पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. राजनीतिक सिद्धांत के बारे में नीचे लिखे कौन-से कथन सही
हैं और कौन-से गलत?
(क)
राजनीतिक सिद्धांत उन विचारों पर चर्चा करता है जिनके आधार पर राजनीतिक संस्थाएं बनती
हैं।
(ख)
राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न धर्मों के अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या करता है।
(ग)
यह समानता और स्वतंत्रता जैसी अवधारणाओं के अर्थ की व्याख्या करता है।
(घ)
यह राजनीतिक दलों के प्रदर्शन की भविष्यवाणी करता है।
उत्तर
:
(अ)
सत्य
(ब)
असत्य
(स)
सत्य
(द)
असत्य
प्रश्न 2. ‘राजनीति उन सबसे बढ़कर है, जो राजनेता करते हैं।’ क्या आप
इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
: राजनीति में मानव स्वभाव की गहरी पैठ है। व्यक्ति मौलिक रूप से एक स्वार्थी जीव है
जो हमेशा प्रतियोगिता में या छिपे रूप में होता है। राजनीति दूसरों के व्यवहार के प्रबंधन
की कला है जो उस पर लादा जाता है या निर्देशित किया जाता है। राजनीति प्रभाव की एक
कला है और यह अधिकृत स्थिति प्राप्त करने की विधि है। यह निश्चित रूप से राजनीतिज्ञ
के उस कार्य से सम्बन्धित नहीं है जो वह करता है या वह विभिन्न कार्यों में निर्णय
लेता है।
वस्तुतः
राजनीति उससे कहीं अधिक है। राजनीति किसी भी समाज का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग है।
राजनीति सरकार के अच्छे मार्गों का एक प्रयास है। महात्मा गाँधी ने एक बार अवलोकन किया
कि राजनीति हमें सर्प की कुण्डली के समान ढंकता, है और बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं
देता परंतु यह एक संघर्ष है। राजनीति का प्रयोग समूह, समाज और राजनीतिक संगठन के कुछ
रूपों में सामूहिक निर्णय निर्माण के लिए होता है। राजनीतिक बातचीत में सामूहिक निर्णय
पर इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीति एक विस्तृत संकल्पना
है जिसका क्षेत्र विस्तृत है।
प्रश्न 3. लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए नागरिकों का जागरूक होना जरूरी
है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
: लोकतंत्र को लोगों की सरकार कहा जाता है। यह कहा जाता है कि सरकार की लोकतंत्रीय
प्रणाली में वास्तविक शक्ति जनता के पास होती है। यह एक अत्यधिक उत्तरदायी और उत्तरदायित्व
पूर्ण सरकार होती है। यह विभिन्न मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर बातचीत और वाद-विवाद
पर आधारित होती है। लोकतंत्र का उद्देश्य जनता हेतु महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे-समानता,
न्याय, स्वतंत्रता इत्यादि को प्राप्त करना होता है। लोकतंत्र में लोगों का महत्व दिया
जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य भाईचारा भी स्थापित करना होता है।
लोकतंत्र
की सफलता के लिए कुछ पूर्व आवश्यकताएँ जरूरी हैं जिनमें सतर्क नागरिक होना अति आवश्यक
है। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति और कर्तव्यों के प्रति चैतन्य नहीं हैं। यदि
वे यह नहीं जानता है कि सरकार क्या करने जा रही है और सरकार की नीति क्या है? यदि वे
प्रशासन और विधान पर प्रतिरोध या रुकावट नहीं डालते, वे घमंडी हो जाएंगे और अपनी स्थिति
और अधिकारों का दुरुपयोग करेंगे। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित होंगे
और प्रजातंत्र के सम्मान में भी गिरावट आयगी।
इसीलिए
लोगों को विभिन्न स्तरों पर जातीय वाद-विवाद और भाषण के आधार पर स्वस्थ जनमत बनाना
चाहिए। इसके लिए लोगों में निम्नलिखित गुण होना चाहिए –
- उनमें उच्च स्तर की साक्षरता होनी चाहिए।
- लोगों में आर्थिक और सामाजिक समानता होनी
चाहिए।
- लोगों में पर्याप्त रोजगार होना चाहिए।
- लोगों को जाति, भाषा और धर्म के ऊपर उठना
चाहिए जिससे लोगों में भाई-चारे का दृष्टिकोण विकसित हो। यदि समाज में योग्यता
का अभाव होगा तो प्रजातंत्र केवल एक भीड़ के रूप में होगा और सरकार पर कोई प्रभावी
नियंत्रण नहीं कायम हो पायगा।
- चैतन्य नागरिक का तात्पर्य उत्तरदायी और
जागरूक नागरिक से है जो सरकार के कार्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
भाग ले सकता है।
प्रश्न 4. राजनीतिक सिद्धांत का अध्ययन हमारे लिए किन रूपों में उपयोगी
है? ऐसे चार तरीकों की पहचान करें जिनमें राजनीतिक सिद्धांत हमारे लिए उपयोगी हों।
उत्तर : प्रत्येक विषय का अपना सिद्धांत होता है। वस्तुतः कोई विषय भी विषय सिद्धांतों के बगैर हो ही नहीं सकता। जब एक परिकल्पना तथ्यों से समर्थित होती है, तो यह सिद्धांत बन जाता है। सिद्धांत एक सामान्यीकरण है जो सम्पूर्ण स्थिति की व्याख्या करता है। यह एक तथ्यात्मक कथन है। यदि विज्ञान (शारीरिक विज्ञान) है या सामाजिक विज्ञान, सभी विषयों के सिद्धांत होते हैं। हमने डार्विन सिद्धांत, न्यूटन नियम और आर्किमिडीज के सिद्धांत के विषय में सुना है। ये सभी सिद्धांत नये नियमों, सिद्धांतों और कानूनों के प्रेरणा-स्रोत हैं।
उसी
प्रकार सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, नागरिक प्रशासन
आदि के सभी शाखाओं में सिद्धांतों की उपयोग की बात है उसे निम्नलिखित उपयोगी बिन्दुओं
में स्पष्ट किया जा सकता है–
- राजनीतिक सिद्धांत समाज को राजनीतिक दिशा
प्रदान करता है।
- राजनीतिक सिद्धांत सामान्यीकरण, साधन और
अवधारणा प्रदान करता है जो समाज में प्रभावी प्रवृत्तियों को समझने में सहायता
करता है।
- राजनीतिक सिद्धांत आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा
का कार्य करता है।
- राजनीतिक सिद्धांत समाज को बदलता है।
- राजनीतिक सिद्धांत समाज को गतिशील और आंदोलनकारी
बनाता है।
- ये सिद्धांत समाज में सुधार लाते हैं।
- राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विचार और संस्थाओं
के मौलिक ज्ञान को प्राप्त करने में सहायता करते हैं जो समाज को एक विशेष आकार
देते हैं जिसमें हम रहते हैं।
- राजनीतिक सिद्धांत समाज को निरंतर बनाये
रखते हैं।
प्रश्न 5. क्या एक अच्छा या प्रभावपूर्ण तर्क औरों को आपकी बात सुनने
के लिए बाध्य कर सकता है?
