प्रश्न 1. बौद्धिक ज्ञानोदय किस प्रकार समाजशास्त्र के विकास के लिए
आवश्यक है?
उत्तर-
समाजशास्त्र के विकास में बौद्धिक ज्ञानोदय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ज्ञानोदय
को ‘विवेक का युग’ कहा जाता है। 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं 18 वीं शताब्दी
में पश्चिमी यूरोप के देशों में विश्व के बारे में सोचने-विचारने का एक नया दृष्टिकोण
विकसित हुआ जिसे ज्ञानोदय कहा जाता है। इस नवीन दर्शन ने एक ओर मनुष्य को संपूर्ण ब्रह्मांड
के केंद्र-बिंदु के रूप में स्थापित कर दिया तो दूसरी ओर विवेक को मनुष्य की प्रमुख
विशेषता के रूप में प्रतिपादित किया।
विवेकपूर्ण
एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने मनुष्य को अपनी ही नजर में हमेशा के लिए
परिवर्तित कर दिया। यद्यपि व्यक्ति को ज्ञान के उत्पादक एवं उपभोक्ता के रूप में प्रतिस्थापित
किया गया, तथापि उन्हीं व्यक्तियों को पूर्ण रूप से मनुष्य माना गया जो विवेकपूर्ण
ढंग से सोच-विचार सकते थे। इस क्षमता के न होने वाले व्यक्तियों को आदिमानव’ अथवा
‘बर्बर मानव’ कहा गया। मानव समाज चूंकि मनुष्यों द्वारा बनाया जाता है इसलिए इसका युक्तिसंगत
विश्लेषण संभव है। इस प्रकार के विश्लेषण की मदद से एक समाज में रहने वाले लोग दूसरे
समाज को भी समझ सकते हैं।
विवेकपूर्ण
एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने धर्म, संप्रदाय व देवी-देवताओं के महत्त्व
को कम कर दिया तथा ‘धर्मनिरपेक्षता’ ‘वैज्ञानिक सोच तथा ‘मानवतावादी सोच’ जैसी वैचारिक
प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। प्रोटेस्टेंट विद्रोह तथा वैज्ञानिक क्रांति ने 18वीं शताब्दी
में जिस ज्ञानोदय के युग का प्रारंभ किया उसमें सामाजि एवं राजनीतिक समस्याओं के प्रति
नवीन दृष्टि से विचार किया जाने लगा। इसी नवीन दृष्टि ने समाजशास्त्र के विकास में
महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ज्ञानोदय
द्वारा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा यह दृढ़ विश्वास विकसित हुआ कि प्राकृतिक विज्ञानों
की पद्धति द्वारा मानवीय पहलुओं का अध्ययन किया जा सकता है और करना भी चाहिए। उदाहरणार्थ-ग़रीबी,
जो अभी तक प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में जानी जाती थी, उसे सामाजिक समस्या के रूप
में देखना प्रारंभ हुआ जो कि मानवीय उपेक्षा अथवा शोषण का परिणाम है। यह दृष्टिकोण
विकसित हुआ कि गरीबी को समझा जा सकता है और इसका निराकरण संभव है। यह धारणा भी विकसित
हुई कि ज्ञान में वृद्धि से सभी बुराइयों का समाधान संभव है। इन्हीं विचारों से समाजशास्त्र
का विकास हुआ। समाजशास्त्र के जनक आगस्त कॉम्टे का विश्वास था कि जिस विषय का विकास
कर रहे हैं वह मानव कल्याण में योगदान देगा।
प्रश्न 2. औद्योगिक क्रांति किस प्रकार समाजशास्त्र के जन्म के लिए
उत्तरदायी है?
उत्तर-
उत्पादन हेतु मशीनों के प्रयोग पर आधारित वह तकनीक, जिसने आधुनिक उद्योगों की नींव
रखी, औद्योगिक क्रांति की देन है। इस क्रांति का प्रारंभ ब्रिटेन में 18वीं शताब्दी
के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं शताब्दी के शुरू में हुआ। भूमि के स्थान पर उद्योग धन का
स्रोत बन गए। पुराने कुटीर उद्योग ढह गए तथा फैक्ट्रियों व कारखानों में काम करने के
लिए दूर-दराज से मजदूर आकर इकट्ठे होने लगे। हाथ के कारीगर बेरोजगार हो गए; अतः वे
कारखानों में काम करने के लिए मजबूर हो गए।
बड़े
पैमाने पर उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे माल की खपत होने लगी। निर्मित माल
के विक्रय-के लिए बाजार का भी विस्तार आवश्यक हो गया। पश्चिमी यूरोप के देशों के लिए
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार खोजना स्वाभाविक बन गया। उद्योगपतियों की आपसी होड़ और अधिक-से-अधिक
लाभ कमाने की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप कारखानों में मजदूरों की दशा दयनीय हो गई।
औद्योगिक नगर समृद्धि के चारों ओर दर्दनाक गरीबी के साक्षी बन गए। पुराने सामाजिक मूल्य
और परंपराएँ सामान्य जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक नहीं रह गए थे।
औद्योगिक
क्रांति के परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। न केवल ऊँच-नीच
में वृद्धि हुई, अपितु लोग गाँव छोड़कर नगरों में रोजगार की तलाश में आने लगे। स्त्रियों
और बच्चों तक को खतरनाक परिस्थितियों में काम करना पड़ा। मजदूर वर्ग के गरीब लोग झुग्गी-झोंपडियों
वाली गंदी बस्तियों में रहने के लिए विवश हो गए। इन परिस्थितियों ने राज्यतंत्र को
सार्वजनिक सामूहिक विषयों की जिम्मेदारी उठाने के लिए बाध्य कर दिया।
इन
नई जिम्मेदारियों को निभाने के लिए शासनतंत्र को एक नवीन प्रकार की जानकारी व ज्ञान
की आवश्यकता महसूस हुई। नए ज्ञान के लिए उभरती माँग ने समाजशास्त्र जैसे विषय के अभ्युदय
एवं विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसीलिए शुरू से ही समाजशास्त्रीय विचार
मुख्य रूप से औद्योगिक समाज के विकास के वैज्ञानिक आविष्कार से जुड़े हुए हैं।
प्रश्न 3. उत्पादन के तरीकों के विभिन्न संघटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
जर्मनी में जन्मे विद्वान कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई०) वैज्ञानिक समाजवाद द्वारा मजदूरों
पर होने वाले अत्याचार एवं शोषण को समाप्त करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने पूँजीवादी
समाज का आलोचनात्मक विश्लेषण कर उसकी कमियों को उजागर किया ताकि इस व्यवस्था का पतन
हो सके। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के बारे में मार्क्स की धारणा थी कि यह उत्पादन के
तरीकों पर आधारित होती है। यह उत्पादन की विस्तृत प्रणाली है जिसका संबंध ऐतिहासिक
काल से होता है। आदिम साम्यवाद, दास प्रथा, सामंतवाद, पूँजीवाद- ये सब उत्पादन की व्यवस्थाएँ
हैं।
सामान्य
स्तर पर उत्पादन की व्यवस्थाएँ एक समय विशेष में जीवन की विशेषताओं को दर्शाती हैं।
अर्थव्यवस्था का आधार प्राथमिक तौर पर आर्थिक होता है और इसमें उत्पादन शक्तियाँ और
उत्पादन संबंध सम्मिलित होते हैं। उत्पादन शक्तियों से तात्पर्य उत्पादन के सभी साधनों
(जैसे-भूमि, मजदूर, तकनीक, ऊर्जा के विभिन्न स्रोत आदि) से है। उत्पादन संबंधों के
अंतर्गत वे सभी आर्थिक संबंध-आते हैं जो मजदूर संगठन के रूप में उत्पादन में भाग लेते
हैं। उत्पादन संबंध, संपत्ति संबंध भी होते हैं क्योंकि ये स्वामित्व अथवा उत्पादन
के साधनों के नियंत्रण से संबंधित होते हैं।
प्रश्न 4. मार्क्स के अनुसार विभिन्न वर्गों में संघर्ष क्या होते हैं?
उत्तर-
मार्क्स के लिए व्यक्ति को सामाजिक समूहों में विभाजित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
आधार उत्पादन प्रक्रिया है। उत्पादन प्रक्रिया में जो व्यक्ति एक जैसे पदों पर आसीन
होते हैं, वे स्वतः ही एक वर्ग निर्मित करते हैं। उत्पादन प्रक्रिया में अपनी स्थिति
के अनुसार तथा संपत्ति के संबंधों में उनकै एक जैसे हित तथा उद्देश्य होते हैं। यही
सामान्य हित वर्ग के सदस्यों में वर्ग के प्रति जागरूकता विकसित करते हैं।
मार्क्स
ने पूँजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्गों का उल्लेख किया है- एक पूँजीपतियों का वर्ग
(बुर्जुआ वर्ग) जिसका उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण होता है तथा दूसरा सम्पत्तिविहीन
सर्वहारा वर्ग जिसके सदस्यों को अपनी आजीविका के लिए मजबूरी में श्रमिकों के रूप में
काम करना पड़ता है। इन वर्गों के उद्देश्य परस्पर विरोधी होते हैं। वर्ग चेतना विकसित
होने के उपरांत राजनीतिक गोलबंदी के तहत इन दोनों में वर्ग संघर्ष विकसित होने लगते
हैं।
मार्क्स
का मत था-“प्रत्येक विद्यमान समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” आदिम युग से
लेकर आधुनिक युग के समाज तक समाज में दो वर्ग ही प्रमुख रहे हैं-एक शोषक वर्ग तथा दूसरा
शोषित वर्ग। इन दोनों वर्गों के नाम विभिन्न युगों में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। शोषक
और शोषित वर्ग, एक-दूसरे का कभी दबे रूप में और कभी खुले रूप में निरंतर विरोध करते
रहे हैं। यही विरोध वर्ग संघर्ष के रूप में प्रतिफलित होता रहा है। माक्र्स ने कल्पना
की थी कि एक दिन सर्वहारा वर्ग पूँजीपतियों को खदेड़कर उत्पादन के साधनों पर अपना अधिकार
जमा लेगा तथा ऐसे समाज का निर्माण होगा जिसे उन्होंने ‘वर्गविहीन समाज’ की संज्ञा दी।
प्रश्न 5. ‘सामाजिक तथ्य क्या हैं? हम उन्हें कैसे पहचानते हैं?
उत्तर-
समाजशास्त्र के जनक कॉम्टे के उत्तराधिकारी माने जाने वाले फ्रांसीसी विद्वान् दुर्खोम
(1858 – 1917 ई०) ने समाजशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल पर दृढ़ करने में विशेष भूमिका
निभाई है। उनका विचार था कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु सामाजिक तथ्य हैं जिनका अध्ययन
आनुभविक रूप में किया जा सकता है। प्रत्येक समाज में घटनाओं का एक विशिष्ट समूह होता
है जो कि उन तथ्यों से भिन्न होता है जिनका अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान करते हैं। सामाजिक
तथ्यों की श्रेणी में कार्य करने, सोचने तथा अनुभव करने के वे तरीके आते हैं जिनमें
व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने की उल्लेखनीय विशेषता होता
है।
दुर्खोम
के अनुसार, “एक सामाजिक तथ्य काम करने का वह प्रत्येक ढंग है जो निर्धारित अथवा अनिर्धारित
है और जो व्यक्ति पर एक बाहरी दबाव डालने के योग्य है अथवा काम करने का वह प्रत्येक
तरीका है जो निर्दिष्ट समाज में सर्वत्र सामान्य है, और साथ ही व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों
से स्वतंत्र वह अपना अस्तित्व बनाए रखता है।” इस परिभाषा से दो बातें स्पष्ट होती हैं-
प्रथम, सामाजिक तथ्य कार्य करने (चाहे वे संस्थागत हैं या नहीं), सोचने तथा अनुभव करने
के तरीके हैं; तथा दूसरे, इन तरीकों में व्यक्तिगत चेतना से बाह्यता (Exteriority)
और दबाव की शक्ति (Constraint) की दो प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं।
बाह्यता
का अर्थ है कि सामाजिक तथ्यों का स्रोत व्यक्ति नहीं होता, अपितु समाज होता है, चाहे
वह पूर्ण राजनीतिक समाज हो या उसका कोई आंशिक समूह; जैसे-धार्मिक समुदाय तथा राजनीतिक,
साहित्यिक एवं व्यावसायिक संघ इत्यादि। दबाव की शक्ति का अर्थ है कि सामाजिक तथ्य व्यक्ति
के व्यवहार पर नियंत्रण रखते हैं। जब हम कोई ऐसी बात करना चाहते हैं जिसे दूसरे पसंद
नहीं करते तथा न ही उसके करने की प्रशंसा करते हैं। तो हम वह कार्य सामान्य रूप से
नहीं करते अर्थात् व्यक्ति तब दबाव महसूस करता है जब वह किसी कार्य को करना चाहता है
परंतु कर नहीं पाता क्योंकि दूसरे व्यक्ति ऐसा नहीं चाहते।
प्रश्न 6. ‘यांत्रिक’ और ‘सावयवी एकता में क्या अंतर है?
उत्तर-
दुर्खोम ने सामाजिक एकता (जिसे सामाजिक संश्लिष्टता अथवा सामाजिक मतैक्य भी कहा जाता
है) के सिद्धांत का प्रतिपादन अपनी सर्वप्रथम पुस्तक ‘दि डिविजन ऑफ लेबर इन सोसायटी
में किया है। यह पुस्तक 1893 ई० में फ्रेंच भाषा में प्रकाशित हुई तथा बाद में
1933 ई० में उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। वास्तव में, दुर्खोम की यह पुस्तक
सामान्य जीवन के तथ्यों का वैज्ञानिक विधि द्वारा विश्लेषण का प्रथम प्रयास था। इस
पुस्तक को लिखने की प्रेरणा उन्हें अर्थशास्त्री ऐडम स्मिथ के विचारों से मिली।
सामाजिक
एकता का अर्थ समाज की विभिन्न इकाइयों में सामंजस्य से है अर्थात् यह ऐसी परिस्थिति
है। जिसमें समाज की विभिन्न इकाइयाँ अपनी भूमिका निभाती हुई संपूर्ण समाज में संतुलन
बनाए रखती हैं। उनके अनुसार सामाजिक एकता पूर्णतः एक नैतिक घटना है क्योंकि इसी के
द्वारा पारस्परिक सहयोग तथा सद्भावना को बढ़ावा मिलता है। दुर्खोम ने सामाजिक एकता
को दो श्रेणियों में बाँटा है –
1.
यांत्रिक एकता – यांत्रिक एकता आदिम समाजों में अथवा
सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में पायी जाती है। इन समाजों में
विभेदीकरण अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर होता है तथा केवल लिंग और आयु के आधार
पर ही कार्यों में थोड़ा-बहुत विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक चेतना (Collective
conscience) द्वारा,सभी व्यक्ति एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को
बनाए रखना सभी व्यक्ति अपना परम कर्तव्य मानते. हैं। यांत्रिक एकता वह एकता है जो कि
व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के कारण आती है। अर्थात् जो समरूपता (Likeness)
का परिणाम है यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए रखी जाती है।
2.
सावयवी एकता – सावयवी एकता असमानताओं से विकसित होती
है। इसका प्रमुख आधार श्रम-विभाजन है। यह एकता आधुनिक समाज की प्रमुख विशेषता मानी
जाती है। दुर्खोम का कहना है कि जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व तथा आयतन बढ़ता
जाता है वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। इन बढ़ती हुई आवश्यकताओं
के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ ही इनमें विशेषीकरण
बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। उस एकता को, जो कि कार्यों की भिन्नता
द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता
के कारण आती हैं, दुर्वीम सावयवी एकता कहते हैं। सावयवी एकता की पुष्टि क्षतिपूरक कानून
द्वारा होती है।
‘यांत्रिक’
और ‘सावयवी’ एकता में निम्नलिखित अंतर पाए जाते हैं-
1.
यांत्रिक एकता समानताओं पर आधारित होती है, जबकि सावयवी असमानताओं अर्थात् श्रम-विभाज़न
पर आधारित होती है।
2.
यांत्रिक एकता सरल समाजों में पायी जाती है, जबकि सावयवी एकता आधुनिक समाजों को प्रमुख
लक्षण है।
3.
यांत्रिक एकता बनाए रखने में दमनकारी कानून की प्रमुख भूमिका होती है, जबकि सावयवी
एकता बनाए रखने में क्षतिपूरक कानून की।
4.
यांत्रिक एकता का प्रारूप खंडात्मक होता है, जबकि सावयवी एकता का संगठित।
5.
यांत्रिक एकता जनसंख्या के सापेक्षिक रूप से कम घनत्व वाले समाजों में पायी जाती है,
जबकि सावयवी एकता जनसंख्या में घनत्व की ऊँची मात्रा वाले समाजों में।
प्रश्न 7. उदाहरण सहित बताएँ कि नैतिक संहिताएँ सामाजिक एकता को कैसे
दर्शाती हैं?
