक इकाइयों के आकार (Size) को सीमित करने पर न होकर एकाधिकारी, प्रतिबन्धक व अनुचित ज्यापार व्यवहार को रोकने पर होगा। इससे एकाधिकारी तथा अल्प-अधिकारिक प्रवृत्तियों को नियन्त्रित करने से सहायता मिलेगी और प्रतिस्पर्धात्मक शक्तियों को प्रोत्साहन मिलेगा जिससे औद्योगिक उत्पादन व उत्पादकता पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा।

II. प्रतिकूल प्रभाव (Adverse Effects)

नई औद्योगिक नीति का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रमुख प्रतिकूल प्रभाव निम्नलिखित हैं-

1. असंतुलित उत्पादन संरचना (Unbalanced Production Structure) देश के दीर्घकालीन औद्योगिक विकास के दृष्टिकोण से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उद्योग-समूह पूँजीगत वस्तु उद्योगों का समूह है। परन्तु इस उद्योग समूह की वार्षिक संवृद्धि दर जो 1980 के दशक में 9.1% थी, नौर्वी पंचवर्षीय योजना की अवधि में कम होकर मात्र 1.7% प्रतिवर्ष रह गई। यह प्रवृत्ति सुधार-उपरान्त औद्योगिक उत्पादक संरचना में होने वाले विसंगतियों की द्योतक है।

2. अस्थिर औद्योगिक विकास (Unstable Industrial Development)—नई औद्योगिक नीति में घरेलू एवं विदेशी निवेशकों को कई प्रोत्साहन दिए गए हैं। यह दावा किया गया है कि इससे अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनेगा और माहौल अपने आप औद्योगिक क्षेत्र की संवृद्धि दर को बढ़ाने में सफल होगा। परन्तु इस नीति का औद्योगिक विकास की दर पर कोई विशेष सकारात्मक प्रभाव नजर नहीं आता। वस्तुत: 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में तो औद्योगिक संवृद्धि दर में गिरावट दिखाई देती है। परन्तु इस योजना में निर्धारित लक्ष्य 10% प्रतिवर्ष को तुलना में वास्तविक संवृद्धि दर अभी भी कम है। एक अन्य चिन्ता का विषय यह है कि सुधार अवधि के विभिन्न वर्षों में औद्योगिक संवृद्धि दर में व्यापक उतार-चढ़ाव होते रहे जिससे अनिश्चितता की स्थिति बनी रही। इससे यह सिद्ध होता है कि "उदारीकरण अपने आप निवेश और उत्पादक गतिविधि को प्रोत्साहित करने में असमर्थ रहा है।"

3. भारतीय उद्योगों पर व्यावसायिक उपनिवेशवाद का खतरा (Threats of Commercial Colonalisatiorn on Indian Industries) हाल के वर्षों में औद्योगिक नीति के अन्तर्गत विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए जो छूटें व रियायतें दी गई हैं उनसे बहुराष्ट्रीय निगमों को भारत में प्रवेश करने के साथ साथ भारतीय उद्योगों को खरीदने के अवसर प्राप्त भी हो गए हैं।

4. विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ने से भारतीय उद्योगों को खतरा (Threats to Indian Industries Due to Increased Foreign Competition) 1991 की नई औद्योगिक नीति के परिणामस्वरूप देश में जो उदारीकृत वातावरण बना है उसमें भारतीय उद्योगपति बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ 'असमान प्रतिस्पर्द्धा' (Uncqual Competition) करने के लिये विवश हैं। कारण यह है कि भारतीय उद्योगपतियों के लिए पूँजी की लागत बहुराष्ट्रीय निगमों की तुलना में बहुत अधिक है; बहुराष्ट्रीय निगमों की तुलनाmमें भारतीय उद्योगपतियों की वित्तीय स्थिति बहुत कमजोर है; विदेशों से आयातों पर कई छूटें दी जा रही हैं, जबकि भारतीय उद्योगों के उत्पादन पर तरह-तरह के कर लगाए गए हैं जिससे भारतीय वस्तुओं के लिए आयातों के साथ स्पर्धा करना मुश्किल हो गया है, इत्यादि । इन कारणों से कॉन्फीडरेशन ऑफ इण्डियन इण्डस्ट्रीज (Confederation of Indian Industries) ने हाल के वर्षों में सरकार को औद्योगिक नीति के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। उसके अनुसार भारत एकदम अत्यधिक संरक्षण' से 'लगभग शूय संरक्षण' की तरफ झुक गया जिससे अंततः 'नीति-प्रेरित अनौद्योगिकरण' (Policy induced de-industrialisation) का खतरा पैदा हो गया। घरेलू उद्योगपति अब समान कार्य-धरातल (Level playing field) की माँग कर रहे हैं।