उत्तर
: सिद्धांत तथ्यों और हेतुवाद (Rationalism) को बताता है। सिद्धांत तार्किक वाद-विवाद
और भाषण पर आधारित होता है। सिद्धांत व्यक्ति के उचित सामर्थ्य और मानव व्यवहार में
निहित होता है। यह बहुत हद तक सही है कि अतार्किक कथन दूसरों के लिए अनुसरण योग्य नहीं
होते। यह केवल तार्किक और विवेकी तर्क ही हैं जो दूसरों के लिए अनुसरण योग्य होते हैं।
राजनीतिक सिद्धांत उन प्रश्नों का परीक्षण करता है जो समाज से सम्बन्धित और व्यवस्थित
होते हैं।
ये
विचार मूल्यों के विषय में होते हैं जो राजनैतिक जीवन और मूल्यों को वैसे और महत्व
और सम्बन्धित संकल्पना की व्याख्या करते हैं। ऊँचे स्तर पर यह उन वर्तमान संस्थाओं
को देखता है जो पर्याप्त है और वे किस प्रकार अस्तित्व में हैं। वह नीति कार्यान्वयन
को भी देखता है ताकि वे लोकतांत्रिक और सही रूप में परिवर्तित हो। राजनीतिक सिद्धांत
का उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों और राजनीतिक घटनाओं का मूल्यांकन करने में
विवेकयुक्त विचार करने में पशिक्षित करता है।
प्रश्न 6. क्या राजनीतिक सिद्धांत पढ़ना, गणित पढ़ने के समान है? अपने
उत्तर के पक्ष में कारण दीजिए।
उत्तर
: राजनीतिक सिद्धांतों का अध्ययन निश्चित रूप से केवल कुछ पहलुओं में गणित अध्ययन के
समान है। यह पूर्ण रूप से समान नहीं है। राजनीतिक सिद्धांत एक तथ्यात्मक कथन है जो
कुछ तथ्यों पर आधारित होते हैं। उनमें सूत्रीय औचित्य होता है। तथ्य अंकों के समान
गणितीय नहीं होते। राजनीतिक सिद्धांत परिकल्पना करता है। यह एक तार्किक और विवेकी है।
यह गुण समस्याओं और गणितीय समीकरणों में दिखाई देता है। हम कह सकते हैं कि राजनीतिक
सिद्धांत गुणात्मक तथ्यों के गणित के निकट है और मात्रात्मक की अपेक्षा विवेकयुक्त
है। विधि की दृष्टि से भी राजनीतिक सिद्धांत और गणित में निकटता दिखाई देती है।
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. राजनीति शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
: प्राचीन काल में राज्य के क्रियात्मक रूप के लिए ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग किया जाता
था। अरस्तू के ग्रन्थ का नाम भी ‘राजनीति’ (Politics) था। पालिटिक्स शब्द की उत्पति
यूनानी शब्द के पोलिस (Polis) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ नगर-राज्य (City-State) होता
है। राजनीति के अन्तर्गत राज्य सरकार, अन्य राजनीतिक संगठनों और उनकी समस्याओं का अध्ययन
किया जाता है।
आधुनिक
विद्वान-जेलिनिक, होल्जन बर्क, सिजविक, ट्रीटरके आदि भी राजनीति के अन्तर्गत राज्य
और सरकार से सम्बद्ध बातों का अध्ययन मानते हैं। फ्रेडरिक पोलक इसे सैद्धान्तिक तथा
व्यावहारिक राजनीति में बाँटते हैं। सैद्धान्तिक राजनीति राज्य, सरकार तथा विधान से
सम्बन्धित मूल सिद्धांत तथा व्यावहारिक राजनीति राज्य के कार्य, कानून का स्वरूप, व्यक्ति
तथा राज्य के सम्बन्धों आदि का अध्ययन करता है।
प्रश्न 2. राजनीतिक सिद्धांत का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
: कुछ विद्वानों ने ‘राजनीतिशास्त्र’ अथवा ‘राजनीतिक दर्शन’ के लिये राजनीतिक सिद्धांत
का प्रयोग किया किन्तु आशीर्वाद जैसे विद्वानों ने दोनों की विषय वस्तु को एक नहीं
माना है। आशीर्वाद के विचार में ‘राजनीतिक सिद्धांत’ शब्द का प्रयोग ‘राजनीतिक दर्शन’
की अपेक्षा अधिक उचित है। ‘राजनीतिक दर्शन’ अनिश्चितता, अस्पष्टता तथा काल्पनिक पक्ष
का द्योतक है, जबकि राजनीतिक सिद्धांत शब्द अधिक स्पष्ट, अधिक निश्चित और अधिक नियोजित
है।
किन्तु
वर्तमान काल में राज्य-विषयक ज्ञान के लिये राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग उचित और तर्कसंगत
प्रतीत नहीं होता, क्योंकि, “राजनीतिक सिद्धांत’ सरकार और शासन कला से कोई सम्बन्ध
नहीं रखता। ‘राजनीतिक सिद्धांत’ का सम्बन्ध राज्य के मौलिक सिद्धांतों तथा उसके भूत
और वर्तमान तक सीमित है। इसका राज्य के भावी स्वरूप तथा कार्यक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं
है।
प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है। इस सम्बन्ध में तथ्य प्रस्तुत
कीजिए।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान को अनेक विद्वानों ने निम्न तथ्यों के आधार पर एक विज्ञान माना है
–
- प्रयोगात्मक विधि द्वारा राजनीतिशास्त्र
का अध्ययन सम्भव है।
- विज्ञान की तरह राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी
की जा सकती है।
- राज्य रूपी प्रयोगशाला में राजनीति विज्ञान
के अन्तर्गत परीक्षण एवं पर्यवेक्षण कर एक निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता
है।
- राजनीति विज्ञान में भी कार्य कारण-प्रभाव
सम्बन्ध देखा जा सकता है।
प्रश्न 4. राजनीति विज्ञान एक विज्ञान नहीं है। तर्क दीजिए।
उत्तर:
निम्न तथ्यों के आधार पर राजनीति विज्ञान को विज्ञान नहीं माना जाता है।
- इसमें वैज्ञानिक विधियों का अभाव है।
- कार्य-कारण सम्बन्ध का अभाव है।
- इसके अन्तर्गत सही भविष्यवाणी नहीं की जा
सकती है।
- इसमें शुद्ध एवं शाश्वत निष्कर्ष का अभाव
है।
- इसमें सार्वभौम रूप से मान्य नियमों का
अभाव है।
- प्रयोगशालाओं का अभाव।
- राजनीति विज्ञान का आधार अनिश्चित तथा विचारों
में एकता का अभाव है।
- इसमें अचूक माप का अभाव है।
- इसमें वस्तुपरक अध्ययन की कमी है।
प्रश्न 5. राजनीति विज्ञान किसे कहते हैं? अथवा, राजनीति विज्ञान से
आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विश्व के बहुत से. दार्शनिकों ने राजनीति विज्ञान को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया
है। प्रो. गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का अध्ययन राज्य के साथ आरम्भ होता है
और राज्य के साथ समाप्त होता है।” प्रो. सीले के अनुसार, “जिस तरह अर्थशास्त्र धन का,
जीव-शास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का तथा रेखागणित स्थान और दूरी का अध्ययन करता
है, उसी प्रकार राजनीति विज्ञान ‘शासन’ के बारे में छानबीन करता है।”
प्रो.
गेटेल के अनुसार, “जिन विषयों में राजनीति विज्ञान की सर्वाधिक दिलचस्पी है वे हैं-राज्य,
सरकार और कानून।” इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान, राज्य,
सरकार, व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन है। इसमें राज्य
के भूत, वर्तमान और भविष्य के हर पहलू का अध्ययन किया जाता है।
प्रश्न 6. राजनीति विज्ञान ‘पोलिस’ शब्द से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान को अंग्रेजी भाषा में Political Science कहा जाता है। अरस्तू ने
इसे Politics का नाम दिया है। पोलिटिक्स (Politics) शब्द यूनानी भाषा के ‘पोलिस’
(Polis) से बना है जिसका अर्थ है ‘नगर राज्य’ (City State)। प्राचीन काल में छोटे-छोटे
नगर राज्य हुआ करते थे परंतु अब विशाल राज्यों का युग है। अत: राजनीति विज्ञान वह विषय
है जो राज्यों के बारे में अध्ययन करता है।
प्रश्न 7. राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व बताइए।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व निम्नलिखित हैं –
- राजनीति विज्ञान देश के नागरिकों को उनके
अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान कराता है।
- राजनीति विज्ञान का अध्ययन लोकतंत्र की
सफलता के लिए भी. आवश्यक माना जाता है। नागरिकों को राजनीति विज्ञान से राजनीतिक
शिक्षा मिलती है। नागरिकों को यह पता चलता है कि इन्हें अपने प्रतिनिधियों का
चुनाव कैसे करना चाहिए तथा उनके प्रतिनिधि कैसे होने चाहिए।
प्रश्न 8. राजनीति विज्ञान में मुख्यतः किन बातों का अध्ययन किया जाता
है?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान में मुख्यतः जिन बातों का अध्ययन किया जाता है उनमें से अधिकांश
निम्नलिखित हैं–
- राज्य का अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन।
- सरकार और उसके विभिन्न रूपों का अध्ययन।
- मानव के राजनीतिक आचरण का अध्ययन।
- विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन।
प्रश्न 9. राजनीति विज्ञान को सर्वव्यापी विज्ञान किसने तथा क्यों कहा?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान को कुछ विद्वान विज्ञान मानते हैं और कुछ अन्य विद्वान इस विषय को
कला मानते हैं। अरस्तु यूनान का एक बड़ा दार्शनिक था। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान
न केवल विज्ञान है बल्कि यह अन्य विज्ञानों से ऊपर भी है। अरस्तू के विचार में इसे
इसलिए सर्वव्यापी विज्ञान (Master Science) कहना आवश्यक है क्योंकि यह मानव की सभी
क्रियाओं और पहलुओं का अध्ययन करता है। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान के क्षेत्रों में
केवल राजनीतिक संस्थाएँ ही नहीं आतीं बल्कि सामाजिक संस्थाएं भी आती हैं।
प्रश्न 10. राजनीति क्या है?