उत्तर-
नैतिक संहिताओं का सामाजिक एकता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वस्तुतः
नैतिक संहिताओं के आधार पर ही सामाजिक एकता के स्वरूप को पहचाना जा सकता है। सरल समाजों
में अपराध सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्य माने जाते हैं तथा समाज इसका उल्लंघन करने
वालों को कठोर दंड देता है। इन समाजों में नैतिक संहिताएँ लागू करने में दनमकारी कानून
की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आधुनिक समाजों में नैतिक संहिताओं का अनुपालन क्षतिपूरक
कानून द्वारा होता है जिसका उद्देश्य क्षति-प्राप्त व्यक्ति की क्षति को पूरा करना
है अर्थात् उसे वह सब कुछ लौटा देना है जिसे गलत ढंग से उससे छीना गया है। इस प्रकार
की नैतिक संहिताएँ एवं क्षतिपूरक कानून सावयवी एकता वाले समाज का लक्षण है।
प्रश्न 8. ‘नौकरशाही की बुनियादी विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर-
नौकरशाही के साथ जर्मनी के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920 ई०) का नाम
जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार नौकरशाही एक संस्तरणबद्ध संगठन है जिसकी रचना तार्किक ढंग
से बहुत-से ऐसे व्यक्तियों के कार्यों के समीकरण के लिए की गई है जो वृहद् स्तर पर
प्रशासनिक दायित्वों के संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में लगे हैं। नौकरशाही की
बुनियादी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1.
अधिकारियों के प्रकार्य – नौकरशाही के अंतर्गत प्रत्येक अधिकारी
के प्रकार्य (काम) सुस्पष्ट होते हैं जिनका संचालन नियमों, कानूनों तथा प्रशासनिक विधानों
द्वारा होता है। उच्च अधिकारियों द्वारा अधीनस्थ वर्गों के कार्यों पर नियंत्रण रखा
जाता है। नौकरशाही में नौकरी के अनुकूल योग्यता वाले व्यक्तियों की ही भरती की जाती
है। नौकरशाही में सरकारी पद पदधारी से स्वतंत्र होते हैं क्योंकि वे उनके कार्यकाल
के पश्चात् भी बने रहते हैं।
2.
पदों का सोपानिक क्रम – नौकरशाही में सभी पद श्रेणीगत सोमान
पर आधारित होते हैं। इसीलिए जहाँ एक ओर उच्च अधिकारी निम्न अधिकारी को निर्देश देते
हैं वहीं दूसरी ओर निम्न अधिकारी अपनी शिकायत उच्च अधिकारी को कर सकते हैं।
3.
लिखित दस्तावेजों की विश्वसनीयता – नौकरशाही का कार्य
लिखित दस्तावेजों के आधार पर | होता है तथा फाइलों को रिकॉर्ड के रूप में सँभालकर रखा
जाता है।
4.
कार्यालय का प्रबंधन – कार्यालय का प्रबंधन विशिष्ट तथा आधुनिक
क्रिया है। इसीलिए इसमें कार्य के लिए प्रशिक्षित और कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता
होती है।
5.
कार्यालयी आचरण – प्रत्येक कार्यालय में कर्मचारियों का
आचरण नियमों तथा कानूनों द्वारा | नियंत्रित होता है। इन्हीं के कारण उनका सार्वजनिक
आचरण उनके निजी व्यवहार से अलग होता है। अपने आचरण हेतु प्रत्येक कर्मचारी जिम्मेदार
होता है।
प्रश्न 9. सामाजिक विज्ञान में किस प्रकार विशिष्ट तथा भिन्न प्रकार
की वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका
निभाई है। उनका तर्क था कि सामाजिक विज्ञानों का पूर्ण उद्देश्य ‘सामाजिक क्रिया की
व्याख्यात्मक सोच’ का विकास करना है। इसी अर्थ में सामाजिक विज्ञान, भौतिक विज्ञानों,
जिनका उद्देश्य प्रकृति के नियमों की खोज करना है से भिन्न होते हैं। सामाजिक क्रियाओं
में सभी अर्थपूर्ण मानवीय व्यवहार सम्मिलित होते हैं। मानवीय क्रियाओं के विषयगत (व्यक्तिनिष्ठ)
अर्थों से संबंधित होने के कारण ही सामाजिक विज्ञान प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न है।
सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन करते समय समाजशास्त्री का कार्य उन अर्थों को ढूंढना होता
है जो कर्ता द्वारा समझे जाते हैं। इसके लिए समानुभूति’ की भावना उसकी सहायता करती
है।
वेबर
ने सामाजिक विज्ञानों में पायी जाने वाली वस्तुनिष्ठता पर भी विचार व्यक्त किए हैं।
सामाजिक यथार्थता की खोज मनुष्य के अर्थों, मूल्यों, समझ, पूर्वाग्रहों, आदर्शों इत्यादि
पर आधारित होती है। इसलिए सामाजिक विज्ञानों को सदैव ‘समानुभूति समझ’ को अपनाना पड़ता
है। अपने अध्ययन को वस्तुनिष्ठ बनाने हेतु समाजशास्त्री को बिना स्वयं की निजी मान्यताओं
से प्रभावित हुए पूर्ण रूप से विषयगत अर्थों एवं सामाजिक कर्ताओं की अभिप्रेरणा को
समझना पड़ता है। वेबर ने सामाजिक विज्ञानों में पायी जाने वाली इस प्रकार की वस्तुनिष्ठता
को मूल्य तटस्थता’ कहा है अर्थात् अपने मूल्यों से तटस्थ होकर ही समाज-वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठ
अध्ययन कर सकता है। वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने हेतु वेबर ने अपने पद्धतिशास्त्र में ‘आदर्श
प्रारूप का भी उल्लेख किया है जो सामाजिक घटना का तार्किक मॉडल है जिसमें उस घटना की
महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को रेखांकित किया जाता है।
प्रश्न 10. क्या आप ऐसे किसी विचार अथवा सिद्धांत के बारे में जानते
हैं जिसने आधुनिक भारत में किसी सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया हो?
उत्तर-
आधुनिक भारत में अनेक सामाजिक आंदोलन हुए हैं। प्रत्येक आंदोलन के पीछे कोई-न-कोई विचारधारा
होती हैं। उदाहरणार्थ-निम्न जातियों में हुए समाज सुधार आंदोलनों के पीछे न केवल इन
जातियों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान करना था, अपितु एक ऐसे समाज का निर्माण करना भी था
जो समता पर आधारित हो। इसी भाँति, पर्यावरणीय चुनौतियों को लेकर हुए आंदोलनों के पीछे
यह विचारधारा रही है कि मानव प्रजाति को सतत विकास के प्रयास में पर्यावरण संतुलन को
बनाए रखना चाहिए।
ऐसा
मानव समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक है क्योंकि पर्यावरणीय असंतुलन विनाश का कारण
बन सकता है। चिपको आंदोलन तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन इसी विचारधारा पर आधारित आंदोलन रहे
हैं। इसी भाँति, महिलाओं में हुए आंदोलनों के पीछे यह सोच रही है कि आधुनिक युग में
उन्हें पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए तथा आगे बढ़ने के लिए वे सभी अवसर उपलब्ध
होने चाहिए जो पुरुषों को उपलब्ध है। कृषक आंदोलन कृषक समस्याओं के समाधान की असफलता
के परिणामस्वरूप विकसित असंतोष के कारण हुए हैं। इन आंदोलनों में कृषक अपनी सामूहिक
पहचान के आधार पर संगठित हुए हैं। विश्वव्यापी मानवाधिकार आंदोलनों के पीछे यह विचारधारा
रही है कि सभी देशों के नागरिकों, चाहे वे किसी भी जाति, प्रजाति, धर्म, रंग के क्यों
न हों, को ससम्मान जीने को अधिकार है।
प्रश्न 11. मार्क्स तथा वेबर ने भारत के विषय में क्या लिखा है-पता
करने की कोशिश कीजिए।
उत्तर-
मार्क्स तथा वेबर ने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है। उदाहरणार्थ-मार्क्स ने भारतीय
समाज की संरचना, उसकी ऐतिहासिक गत्यात्मकता, भारत पर ब्रिटिश राज की स्थापना, ईस्ट
इंडिया कंपनी के भारत में कार्यकलाप, अंग्रेजों द्वारा भारत का दोहन व शोषण, भारतीयों
को 1857 ई० का स्वतंत्रता संग्राम, उसकी असफलता के कारण, भारत में ब्रिटिश राज के भावी
परिणाम आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। यह उल्लेखनीय है कि मार्क्स स्वयं कभी
न तो भारत आए और न ही उन्होंने विशेष रूप से भारत के इतिहास या उसके शास्त्रीय ग्रंथों
का अध्ययन किया।
भारत
पर उनकी जानकारी के चार प्रमुख स्रोत थे- ब्रिटिश म्यूजियम में उपलब्ध सामग्री, लंदन
के समाचार-पत्रों में भारत संबंधी समाचार, ब्रिटिश संसद में भारतीय मुद्दों पर बहस
तथा भारत से आए जातियों के संस्मरण। इनके आधार पर मार्क्स ने जो भी लिखा वह काफी हद
तक सही था। इतना ही नहीं, मार्क्स ने भारत के उज्ज्वल भविष्य की भी कल्पना की जो अंग्रेज
अधिकारियों की इसी टिप्पणी पर आधारित थी कि भारतीयों में अपने को काम के अनुकूल ढाल
लेने और मशीनों को चलाने के लिए आवश्यक जानकारी हासिल कर लेने की विशिष्ट योग्यता पायी
जाती है।
इसी
भाँति, मैक्स वेबर ने धर्म के तुलनात्मक अध्ययन में हिंदू एवं बौद्ध धर्म का भी अध्ययन
किया तथा यह बताने का प्रयास किया कि किस प्रकार इन धर्मों की मान्यताएँ तथा प्रोटेस्टेंट
धर्म की मान्यताओं एवं आचार संहिताओं में अंतर है। उन्होंने इसी आधार पर यह प्रतिपादित
करने का प्रयास किया कि भारत में पूँजीवाद विकसित न होने का कारण हिंदू धर्म की मान्यताएँ
एवं आचार संहिताएँ ही हैं।
प्रश्न 12. क्या आप कारण बता सकते हैं कि हमें उन चिंतकों के कार्यों
का अध्ययन क्यों करना चाहिए जिनकी मृत्यु हो चुकी है। इनके कार्यों का अध्ययन करने
के कारण क्या हो सकते हैं?
उत्तर-
किसी भी विषय को समझने के लिए उन चिंतकों का अध्ययन करना अनिवार्य है जिन्होंने उस
विषय को विकसित करने में अथवा उसे आगे बढ़ाने में विशेष योगदान दिया है। ऐसे विद्वान्
‘शास्त्रीय चितंक’ कहलाते हैं जिनके विचारों को समझे बना विषय का ज्ञान प्राप्त नहीं
किया जा सकता। स्वाभाविक है कि सभी विषय पुराने हैं और उनके प्रतिपादकों की मृत्यु
हो गई है। यदि हम समाजशास्त्र का ही उदाहरण लें तो इसके जनक आगस्त कॉम्टे के अतिरिक्त
एमाइल दुर्खोम, मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स, विलफ्रेडो पेरेटो आदि विद्वानों के विचारों
को समझना जरूरी है। यही वे विद्वान हैं जिन्होंने न केवल इस विषय के निर्माण हेतु अपितु
इसे वैज्ञानिक स्वरूप देने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने
ही इस विषय में अध्ययन-अनुसंधान हेतु पद्धतिशास्त्र का भी निर्माण किया है। उनके द्वारा
जो कार्य किए गए हैं वे उनकी शास्त्रीय रचनाओं में उपलब्ध हैं तथा उनके कार्यों को
या रचनाओं को पढ़े बिना समाजशास्त्र को समझना संभव नहीं है। यदि हम उनके कार्यों का
अध्ययन नहीं करेंगे तो विषय पर हमारी पकड़ अच्छी नहीं हो पाएगी। हम रटकर प्रश्न का
उत्तर तो दे देंगे परंतु सामाजिक यथार्थता को पूर्णतया समझ नहीं पाएँगे।
क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. समाजशास्त्र परिचय पुस्तक के प्रथम अध्याय की चर्चा ‘यूरोप
में आधुनिक युग का आगमनं को देखें। वे कौन-से परिवर्तन थे जिनसे यह तीनों प्रक्रियाएँ
(ज्ञानोदय, फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति) जुड़ी हुई थीं? (क्रियाकलाप
1)
उत्तर-
ज्ञानोदय, फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति तीन ऐसी प्रक्रियाएँ मानी जाती हैं
जिनके परिणामस्वरूप यूरोपीय समाजों में आमूल-चूल परिवर्तन हुए तथा इन परिवर्तनों को
तथा इनके अनुरूप विकसित होने वाली सामाजिक संरचना को समझने के लिए समाजशास्त्र जैसे
विषय का विकास हुआ। ज्ञानोदय के परिणामस्वरूप पश्चिमी यूरोप में एक नवीन दर्शन विकसित
हुआ जिसने एक ओर मनुष्य को सम्पूर्ण ब्रह्मांड के केंद्र-बिंदु के रूप में स्थापित
कर दिया तो दूसरी ओर विवेक को मनुष्य को की प्रमुख विशेषता के रूप में प्रतिपादित किया।
विवेकपूर्ण एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने मनुष्य को अपनी ही नजर में हमेशा
के लिए ही परिवर्तित कर दिया।
इसी
के परिणामस्वरूप ‘धर्मनिरपेक्षता’ वैज्ञानिक सोच’ तथा ‘मानवतावादी सोच’ जैसी वैचारिक
प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। इसी भाँति फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति ने सामाजिक
संरचना के सभी पक्षों को बदल दिया। उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था विकसित हुई जिससे
इन समाजों में वर्ग पर आधारित विषमताएँ और गहरी हो गईं। सामाजिक समस्याओं को समझने
के लिए सामाजिक सर्वेक्षण किए जाने लगे ताकि इन समस्याओं का समाधान निकाला जा सके।
जीवन में अत्यधिक गतिशीलता एवं प्रतियोगिता आ गई तथा भौतिकवादी प्रवृत्ति विकसित होने
लगी।
अतिरिक्त
उत्पादन ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया, नगरीकरण में वृद्धि होने लगी तथा नगरों एवं औद्योगिक
केंद्रों में जनसंख्या बढ़ने लगी। गंदी बस्तियाँ और सफाई के नितांत अभाव से अनेक नई
समस्याएँ विकसित हो गईं जिनके समाधान की आशा राज्यतंत्र से की जाने लगी। राज्य से समाज
कल्याण के कार्यों की अधिक आशा होने लगी। बाजारों का तेजी से विकास हुआ तथा अनौपचारिक
संबंधों के स्थान पर औपचारिक संबंध प्रमुख होने लगे। यह सब परिवर्तन इतने दूरगामी थे
कि इन्हें समझने के लिए समाजशास्त्र जैसे विषय का विकास हुआ।
प्रश्न 2. क्या आप तथा आपके सहपाठियों द्वारा बनाए गए समूह माक्र्सवादी
अर्थ में वर्ग कहलाएँगे? इस दृष्टिकोण के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए। (क्रियाकलाप
2)
उत्तर-
उन व्यक्तियों के समूह को वर्ग कहा जाता है जिनके जीवन बिताने का ढंग एक जैसा होता
है। इसे प्रमुख रूप से आर्थिक आधार पर परिभाषित किया जाता है। यद्यपि वर्ग का आधार
आर्थिक है परंतु वह आर्थिक समूह से कुछ अधिक होता है। मार्क्स के अनुसार, सामाजिक वर्ग
ऐतिहासिक परिवर्तन की इकाइयाँ तथा आर्थिक व्यवस्था द्वारा समाज में निर्मित श्रेणियाँ
दोनों ही हैं। मार्क्स ने एक समान चेतना को वर्ग का प्रमुख आधार माना है। अपनी समान
स्थिति की चेतना के बिना वर्ग अधूरा होता है। वर्ग के प्रति सदस्यों की यह चेतना उनकी
विभिन्न क्रियाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है।
यह
एक विवादास्पद विषय है कि विद्यालय में सहपाठियों के समूह को वर्ग कहा जा सकता है या
नहीं। यह सही है कि इस समूह की प्रमुख विशेषता सहपाठी होना है; परंतु क्या इसी के आधार
पर यह समूह वर्ग कहा जा सकता है? माक्र्स के वर्ग के विचारों के संदर्भ में तो नहीं।
न तो सहपाठियों के समूह में उस अर्थ में अपने सामान्य भाग्य के प्रति चेतना पाई जाती
है जिसको उल्लेख न ही मार्क्स ने किया है। और न ही उनके हित किसी अन्य समूह के विपरीत
हैं जिससे कि वह अपने आपको संगठित कर सकें।
प्रश्न 3. क्या कारखानों तथा कृषि कार्य करने वाले मजदूर एक ही वर्ग
से संबंध रखते हैं? एक ही कारखाने में काम करने वाले मजदूर तथा मैनेजर-क्या ये एक ही
वर्ग से संबंधित हैं? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर-
कारखानों में काम करने वाले मजदूर तथा कृषि कार्य करने वाले मजदूर एक ही वर्ग से संबंध
रखते हैं। उनको अपने श्रम के बदले वेतन मिलता है तथा वे अपनी निम्न एवं दयनीय स्थिति
के प्रति सचेत होते हैं। माक्र्स ने वर्ग को जिस अर्थ में प्रयुक्त किया है उसमें इन्हें
ही वर्ग का माना जा सकता है। कारखानों में काम करने वाले मजदूर शोषक वर्ग में आते हैं
जिनका उनके मालिक शोषण करते हैं। इसी भाँति, कृषि कार्य करने वाले भू-पतियों के शोषण
का शिकार होते हैं।
दोनों
प्रकार के मजदूरों में अपने सामान्य भाग्य के प्रति चेतना पायी जाती है। एक कारखानों
में काम करने वाले मजदूर तथा मैनेजर एक वर्ग से संबंध नहीं होते। दोनों हैं तो कर्मचारी
परंतु मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा कार्य मैनेजरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति
तथा कार्य से भिन्न होते हैं। मजदूर एक वर्ग का निर्माण करते हैं। तो मैनेजर दूसरे
वर्ग का। मैनेजरों के वर्ग को कुछ लोग माध्यम वर्ग कहते हैं क्योंकि यह श्रमिक वर्ग
एवं पूँजीपति वर्ग के बीच का वर्ग है। आजकल बैंकों में मैनेजरों के अपने अलग संगठन
हैं तथा क्लर्को एवं चपरासियों के अलग।
प्रश्न 4. क्या अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक, जो नगरों में
रहते हैं तथा जिनके पास, कोई कृषि भूमि नहीं है, एक ही वर्ग से संबंध रखते हैं जैसे
गरीब कृषक मजदूर जो गाँव में रहता है तथा जिसके पास कोई जमीन नहीं है? (क्रियाकलाप
2)
उत्तर-
अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक, जो नगरों में रहते हैं तथा जिनके पास कोई कृषि
भूमि नहीं है, एक ही वर्ग से संबंध नहीं रखते हैं। एक ग्रामीण गरीब भूमिहीन कृषक मजदूर
तथा एक अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक में कोई समानता नहीं है। यद्यपि दोनों
के पास जमीन नहीं है, तथापि पहला निर्धन होने के कारण श्रमिक वर्ग का सदस्य है, जबकि
उद्योगपति या फैक्ट्री के मालिक पूँजीपति वर्ग या उच्च वर्ग के सदस्य हैं। दोनों के
हित भी एक जैसे नहीं है। एक निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहा है तथा हो सकता है कि पूरे
वर्ष उसे मजदूरी का काम भी न मिले। मजदूरी के काम में भू-स्वामी उसका शोषण करता है।
अमीर
उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक दूसरों (श्रमिकों एवं अपने अधीन कार्य करने वाले
अन्य कर्मचारियों) का शोषण करते हैं तथा उनका जीवन-स्तर भूमिहीन कृषि मजदूर के जीवन-स्तर
से कहीं अधिक ऊँचा होता है। उनका एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना होता है। चाहे इसके लिए
कर्मचारियों का कितना भी शोषण क्यों न करना पड़े। इतना ही नहीं, उत्पादन के साधनों
की दृष्टि से भी दोनो अलग वर्ग के हैं। अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री का मालिक उत्पादन
के साधनों पर नियंत्रण रखते हैं, जबकि मजदूरों का इन साधनों पर किसी प्रकार का नियंत्रण
नहीं होता। उन्हें केवल अपने श्रम के बदले निर्धारित धनराशि दी जाती है।
प्रश्न 5. एक जमींदार जो काफी जमीन का मालिक है और एक छोटा किसान जिसके
पास कम भूमि है-क्या ये दोनों एक ही वर्ग से संबंधित होंगे यदि वे एक ही गाँव में रहते
हों तथा दोनों जमींदार हों? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर-
यह सही है कि एक ही गाँव में रहने वाले दो व्यक्ति-पहला जो काफी जमीन का मालिक है।
तथा दूसरा जो एक छोटा किसान है जिसके पास कम भूमि है-भू-स्वामित्व के आधार पर जमींदार
हैं। इस दृष्टि से उन्हें एक ही वर्ग का माना जा सकता है। इसे देखने का एक दूसरा दृष्टिकोण
भी है, जिसके अनुसार दोनों जरूरी नहीं है कि एक ही वर्ग के हों। जो जमींदार काफी जमीन
का मालिक है। उसका रहन-सहन एवं जीवन पद्धति उस जमींदार से कहीं ऊँची होगी जिसके पास
कम भूमि है।
यदि
दोनों भू-स्वामित्व के कारण अपनी सम्मान स्थिति के प्रति सचेत हैं तथा भूमिहीन कृषि
मजदूरों के असंतोष एवं रोष का सामना कर रहे हैं तो दोनों एक वर्ग के भी सदस्य हो सकते
हैं। मार्क्स ने जिस ‘बुर्जुआ’ वर्ग का उल्लेख किया है उसमें पूँजीपति सम्मिलित हैं,
चाहे वे किसी एक छोटे कारखाने के मालिक हों या अनेक बड़े कारखानों के मालिक। अपने वर्ग
के प्रति चेतना उन्हें एक वर्ग का तथा चेतना को अभाव उन्हें भिन्न वर्ग का सदस्य बना
सकता है। वस्तुत: इस प्रकार के उदाहरणों में प्रमुख बात यह है कि वर्ग ‘अपने में वर्ग’
है अथवा ‘अपने लिए वर्ग है। अपने में वर्ग समान लक्षणों वाला हो सकता है जिसमें चेतना
न हो। अपने लिए वर्ग समान विशेषताओं के साथ-साथ चेतनायुक्त भी होता है।
प्रश्न 6. दुर्खोम तथा माक्र्स ने सामाजिक श्रम-विभाजन के विषय में
क्या कहा-तुलना करने की कोशिश कीजिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर-
दुर्खोम ने श्रम-विभाजन की प्रकार्यात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके अनुसार प्रत्येक
समाज विभिन्न व्यक्तियों में कार्यों का विभाजन इसलिए करता है है ताकि अपने अस्तित्व
को बनाए रखे। श्रम-विभाजन के कारण व्यक्ति एक-दूसरे पर आश्रित हो जाते हैं तथा इसी
से उनमें सावयवी एकता विकसित होती है जो समाज के एकीकरण में सहायक होती है। इसीलिए
दुर्खोम ने कहा है कि श्रम-विभाजन का कार्य सभ्यता का निर्माण करना नहीं है अपितु इसका
कार्य मुख्यतः समूहों तथा व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधकर समाज में एकता लाना है।
दुर्खोम ने श्रम-विभाजन के कारणों एवं दशाओं को समाज में खोजने का प्रयास किया है तथा
इसके असामान्य प्रारूप का भी उल्लेख किया है। मार्क्स ने श्रम-विभाजन का उल्लेख पूँजीवादी
व्यवस्था में संदर्भ में किया है। उन्होंने अर्थव्यवस्था को उत्पादन के तरीकों पर आधारित
माना है तथा उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व के आधार पर पूँजीपति एवं श्रमिक वर्ग में
श्रम-विभाजन एवं संघर्ष का विश्लेषण किया है।
प्रश्न 7. क्या आप कारण बता सकते हैं कि मार्क्स आधुनिक समाज के विषय
में गलत क्यों हो सकते हैं? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर-
अनेक विद्वान आज यह मानने लगे हैं कि मार्क्स आधुनिक समाज के विषय में गलत हैं। इसके
पीछे उनका यह तर्क है कि मार्क्स के सिद्धांत आधुनिक समाजों में निरर्थक हो गए हैं।
उदाहरणार्थ-न तो पूँजीपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग में उस प्रकार का संघर्ष पाया जाता
है जिसका उल्लेख मार्स ने किया है और न ही वह समय आया है जब सर्वहारा वर्ग ने पूँजीपतियों
को खदेड़कर अपना शासन स्थापित किया है जितने भी साम्यवादी देश थे वे साम्यवाद से पूँजीवाद
एवं खुली अर्थव्यवस्था की ओर आगे बढ़ रहे हैं। पूर्व सोवियत संघ का विघटन मार्क्स के
अनेक सिद्धांतों को झुठलाने में सहायक है।
आज
श्रमिकों में न तो उस प्रकार का अलगाव है जैसा वर्णन मार्स ने किया है और न ही उस प्रकार
का शोषण। अनेक पूँजीपति श्रमिकों को वेतन के अतिरिक्त अनेक अन्य सुविधाएँ प्रदान करते
हैं जो शोषण का कार्य न होकर श्रमिक वर्ग के प्रति उनकी सहानुभूति का प्रतीक है। प्रतिवर्ष
उन्हें अच्छे कार्य के लिए बोनस भी दिया जाता है। माक्र्स ने जिस वर्गविहीन समाज की
कल्पना की थी वह समाज भी आज तक निर्मित नहीं हो पाया। इन सब तर्कों के आधार पर अनेक
विद्वान अब कहने लगे हैं कि मार्क्सवादी दर्शन समाप्ति की ओर है तथा मार्क्स अप्रासंगिक
होता जा रहा है।
प्रश्न 8. माक्र्स अभी भी सही है-इस विषय पर किसी को समझाने के लिए
आप कौन-से तर्क देंगे? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर-
कई विद्वान यह भी तर्क देते हैं कि मार्क्स अभी भी सही है। वे मार्क्सवाद के आधुनिक
समाजों में अप्रासंगिक होने का खंडन करते हैं। उनका तर्क है कि माक्र्सवादी विचारधारा
को भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं उदार अर्थव्यवस्था से जो चुनौतियाँ मिली हैं उनसे थोड़ी
अवधि के लिए इसका महत्त्व अवश्य कम हो गया है, किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि
मार्क्स आज की परिस्थितियों में अप्रासंगिक हैं। अनेक पूर्व-साम्यवादी देशों में साम्यवादी
दल फिर से उभरने लगे हैं। चीन जैसे देश में साम्यवाद ने उदारीकृत बाजारी अर्थव्यवस्था
से इस प्रकार को समन्वय कर लिया है कि वहाँ साम्यवाद को फिलहाल किसी प्रकार का खतरा
नहीं है।
आज
भी वर्ग के आधार पर संघर्ष अनेक समाजों में हो रहे हैं तथा अर्थव्यवस्था ही अन्य उप-व्यवस्थाओं
को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। शासक वर्ग सभी देशों में अपने
प्रभुत्वशाली विचारधारा को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा द्वंद्वात्मक
भौतिकवाद के मार्क्स के विचार आज भी सार्थक हैं। अनेक देशों में श्रमिकों में अलगाव
स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अतिरिक्त मूल्य को पूँजीपतियों द्वारा हड़प करने की
प्रवृत्ति आज भी यथावत् बनी हुई है। इन तर्कों के आधार पर कुछ विद्वान यह प्रमाणित
करने का प्रयास करते हैं कि मार्क्स अभी भी सही है।
प्रश्न 9. दुर्खोम आधुनिक समाज में व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता दिए
जाने पर गलत क्यों हो सकते (क्रियाकलाप 3)
उत्तर-
दुर्खोम के अनुसार समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने वाला विज्ञान माना
गया है। सामाजिक तथ्य व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं तथा वे अपनी दबाव की शक्ति के
माध्यम से व्यक्ति को नियंत्रित करते हैं। यह सही है कि सोचने, काम करने तथा अनुभव
करने के तरीके व्यक्तियों द्वारा ही विकसित किए जाते हैं परंतु एक बार विकसित हो जाने
पर व्यक्तियों का उन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है। इसी दृष्टि से दुर्खोम ने इस बात
पर बल दिया है कि सामूहिक प्रतिनिधिानों की समाज में स्थायित्व बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण
भूमिका होती है। दुर्खोम व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता दिए जाने के पक्ष में नहीं थे
क्योंकि इससे समाज में सामूहिक प्रतिनिधानों का महत्त्व कम हो जाएगा तथा समाज में अव्यवस्था
विकसित हो जाएगी।
यह
स्थिति समाज के एकीकरण के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। दुर्वीम इस बात को भूल गए कि
समाज का निर्माण व्यक्तियों से होता है तथा बिना व्यक्तियों के समाज का अस्तित्व ही
सम्भव नहीं हैं बिना स्वतंत्रता के व्यक्तियों का विकास नहीं हो सकता। आधुनिक युग में
व्यक्ति अधिक-से-अधिक स्वतंत्रता की माँग कर रहे हैं तथा अपने पर उतना ही अंकुश लगाएं
पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय 351 रखने को उचित मानते हैं जितना कि सामाजिक व्यवस्था
के लिए आवश्यक है। दुर्खोम इन तर्को को नकारते हैं तथा इसीलिए उन्हें आधुनिक समाज में
व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता देने का विरोधी माना जाता है। वस्तुतः दुर्खोम जैसे प्रकार्यवादी
समाजशास्त्री सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न अंगों को बात करते हैं जिसमें व्यक्ति का
महत्त्व गौण हो जाता है।
प्रश्न 10. कहाँ तक निम्नलिखित समूहों अथवा गतिविधियों में वेबर के
अर्थों में नौकरशाही सत्ता का प्रयोग हुआ है –
1. आपकी कक्षा,
2. आपका विद्यालय,
3. फुटबॉल टीम,
4. एक गाँव की पंचायत समिति,
5. लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों का संघ,
6. ट्रेन अथवा बस में रोजाना सफर करने वाले लोगों का समूह,
7. सामूहिक परिवार,
8. ग्रामीण समुदाय,
9. जहाज का क्रू,
10. अपराधियों का गिरोह,
11. धार्मिक नेता के अनुयायी,
12. सिनेमा घर में सिनेमा देखते हुए लोग।
13. अपनी चर्चा के आधार पर किस समूह को आप नौकरशाही के रूप में पहचानेंगे?
(क्रियाकलाप 4)
उत्तर-
उपर्युक्त समूहों अथवा गतिविधियों के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इनमें
से अधिकांश में वेबर के अर्थों में नौकरशाही सत्ता का प्रयोग होता है। कक्षा में मॉनीटर
अन्य छात्रों के आचरण पर नियंत्रण रखता है तथा छात्र भी कोई समस्या होने पर उसके माध्यम
से उसे क्लास टीचर या प्रिंसिंपल तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। विद्यालय में प्रबंध
समिति प्रिंसिपल के कार्यों की देखरेख करती है, प्रिंसिपल अध्यापकों की तथा अध्यापक
छात्रों की। इनमें से प्रत्येक की न केवल सत्ता अलग-अलग है, अपितु दायित्व भी भिन्न-भिन्न
हैं।
फुटबॉल
टीम में कैप्टन एवं उप-कैप्टन टीम के अन्य सदस्यों को निर्देशित करने में महत्त्वपूर्ण
भूमिका निभाते हैं। इसी भाँति, किसी गाँव की पंचायत समिति में पंचायत का प्रधान अपनी
सत्ता के आधार पर निर्णय लेता है तथा पंचायत के लिए निर्धारित कार्यों को पूरा करने
का प्रयास करता है। सामूहिक परिवार में परिवार का कर्ता परिवार के अन्य सदस्यों पर
अपनी सत्ता के आधार पर ही नियंत्रण रखता है। ग्रामीण समुदाय में पंचायत के प्रधान के
पास सत्ता होती है तथा वह इसका प्रयोग ग्रामीण लड़ाई-झगड़ों को सुलझाने में करता है।
जहाज
के क्रू में भी स्पष्ट संस्तरण देखा जा सकता है। क्रू का प्रत्येक सदस्य अपने निर्धारित
कार्यों को करता है तथा सबका यह प्रयास रहता है कि जहाज बिना किसी बाधा के अपनी मंजिल
तक ठीक-ठाक पहुँच सके। अपराधियों के गिरोह में भी कोई-न-कोई ऐसा नेता होता है जो इन
अपराधियों को संगठित बनाए रखता है तथा आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बनाने
में अहम भूमिका निभाता है।
किसी
धार्मिक सपंद्राय में नेता के पास सत्ती अधिक होती है तथा वह इस सत्ता के माध्यम से
अपने अनुयायियों पर नियंत्रण रखता है। लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों के संघ, ट्रेन
अथवा बस में रोजाना सफ़र करने वाले लोगों तथा सिनेमा घर में सिनेमा देखते हुए लोगों
में वेबर के अर्थों में नौकरशाही सत्ता का अभाव पाया जाता है। नौकरशाही सत्ता के लिए
पदों में संस्तरण तथा प्रत्येक पद के साथ वैधता जुड़ी होना आवश्यक है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. श्रम विभाजन का सिद्धांत किसने प्रतिपादित किया?
(क)
कार्ल जे० फ्रेडरिक
(ख)
रैक्जे म्योर
(ग) दुर्वीम
(घ)
वेबर
प्रश्न 2. आदर्श प्रारूप की अवधारणा किसने दी?
(क)
बटेंड रसेल
(ख) वेबर ने
(ग)
वाटसन
(घ)
हैन्सन
प्रश्न 3. “नौकरशाही मंत्रीय उत्तरदायित्व की आड़ में फलती-फूलती है।”
यह कथन किसने कहा?
(क) रैक्जे म्योर
(ख)
परकिंस
(ग)
लार्ड हेवर्ट।
(घ)
फिफनर
प्रश्न 4. “इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही लेखा मात्र नहीं है।” यह
कथन किसका है?
(क)
प्रो० कैरयू हंट
(ख)
रैक्जे म्योर
(ग)
प्रो० लास्की
(घ) डा० राधाकृष्णन
प्रश्न 5. ‘दि डिविसन ऑफ लेबर इन सोसाइटी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क)
मैक्स वेबर
(ख)
लार्ड हेवर्ट
(ग) एमाइल दुखम
(घ)
परकिंस
निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. दुर्खोम की प्रथम पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर-
दुर्खाम की प्रथम पुस्तक का नाम समाज में श्रम-विभाजन’ (The Division of Labour in
Society) है।
प्रश्न 2. दुर्खोम की आत्महत्या पर लिखी सुप्रसिद्ध पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर-
दुर्खोम की आत्महत्यास पर लिखी उनकी तीसरी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘दि सुसाईड’ (The
Suicide) है।
प्रश्न 3. धर्म पर लिखी दुर्खोम की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर-
धर्म पर लिखी दुर्खोम की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘दि एलीमेंट्री फार्ल्स ऑफ रिलिजियस
लाइफ’ (The Elementary Forms of Religious Life) है।
प्रश्न 4. दुर्खोम ने समाजशास्त्र को किसके अध्ययन के रूप में परिभाषित
किया है?