5. अनुसन्धान व विकास कार्य का अभाव (Lack of Research and Development Activities)—प्रो. एच. के. परांजपे के अनुसार किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम ने भारत को अपने अनुसन्धान व विकास कार्य के लिए आधार बनाने का प्रयास नहीं किया है। इसके अतिरिक्त तमाम छूटों व रियायतों के बावजूद किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम ने भारत के निर्यातों को बढ़ाने की कोशिश नहीं को है। उन्होंने उतना ही निर्यात किया है जितना अनुबंधों के अधीन अनिवार्य था। उत्पादक और निर्यातक को अपेक्षा उनको भूमिका व्यापारी जैसी रही है। जहाँ तक विदेशी प्रौद्योगिकी का सम्बन्ध है. परांजपे का यह तर्क ठीक है कि विदेशी प्रौद्योगिकी अक्सर अधिक पूँजी तथा कम श्रम के प्रयोग पर आधारित रही है जो भारत की संसाधन-संरचना के प्रतिकूल है। हमें ऐसी प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है जो कम पूँजी तथा अधिक श्रम का प्रयोग करे। ऐसी प्रौद्योगिकी हमें खुद ही विकसित करनी होगी।

राष्ट्रीय विनिर्माण नीति-2011 (NATIONAL MANUFACTURING POLICY : 2011)

प्रधानमंत्री समूह की संस्तुति पर जिसने अपनी रिपोर्ट 2008 में दी, 4 नवम्बर, 2011 को सरकार ने राष्ट्रीय विनिर्माण नीति घोषित की। इसमें निम्नांकित निर्देशक उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया-

(i) विनिर्माण क्षेत्रक की संवृद्धि दर को 12-14 प्रतिशत के स्तर पर ले जाना।

(ii) 2022 तक सकल घरेलू उत्पाद का कम-से-कम 25 प्रतिशत का योगदान देने के लिए विनिर्माण को सक्षम बनाना।

(iii) 2022 तक विनिर्माण क्षेत्र द्वारा 100 मिलियन अतिरिक्त नौकरियाँ सृजित करना।

(iv) विनिर्माण में आसान जुड़ाव हेतु ग्रामीण प्रवासी तथा शहरी गरीबों के बीच उपयुक्त कौशल का सृजन करना।

(v) विनिर्माण में घरेलू मूल्यवर्धन तथा प्रौद्योगिकी सम्बन्धी गहनता बढ़ाना।

(vi) भारतीय विनिर्माण में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़ाना।

इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विनिर्माण नीति निम्न तथ्यों पर जोर देती है-

1.देश के भीतर अधिक विनिर्माण क्षमताओं और तकनीकी के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए विनिर्मित उत्पादों के फैलते घरेलू बाजार को प्रभावित करते हुए विदेशी निवेश और तकनीक को प्रोत्साहित करना।

2. नीतियों और कार्यक्रमों के डिजाइन और क्रियान्वयन में देश में उपक्रमों की प्रतिस्पर्धात्मकता को मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाना।

3. कारोबार नियमों के बुक्तिकरण के द्वारा उद्योगें के अनुपालन बोझों को प्रक्रियागत और नियमन औपचारिकताओं के सरलीकरण के द्वारा कम करना।

4. उपक्रमों की संवृद्धि गुणवत्ता और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए नवोन्मेष को प्रभावित करना।