उत्तर
: राजनीति (Politics) शब्द यूनानी भाषा के शब्द (Polis) से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य
(City State) है। प्राचीन काल में नगर राज्य हुआ करते थे। अतः राजनीति का अर्थ राज्य
संबंधी समस्याओं से ही माना जाता था, परंतु आधुनिक धारणा यह है कि राजनीति एक व्यापक
सामाजिक प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक दल, दबाव, गुट, राजनीतिक संस्कृति, जनमत,
मतदान आचरण सभी आ जाते हैं। कुछ आधुनिक लेखकों ने राजनीतिक को ‘शक्ति के लिए सघर्ष’
कहा है। कुछ अन्य लेखक राजनीति को मूल्यों के अधिकारिक आबंटन से संबंधित करते हैं।
प्रश्न 11. राजनीति विज्ञान के अध्ययन के क्या लाभ हैं?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान के अध्ययन के प्रमुख लाभ –
- राजनीति विज्ञान के अध्ययन से हमें राज्य
और सरकार के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।
- नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान
होता है।
- विभिन्न समुदायों के संगठनं कार्य तथा उद्देश्यों
का ज्ञान प्राप्त होता है।
- लोकतंत्र की सफलता विज्ञान के अध्ययन पर
निर्भर है।
- राजनीतिक चेतना जागृत होती है।
- मानव के दृष्टिकोण को उदार बनाता है।
- जन कल्याण सम्बन्धी नीति बनाने में सहायक
होता है।
- व्यक्ति में नैतिक गुणों का विकास करता
है। उसे एक आदर्श नागरिक बनाता है।
प्रश्न 12. राजनीति और राजनीति विज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर
: राजनीति और राजनीति विज्ञान में अंतर-
प्राचीन
काल में राजनीति शास्त्र को राजनीति ही कहा जाता था। अरस्तू ने अपनी पुस्तक का नाम
‘Politics’ ही रखा था, परंतु आजकल इन दोनों में भेद किया जाता है। ‘Politics’ (राजनीति)
शब्द ग्रीक भाषा के Polis से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे
नगर राज्य थे, परंतु अब बड़े-बड़े राज्य बन गए हैं। आजकल राजनीति शब्द का अर्थ उन राजनीतिक
समस्याओं से लगाया जाता है जो कि किसी ग्राम, नगर, प्रान्त, देश अथवा विश्व की समस्याएँ
हैं।
राजनीति
दो प्रकार की होती हैं-सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक। राजनीतिक विज्ञान, राजनीति से
प्राचीन है। राजनीति विज्ञान का उद्देश्य आदर्श राज्य, आदर्श नागरिक तथा आदर्श राष्ट्र
का निर्माण करना है जबकि राजनीति का उद्देश्य किसी भी प्रकार सत्ता प्राप्त करने से
है। राजनीति का अर्थ ही सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष है जबकि राजनीति शास्त्र सहयोग,
सौहार्द्र, सहिष्णुता, प्रेम तथा त्याग की भावना सिखाता है। राजनीति विज्ञान निश्चित
आदर्शों पर आधारित है जबकि राजनीति स्वार्थ व अवसरवादिता पर आधारित है।
प्रश्न 13. “राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर
: कई आधुनिक लेखकों ने राजनीति को ‘शक्ति के लिए संघर्ष’ के रूप में देखा है। वेल और
केपलेन (Lasswel and Kaplan) के शब्दों में, “राजनीतिक विज्ञान शक्ति को सँवारने और
उसका मिल-बाँटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” राबर्ट डैल (Robert Dahl) का कहना है
“राजनीति में शक्ति और प्रभाव का अध्ययन शामिल है।” (Politics involves power and
influence) लोग दूसरों पर शासन करना चाहते हैं। ये सत्ता के भूखे होते हैं और शक्ति
के लिए संघर्ष करते हैं। राजनीतिक दलों, दबाव गुटों और अन्य संगठित समुदायों के बीच
सत्ता या सुविधाओं के लिए संघर्ष चलता रहता है। अत: यह ठीक ही कहा गया है कि राजनीति
शक्ति के लिए संघर्ष है।
प्रश्न 14. राजनीति विज्ञान की इतिहास को क्या देन है?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान की इतिहास को देन-
- राजनीति विज्ञान इतिहास को सरस बनाता है।
- राजनीति विज्ञान इतिहास को नयी दिशा प्रदान
करता है, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न होती तो भारत का इतिहास कुछ और ही
होता।
- राजनीतिक विचारधाराएँ ऐतिहासिक घटनाओं को
जन्म देती है। रूसो और मांटेस्क्यू के विचारों ने फ्रांस को जन्म दिया।
- “राजनीति विज्ञान ही वह शास्त्र है जो स्वर्ण
कणों के रूप में इतिहास रूपी नदी की रेत में संगृहीत किया जाता है।”
प्रश्न 15. राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को क्या देन है?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान का उद्देश्य नागरिकों को उन्नति व विकास द्वारा जीवन-स्तर को ऊँचा
उठाना है। राजनीतिक विचारधाराओं का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। “जैसे प्रजातंत्र
की विचारधारा आर्थिक न्याय पर बल देती है। राजनीतिक संगठनों का भी देश की अर्थशास्त्र
पर प्रभाव पड़ता है। यदि सत्ता दल में एकता और अनुशासन है तो वहाँ की आर्थिक नीतियाँ
उचित और स्थायी होंगी। सरकारी नीतियाँ, आयात-निर्यात, बैंक नीति, विनिमय दर, सीमा शुल्क
आदि नीतियों का भी अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 16. “राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक हैं।”
स्पष्ट करो।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान और इतिहास का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। दोनों को एक दूसरे से अलग
करना बहुत कठिन है। सीले का कथन है कि, “राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास का कोई फल
नहीं; इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान का कोई मूल्य नहीं।” राजनीति विज्ञान इतिहास
पर निर्भर है। सभी राजनीति संस्थाएँ विकास का परिणाम होती हैं।
उन्हें
समझने के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। इतिहास राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला है।
ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर वर्तमान राजनीतिक जीवन में सुधार करने हेतु भविष्य के
लिए मार्ग निश्चित किया जा सकता है। दूसरी ओर राजनीति विज्ञान भी इतिहास को अध्ययन
सामग्री प्रदान करता है। ऐतिहासिक घटनाएँ राजनीतिक विचारधाराओं का परिणाम होती हैं।
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक
हैं।
प्रश्न 17. आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति के किन्हीं दो विषयों
का नाम बताओ।
उत्तर
: आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के मुख्य विषय निम्नलिखित हैं –
- सत्ता तथा शक्ति का अध्ययन
- मूल्यों की सत्तावादी व्यवस्था का अध्ययन
प्रश्न 18. परम्परागत दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन
के कोई दो विषय बताओ।
उत्तर
: परम्परागत दृष्टिकोण के अध्ययन के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन में निम्नलिखित
विषयों को मुख्यरूप से शामिल किया जाता है:
- राजनीति शास्त्र का अध्ययन (Study of
Political Science) है। इसमें राज्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया
जाता है।
- सरकार का अध्ययन (Study of
Government): राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत सरकार का अध्ययन किया जाता है। सरकार
राज्य का आवश्यक अंग है। सरकार का संगठन सरकार के अंग तथा विभिन्न प्रकार की शासन
प्रणालियों का अध्ययन किया जाता है।
प्रश्न 19. राजनीति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
: सामान्य राजनीति से आशय ‘निर्णय लेने की प्रक्रिया’ है। यह प्रक्रिया सार्वभौमिक
है। जीन ब्लान्डल के अनुसार “राजनीति एक सार्वभौमिक क्रिया है।” हरबर्ट जे. स्पेंसर
के अनुसार “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान
करता है।”
प्रश्न 20. घरेलू मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप को उदाहरण द्वारा स्पष्ट
कीजिए।
उत्तर
: राजनीति का घरेलू मामलों में हस्तक्षेप 10वीं सदी के उत्तरार्द्ध में प्रारंभ हुआ।
महिलाओं का शोषण रोकने के लिए भारत में भी अन्य देशों के समान घरेलू हिंसारोधक अधिनियम
बनाकर उन्हें घरेलू हिंसा से निदान के क्षेत्र में पहल हुई।
प्रश्न 21. क्या राजनीतिक विवादों को तर्कों द्वारा सुलझाया जा सकता
है?