उत्तर-
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।
प्रश्न 5. दुर्खोम ने समाजशास्त्र को किस प्रकार का विज्ञान कहा है?
उत्तर-
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को ‘समाजों का विज्ञान’ (The science of societies) कहा है।
प्रश्न 6. मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को किसके विज्ञान के रूप में प्रतिपादित
किया है?
उत्तर-
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण बोध कराने वाले विज्ञान
के रूप में प्रतिपादित किया है।
प्रश्न 7. वेबर ने अपने पद्धतिशास्त्र में किस पद्धति का अधिक प्रयोग
किया है?
उत्तर-
वेबर ने अपने अध्ययनों में तुलनात्मक पद्धति का अधिक प्रयोग किया है।
प्रश्न 8. वेबर के अनुसार सत्ता किसे कहते हैं?
Ø वेबर के अनुसार सत्ता क्या है?
उत्तर-
वेबर के अनुसार वैध (औचित्यपूर्ण) शक्ति को सत्ता कहते हैं।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. मार्क्स की वर्ग की अवधारणा की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
माक्र्स के अनुसार वर्ग आर्थिक आधार पर निर्मित समुह है तथा ये वैधानिक अथवा धार्मिक
रूप में परिभाषित नहीं होते। मार्क्स के शब्दों में, “सामाजिक वर्ग ऐतिहासिक परिवर्तन
की इकाइयाँ तथा आर्थिक व्यवस्था द्वारा समाज में निर्मित श्रेणियाँ दोनों ही हैं। वस्तुत:
केवल एक समान आर्थिक स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह ही वर्ग नहीं है अपितु यह एक ऐसा
समूह है जिसके सदस्य अपने वर्ग अथवा इसके चिह्नों के प्रति मानसिक चेतना भी रखते हैं
तथा उनकी यह चेतना वर्ग की विभिन्न क्रियाओं में देखी जा सकती है।
प्रश्न 2. माक्र्स की अधिसंरचना तथा ‘अधोसंरचना की अवधारणा की व्याख्या
कीजिए।
उत्तर-
किसी समाज की अधिसंरचना से अभिप्राय उस आर्थिक संरचना से है जिस पर समाज का संपूर्ण
ढाँचा निर्भर करता है। इसके निर्धारण में उत्पादन के संबंधों एवं उत्पादन की शक्तियों
का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। मार्स ने इसे वह आधार माना है जो समाज की अधोसंरचना
को निर्धारित करता है। अधोसंरचना से अभिप्राय उन वैचारिक संरचनाओं से है जो अधिसंरचना
द्वारा निर्धारित होती है। इनमें कानून, राजनीति, धर्म, कलाएँ, दर्शन आदि सम्मिलित
होते हैं। माक्र्स का कहना है कि आर्थिक अधिसंरचना के अनुसार ही कानून, राजनीति, धर्म,
कलाएँ, दर्शन आदि अधोसरचंनाएँ निर्मित होती हैं।
प्रश्न 3. दमनकारी एवं प्रतिकारी (क्षतिपूरक) कानून क्या हैं?
उत्तर-
दुर्वीम ने समाज में पायी जाने वाली एकता को इसे बनाए रखने वाले कानूनों से जोड़ा है।
उनके अनुसार यांत्रिक एकता की अवस्था में दमनकारी कानून तथा सावयविक एकता की अवस्था
में प्रतिकारी कानून का प्रचलन होता है। दमनकारी कानून वाले समाजों में विचलन या अपराध
सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्य समझे जाते हैं; अतः ऐसे व्यक्तियों को कठोर दंड दिया
जाता है। इससे नैतिक संतुलन बना रहता है तथा सामूहिक चेतना भी बनी रहती है। प्रतिकारी
कानून वाले समाजों में अपराध को समस्त समाज के विरुद्ध अपराध नहीं समझा जाता अपितु
इसे व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अपराध माना जाता है। अतः प्रतिकारी कानून का उद्देश्य
हानि-प्राप्त व्यक्ति की हानि को पूरा करना होता है।
प्रश्न 4. दुर्खोम की किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखिए।
उत्तर-
दुखैम का समाजशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने समाजशास्त्र
को एक सुदृढ़ आधारशिला प्रदान की तथा समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में प्रतिस्थापित
किया। उनके द्वारा लिखित दो पुस्तकें निम्नलिखित हैं –
1.
1893 ई० में प्रकाशित ‘De la Division du Travail Social (The Division of Labour
in Society); तथा
2.
1897 ई० में प्रकाशित Le Suicide (The Suicide)।
प्रश्न 5. मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत की मानवीय इतिहास
के बारे में क्या धारणा है।
उत्तर-
मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत की समस्त मानवीय इतिहास के बारे में दो धारणाएँ
हैं-
1.
जीवित रहने के साधनों का उत्पादन तथा
2.
बच्चों का उत्पादन ताकि समाज की निरंतरता बनी रह सके।
प्रश्न 6. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख
कीजिए।
उत्तर-
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
1.
विपरीतों की एकता तथा संघर्ष का नियम,
2.
निषेध के निषेध का नियम।
प्रश्न 7. मार्क्स के द्वारा वर्णित किन्हीं दो युगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
मार्क्स द्वारा वर्णित दो युग इस प्रकार हैं-
1.
आदिम साम्यवादी युग तथा
2.
दास युग।
प्रश्न 8. अधोसंरचना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
अधोसंरचना से अभिप्राय उन वैचारिक संरचनाओं से है जो अधिसंरचना (आर्थिक संरचना) द्वारा
निर्धारित होती हैं। इसमें कानून, राजनीति, धर्म, कलाएँ, दर्शन आदि सम्मिलित होते हैं।
प्रश्न 9. मैक्स वेबर के अनुसार किसी क्रिया को सामाजिक क्रिया कब कहा
जाता है?
उत्तर-
मैक्स वेबर के अनुसार कोई भी क्रिया तभी सामाजिक क्रिया कही जाती है जब उसको करने वाले
व्यक्ति द्वारा लगाए गए चेतना संबंधी अर्थ के कारण वह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार
द्वारा प्रभावित होती है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. मार्क्स को एक समाजशास्त्री क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
आगस्त कॉम्टे की तरह मार्क्स एक दार्शनिक तथा समाजशास्त्री दोनों ही था। इससे अभिप्राय
यह नहीं कि मार्क्स ने केवल उन्हीं समस्याओं की ओर ध्यान दिया जो कि आज दर्शनशास्त्र
अथवा समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के अंतर्गत आती हैं। मार्क्स अपने समय के अन्य विद्वानों
की तरह यह विश्वास रखते थे कि दर्शनशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक सामान्य समग्र के ही
अंग हैं तथा तार्किक दृष्टि से अन्वेषण का ही एक विषय हैं। दर्शनशास्त्र समाज के अन्वेषण
में अवधारणात्मक रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जबकि समाजशास्त्र दार्शनिक समस्याओं को
सुलझाने में सहायक होता है।
सामान्य
विश्वास के विपरीत, मार्क्स एक भौतिकवादी (इस शब्द के आध्यात्मिक अथवा आत्म-विषयक अर्थ
में) नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कभी भी पदार्थ की संचार की गति को आवश्यक या अतिंम
तत्त्व नहीं माना तथा यह नहीं कहा कि इसके अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है। वे मानते
थे कि न तो मस्तिष्क अथवा समाज इतिहास को अमानवीय वस्तुओं के यात्रिक नियमों के रूप
में परिसीमित कर सकता है और न ही इनकी व्याख्या दी जा सकती है। मार्क्स के लिए प्रकृति
पदार्थ से अधिक व्यापक अवधारणा थी।
जैड०
ए० जोर्डन के अनुसार मार्क्स ‘एक प्रकृतिवादी दार्शनिक थे, न कि भौतिकवादी। प्रकृतिवादी
से अभिप्राय है कि मस्तिष्क प्रकृति का अंग है, इसका अन्वेषण तथा अध्ययन उसी विधि के
द्वारा किया, जा सकता है जिसके द्वारा अन्य प्राकृतिक वस्तुओं का; अर्थात् अनुभवाश्रित
विधि द्वारा, न कि काल्पनिक वैज्ञानिक विधि अथवी आध्यात्मिक निगमन विधि द्वारा। वे
यह मानते थे कि समय, स्थान तथा कारणवाद की श्रेणियाँ सामाजिक जगत से संबंधित ज्ञान
प्राप्त करने के लिए मौलिक हैं। मार्क्स के समय प्रकृतिवाद तथा भौतिकवाद में अंतर नहीं
किया जा सकता था, परंतु उन्होंने कभी भी इन्हें पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रयोग
नहीं किया। यद्यपि मार्क्स की व्यक्ति की अवधारणा का स्रोत दार्शनिक है तथापि इनका
व्यक्ति का विज्ञान समाजशास्त्रीय तथा अनुभवाश्रित है, न कि दार्शनिक या काल्पनिक।
व्यक्ति सदैव एक सामाजिक प्राणी रहा है, क्योंकि उसे सामाजिक क्रिया द्वारा जीवनयापन
तथा जीवित रहने के लिए सामूहिक रूप से उत्पादन करना पड़ता था।
समाज
का निर्माण अंत:क्रियारत व्यक्तियों द्वारा होता है तथा मार्क्स स्वयं मानते थे कि
समाज व्यक्तियों का योग नहीं अपितु व्यक्तियों की पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है
तथा व्यक्ति का विज्ञान, समाज के व्यक्तियों की अंत:क्रियाओं का ही अध्ययन है। ये मनोवैज्ञानिक
व्यक्तिवाद (जिसे जे० एस० मिल तथा हरबर्ट स्पेंसर समर्थन देते थे) के विरोधी थे, क्योंकि
इनकी मान्यता थी कि सामाजिक नियम अंत में मनोवैज्ञानिक नियम ही हैं। मार्क्स को एक
समाज-वैज्ञानिक इसलिए माना जाता है कि उन्होंने केवल समाजशास्त्र को ही सैद्धांतिक
एवं अनुभवाश्रित योगदान नहीं दिया अपितु ऐसे सिद्धांतों का निर्माण किया जो राजनीति
विज्ञान एवं अर्थशास्त्र में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
मार्क्स
को समाजशास्त्री इसलिए कहा जाता है क्योकि इन्होंने ऐसे सिद्धांतों का निर्माण किया
जो केवल समाज के विभिन्न पक्षों से ही संबंधित नहीं है, अपितु समाज के विभिन्न पक्षों
में संबंधों का निर्धारण करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका वर्ग-संघर्ष
का सिद्धांत, अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत, अलगाव का सिद्धांत, सामाजिक परिवर्तन का
सिद्धांत इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं जिन्हें आज समाजशास्त्र का कोई भी
छात्र अनदेखा नहीं कर सकता है।
प्रश्न 2. मार्क्स के सामाजिक अध्ययनों के दार्शनिक आधार को स्पष्ट
कीजिए।
उत्तर-
मार्क्स ने सामाजिक विज्ञानों में प्रचलित प्रकृतिवादी विचारधारा की दार्शनिक मान्यताओं
का निर्माण किया। कोई समाज-वैज्ञानिक प्रकृतिवाद अथवा गैर-प्रकृतिवाद को मानता है या
नहीं, यह उसके प्रकृति तथा विषय-वस्तु से संबंधित विचारों पर आधारित है। मार्स एक भौतिकवादी
नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कभी भी यह दावा नहीं किया कि सामाजिक घटना को प्राकृतिक
घटना में परिसीमित किया जा सकता है अथवा दोनों घटनाएँ एक प्रकार की हैं, वरन् उन्होंने
यह तर्क दिया कि सभी विज्ञानों के संबंधों को वैज्ञानिक विधि द्वारा संकलित किया जा
सकता है। अन्य विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र का संबंध भी अनुभवाश्रित प्रस्तावनाओं
का निर्माण करना तथा उन्हें प्रमाणित करना है।
मार्क्स
के अनुसार सामाजिक विज्ञानों का संबंध मानवीय अंत:क्रियाओं की घटनाओं से संबंधित है।
इसे उन्होंने अंत:क्रियावाद कहा है तथा इसे अनेक समाज-वैज्ञानिक आज भी मानते हैं, चाहे
वे प्रकृतिवाद के समर्थक हैं या अप्रकृतिवाद के। मार्क्स के लिए उविकासीय परिवर्तन
एक स्वचालित प्रक्रिया है। जिसके नियमों की खोज करना समाजशास्त्र का प्रमुख कार्य होना
चाहिए।
प्रश्न 3. मार्क्स का सैद्धांतिक दृष्टिकोण क्या है? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
प्रकृतिवाद दार्शनिक आधार से संबंधित तीन सैद्धांतिक दृष्टिकोणों पर आश्रित है, जिनकी
व्याख्या पद्धतिशास्त्र तथा सार रूप दोनों से हो सकती है। इनसे विचारों अथवा संबंधों
के प्रकारों का पता चलता है, जो कि सामाजिक घटना के अन्वेषण में लाभदायक तथा अनिवार्य
माने जाते हैं। ये समाज के अध्ययन का सामान्य दृष्टिकोण व्यक्ति करते हैं। मार्क्स
का प्रथम दृष्टिकोण यह विश्वास है। कि संघर्ष एक प्रभावशाली प्रक्रिया अथवा संबंध
(जिससे संघर्षमय संबंध सदैव निहित है) है तथा इसके परिणाम विभाजित करने वाले एवं संश्लिष्टता
बढ़ाने वाले दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। संघर्ष को सामाजिक जीवन से पृथक् नहीं
किया जा सकता। विकास संघर्ष का ही परिणाम है तथा संघर्ष रहित समाज एक स्थिर समाज है।
दूसरा
दृष्टिकोण समाज के विभिन्न अंगों में सार्वभौमिक आत्मनिर्भरता तथा विशेष प्रकार की
एकता से संबंधित है। प्रत्येक अंग का निर्धारण दो तरह से किया जाता है- उस व्यवस्था
के रूप में जिसका कि वह भाग है तथा वह व्यवस्था के अन्य अंगों को कैसे प्रभावित करता
है। इसे प्रकार्यवाद की प्रस्तावना कहा जा सकता है। संघर्ष तथा प्रकार्यात्मक आश्रितता
एक ही प्रक्रिया के दो पूरक पहलू हैं।
तीसरे
सैद्धांतिक दृष्टिकोण के अनुसार, वृहत् समाजशास्त्रीय संरचनाओं तथा नियमों की प्रामाणिकता
किसी विशेष समय के संदर्भ में ही दी सकती है। इसलिए उन्हें ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा
जाना चाहिए। समाजशास्त्रीय वर्णन सामाजिक घटनाओं के ऐतिहासिक पहलुओं की ओर ध्यान दिए
बिना अपूर्ण है।
सैद्धांतिक
दृष्टिकोण को कुछ अवधारणाओं के रूप में व्यक्ति किया जाता है। इस प्रकारे सैद्धांतिक
दृष्टिकोण और अवधारणात्मक ढाँचे में सह-संबंध पाया जाता है। जहाँ तक माक्र्स का संबंध
है, यह सह-संबंध उनके अध्ययन में स्पष्ट देखा जा सकता है।
प्रश्न 4. दुर्खोम के अनुसार समाजशास्त्र की विषय-वस्तु क्या है?
उत्तर-
एमाइल दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्र की अध्ययन-वस्तु माना तथा संस्थाओं
और सामाजिक प्रक्रियाओं के अध्ययन पर बल दिया है। इन्होंने एक अनुसंधान पत्रिका निकालनी
शुरू की जिसमें समाजशास्त्र को सात भागों में विभाजित किया-
1.
सामान्य समाजशास्त्र
2.
धर्म का समाजशास्त्र
3.
कानून और नियमों का समाजशास्त्र
4.
अपराध का समाजशास्त्र
5.
आर्थिक समाजशास्त्र
6.
जनसंख्या विज्ञान तथा
7.
कलात्मक समाजशास्त्र।
दुर्वीम
ने समाजशास्त्र की विषय-सामग्री को तीन भागों में विभक्त किया है-
1.
सामाजिक रूपशास्त्र – दुर्खोम का कहना है कि समाज के संगठनों
पर भौगोलिक तत्त्वों का गहरा प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक तत्त्व समाज में जनसंख्या के
घनत्व को प्रभावित करते हैं। दुर्खोम सामाजिक रचना को भौगोलिक तत्त्वों का ही परिणाम
मानते हैं। इसलिए उनका कहना है कि समाजशास्त्र के अंतर्गत उन भौगोलिक तत्त्वों का अध्ययन
किया जाता है जो समाज की रचना को प्रभावित करते हैं। इसे ही दुर्खोम ने सामाजिक रूपशास्त्र’
कहा है।
2.
सामाजिक दैहिकी – कानून, धर्म तथा पारिवारिक जीवन एवं
भाषा आदि समाज के आधारभूत नियंत्रक तत्त्व हैं। इन सभी तत्त्वों के कारण समाज में नियंत्रण
की व्यवस्था बनी रहती है। इसी को सामाजिक दैहिकी कहते हैं। समाजशास्त्र में सामाजिक
दैहिकी से संबंधित सभी तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है। धर्म का समाजशास्त्र, भाषा
का समाजशास्त्र आदि का अध्ययन इसमें प्रमुख रूप से किया जाता है।
3.