5. मध्यावधि सुधारों को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी विमर्शकारी मेकोनिज्म को विकसित करना।

राष्ट्रीय विनिर्माण नीति की विशेषताएँ (FEATURES OF NATIONAL MANUFACTURING POLICY)

संक्षेप में राष्ट्रीय विनिर्माण प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. दीर्घकालीन विकास व राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि से व्यूहरचनात्मक के उद्योगों को प्रोत्साहनmदेना।

2. सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों को प्रोत्साहित करना।

3. रोजगार सृजन करने वाले उद्योगों को बढ़ावा देना।

4. पूँजी उत्पाद उद्योगों को निजी व सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में ही प्रोत्साहन देना।

5. सूक्ष्म, लघु व मध्यम स्तरीय उद्योगों को प्रोत्साहित करना।

6. ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहन देना जिनसे भारत को तुलना लाभ प्राप्त है जैसे-घरेलू तकनीक व कौशल विकास।

राष्ट्रीय निवेश तथा विनिर्माण क्षेत्र (NATIONAL INVESTMENT AND MANUFACTURING ZONES : NIMZs)

राष्ट्रीय निवेश एवं विनिमाण क्षेत्र (MINZ) की शुरुआत इस नीति की प्रमुख विशेषता है। NIMZ. उस भूमि पर ही खोले जायेंगे जो बेकार तथा कृषि योग्य नहीं है। राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्र विश्वस्तरीय भौतिक और सामाजिक अवसंरचना सहित समेकित औद्योगिक टाउनशिप के रूप में परिकल्पित किए गए है

 NIMZs की प्रमुख विशेषताएँ (Main Characteristics of NIMZs)

1. NIMZs की स्थापना के लिए उपयुक्त भूमि की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। राज्य सरकार 5,000 हेक्टेअर भूमि की व्यवस्था करेगी।

2. NIMZE के अधीन क्षेत्र का कम-से-कम 30 प्रतिशत उत्पादन विनिर्माण उत्पादन इकाइयों की स्थापना के लिए रखा जाएगा।

3. NIMZS का ठीक संचालन सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष प्रयोजन माध्यम (Special Purpose Vehicle) गठित किया जाएगा।

4. राज्य सरकार पर पानी, बिजली तथा अन्य आवश्यक आधारिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी होगी।

5. केन्द्र सरकार वृहद् योजना (Master planning) को लागत का वहन करेगी तथा NIMZs को जोड़ने वाली गौतिक आधारिक संरचना व्यवस्था (यथा रेल, सड़क, राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डों तथा दूरसंचार इत्यादि) का निर्माण सुधार एक निश्चित समयावधि में करेगी।

6. केन्द्र सरकार अर्थक्षमता अंतराल वित्तपोषण (Viability gap funding) के रूप में वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगी जो परियोजना लागतों के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

7. बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं से सरल शर्तों वाले ऋणों की उपलब्धता का पता लगाया जाएगा तथा NIMZs की आन्तरिक आधारिक संरचना के विकास के लिए उन्हें विकसित करने वालों को विदेशी वाणिज्यिक उधार (External commercial borrowings) जुटाने की अनुमति दी जाएगी।

भारत सरकार ने आशा व्यक्त की है कि राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, जो देश में विनिर्माण क्षेत्र के लिए प्रथम समर्पित नीतिगत उपाय है, वर्धित पूँजी निर्माण द्वारा; वैश्विक स्तर की औद्योगिक आधारिक संरचना की स्थापना द्वारा; प्रौद्योगिकी उन्नयन (Technological upgradation) द्वारा नवीन तथा व्यावसायिक कौशल विकास आधारित संरचना के सृजन द्वारा तथा उद्योगों, कामगारों व पर्यावरण अनुकूल विनियमों द्वारा; भारतीय अर्थव्यवस्था के विनिर्माण परिदृश्य को बदल देगी।

Post a Comment

Hello Friends Please Post Kesi Lagi Jarur Bataye or Share Jurur Kare