उत्तर
: राजनीतिक तर्कों का एकमात्र उद्देश्य अपनी बात को मनवाना होता है और इस लक्ष्य प्राप्ति
के लिए मनुष्य अनेक तरीकों को अपना सकता है, जैसे-विज्ञापन अथवा प्रचार-प्रसार द्वारा।
इराक पर आक्रमण के अपने तर्क को सही ठहराने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने विज्ञापन
तथा प्रचार, दोनों तरीकों का सहारा लिया था।
ऐसे
समय राजनीतिक विवाद उन तक ही सीमित रह जाते हैं जिनका प्रदर्शन अच्छे तरीके से किया
जाता है चाहे वह तर्क गलत ही क्यों न हों। प्रचार के माध्यमों से राजनीतिक उद्देश्यों
को जनता के सामने तोड़-मरोड़ कर तथ्यों के द्वारा रखा जाता है और अपने मनमाने निष्कर्षों
को लोगों के ऊपर थोप दिया जाता है। यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विचारक यह म ते हैं
कि राजनीतिक विवादों को तर्कों के माध्यम से ठीक ढंग से नहीं सुलझाया जा सकता है।
प्रश्न 22. सिद्धांत किसे कहते हैं?
उत्तर
: सिद्धांत अंग्रेजी शब्द (Theory) का हिन्दी रूपांतर है और Theory यूनानी शब्द ‘थ्योरिया’
(Thoria), थ्योरमा’ (Theorema) थ्योराइन’ (Theorein) नामक शब्द से लिया गया है। इसका
अर्थ है “भावात्मक सोच-विचार” (Sentimental Thinking)। एक ऐसी मानसिक दृष्टि जो कि
एक वस्तु के अस्तित्व और उसके कारणों को प्रकट करती है। ओनोल्ड बेश्ट के अनुसार सिद्धांत
के अन्तर्गत “किसी भी विषय के संबंध में एक लेखक की पूरी की पूरी सोच या समझ शामिल
रहती है। इसमें तथ्यों का वर्णन विश्लेषण व व्याख्या सहित उसका इतिहास के प्रति दृष्टिकोण,
उसकी मान्यताएँ और वे लक्ष्य शामिल हैं जिनके लिए किसी भी सिद्धांत का प्रतिपादन किया
जाता है। पॉपर के अनुसार: “सिद्धांत मानसिक आँखों में रेखांकित, अनुभाविक व्यवस्था
का विकल्प है।”
प्रश्न 23. राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
: जार्ज कैटलिन के अनुसार, राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक दर्शन तथा राजनीति विज्ञान
दोनों सम्मिलित हैं। डेविड हैल्ड के अनुसार “राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन से संबंधित
अवधारणाओं और व्यापक अनुमानों का एक ऐसा ताना-बाना है जिसमें शासन, राज्य और समाज की
प्रकृति व लक्ष्यों और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं का विवरण शामिल है।”
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान और तर्कशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन समय से ही इन दोनों
शास्त्रों को एक ही शास्त्र के दो अंगों के रूप में माना जाता रहा है। राजनीति विज्ञान
और अर्थशास्त्र के घनिष्ठ संबंधों के बारे में विभिन्न विद्वानों के विचार निम्नलिखित
हैं –
प्रो.
गार्नर के अनुसार, “वर्तमान काल में राजनीति के ज्वलन्त प्रश्न मूल रूप में अर्थशास्त्र
के भी प्रश्न हैं। वास्तव में प्रशासन के सम्पूर्ण सैद्धान्तिक पक्ष का स्वरूप अधिकांशतः
आर्थिक है। मार्क्स ने तो यहाँ तक कहा है कि, “किसी युग के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के
स्वरूप का निश्चिय आर्थिक परिस्थितियाँ ही करती है।” बिस्मार्क का कथन था कि, “मुझे
यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं वरन् व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।”
राजनीति
विज्ञान की अर्थशास्त्र को देन :
राजनैतिक
विचारधाराओं का आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संगठन का भी देश की अर्थव्यवस्था
पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो उस देश के लोगों
की आर्थिक दशा अच्छी होगी। अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution
of Economics to Political Science) अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान कहते हैं। अर्थशास्त्र
में धन के उत्पादन, विनिमय, वितरण तथा उपभोग में लगे व्यक्ति के सामाजिक गतिविधियों
का अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह मानव आवश्यकताओं और उनकी संतुष्टि का
विज्ञान है। जब तक व्यक्ति की आर्थिक दशा अच्छी नहीं होगी, वह अच्छा नागरिक नहीं बन
सकता। अतः अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में गहरा सम्बन्ध है।
प्रश्न 2. राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र क्या है?
उत्तर
: राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। राजनीति विज्ञान में मुख्यतः
निम्नलिखित तथ्यों का अध्ययन होता है:
1.
राज्य का अध्ययन : राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य के भूत
वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का
आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।” गिलक्राइस्ट ने भी कहा है; “राज्य क्या है, क्या
रहा है और क्या होना चाहिए का अध्ययन राजनीति विज्ञान का विषय है।”
2.
सरकार का अध्ययन : सरकार राज्य का एक अनिवार्य तत्व है। सरकार
के विभिन्न रूप सरकार के अंग तथा सरकार का संगठन आदि का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में
किया जाता है।
3.
मानव व्यवहार का अध्ययन : राज्य का व्यक्ति के साथ अटूट संबंध
है। व्यक्ति और राज्य का क्या सम्बन्ध है? व्यक्ति को कौन-कौन से अधिकार मिलने चाहिए
और कौन-कौन से कर्त्तव्य करने चाहिए? व्यक्ति का राजनैतिक आचरण। क्या है ? इन सब बातों
का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में किया जाता है।
4.
अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन : राजनीति विज्ञान में अन्तर्राष्ट्रीय
कानून, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि का भी अध्ययन किया जाता है।
उपरोक्त के अतिरिक्त राजनीति विज्ञान शक्ति का भी अध्ययन है। इसमें नीति निर्माण प्रक्रिया
भी अध्ययन की जाती है। इसमें शास्त्र संबंधी कार्य, मतदान, राजनैतिक दल एवं आम राजनीतिक
संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है।
प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान के परम्परागत तथा आधुनिक अर्थ बताएँ।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान के अंग्रेजी पर्याय (Political Science) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा
के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है, जिसका अर्थ है (City State) अर्थात् नगर राज्य। प्राचीन
काल में यूनान में छोटे-छोटे नगर राज्य होते थे। आज के युग में छोटे-छोटे नगर राज्यों
का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। राज्य के इस विकसित और विस्तृत रूप से संबंधित
विषय को राजनीति विज्ञान कहा जाने लगा। राजनीतिक विज्ञान की परिभाषाएँ विभिन्न विद्वानों
द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत की गई हैं –
1.
राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन है : ब्लंटशली के अनुसार, “राजनीतिक
विज्ञान वह विज्ञान है, जिसका संबंध राज्य से है और जो यह समझने का प्रयत्न करता है
कि राज्य के आधारभूत तत्व क्या हैं, उसका आवश्यक स्वरूप क्या है, उसकी किन विविध रूपों
में अभिव्यक्ति होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ?” प्रसिद्ध विद्वान डॉ. गार्नर के
अनुसार, “राजनीति विज्ञान विषय के अध्ययन का आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।”
2.
राजनीति विज्ञान ‘राज्य और सरकार’ दोनों का अध्ययन है :
पॉल जैनट के अनुसार, “राजनीति विज्ञान समाज का वह अंग है जिसमें राज्य के आधार और सरकार
के सिद्धांतों पर विचार किया जाता है।” डिमॉक (Dimock) के अनुसार, “राजनीति विज्ञान
का संबंध राज्य तथा उसके साधक सरकार से है।”
3.