सामान्य समाजशास्त्र – सामान्य समाजशास्त्र में साधारण सामाजिक
नियमों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ-साथ सामान्य अंगों को सुरक्षित रखने के लिए
जो भी संभव प्रयत्न किए जाते हैं उन सबका अध्ययन भी समाजशास्त्र की विषय-वस्तु है।
प्रश्न 5. समन्वयात्मक संप्रदाय के बारे में दुखम के विचारों की विवेचना
कीजिए।
उत्तर-
समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है तथा यह अन्य विशिष्ट
सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र है। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रांसीसी और
अंग्रेज समाजशास्त्री हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित तथा संकुचित
न बनाकर विस्तृत और व्यापक बनाना होगा। समाजशास्त्र के क्षेत्र को कुछ विषयों तक सीमित
न करके उसे अन्य सभी विज्ञानों में भी समन्वित करना चाहिए। अन्य विज्ञानों से पृथक्
रखने पर समाजशास्त्र एक जड़ विषय हो जाएगा।
दुर्खोम,
हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी आदि इसी मत के समर्थक हैं। इन विद्वानों के
मत में समाजशास्त्र एक विज्ञानों का विज्ञान’ (Science of sciences) है। सभी विज्ञान
उसके क्षेत्र में आ जाते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन
के समस्त भाग परस्पर संबंधित हैं। इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से हम संपूर्ण
समाजिक जीवन को नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र में संपूर्ण
सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें, केवल सूक्ष्म सिद्धांतों का अध्ययन करने से
काम नहीं चलेगा।
दुर्खोम
के अनुसार प्रत्येक समाज में कुछ विचारे, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं जिनका पालन
संबंधित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ संबंधित समाज के सामाजिक
जीवन का ‘सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्खोम के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य
इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इसी स्थिति में स्पष्ट है कि समाजशास्त्र
को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए।
प्रश्न 6. दुर्खोम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
Ø सामाजिक तथ्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्र की विषय-वस्तु माना है। इनके अनुसार समाजशास्त्र
समस्त मानवीय क्रियाओं का अध्ययन नहीं करता, बल्कि ‘सामाजिक तथ्य’ ही समाजशास्त्र की
वास्तविक अध्ययन-वस्तु हैं। सामाजिक तथ्यों से दुर्वीम का अभिप्राय व्यवहार के उन तरीकों
से है जो व्यक्ति पर बाह्य दबाव डालने की क्षमता रखते हैं तथा व्यक्तिगत स्वरूपों से
अलग अपना अस्तित्व रखते हैं।
दुर्खोम
के अनुसार सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान समझना चाहिए; अर्थात् इनमें कुछ ऐसे विशिष्ट
गुण होते हैं जिन्हें बाहरी रूप से देखा जा सकता है। इन्हें अनुभवं द्वारा जाना जा
सकता है तथा वे अपने अस्तित्व के लिए मनुष्य पर ही निर्भर नहीं होते। सामाजिक तथ्यों
की व्याख्या मनोविज्ञान, प्राणिशास्त्र या भौतिकशास्त्र के सिद्धांतों द्वारा संभव
नहीं है। इनके कारण तथा परिणाम समाज में ही विद्यमान होते हैं। दुर्खोम के शब्दों में,
“सामाजिक तथ्य व्यवहार (विचार, अनुभव या क्रिया) का वह पक्ष है जिसका निरीक्षण वस्तुनिष्ठ
रूप में संभव है जो व्यक्ति को एक विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करता है।”
उपर्युक्त
परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी विचार, अनुभव या क्रिया को तभी सामजिक
तथ्य माना जाएगा जबकि उसमें दो विशेषताएँ हों-
1.
विचार, अनुभव या क्रिया का वास्तविक रूप में निरीक्षण संभव हो; तथा
2.
ये व्यक्ति पर बाहरी दबाव रखने की क्षमता रखते हों।
दुर्खोम
के अनुसार सामाजिक तथ्य में कार्य करने, सोचने, अनुभव करने के वे तरीके सम्मिलित हैं
जो व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं तथा वे अपनी दबाव शक्ति के माध्यम से व्यक्ति को
नियंत्रित करते हैं।”
प्रश्न 7. दुर्खोम के अनुसार सामाजिक तथ्यों की प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी
हैं?
उत्तर-
दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों की निम्नलिखित दो विशेषताएँ बताई हैं-
1.
बाह्यता – बाह्यता का अर्थ यह है कि सामाजिक घटनाओं या तथ्यों
का निर्माण तो समाज के सदस्यों द्वारा ही होता है किंतु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित
हो जाने के पश्चात् फिर किसी एक व्यक्ति को नहीं रहता और वह भी इस अर्थ में कि इसे
एक स्वतंत्र वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जाता है। सामाजिक तथ्यों में सामूहिक
चेतना पायी जाती है। दुर्खोम के अनुसार, जिस प्रकार वैयक्तिक विचारों का मूलभूत स्रोत
स्नायुमंडल के विभिन्न कोशाणु हैं, उसी प्रकार सामाजिक विचारों का आधार समाज में सम्मिलित
व्यक्ति होते हैं।
सामूहिक
चेतना का विकास वैयक्तिक चेतना के सम्मिलिन तथा संगठन से होता है अथवा यह भी कहा जा
सकता है कि वैयक्तिक विचारों का जब संगठन होता है तो एक नए प्रकार के विचार ‘सामूहिक
विचार’ का विकास होता है जिसकी अपनी विशेषताएँ होती हैं। दुर्खोम के अनुसार, सामूहिक
विचार व्यक्ति की परिधि से स्वतंत्र अपनी सत्ता रखते हैं।
2.
बाध्यता – सामाजिक तथ्यों की दूसरी विशेषता बाध्यता है अर्थात्
सामाजिक तथ्यों को व्यक्ति पर बाध्यकारी प्रभाव पड़ता है। वास्तव में, व्यक्ति जो भी
कार्य करता है उस पर सामाजिक तथ्य का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है क्योंकि
तथ्यों के निर्माण में समाज के अनेक सदस्यों का योगदान होता है। दुर्खोम ने उदाहरण
देते हुए यह स्पष्ट किया है कि नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास व वित्तीय व्यवस्थाएँ मनुष्य
के व्यवहार तथा कार्यों को करने के तरीकों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं।
प्रश्न 8. दुर्खोम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा की आलोचना किन आधारों
पर की गई है? समझाइए।
उत्तर-
दुर्खोम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा की अनेक आधारों पर आलोचना की गई है। आलोचना के
प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –
1.
सामाजिक तथ्यों को सदैव वस्तुएँ नहीं माना जा सकता, वे भी ऐसी वस्तुएँ जो मानवीय अंत:क्रियाओं
से परे हैं। उदाहरणार्थ-यदि किसी विश्वविद्यालय से प्रोफेसर और विद्यार्थी निकाल दिए
जाएँ तो वहाँ नाम के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाएगा।
2.
सामाजिक तथ्यों को बाहरी निरीक्षण तक सीमित करना भी उचित नहीं है क्योंकि अनेक ऐसे
विषय हैं जो तर्क व परिष्कृत सामान्य बुद्धि से बहुत सुंदर रीति से समझे जा सकते हैं।
3.
सोरोकिन के अनुसार बाह्यती व बाध्यता की विशेषताएँ विशिष्ट समस्याओं के अध्ययन के लिए
तो उपयुक्त हैं पर सभी प्रकार के सामाजिक तथ्यों के लिए नहीं।
4.
बार्ल्स के अनुसार दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों की अपनी अवधारणा में बाध्यता पर आवश्यकता
से अधिक बल दिया है।
5.
उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद दुखम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण
अवधारणा मानी जाती है।
प्रश्न 9. दुर्खोम के अनुसार यांत्रिक एकता किसे कहते हैं?
उत्तर-
प्राचीन समाजों में श्रम-विभाजन का अभाव पाया जाता था तथा केवल लैंगिक आधार पर थोड़ा-बहुत
श्रम-विभाजन पाया जाता था, परंतु फिर भी विशेषीकरण नहीं था। इसलिए दुर्खोम के अनुसार
प्राचीन समाजों में एकता का आधार समानता थी। दुर्खोम ने इस प्रकार की एकता को यांत्रिक
एकता कहा है। यांत्रिक एकता उन समाजों में पायी जाती है जिनमें दमनकारी कानून की प्रधानता
होती है। दुर्खोम का कहना है कि जिस प्रकार की आचार-संहिता समाज में पायी जाती है,
उसी के अनुरूप एकता उस समाज में मुख्य रूप से पायी जाती है।
यांत्रिक
एकता आदिम समाजों में अथवा सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में
पायी जाती है। इन समाजों में विभेदीकरण अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर है तथा
केवल लिंग और आयु के आधार पर ही थोड़ा-बहुत कार्यों में विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक
चेतना द्वारा सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को
बनाए रखना सभी व्यक्ति अपना परम कर्तव्य मानते हैं। कोई भी ऐसा कार्य करना, जिससे कि
सामूहिक चेतना को आघात पहुँचता हो, बहुत बुरा अपराध माना जाता है। अतः यांत्रिक एकता
वह एकता है जो कि व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के करने के कारण आती है अर्थात्
जो समरूपता का परिणाम है। यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए
रखी जाती है।
प्रश्न 10. सावयवी एकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
जैसे-जैसे समाज में जटिलता आती जाती है तथा वह परंपरा से आधुनिकता की ओर आगे बढ़ती
है, वैसे-वैसे समाज में श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण में वृद्धि होने लगती है। इससे व्यक्ति
एक-दूसरे पर अधिक-से-अधिक आश्रित होने लगते हैं। दुर्खोम के अनुसार, आधुनिक समाजों
में एकता का आधार श्रम-विभाजन के कारण आने वाली अन्योन्याश्रितता है। इसी एकता को दुर्खोम
ने सावयवी एकता कहा है। दुर्खोम का कहना है कि जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व
तथा आयतन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं।
इन
बढती हुई आवश्यकताओं के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ
ही इनमें विशेषीकरण बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। दुर्खोम उस एकता
को, जो कि कार्यों की भिन्नता द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप
व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता के कारण आती है, सावयवी एकता कहते हैं। यांत्रिक एकता
के विपरीत, इसमें समरूपता की बजाय भिन्नता व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास
करती है। सावयविक एकता व्यक्तियों के व्यक्तित्व में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित
होती रहती है। सावयवी एकता की पुष्टि प्रतिकारी कानून द्वारा होती है। सहयोगी कानून
का दमनकारी कानून पर प्रभुत्व इस बात का प्रतीक है कि श्रम-विभाजन द्वारा जो संबंध
स्थापित होते हैं वह असंख्य होते हैं अर्थात् समरूपता द्वारा स्थापित संबंधों से कहीं
अधिक होते हैं।
प्रश्न 11. वेबर की समाजशास्त्र की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
जर्मन सामाजिक विचारधारा में वेबर का नाम उल्लेखनीय है। इन्हें राजनीतिक-अर्थशास्त्री
तथा समाजशास्त्री दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है। इन्हें भी समाजशास्त्र के प्रतिपादकों
में से एक माना जाता है। इन्होंने भी समाजशास्त्र को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास
किया। मैक्स वेबर के शब्दों में, समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण
बोध कराने का प्रयत्न करता है ताकि इसके घटनाक्रम (गतिविधि) एवं परिणामों की कार्य-कारण
व्याख्या तक पहुँचा जा सके।” उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेबर समाजशास्त्र
की विषय-वस्तु सामाजिक क्रिया मानते हैं, इसलिए समाजशास्त्र का विस्तृत अर्थ तथा प्रकृति
को समझने के लिए इसकी सामाजिक क्रिया की अवधारणा को समझना आवश्यक है।
मनुष्यों
की सभी क्रियाएँ सामाजिक नहीं हैं, अपितु केवल सामाजिक संदर्भ में की जाने वाली क्रियाएँ
ही . सामाजिक क्रियाएँ कहलाती हैं। उदाहरणार्थ- अकेले बैठे-बैठे हाथ उठाना कोई सामाजिक
क्रिया नहीं है परंतु किसी के सामने हाथ जोड़ना एक सामाजिक क्रिया है। ‘क्रिया’ शब्द
का अर्थ ‘कर्म’ या कार्य है, जबकि सामाजिक’ शब्द सामाजिक संदर्भ या सामाजिक परिस्थिति
का द्योतक है। वेबर के अनुसार ‘क्रिया में वह सारा मानव व्यवहार आ जाता है जिसको कर्ता
चेतना संबंधी अर्थ से संबंधित करता है। इस अर्थ में क्रिया बाहरी भी हो सकती है और
आंतरिक या चेतना संबंधी भी। यह किसी परिस्थिति में सकारात्मक रूप से दखल देने अथवा
जानबूझकर उस परिस्थिति से दूर रहने के रूप में हो सकती है। एक सामाजिक प्राणी होने
के नाते व्यक्ति की क्रियाएँ एवं व्यवहार सामाजिक संदर्भ में ही अर्थपूर्ण होते हैं;
अतः सामाजिक संदर्भ में की जाने वाली क्रिया को ही सामाजिक क्रिया कहा जाता है।
वेबर
के अनुसार ‘क्रिया’ में वह सारी व्यवहार आ जाता है जिसको क्रियारत व्यक्ति (कर्ता)
चेतना संबंधी अर्थ से संबंधित करता है। इस अर्थ में क्रिया बाहरी भी हो सकती है तथा
आतंरिक या चेतना संबंधी भी; यह किसी परिस्थिति में सकारात्मक रूप से दखल देने अथवा
जानबूझकर उस परिस्थिति से दूर रहने के रूप में हो सकती है। वेबर के अनुसार, “किसी क्रिया
को सामाजिक क्रिया तभी कहा जा सकता है जबकि उस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों
के द्वारा लगाए गए चेतना संबंधी अर्थ के कारण यह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार
द्वारा प्रभावित हो और उसी के अनुसार उसकी गतिविधि निर्धारित हो।’
वेबर
का अर्थपूर्ण समाजशास्त्र व्यक्ति तथा उसकी क्रिया को एक मूल इकाई मानता है। व्यक्ति
ही उच्च सीमा है तथा अर्थपूर्ण व्यवहार को करने वाला है। अन्य अवधारणाएँ; जैसे-‘राज्य’,
‘समिति’, ‘सामंतवाद’ इत्यादि मानवीय अंतःक्रियाओं को ही कुछ श्रेणियाँ हैं। इसलिए समाजशास्त्र
का उद्देश्य इन अवधारणाओं को अर्थपूर्ण क्रियाओं में परिवर्तित करना है।
प्रश्न 12. वेबर की सत्ता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
जब राजनीतिक शक्ति के साथ वैधता को जोड़ दिया जाता है तो उसे सत्ता कहते हैं। वेबर
के अनुसार सत्ता का संबंध शक्ति से है। वैध शक्ति (Legitimate power) को ही सत्ता कहा
जाता है। सत्ता द्वारा ही सामाजिक क्रिया का परिसंचालन होता है तथा इसी के द्वारा समाज
में स्थायित्व बना रहता है अथवा सामाजिक व्यवस्था का निर्धारण होता है। वेबर की सत्ता
संबंधों की चर्चा, अर्थात् कुछ व्यक्तियों के पास शक्ति कहाँ से आती है तथा वे यह अनुमान
क्यों लगाते हैं कि अन्य व्यक्तियों को उनका अनुपालन करना चाहिए। वास्तव में, उनके
आदर्श-प्रारूप का ही एक उदाहरण है जिसमें वह सत्ता का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण प्रस्तुत
करते हैं।
इस
प्रकार, शक्ति को जब वैधानिक रूप दे दिया जाता है तो उसे सत्ता कहा जाता है। सत्ता
को मानना अथवा इसका पालन करना एक ऐच्छिक कार्य है। सत्ता ही समाज में स्थायित्व का
वास्तविक आधार है। सत्ता केवल राजनीतिक क्रियाओं अथवा परिस्थितियों तक ही सीमित नहीं
है अपितु सामजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में सत्ता क्रियाशील है तथा देखी जा सकती है।
राजनीतिक तथा सामाजिक पहलुओं में अंतर केवल इतना है कि पहले में सत्ता इसके साथ जुड़ी
हुई है, जबकि दूसरे में शक्ति तथा सत्ताका वितरण समान रूप से नहीं है।
यदि
सरकार को जनता वैध स्वीकार नहीं करती है तो सरकार के प्रति अविश्वास प्रकट किया जाता
है। कई बार युद्ध और क्रांतियों द्वारा सरकार का तख्ता तक पलट दिया जाता है। वास्तव
में, कोई भी सरकार हिंसा, दंड या दमन के आधार पर ही अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकती।
वैधता जनता के मन में उसके प्रति विश्वास पैदा करती है और जनसाधारण उसे नैतिक दृष्टि
से सही और उचित मानने लगता है। इस प्रकार का विश्वास राज्य व्यवस्था की सभी संरचनाओं,
कार्यविधियों, नीतियों, अधिकारियों तथा नेताओं के प्रति होना ही वैधता कहलाता है।
प्रजातंत्रीय
राज्यों में वैधता का महत्त्वपूर्ण स्थान है तथा इसके रहने पर द्वंद्व एवं विवाद भी
राज्य-व्यवस्था को कभी विभंग नहीं कर सकते। वैधता के कारण ही अधीनस्थ अधिकारी अपने
से उच्च अधिकारियों का आदेश मानते हैं। वैधता सारी व्यवस्था को सुचारु बना देती है।
वास्तव में, वैधता के अभाव में शक्ति केवल बल (Force) है तथा इसके न होने पर शासकों
का भी विरोध किया जाता है।
प्रश्न 13. वेबर के अनुसार सत्ता कितने प्रकार की होती है?