मानवीय तत्त्व -राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अंग है,
जिसके अंतर्गत मानवीय जीवन के राजनीतिक पक्ष और जीवन के पक्ष से संबंधित राज्य, सरकार
तथा अन्य संबंधित संगठनों का अध्ययन किया जाता है।
राजनीति
विज्ञान की परिभाषा -आधुनिक दृष्टिकोण : परम्परागत रूप से राजनीति
विज्ञान को व्यक्तियों के राजनीतिक क्रिया-कलापों तक ही सीमित समझा जाता था और जिसमें
राज्य सरकार और अन्य राजनीतिक संस्थाओं को ही महत्वपूर्ण समझा जाता था। परंतु आधुनिक
दृष्टिकोण अधिक व्यापक और यथार्थवादी हैं। इसमें अन्तः अनुशासनात्मक दृष्टिकोण
(Inter-disciplinary approach) अपनाया गया है। इसमें राज्य को ही नहीं वरन् समाज को
भी सम्मिलित किया गया है। आधुनिक लेखकों के द्वारा राजनीति विज्ञान को शक्ति, प्रभाव,
सत्ता, नियंत्रण, निर्णय और मूल्यों का अध्ययन बताया गया है।
डेविट
इस्टन के अनुसार, “राजनीति विज्ञान मूल्यों का सत्तात्मक आबंटन है।” (Political
Science deals with the authoriative allocation of values) केटलिन ने राजनीति विज्ञान
को शक्ति का विज्ञान (Science of Power) कहा है। पिनॉक और स्मिथ के अनुसार, “राजनीति
विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनात्मक ढाँचों से संबंधित
होता है जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना, सदस्यों के सामूहिक कर्मों का
सम्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक अन्तर्भावी (Inclusive) और
अंतिम माना जाता है।” इस प्रकार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार को उसके
समस्त सामाजिक जीवन के संदर्भ में ही ठीक प्रकार से समझने की कोशिश करता है।
प्रश्न 4. संक्षिप्त टिप्पणी लिखो
(क)
शक्ति की अवधारणा
(ख)
सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य
उत्तर:
(क)
शक्ति की अवधारणा :
शक्ति
एक ऐसी अवधारणा है जो राज्य के लिए आवश्यक है। राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने
के लिये नागरिकों द्वारा कानूनों का पालन किए जाने की अपेक्षा रखी जाती है परंतु जो
व्यक्ति ऐसा नहीं करते उन्हें शक्ति द्वारा बाध्य किया जाता है कि कानूनों का पालन
करें।
(ख)
सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य :
इतिहास
अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजनीति विज्ञान आदि अनेक विषय मानव सम्बन्धों
का वर्णन करते हैं तथा वे परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। अतः विषयी दृष्टिकोण में
ही मानव समस्याओं को उचित रूप से समझा जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों में
इस प्रकार के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मानव समाज में पायी जाने वाली गरीबी की समस्या
की कई दिशाएँ होती हैं। आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक और यहाँ तक की राजनीतिक सभी दृष्टिकोणों
से समस्या का अध्ययन किया जा सकता है और तभी उसका निराकरण संभव है।
प्रश्न 5. राजनीति विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक विषय का अपना क्षेत्र होता है जिसकी व्यापकता उस शासन की विषय वस्तु पर निर्भर
करती है। गार्नर ने राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया है:
- राज्य की प्रकृति तथा उत्पत्ति का अनुसंधान।
- राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप, उनके इतिहास
तथा विभिन्न रूपों की गवेषणा।
- इन दोनों आधार पर राजनीतिक विकास के नियोजन
का यथासम्भव आकलन।
राजनीतिक
विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या करते हुए गेटल (Gettell) ने कहा है “राजनीति विज्ञान
को राज्य का विज्ञान कहा जाता है। यह संगठित राजनीतिक इकाइयों के रूप में मानवजाति
का अध्ययन करता है। राज्य के जन्म की ऐतिहासिक व्याख्या भी इसके अन्तर्गत की जाती है।
यह राज्य के विकास की व्याख्या भी करता है और वर्तमान समय के विशिष्ट शासन वाले राज्यों
के विषय में भी चर्चा करता है।
“राजनीति
विज्ञान एक सीमा तक राज्य के आदर्श स्वरूप तथा उसके सर्वोच्च लक्ष्य और शासन के उचित
प्रकारों का भी अध्ययन करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिकरण UNESCO के संयोजन में
हुए सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राजनीति के सिद्धांत,
राजनीतिक संस्थाएं, राजनीतिक दल, दबाव समूह एवं लोकमत, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध आदि विषय
सम्मिलित समझा जाना चाहिए।
प्रश्न 6. राजनीतिशास्त्र का कला के रूप में विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राजनीति विज्ञान न केवल विज्ञान है, अपितु इसे कला भी कहा जा सकता है। यह कला की समस्त
विशेषताओं को अपने में समाहित करता है और किसी भी सिद्धांत या सूत्र को व्यवहार में
क्रियान्वित करने का प्रयास करता है। अब प्रश्न यह है कि कला क्या है? कला वह विद्या
है जो किसी भी कार्य को अच्छी तरह करना सिखाती है और व्यावहारिक जीवन में विभिन्न सिद्धांतों
का प्रयोग बताकर जीवन का आदर्श प्रस्तुत करती है अर्थात् कला मानव जीवन का सर्वांगीण
चित्र तथा किसी ज्ञान का व्यावहारिक पहलू है। इस दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान भी एक
कला है।
प्रोफेसर
गैटल के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र की कला का उद्देश्य मनुष्य के क्रिया-कलापों से संबंधित
उन सिद्धांतों तथा नियमों का निर्धारण करना है जिन पर चलना राजनीतिक संस्थाओं के कुशल
संचालन के लिए आवश्यक है।” बकल (Buckle) राजनीति विज्ञान को कलाओं में पिछड़ी हुई कला
मानते हुए यह स्वीकार करते हैं कि राजनीति विज्ञान एक कला है, “राजनीति विज्ञान से
अधिक कला है। इसका राज्य के व्यावहारिक पक्ष से ज्यादा सम्बन्ध है।”
प्रश्न 7. राजनीति विज्ञान, विज्ञान और कला दोनों है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
: यह एक सामान्य अभिमत है कि कोई भी अध्ययन या तो विज्ञान की श्रेणी में आता है या
कला की, लेकिन वस्तुतः ऐसा सोचना त्रुटिपूर्ण है। विलियम एस. लिंगर के अनुसार “विज्ञान
और कला का परस्पर विरोधी आवश्यक नहीं है। कला विज्ञान पर आधारित हो सकती है।” राजनीतिशास्त्र
के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह विज्ञान और कला दोनों है।
विज्ञान
और कला दोनों ही रूपों में यह हमारे लिये उपयोगी है। गार्नर के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान
व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करता है, भ्रममूलक राजनीति दर्शन के सिद्धांत का खण्डन करता
है तथा विवेकपूर्ण राजनीतिक क्रियाकलाप के आधार के रूप में सुदृढ़ सिद्धांतों का प्रतिपादन
करता है।” (It renders practical service by deducting sound principles as a
basis for wise political action and by exposing the teaching of false political
philosophy)
इस
प्रकार राजनीतिशास्त्र एक विज्ञान भी है और एक उच्चस्तरीय कला भी। जब हम राजनीति विज्ञान
के सिद्धांतों का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित विवेचन करते हैं तथा कुछ सामान्य व सार्वभौम
निष्कर्षों की खोज करते हैं तो यह एक विज्ञान है लेकिन जब हम इन सिद्धांतों व व्यवहार
के मध्य भिन्नता व सापेक्षता पाते हैं तो राजनीति विज्ञान कला के निकट होती है। सिद्धांतों
व व्यवहार का यह अंतर कुशलता व कल्पना (कला) के विकास का अवसर प्रदान करता है।
वर्तमान
समय में चुनाव एवं राज्यों के पारस्परिक जीवन में बहुत अधिक अंतर आ गया है और ऐसी परिस्थितियों
में राजनीति विज्ञान का कला रूप ही विश्वशान्ति एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत
को प्रोत्साहन देकर विश्व को विनाश के गर्त से बचा सकता है। इसलिए, यह स्पष्ट विस्तार
करते हुए उसे कला, दर्शन और विज्ञान तीनों मानता है। लासवेल ने भी राजनीति विज्ञान
को कला, विज्ञान और दर्शन का संगम माना है