उत्तर-
वेबर ने वैध शक्ति या औचित्यपूर्ण शक्ति को सत्ता कहा है। उनके अनुसार समाज में स्थायित्व
इसलिए नहीं आता कि राजनीतिक शक्ति में बल प्रयोग किया जाता है अथवा करने की धमकी दी
जाती है, वरन् इसलिए आता है कि शक्ति को वैधता सुदृढ़ करती है। जब शक्ति के साथ वैधता
को जोड़ दिया जाता है तो उसे सत्ता कहते हैं। सत्ता केवल राजनीतिक क्रियाओं अथवा परिस्थितियों
तक ही सीमित नहीं है अपितु सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में सत्ता क्रियाशील है तथा
देखी जा सकती है। राजनीतिक तथा सामाजिक पहलुओं में अंतर केवल इतना है कि पहले में सत्ता
शक्ति के साथ जुड़ी हुई है, जबकि दूसरे में शक्ति तथा सत्ता का वितरण समान रूप से नहीं
पाया जाता।
वेबर
ने सत्ता को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। ये हैं –
1.
तार्किक वैधानिक सत्ता – इस प्रकार की सत्ता की वैधता का आधार व्यक्ति
का पद होता है। जिसके साथ वैधानिक व्यवस्था की मान्यता जुड़ी होती है। आधुनिक समाजों
में इस प्रकार की सत्ता अधिक पायी जाती है।
2.
परंपरागत सत्ता – इस प्रकार की सत्ता का आधार प्राचीनकाल से
चले आ रहे मूल्य, आदर्श प्रतिमान या परंपराएँ होती हैं।
3.
चमत्कारिक सत्ता – इस प्रकार की सत्ता की वैधता का आधार व्यक्ति
के कुछ व्यक्तिगत गुण होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण अन्य लोग उस चमत्कारिक व्यक्ति
के आदेशों का पालन करते हैं।
4.
उपर्युक्त तीनों प्रकारआदर्श-प्रारूप होते हैं तथा वस्तुत: एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
प्रश्न 14. वेबर की आदर्श-प्रारूप की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
Ø ‘आदर्श-प्रारूप’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
आदर्श-प्रारूप की अवधारणा मैक्स वेबर के पद्धतिशास्त्र का एक प्रमुख पहलू है। वेबर
के समय जर्मनी में यह विचारधारा अत्यंत प्रचलित थी कि सामाजिक घटनाओं पर प्राकृतिक
विज्ञानों की पद्धति के अनुसार विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सामाजिक क्षेत्र में
व्याख्या और स्पष्टीकरण मूलतः ऐतिहासिक हैं। आदर्श-प्रारूप की अवधारणा इस विचारधारा
का खंडन कर एक ऐसी पद्धति प्रदान करती है जो कि वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने में सहायक है।
वेबर
के अनुसार तर्कसंगत ढंग से सामाजिक घटनाओं के कार्य-कारण संबंधों को तब तक स्पष्ट नहीं
किया जा सकता जब तक कि उन घटनाओं को पहले समानताओं के आधार पर कुछ सैद्धांतिक श्रेणियों
में न बाँट लिया जाए। ऐसा करने पर समाजशास्त्री को आदर्श-प्रारूप घटनाएँ मिल जाएँगी।
इस दृष्टिकोण से सामाजिक घटनाओं की तार्किक संरचना में बुनियादी पुनर्निर्माण की आवश्यकता
होती है जिसे वेबर ने आदर्श-प्रारूप की अवधारणा को विकसित करके किया है। समाजशास्त्रियों
को अपनी उपकल्पना का निर्माण करने के लिए ‘आदर्श’ अवधारणाओं को चुनना चाहिए।
वैबर
के अनुसार-‘आदर्श-प्रारूप न तो औसत-प्रारूप है और न ही आदर्शात्मक है, बल्कि वास्तविकता
के कुछ तत्त्वों के विचारपूर्वक चुनाव तथा सम्मिलन द्वारा निर्मित आदर्शात्मक मापदंड
है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है-“आदर्श-प्रारूप से तात्पर्य कुछ वास्तविक तथ्यों
के तर्कसंगत आधार पर यथार्थ अवधारणाओं का निर्माण करने से है।” “आदर्श’ शब्द किसी प्रकार
के मूल्यांकन से संबंधित नहीं है।
वेबर
के द्वारा प्रतिपादित आदर्श-प्रारूप की अवधारणा की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताएँ
है-
1.
आदर्श-प्रारूप का निर्माण, कर्ता की क्रिया के इच्छित अर्थ के अनुसार किया जाता है।
2.
आदर्श-प्रारूप संपूर्णता अथवा सब-कुछ का विश्लेषण नहीं है अपितु सामाजिक क्रिया या
घटना के अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्षों का निरूपण है; विशेषतया उन पक्षों का जिन्हें आदर्श-प्रारूप
का निर्माण करने वाला विद्वान महत्त्वपूर्ण मानता है।
3.
वेबर के अनुसार आदर्श-प्रारूप सामाजिक विज्ञानों का अंतिम सत्य नहीं है अपितु आदर्श-प्रारूप
को मात्र ठोस ऐतिहासिक समस्याओं के विश्लेषण हेतु साधन या उपकरण के रूप में प्रयोग
किया जाना चाहिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. दुर्खोम के समाज में श्रम-विभाजन के सिद्धांत की विस्तृत
विवेचना कीजिए।
Ø दुर्खोम के द्वारा प्रतिपादित श्रम-विभाजन के सिद्धांत की आलोचनात्मक
विवेचना कीजिए।
Ø श्रम विभाजन किसे कहते हैं? श्रम-विभाजन के बारे में दुर्खोम के विचारों
को संक्षेप में बताइए।
Ø दुर्खोम द्वारा प्रतिपादित श्रम-विभाजन के कारणों की व्याख्या कीजिए।
यह व्याख्या कहाँ तक सामाजिक एकता से संबंधित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
श्रम-विभाजन की उत्पत्ति आधुनिक नहीं है अपितु 18 वीं शताब्दी में इसे समाजशास्त्रीय
दृष्टिकोण से देखने का नवीन प्रयास अवश्य किया गया। दुर्खोम ने इस मूल रूप से आर्थिक
संस्था का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ
के अनुसार श्रम-विभाजन से उत्पादन में वृद्धि होती है तथा वस्तुओं की श्रेणी में भी
श्रेष्ठता आती है। दुर्खोम के अनुसार इससे सामाजिक एकता बनी रहती है।
श्रम-विभाजन
का अर्थ एवं परिभाषाएँ
श्रम-विभाजन
का अर्थ कार्यों का वितरण है अर्थातु किसी उत्पादन प्रक्रिया में कार्यों को इस प्रकार
से विभाजित करना कि वे अलग-अलग व्यक्तियों या अलग-अलग समूहों द्वारा संपादित किए जाएँ
श्रम-विभाजन कहलाता है। विभिन्न विद्वानों ने इसे निम्नांकित रूप से परिभाषित किया
है –
1.
दुर्खोम (Durkheim) के अनुसार – “श्रम-विभाजन से अभिप्राय केवल भूमिकाओं
में विभिन्नीकरण एवं विशेषीकरण से नहीं है अपितु इन भूमिकाओं में समन्वय से भी है।’
2.
वाटसन (Wattson) के अनुसार – “किसी उत्पादन क्रिया को सूक्ष्म
भागों में बाँटना, श्रमिकों को विशिष्ट साधन उपलब्ध कराना और फिर सब साधनों के प्रयासों
को मिलाकर आवश्यक उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन करना श्रम-विभाजन कहलाता है।”
3.
हैन्सन (Henson) के अनुसार – “श्रम-विभाजन का अर्थ क्रिया का विशिष्टीकरण
है।”
श्रम-विभाजन
एवं सामाजिक एकता
दुम्का
नाम समाजशास्त्र में श्रम-विभाजन के सिद्धांत के साथ जुड़ा हुआ है। इसी सिद्धांत में
इन्होंने यांत्रिक एवं सावयविक एकता की अवधारणाओं का उल्लेख किया है। श्रम-विभाजन का
अभिप्राय कार्यों या भूमिकाओं का वितरण है। जैसे-जैसे श्रम-विभाजन बढ़ता जाता है। वैसे-वैसे
कार्यों में विशेषीकरण आता-जाता है। दुर्खोम का कहना है, “श्रम-विभाजन से अभिप्राय
केवल भूमिकाओं में विभिन्नीकरण एवं विशेषीकरण से ही नहीं है अपितु इन भूमिकाओं में
समन्वय से भी है। प्राचीन समाजों में श्रम-विभाजन का अभाव पाया जाता था तथा केवल लैंगिक
आधार पर थोड़ा-बहुत श्रम-विभाजन पाया जाता था, परंतु फिर भी विशेषीकरण नहीं था।
इसलिए
दुर्खोम के अनुसार प्राचीन समाजों में एकता का आधार समान था। परंतु जैसे-जैसे समाज
में जटिलता आती गई तथा वह परंपरा से आधुनिकता की ओर आगे बढ़ता गया, समाज में श्रम-विभाजन
एवं विशेषीकरण में वृद्धि होने लगी तथा इससे व्यक्ति एक-दूसरे पर अधिक-से-अधिक आश्रित
होने लगे। दुखीम के अनुसार आधुनिक समाजों में एकता का आधार श्रम-विभाजन के कारण आने
वाली अन्योन्याश्रितता है। दुर्खोम ने इन दोनों प्रकार की एकताओं को क्रमशः यांत्रिक
व सावयविक एकता कहा है।
दुर्खोम
के अनुसार सामाजिक एकता के इन दोनों स्वरूपों की एक अन्य विशेषता यह है कि ये विशिष्ट
वैधानिक व्यवस्थाओं से संबंधित हैं। यांत्रिक एकता की अवस्था में दमनकारी कानून
(Repressive law) तथा सावयविक एकता की अवस्था में क्षतिपूरक कानून (Restitutive
law) का प्रचलन होता है। दमनकारी कानून वाले समाजों में विचलन या अपराध सामूहिक चेतना
के विरुद्ध कार्य समझे जाते हैं; अतः ऐसे व्यक्तियों को कठोर दंड दिया जाता है। इससे
नैतिक संतुलन बना रहता है तथा सामूहिक चेतना भी बनी रहती है। प्रतिकारी कानून वाले
समाजों में अपराध को समस्त समाज के विरुद्ध अपराध नहीं समझा जाता, अपितु इसे व्यक्ति
विशेष के विरुद्ध अपराध माना जाता है। अतः क्षतिपूरक कानून को उद्देश्य हानि-प्राप्त
व्यक्ति की हानि को पूरा करना होता है।
यांत्रिक
एकता उन समाजों में पायी जाती है जिनमें दमनकारी कानून की प्रधानता होती है। दुर्खोम
का कहना है कि जिस प्रकार की आचार-संहिता समाज में पायी जाती है, उसी के अनुरूप एकता
उस समाज में मुख्य रूप से पायी जाती है। यांत्रिक एकता आदिम समाजों में अथवा सभ्यता
और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में पायी जाती है। इन समाजों में विभेदीकरण
अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर है तथा केवल लिंग और आयु के आधार पर ही थोड़ा-बहुत
कार्यों में विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक चेतना (Collective conscience) द्वारा
सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ बंधे रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को बनाए रखना सभी
व्यक्ति अपना परम कर्तव्ये मानते हैं। कोई भी ऐसा कार्य करना, जिससे कि सामूहिक चेतना
को आघात पहुँचता हो, बहुत बुरा अपराध माना जाता है। अतः यांत्रिक एकता वह एकता है जो
कि व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के करने के कारण आती है। अर्थात् जो समरूपता
-(Likeness) का परिणाम है। यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए
रखी जाती है।
आधुनिक
समाजों में सावयविक एकता पायी जाती है। जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व तथा आयतन
बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। इन बढ़ती हुई
आवश्यकताओं के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ ही इनमें
विशेषीकरण बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। दुर्खोम उस एकता को, जो
कि कार्यों की भिन्नता द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप
व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता के कारण आती है, सावयविक एकता कहते हैं। यांत्रिक एकता
के विपरीत, इसमें समरूपता की बजाय भिन्नता व्यक्तियों को एक सूत्र मे बाँधने का प्रयास
करती है। सावयविक एकता व्यक्तियों के व्यक्तित्व में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित
होती रहती है। सावयविक एकता की पुष्टि प्रतिकारी कानून द्वारा होती है। सहयोगी कानून
का दमनकारी कानून पर प्रभुत्व इस बात का प्रतीक है कि श्रम-विभाजन द्वारा जो संबंध
स्थापित होते हैं वह असंख्य होते हैं अर्थात् समरूपता द्वारा स्थापित संबंधों से कहीं
अधिक होते हैं।
इस
प्रकार, दुर्खोम के विचारानुसार श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं
की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों पर आश्रित हो जाता है तथा इस अन्योन्याश्रितता के
कारण समाज में सावयविक एकता आती है। सावयविक एकता की तुलना जैविक शरीर से की जा सकती
है जिसके सभी अंग एक-दूसरे पर आश्रित होते हैं। सावयविक एकता वाले समाजों में सामूहिक
चेतना की बजाय व्यक्तिवादिता अधिक पायी जाती है।
श्रम-विभाजन
के कारण तथा दशाएँ
अर्थशास्त्रियों
के अनुसार श्रम-विभाजन का कारण हमारी बढ़ती हुई प्रसन्नता है। इसमें यह मान लिया गया
है कि हम वास्तव में खुशी तथा प्रसन्नता की ओर बढ़ रहे हैं। परंतु दुर्खोम इस प्रकार
के तर्क से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि इतिहास के प्रत्येक युग में जो प्रसन्नता
व्यक्तियों को मिलती है वह सीमित है। यदि श्रेम-विभाजन का और कोई कारण नहीं है तो प्रसन्नता
प्राप्त होने के पश्चात् श्रम-विभाजन में वृद्धि रुक जानी चाहिए, जबकि वास्तव में ऐसा
नहीं होता है। इसके विपरीत, यह देखा गया है कि दुःखदायी अनुभव होने पर भी श्रम-विभाजन
में निरंतर वृद्धि होती रहती है। दूसरे, प्रसन्नता स्वास्थ्य की एक दशा मात्र है।
दुर्खोम
का कहना है कि श्रम-विभाजन का कारण समाज के नैतिक घनत्व (Moral density) में वृद्धि
है जिसका सूचक भौतिक घनत्व (Material density) है। समयानुसार खंडात्मक प्रकार की संरचना
का लोप होना शुरू हो जाता है और सामाजिक आयतन में वृद्धि होनी शुरू हो जाती है। इस
प्रकार, समाजों के आयतन तथा घनत्व में वृद्धि द्वारा भौतिक घनत्व बढ़ता है जिसके द्वारा
यांत्रिक रूप से श्रम-विभाजन की प्रगति निर्धारित होती है तथा अस्तित्व के लिए संघर्ष
शुरू हो जाता है। इसके कारण अधिक उत्पादन तथा अच्छी वस्तुओं की माँग बढ़ने के साथ-साथ
विशेषीकरण भी बढ़ने लगता है। दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण तभी
विकसित हो सकता है जबकि व्यक्तिगत भिन्नताएँ बढ़ जाती हैं।
दुर्खोम; स्पेंसर (Spencer)
के इस सिद्धांत से सहमत नहीं हैं कि आयतन में वृद्धि व्यक्तिगत भिन्नताओं को बढ़ावा
देती है। इनका कहना है कि भिन्नताओं का बढ़ना श्रम-विभाजन का विरोधी है। इस प्रकार,
दुर्खोम श्रम-विभाजन के कारण सामाजिक पर्यावरण तथा सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में ही
देखते हैं। दुर्खोम श्रम-विभाजन की दशाएँ भौगोलिक पर्यावरण में नहीं अपितु सामाजिक
संबंधों में देखते हैं। इनका कहना है कि पैतृकता, श्रम-विभाजन के विकास में एक बाधा
है।
दुर्खोम
के अनुसार समाजों के आयतन तथा घनत्व में वृद्धि के कारण व्यक्तियों में भी परिवर्तन:आते
हैं। और वे अधिक स्वतंत्र हो जाते हैं तथा सामूहिक व्यक्तित्व से अपना संबंध तोड़ लेते
हैं। इससे विशेषीकरण बढ़ने लगता है तथा श्रम-विभाजन में भी वृद्धि होती है।
श्रम-विभाजन
के असामान्य प्रारूप
दुर्खोम
का कहना है कि श्रम-विभाजन के सामान्य प्रारूपों को समझने के लिए इसके असामान्य प्रारूपों
का ज्ञान होना जरूरी है। असामान्य प्रारूप वे हैं जिसमें श्रम-विभाजन अपनी सामान्य
भूमिका नहीं निभाता अर्थात् एकता या सामाजिक संश्लिष्टता नहीं ला पाता, अपितु इसके
विपरीत इसमें बाधाएँ उत्पन्न करता है। दुर्खोम ने तीन असामान्य प्रारूपों का उल्लेख
किया है –
1.
विश्रृंखला श्रम-विभाजन – इसमें समाज की विभिन्न इकाइयों
में सामंजस्य समाप्त हो जाता है। दुर्खोम का कहना है कि मानव शरीर की तरह समाज की भी
अनेक इकाइयाँ हैं जो अपना कार्य करती हैं तथा पारस्परिक सामंजस्य बनाए रखती हैं जिससे
सामान्य सामाजिक चेतना तथा सावयविक एकता का उदय होता है। परन्तु कई बार ऐसा होता है
कि व्यक्ति पारस्परिक संतुलन खो देते हैं तथा उनकी स्थिति अनिश्चित हो जाती है। यदि
व्यक्ति अपने कार्य नहीं करते तथा कार्यों में समन्वय नहीं रहता तो इसे अवस्था को विशृंखल
श्रम-विभाजन की अवस्था कहा जाता है। अनेक क्षेत्रों में विश्रृंखला श्रम-विभाजन स्पष्ट
रूप से देखा जा सकता है। प्रमुख रूप से औद्योगिक क्षेत्रों, आर्थिक क्षेत्रों, ज्ञान-विज्ञान
तथा मानसिक क्षेत्रों में व्याधिकीय विश्रृंखला की अवस्था देखी जा सकती है।
2.
आरोपित श्रम-विभाजन – आरोपित श्रम-विभाजन का उदाहरण वर्ग संघर्ष
है तथा इसकी उत्पत्ति व्यक्ति की उसके प्रकार्य से समन्वय न होने की दशा द्वारा होती
है क्योंकि प्रकार्य व्यक्ति पर जबरदस्ती थोपा गया होता है। वास्तव में, आरोपित श्रम-विभाजन
में व्यक्ति की योग्यता, क्षमता तथा रुचि और समाज द्वारा सौंपे गए कार्य में सामंजस्य
नहीं रहता। दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसको हम व्यक्तियों
पर न तो बलपूर्वक थोप ही सकते हैं और न ही उसमें व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता ही दे
सकते हैं।
3.
एक अन्य असामान्य प्रारूप – दुर्खोम ने एक तीसरे असामान्य प्रारूप
का उल्लेख किया है। जिसे वह कोई विशेष नाम नहीं देते। जब प्रत्येक कर्ता की प्रकार्यात्मक
भूमिका अपर्याप्त होती है।
तो
श्रम-विभाजन सामाजिक एकता नहीं ला पाता। सामाजिक संबंधों में एकता तथा निरंतरता लाए
रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका पर्याप्त मात्रा में निभाता
रहे। परंतु जब व्यक्ति अपनी प्रकार्यात्मक भूमिकाएँ पर्याप्त मात्रा में नहीं निभाते
तो सामाजिक संबंधों में शिथिलता आ जाती है तथा श्रम-विभाजन अपनी प्रमुख भूमिका अर्थात्
सामाजिक एकता लाना छोड़ देता है।
श्रम-विभाजन
के सिद्धांत की आलोचना
यद्यपि
दुर्वीम ने अपने श्रम-विभाजन का सिद्धांत इतने विधिवत् रूप से प्रस्तुत किया है फिर
भी इसमें कुछ कमियाँ दिखाई देती हैं। दुर्खोम श्रम-विभाजन के केवल सामाजिक पक्ष की
ओर अधिक ध्यान देता है तथा इसका कारण जनसंख्या में घनत्व तथा आयतन में वृद्धि मानता
है। इसका कार्य भी दुर्वीम के अनुसार समाज में सामाजिक संश्लिष्टता लाना है तथा यह
संश्लिष्टता श्रम-विभाजन के कारण व्यक्तियों की एक-दूसरे पर आश्रितता द्वारा आती है।
परंतु श्रम-विभाजन के इतने अधिक विकास के कारण भी आधुनिक समाजों के व्यक्तियों में
संतोष नहीं है। आदिम समाजों में लोग अधिक सुखी थे जबकि उनमें श्रम-विभाजन नहीं था।
साथ
ही, दुर्खोम एकदम समरूपता (Likeness) से श्रम-विभाजन पर आ जाता है तथा बीच की उन अवस्थाओं
का कोई उल्लेख नहीं करता, जिनमें श्रम-विभाजन अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। इन
समाजों और आधुनिक समाजों में, जिनमें श्रम-विभाजन चरम सीमा पर पहुंच चुका है, क्या
अन्तर है तथा श्रम-विभाजन के विभिन्न स्तर किस प्रकार सामाजिक संश्लिष्टता को प्रभावित
करते हैं- इस बारे में दुर्खोम का सिद्धांत कोई प्रकाश नहीं डालता। इन आलोचनाओं के
बावजूद दुर्खोम का सिद्धांत समाजशास्त्रीय सिद्धांतों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता
है।
प्रश्न 2. मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या
कीजिए।
Ø “अभी तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” व्याख्या
कीजिए।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स का मत है कि समाज में वर्ग संघर्ष सदैव से ही होते चले आए हैं। ‘साम्यवादी
घोषणा-पत्र में कहा गया है-“अब तक के समस्त विद्यमाने समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष
का ही इतिहास है।” वर्ग संघर्ष से आशय है कि समाज में दो वर्गों का अस्तित्व है तथा
इन वर्गों के हित एक-दूसरे के विपरीत हैं। इस कारण इनमें संघर्ष चलता रहा है। उसका
कथन है कि वर्ग संघर्ष आधुनिक युग में पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच मुख्य रूप से
पाया जाता है और इस संघर्ष के परिणामस्वरूप ही समाज मानवीय आशाओं के अनुरूप उन्नति
नहीं कर पाता है। इसलिए वर्ग संघर्ष ही राज्य तथा समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्या है।
यह वर्ग संघर्ष अनेक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को जन्म देता है।
मार्क्स
का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत
मार्क्स
अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को ऐतिहासिक आधार पर सत्य मानता है। उसका मत है कि इतिहास
में आदिम साम्यवादी व्यवस्था के अतिरिक्त कोई भी ऐसा युग नहीं रहा जबकि दो वर्गों के
बीच संघर्ष की स्थिति न रही हो। इस संबंध में मार्क्स का मत है कि वर्तमान समाज धनवानों
और निर्धनों में विभाजित है। ये धनवान वर्ग और निर्धन वर्ग; पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक
वर्ग कहलाते हैं। इन दोनों वर्गों में कभी कोई संयोग नहीं हो सकता। इसलिए सभी समाजवादियों
को एक साथ मिलकर ऐसी प्रयास करना चाहिए कि वर्ग संघर्ष की समाप्ति हो जाए और वर्गहीन
समाज की स्थापना हो जाए। माक्र्स अपने वर्ग संघर्ष के इस सिद्धांत को निम्नलिखित आधारों
पर सत्य मानता है –
1.
मार्क्स इस बात में विश्वास करता है कि आदिम साम्यवादी व्यवस्था के अतिरिक्त प्राचीनकाल
से ही इतिहास में विरोधी वर्गों का अस्तित्व देखने को मिलता है।
2.
व्यक्तियों के विभिन्न स्वार्थ होते हैं, इसलिए उनमें मतभेद होना स्वाभाविक ही है।
3.
सभी लोग अपनी क्षमता और कार्यकुशलता में समान नहीं होते हैं, इसलिए भी समाज में वर्ग-संघर्ष
पाया जाता है।
4.
मार्क्स का विचार है कि विश्व में महायुद्धों की उत्पत्ति का एकमात्र कारण पूँजीवाद
है और युद्धों में एक प्रबल वर्ग निम्न वर्ग के अधिकारों का हनन करता है जिसके परिणामस्वरूप
समाज में इस अंतर्विरोध के कारण क्रांति का जन्म होता है।
5.
मार्क्स और एंगेल्स का मत है कि राज्य की उत्पत्ति वर्गभेद के कारण ही हुई है।
मार्क्स
का मत है कि जब समाज में पूँजीपतियों का उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार स्थापित हो
जाएगा, तब समाज धनिक वर्ग और निर्धन वर्ग में विभाजित हो जाएगा। इस पूँजीवादी युग में
श्रमिकों के दु:खों में वृद्धि निरंतर होती रहती है। श्रम के अधिक शोषण करने तथा निरंतर
घटती मजदूरी के कारण श्रमिक निरंतर दु:खों तथा कठिनाइयों के दबावों में रहते हैं जिसके
कारण उनका स्वास्थ्य भी निरंतर गिरता चला जाता है और वे इस स्थिति में भी नहीं रहते
हैं कि अब और अधिक परिश्रम कर सकें। पूँजीवादी युग मानवीय संवेदनाओं को समाप्त कर देता
है।
पूँजीपति
श्रमिकों को पशुओं के रूप में देखता है। वह कम मजदूरी देकर अधिक कार्य लेना चाहता है।
उसके लिए मार्क्स उसे ‘आपदाओं का बढ़ता हुआ सिद्धांत’ (Theory of increasing
miseries) का नाम देता है। उसका कहना है कि एक दिन यह स्थिति ही क्रांति को जन्म देगी,
जब दुनिया के मजदूर संगठित होकर पूँजीवाद के विरुद्ध क्रांति करके उसको समाप्त कर देंगे
और एक वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। माक्र्स इसी प्रकार की क्रांति को ‘वर्ग संघर्ष’
की संज्ञा प्रदान करता है, और वर्म संघर्ष को ही पूँजीवाद के विनाश का कारण मानता है।
मार्क्स
का मत है कि जब श्रमिक वर्ग पूँजीवाद का उन्मूलन कर लेगा तब समाज में सर्वहारा वर्ग
का अधिनायकतंत्र स्थापित होगा। उत्पादन के सभी साधनों पर श्रमिकों का सामूहिक अधिकार
होगा और ऐसा समाज वर्गहीन समाज होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमतानुसार
कार्य और योग्यतानुसार वेतन मिलेगा। उस समाज में सभी व्यक्तियों को अनिवार्य रूप से
कार्य करना होगा और उसमें साहित्य, संस्कृति व कला का पूर्ण रूप से विकास होगा।
वर्ग
संघर्ष के सिद्धांत की आलोचना
मार्क्स
का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत आलोचना की विषय-वस्तु रहा है। इस संबंध में आलोचकों ने
निम्नलिखित मत व्यक्त किए हैं –
1.
मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कल्पनावादी सिद्धांत कहा जाता है।
2.
मार्क्स अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत में केवल श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग का ही वर्णन
करता है। और वह समाज में पाए जाने वाले माध्यम वर्ग की उपेक्षा करता है।
3.
संघर्ष ही सामाजिक जीवन का मूल तत्त्व नहीं है, वरन् समाज में संघर्ष की अपेक्षा सहयोग
अधिक पाया जाता है।
4.
मार्क्स वर्ग संघर्ष को ही सभी सामाजिक संकटों का एकमात्र कारण मानता है, किंतु आलोचकों
का मत है कि उसकी यह विचारधारा भ्रमपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक संकट वर्ग संघर्ष के
अतिरिक्त युद्ध आदि कारणों से भी उत्पन्न हो सकते हैं।
5.
मार्क्स का यह विश्वास भी आलोचकों को मान्य नहीं है कि वर्ग संघर्ष के कारण ही समाज
में पूँजीवाद का अंत हो जाएगा। उनका तर्क है कि सदियों से पूँजीपति वर्ग तथा निर्धन
वर्ग में संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, किंतु आज तक भी श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग का
विनाश करने में सफल नहीं हुआ है।
6.
मार्क्स की यह विचारधारा भी मान्य नहीं है कि वर्ग संघर्ष से श्रमिकों का हित होगा,
क्योंकि संघर्ष से कभी किसी का हित नहीं होता है। संघर्ष तो विघटन को जन्म देते हैं।
7.
मार्क्स का यह मत भी अमान्य है कि विश्व के सभी श्रमिकों के हित समान होते हैं। आलोचकों
का विचार है कि सामाजिक हित भौतिक परिस्थितियों पर आधारित होते हैं और प्रत्येक देश
में नागरिकों की भौतिक परिस्थितियाँ भिन्न हैं, इसलिए हितों की समानता का प्रश्न ही
नहीं उठता है।
8.
मार्स अपने इस सिद्धांत में कोई वैज्ञानिक तर्क भी प्रस्तुत नहीं करता है। इसलिए माक्र्स
का यह सिद्धांत कोरी कल्पना है। इस संबंध में प्रो० लास्कीका कथन है-“पूँजीवाद का अंत
होने के पश्चात् तो साम्यवाद की उत्पत्ति के स्थान पर ऐसे अराजकतावाद की स्थापना संभावित
है जो किसी प्रकार से भी साम्यवादी सिद्धांतों से समता नहीं रखेगा।”
9.
क्रांति श्रमिक वर्ग के स्थान पर बुद्धिजीवी वर्ग से भी संभव हो सकती है।
10.
समस्त सामाजिक जीवन का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास नहीं है। डॉ० राधाकृष्णन के अनुसार,
“इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही लेखा मात्र नहीं है।’
11.
सामाजिक और आर्थिक वर्ग एक ही नहीं है।
12.
मार्क्स द्वारा चित्रित वर्ग संघर्ष के परिणाम सत्य सिद्ध नहीं हुए हैं।
मार्क्स
की वर्ग संघर्ष की धारणा का मूल्यांकन प्रो० कैरयू हण्ट ने इन शब्दों में किया है-“मार्क्स
का यह विचार कि मनुष्यों के समस्त झगड़े वर्ग संघर्ष से उत्पन्न होते हैं- किंतु एक
वैज्ञानिक धारणा के रूप में मिथ्या है।”
प्रश्न 3. नौकरशाही किसे कहते हैं? वेबर के सत्ता के एक प्रकार के रूप
में नौकरशाही के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।
Ø नौकरशाही पर एक लेख लिखिए।
Ø नौकरशाही को परिभाषित कीजिए तथा इसके कार्यों एवं अकार्यों की विवेचना
कीजिए।
Ø नौकरशाही की परिभाषा देते हुए मैक्स वेबर के नौकरशाही सिद्धांत का परीक्षण
कीजिए।
उत्तर-
वेबर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में नौकरशाही का सिद्धांत प्रमुख स्थान रखता है।
उन्होंने नौकरशाही की विवेचना तार्किक-वैधानिक सत्ता के रूप में की है। उनकी नौकरशाही
की विवेचना उनके द्वारा प्रतिपादित ‘आदर्श प्रारूप की संकल्पना पर आधारित है। वस्तुतः
उनकी सत्ता की संकल्पना का स्पष्टीकरण उनके नौकरशाही के सिद्धांत द्वारा ही किया जा
सकता है। अतः नौकरशाही के सिद्धांत का ज्ञान, सत्ता के इस प्रमुख प्रकार को समझने के
लिए अनिवार्य है।
नौकरशाही
का अर्थ
‘नौकरशाही’
(Bureaucracy) शब्द फ्रांसीसी भाषा के burequ’ शब्द से बनी है, जिसका अर्थ है- लिखने
की मेज या डेस्क। इस प्रकार नौकरशाही’ का अर्थ उस सरकार से है जिसके कर्मचारी केवल
कार्यालय में बैठकर कार्य करते हैं। आधुनिक युग में यह शब्द अपयश का प्रतीक बन गया
है। नौकरशाही के इस आधुनिक अर्थ के संदर्भ में जॉन ए० वेग (John A. Vieg) ने कहा है-“नौकरशाही
का अर्थ बदनामी और विकृति के कारण घोटाला, स्वेच्छाचारिता, अपयश, कार्यालय की कार्यवाही
तथा तानाशाही होकर रह गया है।”
कभी-कभी
इस शब्द का प्रयोग अच्छे भाव से भी किया जाता है जिसमें नौकरशाही का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति
से होता है जो अपने अनुभव, ज्ञान तथा उत्तरदायित्व के लिए प्रसिद्ध हो। मार्क्स ने
नौकरशाही का प्रयोग निम्नलिखित भावनाओं से किया है –
नौकरशाही
ऐसा संगठन है, जो संगठित रूप में बहुत-से कार्य करता है और जिसके प्रभाव से सभी थर्राते
हैं।”
नौकरशाही
की परिभाषाएँ
मैक्स
वेबर (Max Weber) ने नौकरशाही को दो रूपों में परिभाषित किया है –
1.
कानूनी सत्ता के रूप में – इस रूप में नौकरशाही ‘कानून द्वारा
स्थापित अवैयक्तिक व्यवस्था (Legally established impersonal order) है जिसमें व्यक्ति
पद की सत्ता का प्रयोग इस आधार पर करते हैं कि उन्हें अपने पद की सत्ता के दायरे में
आदेश देने की औपचारिक वैधता प्राप्त है।
2.
एक संगठन के रूप में – संगठन के रूप में नौकरशाही “एक संस्तरणबद्ध
संगठन है जिसकी रचना तार्किक ढंग से बहुत से ऐसे व्यक्तियों के कार्यों के समीकरण के
लिए की गई है जो वृहद् स्तर पर प्रशासनिक दायित्वों व संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति
में लगे हैं।”
माशर
किंग्स्ले एवं स्टैहल (Masher Kingsley and Stahl) के अनुसार – नौकरशाही
को प्रशासकीय संरचना के रूप में माना है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रशासन के जटिल
संयंत्र में एक पुर्जे की तरह कार्य करता है। कोई असंदिग्ध बात इस संरचना में नहीं
जोड़ी जाती है। इसमें सभी प्रशासकीय संबंधों की पूर्ण व्याख्या की जाती है। अधिकार
का स्तंभ दायित्व के स्तरों में समान रूप से विभाजित होता है।”
कुछ
विद्वानों ने नौकरशाही या लोकशाही को महान प्रशासन (big administration) या सरकार
(Government) से जोड़ा है। आज के युग में हम विस्तृत प्रशासकीय संस्थाओं के अंतर्गत;
जिसमें अनेक सरकारी संस्थाएँ, निगम (Corporation), मजदूर संघ (Trade union) तथा राजनीतिक
दल (Political parties) सम्मिलित हैं; रहते हैं। इन सभी प्रशासकीय अंगों का विस्तृत
रूप होता है और इनका विस्तार भी नौकरशाही का कारण है। महान् शासन से तात्पर्य है-प्रशासन
की बड़ी मशीनरी, अर्थात् प्रशासकीय विभाग को अधिकार प्रदान करते हुए अधिक महत्त्व प्रदान
करना। इस दृष्टि से आज का लोक-कल्याण राज्य’ (Welfarestate) एक प्रशासकीय राज्य कहलाता
है।
नौकरशाही
का एक अर्थ दूषित मनोवृत्ति के रूप में भी किया जाता हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता
को आघात पहुँचाता है। इस शासन में प्रशासन तंत्र अर्थात् सरकारी अधिकारी अपने लाभ के
लिए शासन करते हैं तथा वे स्वयं को जनता का सेवक न समझकर शासक समझते हैं।
नौकरशाही
के सामान्य लक्षण
नौकरशाही
व्यवस्था के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं –
1.