प्रश्न 8. राजनीति विज्ञान के अर्थ और कार्यक्षेत्र को स्पष्ट करें।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान का अर्थ “राज्य की नीति” से होता है। राज्य की नीति में यह अत्यन्त
आवश्यक तत्त्व होता है कि राज्य की उत्पत्ति की जाए। राज्य की शक्ति का व्यवहार और
सैद्धान्तिक स्वरूप का संचालन सम्प्रभुता के हाथों में निहित किया जाए और साथ ही साथ
राज्य में राजनीतिक विचारधारा और राज्य में विधि के स्तर पर राजनीतिक विचारधारा का
प्रभाव हो।
राजनीति
के अर्थ की उपरोक्त प्रासंगिकता को उजागर करते हुए अरस्तू ने राजनीति के अर्थ और उसके
कार्यक्षेत्र को उजागर करते हुए इससे इस महत्वपूर्ण कथन के माध्यम से किया कि “समाज
द्वारा सुसंस्कृत मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठतम होता है, परंतु जब वह कानून तथा
न्याय के बिना जीवन व्यतीत करता है तो वह निकृष्टतम हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एसा
है जो समाज में न रह सकता हो अथवा जिसे समाज की आवश्यकता ही न हो क्योंकि वह अपने आप
में पूर्ण है, तो उसे मानव समाज का सदस्य मत समझो, वह जंगली जानवर या देवता ही हो सकता
है।”
प्रश्न 9. राजनीति विज्ञान राज्य का ही अध्ययन है, स्पष्ट करें।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान को राज्य का अध्ययन इसलिए कहा जाता है कि राजनीति का अर्थ ही है
“राज्य की नीति”। अगर राजनीति अपने इस महत्वपूर्ण अंग का अवलोकन नहीं, करेगी तो निश्चित
है कि राजनीति विज्ञान का अस्तित्व कभी भी सम्भव नहीं हो पायेगा। इसलिये राजनीति विज्ञान
में राज्य और राज्य की नीति चाहे वह राजनीतिक विचारधारा के रूप हो या किसी विधि के
रूप में हो, इन सबको राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है।
राजनीति
की कोई भी विचारधारा चाहे वह लोकतंत्रीय हो और या फिर समाजवादी, साम्यवादी और निरंकुशवादी
विचारधारा हो। इन सबको उत्पन्न करने का मूल स्रोत राजनीति है और राजनीति ने निरंकुशवादी
विचारधाराओं को राज्य की व्यवस्था चलाने के लिये इसकी उपयोगिता की प्रासंगिकता को स्थापित
किया। इस कारण राजनीति विज्ञान का आधार स्तम्भ राज्य है और राज्य से जुड़े होने वाले
आवश्यक तत्व जैसे सरकार, विधि, जनता की राज्य के प्रति उसकी राजनीतिक विचारधारा आदि
की अवहेलना राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में कोई भी नहीं कर सकता।
प्रश्न 10. परम्परागत राजनीति विज्ञान से आप क्या समझते हैं, स्पष्ट
कीजिए।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान का परम्परागत दृष्टिकोण राजनीति विज्ञान का जहाँ मूल आधार स्तम्भ
है, वहीं राज्य और सरकार की संरचना का मूल आधार स्तम्भ भी है। इसके साथ ही परम्परागत
राजनीति ने राज्य और सरकार को संचालित करने के लिये राजनीतिक मूल्यों यानि नैतिक दृष्टिकोण
पर ही क्रियान्वित होती है। परम्परागत राजनीति बिना नैतिक मूल्यों के किसी भी राजनीतिक
सिद्धांत की संरचना को निर्मित नहीं करती, नैतिक मूल्य राजनीति का मूलभूत आधार स्तम्भ
है।
परम्परागत
राजनीति का यह दृष्टिकोण था कि बिना नैतिक मूल्यों के राज्य की शक्ति निरंकुश होगी,
वहीं राजनीति विचारधारा का मार्ग अस्पष्ट और अमर्यादित होगा। इसलिये परम्परावादी राजनीतिक
विचारकों ने नैतिकता से ही राजनीति के आदर्श खोजे तथा नैतिकता से राजनीति को मर्यादित
किया। अतः यह आदर्श और मर्यादा का स्वरूप होने से राज्य और सरकार की उपयोगिता स्वयं
शासक के लिये भी उपयोगी बनी और जनता के लिये भी उपयोगी बनी।
प्रश्न 11. राजनीतिक विचारधारा की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
: राजनीतिक विचारधाराओं ने ही संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की राज्य तथा इसके
अंग, सरकार और विधि पर राजनीतिक विचारधाराओं का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। जैसे लोकतंत्रीय
पद्धति में राज्य के यह दो महत्वपूर्ण तत्व सरकार और विधि कभी भी निरंकुश नहीं हो सकते,
क्योंकि उन्हें अपने मूल्यों में प्राकृतिक नियमों को अपनाना पड़ेगा, न्याय की व्यवस्था
बनाये रखने के लिये और दूसरा राजनीति जनता के प्रति जवाबदेह हो।
यही
लोकतंत्रीय राजनीतिक विचारधारा का मूल स्वरूप रहा है। इसके साथ ही ठीक इसके विपरीत
जो राजनीति को बल और शक्ति की निरंकुशता से संचालित करने पर विशेष बल देते हैं और साथ
ही साथ यह निरंकुश विचारधारा प्राकृतिक नियमों का अवहेलना अपने विधि निर्माण के सन्दर्भ
में व्यापक स्तर पर करती है। इसलिये निरंकुशवादी राज्य व्यवस्था के लिये न्याय की अवधारणा,
उसके अस्तित्व के लिये खतरे का मूल आधार बन जाती है।
प्रश्न 12. राजनीति विज्ञान में दर्शन की उपयोगिता से आप क्या समझते
हैं?
उत्तर
: राजनीतिक दर्शन की मूल जड़ नैतिक नियमों से संबंधित होती है। नैतिक नियमों और उद्देश्यों
से ही राजनीति के आदर्शात्मक स्वरूप और सीमा पर सही नियंत्रण स्थापित होता है, तथा
राज्य इसी के बल पर निरंकुश नहीं हो सकता है अर्थात् राज्य को यदि निरंकुश नहीं होना
है, तो उसे निश्चित रूप से आदर्शवादी सिद्धांतों के अनुरूप ढलना होगा।
इस
संदर्भ में चाहे प्राचीन राजनीतिक विचारक हों या फिर आधुनिक राजनीतिक विचारक हों, सबने
आदर्शवाद की उपयोगिता को राज्य के सन्दर्भ में उपयोगी इसलिए माना, क्योंकि आदर्शवादी
ही निरंकुशता को खत्म करने का एकमात्र मौलिक साधन है। बिना आदर्शवाद के निरंकुशवाद
को खत्म नहीं किया जा सकता है। हालांकि राजनीतिक दर्शन की आलोचना इस तथ्य पर की गई
कि ऐसा दर्शन काल्पनिक और अव्यावहारिक स्तर पर होता है। इसलिये राजनीति दर्शन को उन्हीं
लोगों द्वारा काल्पनिक माना गया जो राजनीति को निरंकुशवादी ज्यादा समझते थे।
प्रश्न 13. आधुनिक राजनीति विज्ञान और परम्परावादी राजनीति विज्ञान
में अंतर में स्पष्ट करें।
उत्तर
: आधुनिक राजनीति विज्ञान के विचारक विज्ञान को केवल राज्य का विषय न मानकर वरन् वह
मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार को भी राजनीति विज्ञान का विषय मानते हैं। उन्होंने आधुनिक
सहभागिता के रूप में प्रदर्शित करके यह स्पष्ट किया, जैसे लासवेल और केपलन ने अपने
कथन के द्वारा यह भाव प्रकट किया कि “राजनीति विज्ञान एक व्यवहारवादी विषय के रूप में
शक्ति को संवारने और मिल-बांटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” इसलिये राजनीतिक सहभागिता
में जनता की भावना और जनता द्वारा शासन में दिए जाने वाले योगदान का विशेष ध्यान रखा
जाने लगा, जिससे कि वे राज्य कानून के प्रति जवाबदेह हो।
परम्परावादी
राजनीति विज्ञान के विचारक राज्य और सरकार की संरचना को राजनीति विज्ञान का एक अहम्
हिस्सा मानते थे। उनका मत था कि यदि सरकार और राज्य के संदर्भ में उनके निर्माण और
क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो निश्चित है कि राज्य व्यवस्था वास्तव में
एक अनुशासित व्यवस्था को जन्म दे सकेगी तथा स्थायी रूप से शासन व्यवस्था का संचालन
कर सकेगी इसलिये परम्परावादी राजनीति विज्ञान के विचारकों ने राज्य और सरकार के स्थायित्व
के लिये ही कई राजनीतिक विचारों का प्रतिवादन किया और इन राजनीतिक विचारों का दार्शनिक,
ऐतिहासिक और तुलनात्मक पद्धति से सम्बन्ध था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. राजनीति विज्ञान के अध्ययन के महत्व की संक्षेप में व्याख्या
कीजिए।
उत्तर
: आधुनिक युग प्रजातंत्र का युग है और इस युग में राजनीति विज्ञान के अध्ययन का बहुत
महत्व है। इस विषय की गणना संसार के महत्वपूर्ण विषयों में की जाती है। इसका कारण यह
है कि आधुनिक जीवन राजनीतिक जीवन ही है। मनुष्य का कार्य राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित
होता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का नागरिक है और उसका राज्य के साथ अटूट
संबंध है। अत: राजनीति शास्त्र के अध्ययन के महत्व का विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है
–
1.
राज्य तथा सरकार का ज्ञान : राजनीति विज्ञान राज्य का विज्ञान है
और इसके द्वारा ही हमें राज्य तथा सरकार के बारे में ज्ञान होता है। राज्य का होना
सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है क्योंकि समाज में शान्ति व व्यवस्था राजनीतिक संगठन
के बिना स्थापित नहीं की जा सकती। राज्य के सभी काम सरकार द्वारा किए जाते हैं। इस
कारण सरकार के बारे में भी जानना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि सरकार का गठन
कैसे होता है और किस प्रकार की सरकार अच्छी होती है। इस सब बातों का ज्ञान हुए बिना
कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का पूरी तरह विकास नहीं कर सकता। अतः इस विज्ञान के अध्ययन
के बहुत लाभ हैं।
2.
अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान : राजनीति विज्ञान व्यक्ति
को उनके अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान कराता है। समाज और राज्य दोनों में ही रहते
हुए व्यक्ति को कुछ अधिकार मिलते हैं और ये अधिकार व्यक्ति को जीवित रहने तथा अपने
जीवन का विकास करने में सहायक होते हैं। अधिकारों के बदले व्यक्ति को कुछ कर्त्तव्यों
का पालन भी करना पड़ता है ताकि शान्ति और व्यवस्था बनी रहे और दूसरों को भी अधिकार
मिल सके।
3.
विविध समुदायों का ज्ञान होता है : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए
उसे कई प्रकार के समुदायों में पारा लेना पटता है, जैसे कि धार्मिक, सामाजिक तथा मनोरंजन
संबंधी समुदाय। किस समुदाय का संगठन कैसे होता है, उसके क्या उद्देश्य तथा कार्य हैं?
व्यक्ति को उनसे क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? इन सब बातों का ज्ञान हमे राजनीति विज्ञान
द्वारा मिलता है।
4.
दूसरे देशों की शासन प्रणाली का ज्ञान होता है : आज कोई भी व्यक्ति
अकेला नहीं रह सकता। देश-विदेश की घटनाओं में प्रत्येक व्यक्ति की दिलचस्पी रहती है
और उनका प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक विज्ञान के पता चलता है कि किस-किस देश में कौन-कौन
सी शासन प्रणाली प्रचलित है? वहाँ पर किस राजनीतिक विचारधारा को अपनाया गया है और उनके
अनुसार ही हमें अपने सम्बन्ध उन देशों से स्थापित करने पड़ते हैं। कहीं राजतंत्र, कहीं
लोकतंत्र, कहीं तानाशाही, कहीं संघात्मक सरकार, कहीं अध्यक्षात्मक सरकार और कहीं संसदीय
प्रणाली।
5.
लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक : आज का युग लोकतंत्र का युग
है। इस शासन प्रणाली में सम्पूर्ण शासन प्रणाली नागरिकों के हाथों में होती है। वे
अपने प्रतिनिधि चुनते हैं जो कानून बनाते और शासन चलाते हैं। अतः लोकतंत्र उसी देश
में सफल हो सकता है, जिस देश के लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिली हो और राजनीतिक शिक्षा
के लिए राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है।
6.
राजनीतिक चेतना जागृत होती है : आज लोकतंत्र का युग है और
शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है। राजनीति शास्त्र का अध्ययन व्यक्ति को सरकार
के विभिन्न अंगों, उनके संगठन तथा कार्यों से परिचित करा देता है। यदि किसी व्यक्ति
को सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करने का अवसर मिले तो राजनीति विज्ञान के अध्ययन
की सहायता से वह व्यक्ति अपने कार्यों को आसानी से कर सकता है। इस प्रकार से राजनीतिक
चेतना का भी विकास होता है और शासन में भी कुशलता आती है।
प्रश्न 2. राजनीति शास्त्र की प्रकृति व विषय क्षेत्र की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
: राजनीति शास्त्र की प्रकृति (Nature of Political Science) क्या राजनीति शास्त्र
विज्ञान है? यह प्रश्न राजनीति विज्ञान में अत्यधिक चर्चित रहता है। कुछ विचारक जो
इसे विज्ञान मानते हैं उनमें प्रमुख हॉब्स, माण्टेस्क्यू, ब्राइस, जैविक गार्नर आदि।
महान दार्शनिक एवं राजनीति विज्ञान के जनक (Father of Political Science) अरस्तू ने
तो इसे सर्वोच्च विज्ञान (Master Science) कहा है। राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक पद्धति
का प्रयोग होता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन है। तार्किक विश्लेषण एवं पर्यवेक्षण आधारित
है। कार्य और कारण में संबंध है।
विज्ञान
के लक्ष्य अर्थात् सत्य की खोज का राजनीति विज्ञान में भी पुट मिलता है। किस प्रकार
के राजनैतिक नियम एक आदर्श राज्य के अन्तर्गत नागरिकों का अधिकतम हित कर सकते हैं,
उनका प्रयोग राजनीति विज्ञान में होता रहता है। इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान में
भविष्यवाणी भी की जा सकती है। परंतु दूसरे विचारक इसे विज्ञान नहीं मानते। इसमें मटलेण्ड
एवं बकल प्रमुख हैं। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान में न तो कोई प्रयोगशाला है और न
ही उसमें प्रयोग किए जा सकते हैं।
व्यक्ति
को मेढ़क आदि की तरह स्थिर करके प्रयोग नहीं किए जा सकते। राजनीति विज्ञान में निष्पक्षता
का अभाव रहता है। कारण और कार्य में वास्तविकता का सम्बन्ध नहीं हो सकता। भविष्यवाणी
सही रूप में नहीं की जा सकती। कुछ विचारक राजनीति विज्ञान को कला भी कहते हैं। कला
का अर्थ है कि सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्। कला का अर्थ है किसी कार्य को सफलतापूर्वक
किया जाना। इन सभी बातों को राजनीति शास्त्र में पाया जाना उसे कला सिद्ध करता है।
विषय
क्षेत्र
राजनीति
विज्ञान के अन्तर्गत राज्य का अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार
का भी अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान का मानवीय तत्वों पर विशेष बल दिया जाता
है। अत: यह मानव संबंधों का भी अध्ययन है। इसमें नागरिकों के कर्त्तव्य और नागरिकों
के अधिकारों का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न प्रकार की राजनीतिक संस्थाओं, अन्तर्राष्ट्रीय
संबंधों, अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, विश्व शांति के उपायों आदि सभी का अध्ययन इसमें
सम्मिलित है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के समाज में
विभिन्न प्रकार के संबंधों में भी अध्ययन करता है। आधुनिक विचारकों के अनुसार राजनीति
विज्ञान शक्ति का अध्ययन है तथा मानव मूल्यों का भी अध्ययन है।
प्रश्न 3. राजनीति शास्त्र और इतिहास में संबंध स्थापित कीजिए।
उत्तर
: राजनीति विज्ञान और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सीले (Seelay) का कथन है,
“राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसमें कोई फल नहीं लगता
और इतिहास के बिना राजनीति शास्त्र बिना जड़ के वृक्ष के समान है।” (Without
History Political Science has no root and without Political Science History has
no fruit.”) राज्य ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। इतिहास राजनीति शास्त्र की प्रयोगशाला