कार्य-क्षेत्र की निश्चितता – नौकरशाही व्यवस्था का आधार एक निश्चित
कार्य-क्षेत्र से संबंधित होता है। जब विधायिका आदेश देती है तो उसी के अनुसार कार्यपालिका
तथा प्रशासकीय व्यवस्था का निर्माण किया जाता हैं। नौकरशाही विभाग के कार्य के साथ-साथ
अपने उत्तरदायित्व को निभाने का भी कार्य पूर्ण रूप से करती है। उत्तरदायित्व के प्रति
यह जागरूकता ही नौकरशाही की कर्तव्यपरायणता मानी जाती है।
2.
सरकारी कार्यों की गोपनीयता – इस व्यवस्था में लोकसेवकों अथवा
नौकरशाही से शपथ ली जाती है और उनसे आशा की जाती है कि वे सरकारी विषयों को गुप्त रखेंगे।
इसका प्रमुख कारण यह है कि गोपनीयता भंग होने से राष्ट्र तथा समाज दोनों को हानि हो
सकती है और शत्रु द्वारा इसका लाभ उठाया जा सकता है।
3.
नियुक्ति का आधार पदक्रम – नौकरशाही व्यवस्था में पद के क्रमानुसार
नियुक्तियों की जाती , हैं और उनमें वरीयता का भी ध्यान रखा जाता है। प्रत्येक लोकसेवक
को यह मालूम रहता है। कि उसकी नियुक्ति के अनुसार ही पदोन्नति का क्रम होगा। इस व्यवस्था
में सरकारी आदेशों का पालन किया जाता है और ऊपर से नीचे तक के क्रम श्रेष्ठता-सूची
के अनुसार निश्चित रहते हैं। नीचे का अधिकारी अपने उच्च अधिकारी के प्रति उत्तरदायी
होता है। आदेश के क्रम ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होते जाते हैं। यह क्रम निरंतर क्लता
रहता है। व्यवस्था का यह क्रम उचित मार्ग (Proper channel) कहलाता है।
4.
कार्य में नियमबद्धता – प्रत्येक लोकसेवक को जितना कार्य सौंपा
जाता है वह उसी के अनुसार कार्य करता है। साथ ही वह इस बात का ध्यान रखता है कि अधिक
कार्य को भी वह उन्हीं के नियमों का पालन करते हुए संपन्न करेगा। नौकरशाही द्वारा नियमानुसार
कार्य करने का ही फल है कि राष्ट्र का प्रत्येक कार्य संपन्न होता रहता है। लोकसेवक
पक्षपात रहित होकर कानूनी बातों और नियमपूर्वक कार्य की ओर अधिक ध्यान देता है।
5.
विशेष संगठन के रूप में कार्य – नौकरशाही एक विशिष्ट
संगठन के रूप में कार्य करती है। इसी कारण ऐसा कहा जाता है कि नौकरशाही में अहं की
भावना (Egoism) होती है। यह ठीक भी है; क्योंकि अधिकांश लोकसेवक समाज-कल्याण की भावना
से काम न करके स्वामी भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं उनकी विशिष्टता एक संगठन
के रूप में दिखाई देती है। इस संगठन से प्रायः वे सरकार पर प्रभाव डालते रहते हैं।
6.
कार्यों में अंतर – प्रशासनिक सेवाओं की संगठित व्यवस्था
को ही लोक-प्रशासन कहा जाता है। सरकार से संबंधित सभी पक्षों को इसमें सम्मिलित किया
जाता है। सरकार के दायित्व : प्रशासकीय आधार पर भी भिन्न-भिन्न होते हैं। यदि एक लोकसेवक
लेखांकन का कार्य कर रहा होता है तो दूसरा लेखा-परीक्षण का दोनों का कार्य-क्षेत्र
सार्वजनिक सेवाएँ हैं पंरतु दोनों के कार्यों की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। इसी
आधार पर लोकसेवकों का सार्वजनिक सेवाओं से संबद्ध विविध क्षेत्रों पर एकाधिकार होता
है।
7.
सिद्धांत और व्यवहार में अंतर – प्रत्येक लोकसेवक पर
उसकी नियुक्ति के साथ ही जनसेवक की भूमिका निभाने का दायित्व होता है। वह जनता के समक्ष
निष्ठा और नियमपूर्वक कार्य करने के लिए कृत-संकल्प होता है। पंरतु इस व्यवस्था में
उसका आचरण उसके घोषित स्वरूप से भिन्न प्रतीत होता है। वह मात्र जनसेवक नहीं रह जाता,
उसकी जनभक्ति स्व-भक्ति और स्वार्थ-भक्ति के रूप में बदल जाती है।
8.
अधिकारिक रिकॉर्ड – नौकरशाही के अंतर्गत अधिकारिक रिकॉर्डों
को उचित ढंग से रखा जाता है। संगठन के निर्णयों और गतिविधियों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड
कर लिया जाता है। और भावी संदर्भ के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
9.
अवैयक्तिक संबंध – नौकरशाही के अंतर्गत कर्मचारियों के
मध्य संबंध अवैयक्तिक होते हैं। कार्यालय की स्थिति व्यक्तिगत संबंधों, भावनाओं और
अनुभूतियों से मुक्त होती है। निर्णय औचित्य के आधार पर लिए जाते हैं न कि व्यक्तिगत
आधार पर। वेबर को मत है-“नौकरशाही तंत्र औचित्यपूर्ण निर्णयों के लिए मार्ग प्रशस्त
करता है।”
10.
विशेषज्ञता – नौकरशाही में कर्मचारियों का चयन उनकी योग्यताओं
के आधार पर किया जाता है। ये नियुक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से या पूर्व
उत्तीर्ण परीक्षाओं के आधार पर की जाती है। ये अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं, इन्हें
चुना नहीं जाता, क्योंकि चुनाव-पद्धति में चयन तकनीकी योग्यता के आधार पर नहीं हो सकता।
नौकरशाही
के प्रमुख कार्य
नौकरशाही
के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –
1.
परामर्श देना – नौकरशाही या लोकसेवक देश तथा समाज से
संबंधित वास्तविक कार्य करने के लिए मुख्य कार्यपालिका को, उसकी नीति के अनुरूप प्रशासकीय
दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ मंहत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श भी देते हैं।
वे यह कार्य अपने को निष्पक्ष रखकर करते हैं। देखा जाए तो संपूर्ण प्रशासकीय कार्य
उनके परामर्श से ही प्रारंभ होते हैं। परंतु इस कार्य को वही नौकरशाह या लोकसेवक उचित
रूप से पूर्ण कर सकता है जिसे अपने विषय का पूर्ण ज्ञान हो और विषय को सूक्ष्मता से
समझने की क्षमता हो।
2.
नियोजन की रूपरेखा बनाना – नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण कार्य
परामर्श के आधार पर किसी योजना की रूपेरखा तैयार करना है। यह कार्य लोकसेवक नियोजन
के सिद्धांत के अनुरूप ही करते हैं। इस दृष्टि से उनको विविध प्रकार के कार्य संपन्न
करने पड़ते हैं। इस दृष्टि से वे न केवल नियोजक होते हैं, वरन् भविष्यदृष्टा भी होते
हैं। नियोजन करते समय वह प्राप्त साधनों तथा लक्ष्यों के अनुसार अपनी योजनाएँ बनाते
हैं। उनके उसी महत्त्वपूर्ण कार्य के अनुसार संपूर्ण देश का शासन संचालित होता है और
सफलता प्राप्त करता है।
3.
उत्पादन करना – सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नौकरशाह
या लोकसेवक महत्त्वपूर्ण दायित्व पूरे करते हैं उनका प्रत्येक कार्य एक उत्पादन सेवा
और एक उपलब्धि के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह उपलब्धि और उत्पादन सेवा करने का
एक सापेक्ष रूप है। लोकसेवक का प्रत्येक कार्य, चाहे वह कितना भी छोटा हो अथवा बड़ा,
एक प्रकार से उत्पादन के क्षेत्र में आता है। उसका प्रत्येक कार्य एक भौतिक अस्तित्व,
एक भावनात्मक आधार तथा प्रशासकीय सफलता है और यह उसी का उत्पादने है।
4.
आदर्शों को व्यावहारिक रूप देना – लोकसेवक या नौकरशाह
निष्ठा की भावना से कार्य करते हैं जिससे देश तथा समाज में सजीव आधार बनता है। इनका
समूचा प्रस्तुतीकरण समाज, राष्ट्र व प्रशासन के आदर्शों को सजीव आधार प्रदान करता है।
5.
सार्वजनिक सेवाओं को ईमानदारी से संपन्न करना – नौकरशाह जनता
की सेवा मनोयोग तथा आत्मनिष्ठा के साथ पूर्ण करते हैं। निष्ठापूर्वक किए गए उनके इन
कार्यों के परिणाम भी अच्छे निकलते हैं। इससे सामाजिक जीवन में संतुलन और समृद्धि की
अभिव्यक्ति एक साथ होने लगती है। सरकार प्रशासनिक सेवाओं के बलबूते पर ही अपने दायित्वों
को संपन्न करती है। और नागरिक अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हैं।
नौकरशाही
के प्रमुख अकार्य
नौकरशाही
शासन-व्यवस्था की अनेक विद्वानों द्वारा कटु आलोचनाएँ की जाती हैं। इसके सबसे बड़े
आलोचक रैम्जे म्योर (Ramsay Muir) हैं। उसने आलोचना करते हुए कहा है-“संक्षेप में नौकरशाही
की शक्ति के रूप में शासन का ढंग पूर्ण रूप से कठोर है-चाहे वह प्रशासन के क्षेत्र
में हो, कानून के क्षेत्र में हो या वित्त के क्षेत्र में हो। प्रजातात्रिक शासन में
तो यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है और कई बार तो यह तानाशाह के समान व्यवहार करती
है।” रैम्जे म्योर ने नौकरशाही पर यह लांछन लगाया है-“नौकरशाही मंत्रीय उत्तरदायित्व
की आड़ में फलती-फूलती है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने इसकी तुलना अग्नि से की है जो
कि एक सेवक के रूप में तो बहुत उपयोगी सिद्ध होती है, परंतु जब यह स्वामी (मालिक) बन
जाती है तो घातक सिद्ध होती है। इसी प्रकार लॉर्ड हेवर्ट (Lord Hawart) ने नौकरशाही
की शक्ति को ‘नई तानाशाही’ (New Despotism) कहकर पुकारा है।
नौकरशाही
के प्रमुख अकार्य निम्नलिखित हैं –
1.
जनता की इच्छाओं तथा माँगों की अवहेलना करना – नौकरशाही व्यवस्था
में सरकारी अधिकारी स्वयं को जनता का संरक्षक तथा हितैषी समझते हैं। वे जनमत को महत्त्वपूर्ण
नहीं समझते। वास्तविकता यह है कि वे व्यवहार में वही करते हैं, जो उनको अच्छा लगता
है। फिफनर (Pfiffner) के शब्दों में, “नौकरशाही बहुत मनमानी करती है। वह जनता की नीतियों
का सरकारी नीतियों से सामंजस्य न करके उन्हें नए रूप प्रदान करती है। इससे जनसाधारण
की माँगों तथा इच्छाओं की उपेक्षा होती है।”
2.
लालफीताशाही या औपचारिकता की अधिकता – लालफीताशाही औपचारिक
बातों को अधिक महत्त्व देती है। इसमें संदेह नहीं है कि नौकरशाही में ‘क्रिया-प्रक्रिया
के नियमों (Rules of procedure) को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इससे शासन-व्यवस्था
में सरकार का व्यय प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। प्रायः प्रशासनिक अधिकारी यह भूल जाते
हैं कि उनका उद्देश्य केवल फॉर्म भरना अथवा नियमों का परिपालन करना ही नहीं है, वरन्
समाज-सेवा करना भी है। नौकरशाही प्रक्रिया-औपचारिकताओं को अपना उद्देश्य बना लेती है,
जबकि वे जन-सेवा के लिए एक माध्यम मात्र हैं।
3.
अधिकारियों की संख्या की वृद्धि – इसके विषय में परकिंस
के अनुसंधान के अनुसार अधिकारियों की संख्या में प्रतिवर्ष 15.75% की वृद्धि हो जाती
है, जिसका बोझ जनता को करों के रूप में वहन करना पड़ता है।
4.
अधिकारियों की शक्ति-वृद्धि की भावना – नौकरशाह सदैव शक्ति
के भूखे रहते हैं। जनतंत्रीय कार्यों के प्रति उनमें आदर तथा सद्भावना नहीं होती। वे
जनता की ओर से अपनी शक्ति को निरंतर बढ़ाते चले जाते हैं। संसदात्मक शासन-प्रणाली में
मंत्रियों के उत्तरदायित्वों की आड़ में विभागों की शक्ति निरंतर बढ़ती जाती है।
5.
विभागीकरण या साम्राज्य-रचना – नौकरशाही की एक त्रुटि यह है कि
इसमें सरकौर के कार्यों को पृथक्-पृथक् विभागों (Isolated departments) में विभक्त
कर दिया जाता है। प्रत्येक विभाग स्वयं को आत्मनिर्भर बनाना चाहता है तथा दूसरे विभागों
को सहयोग देने के पक्ष में नहीं होता। प्रत्येक विभाग के अधिकारी अपने विभाग को अपना
छोटा राज्य (Little kingdom) समझने लगते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे एक बड़े प्रशासन
के अंश मात्र हैं।
6.
पुरानी प्रथाओं से प्रेम तथा रूढ़िवादिता-बट्टेण्ड रसेल (Burtrend
Russell) के अनुसार, प्रत्येक राष्ट्र में नौकरशाही व्यवस्था में अधिकारियों की मनोवृत्ति
नकारात्मक हो जाती है। नवीन प्रयोग करने में उनकी बिलकुल रुचि नहीं होती। वे रूढ़िवाद
में मग्न रहते हैं। उनमें पद की गर्वीली भावनाएँ उदित हो जाती हैं, जिसके कारण वे सत्य
बात को भी सुनना नहीं चाहते।”
7.
प्रजातंत्र की विरोधी – नौकरशाही किसी भी रूप में अपने वर्गीय
अस्तित्व की अनुभूति के साथ-साथ प्रजातंत्र से न्यायपूर्ण संबंध नहीं बना पाती। रैम्जे
म्योर ने स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया है-“संसद लोक-सेवकों के हाथ की कठपुतली है।”
8.
श्रेष्ठता की भावना – इस व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारियों में
श्रेष्ठता की भावना आ जाती है। इन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। इसलिए ये
अपने आप को जनता और राजनीतिक नेतृत्व से पृथक् और श्रेष्ठ समझने लगते हैं। फलस्वरूप
शासकों और शासितों के बीच गहरी खाई पैदा हो जाती है, कहीं असंतोष तो कहीं भ्रष्टाचार
की भावना को जन्म देने में सहायक होती है।
9.
निरंकुशता का प्रदर्शन – उदारता के लिए नौकरशाही में कोई स्थान
नहीं होता। वे निरंकुशता के लिए नियमों का आश्रय लेते हैं। उनकी यह निरंकुशता उनके
श्रेष्ठ अनुभव, पृथक् अनुभव तथा विशेषज्ञ-अनुभव करने की भावना से आबद्ध है। यद्यपि
वे अपने को परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं, तथापि उनकी यह
प्रवृत्ति उनमें निरंकुशं मनोभावना को विकास करती है।
वेबर
के नौकरशाही के सिद्धांत की आलोचना
नौकरशाही
के अध्ययन तथा विवेचन में मैक्स वेबर को पथ-प्रदर्शक के रूप में माना जाता है। विद्वानों
द्वारा उनके विचारों की पर्याप्त आलोचानाएँ प्रस्तुत की गई हैं जो निम्नलिखित हैं
–
1.
मैक्स वेबर नौकरशाही को व्यवस्था का एक आदर्श रूप मानता है, जबकि नौकरशाही में कुछ
भी आदर्श नहीं है।
2.
आलोचकों के अनुसार, वेबर के विचार उपकल्पना के रूप में हैं। उनका कोई गवेषणात्मक आधार
नहीं है।
3.
वेबर; मानव मनोविज्ञान, व्यक्ति के अनौपचारिक संबंध तथा औपचारिक प्रभावों पर कोई ध्यान
नहीं देता।
4.
वेबर ने नौकरशाही के पूर्णतः औपचारिक स्वरूप का अध्ययन किया है तथा सामाजिक घटनाओं
या अनौपचारिक संबंधों को प्रसंगवश मानकर छोड़ दिया है, जबकि ये किसी भी संगठन के सुचारू
कार्य-संचालन के लिए अति आवश्यक हैं।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि नौकरशाही के अध्ययन में वेबर का अद्वितीय स्थान है। इनकी प्रतिभा को स्वीकार करते हुए कार्ल जे० फ्रेडरिक (Carl J. Friedrich) ने इन्हें अध्ययन की महत्त्वपूर्ण दिशाएँ खोलने वाला बताया है।