भी है। अकबर ने राजपूतों के साथ सुलह की नीति अपनाकर अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया
जबकि औरंगजेब ने जजिया कर लगाकर सिक्ख, मराठे तथा अन्य हिन्दुओं को अपने विमुख कर लिया।
धीरे-धीरे
उसका राज्य खण्डित होता गया। इसी प्रकार राजनीति शास्त्र भी इतिहास को सामग्री प्रदान
करता है। यदि इतिहास में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन न किया जाए तो इतिहास
नीरस बन जाता है। बहुत सी राजनीतिक घटनाएँ इतिहास को एक नई दिशा में मोड़ देती हैं।
यदि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न हुई होती तो भारत का इतिहास आज कुछ और ही होता।
जून 1975 में इन्दिरा गाँधी ने आपात स्थिति न लगायी होती हो शायद भारत के राजनीतिक
दलों का यह इतिहास न होता जो आज है। इस प्रकार इतिहास राजनीतिक विज्ञान का बहुत ऋणी
है।
अंतर-इतिहास
और राजनीति विज्ञान में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर है। इतिहास
में घटनाओं का यथार्थ वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति विज्ञान में घटनाओं का विश्लेषण
करके आदर्श रूप को लाने का प्रयास होता है। आदर्श राज्य भविष्य में कैसा होना चाहिए
इस पर राजनीति विज्ञान में विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोनों विषयों के विषय
क्षेत्र भी अलग-अलग होते हैं। उनमें उद्देश्य की दृष्टि से भी अंतर होता है।
प्रश्न 4. राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र के साथ संबंध विस्तार से
बताइए।
उत्तर
: राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थिक परिस्थितियाँ राजनीतिक
दशा पर प्रभाव डालती हैं तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ आर्थिक दशा को प्रभावित करती हैं।
राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों मानव कल्याण के लिए प्रयासरत हैं। आर्थिक समस्याओं
को राजनीति विज्ञान की सहायता से ही सुलझाया जाता है। राज्य द्वारा निर्धारित नीतियों
के आधार पर आर्थिक कार्यक्रम चलाए जाते हैं। हिटलर और मुसोलिनी के नेतृत्व में जर्मनी
तथा इटली में जो एक नए प्रकार का शासन (राष्ट्रीय समाजवाद पर आश्रित) स्थापित हुआ था,
उसके कारण इन राज्यों का आर्थिक संगठन बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था। समाजवाद के विकास
का प्रधान कारण आर्थिक विषमता ही है।
ब्रिटेन
और भारत में राजकीय समष्टिवाद के कारण इन देशों के आर्थिक जीवन पर राज्य का नियंत्रण
बहुत बढ़ गया है। राज्य के कानून मजदूरी की निम्नतम दर, काम के घंटे व इसी प्रकार की
अन्य बातों की व्यवस्था करते हैं। इसी प्रकार चुंगी, आयातकर, निर्यातकर, मूल्य का नियंत्रण,
मुद्रा पद्धति आदि द्वारा सरकारें वस्तुओं के आदान-प्रदान व विनियम को नियंत्रित करती
हैं। इन विविध प्रकार के राजकीय कानूनों द्वारा आर्थिक जीवन बहुत अशों तक मर्यादित
हो जाता है। मानव सभ्यता के विकास में आर्थिक परिस्थितियाँ विशेष महत्व रखती हैं। अनेक
विचारक इतिहास की घटनाओं का मूल कारण आर्थिक ही मानते हैं। कार्ल मार्क्स ऐसे ही विचारक
थे।
अंतर:
राजनीति
विज्ञान और अर्थशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर भी है
जिसका वर्णन निम्न प्रकार है –
1.
राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध व्यक्तियों से व अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है :
राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय समाज में रहने वाले व्यक्ति हैं। राजनीति विज्ञान मनुष्य
के राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है परंतु अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से
है। यह शास्त्र वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और विनियम का अध्ययन करता है जबकि राजनीति
विज्ञान का सम्बन्ध राजनीतिक विचारधाराओं से है। संक्षेप में, अर्थशास्त्र कीमतों
(Prices) का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान मूल्यों (Values) का।
2.
राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अर्थशास्त्र से विस्तृत है :
अर्थशास्त्र मानव की केवल आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है जिसमें कि धन का उत्पादन,
वितरण और उपयोग सम्मिलित हैं जबकि राजनीति विज्ञान मानव के राजनीतिक जीवन का अध्ययन
करता है। राजनीति विज्ञान में व्यक्ति के राजनीतिक पक्ष के अतिरिक्त उसके सामाजिक,
आर्थिक, धार्मिक व नैतिक पक्ष का ही अध्ययन किया जाता है। अत: राजनीति विज्ञान का क्षेत्र
अर्थशास्त्र से व्यापक है।
निष्कर्ष
:
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष
पर पहुँचते हैं कि आज के युग में ये दोनों विषय एक-दूसरे के पूरक, हैं।
प्रश्न 5. वैधता से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व भी बताइए।
उत्तर
: राज्य को शक्ति प्रयोग करने का अधिकार है। वह नागरिकों के ऊपर बाध्यकारी शक्ति का
भी प्रयोग कर सकता है ताकि नागरिक राज्य के कानूनों का पालन करते रहें। नागरिकों पर
नियंत्रण बनाए रखने के लिए सदैव शक्ति का प्रयोग न तो सम्भव है और न ही इसका कोई औचित्य
है। अतः राज्य शक्ति का प्रयोग अंतिम विकल्प के आधार पर ही करता है। शक्ति का प्रयोग
केवल उन व्यक्तियों के लिये ही किया जाता है जो कानून का पालन नहीं करते।
व्यक्तियों
के द्वारा राज्य की आज्ञा का पालन इस विश्वास पर ही किया जाता है कि राज्य व्यक्तियों
के हित में शासन करता है। जब संसद में किसी एक दल का बहुमत नहीं होता है और कुछ दल
मिलकर एक संगठन बना लेते हैं तो गठबंधन में सम्मिलित दलों का बहुमत हो जाता है और वे
ही सरकार भी बनाते हैं परंतु उनमें से कोई भी एक दल बहुमत नहीं रखता। इस प्रकार अल्पमत
की सरकारें बनती रहती हैं परंतु इस प्रकार की सरकारों को भी न्यायोचित माना जाता है
क्योंकि कुछ निश्चित नियम व विधियों का इसमें प्रयोग होता है। राज्य में इस प्रकार
बनी सरकार का भी औचित्य रहता है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है –
(क)
सुकरात
(ख)
प्लेटो
(ग) अरस्तु
(घ)
गार्नर
प्रश्न 2. “सदा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना प्रजातंत्र का मूल्य
है।” यह किसका कथन है?
(क)
जॉन स्टुअर्ट मिल
(ख)
रूसो
(ग) लास्की
(घ)
हीगल
प्रश्न 3. किस लैटिन शब्द से Justice अर्थात् ‘न्याय’ शब्द की उत्पत्ति
हुई?
(क)
जस्टिसिया
(ख)
जज
(ग)
जस
(घ) ज्यूडिशिया
प्रश्न 4. लोकतंत्र की आधारशिला है:
(क)
स्थानीय शासन
(ख)
राष्ट्रपति शासन
(ग) बहुदलीय शासन
(घ)
मिली-जुली सरकार
प्रश्न 5. ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक हैं –
(क)
प्लेटो
(ख) अरस्तू
(ग)
सुकरात
(घ)
कौटिल्य
प्रश्न 6. प्रजातंत्र (Democracy) किस भाषा के शब्द से बना है।
(क) ग्रीक
(ख)
लैटिन
(ग)
फ्रेंच
(घ)
जर्मन
प्रश्न 7. अमेरिका में ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ पर आतंकी हमला कब हुआ था।
(क)
9 सितम्बर, 2001
(ख) 11 सितंबर, 2001
(ग)
6 अगस्त, 2001
(घ) 9 मार्च, 2001