प्रश्न 1. अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरतचंद्र रॉय ने सामाजिक मानवविज्ञान
के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?
उत्तर-
एल० के० अनन्तकृष्ण अय्यर (1861-1937 ई०) तथा शरदचंद्र रॉय (1871-1942 ई०) को भारत
के अग्रणी विद्वानों में माना जाता है जिन्होंने समाजशास्त्रीय प्रश्नों को आकार प्रदान
किया। उन्होंने एक ऐसे विषय पर कार्य करना प्रारंभ किया जो भारत में न तो अभी तक विद्यमान
था और न ही कोई ऐसी संस्था थी जो इसे किसी विशेष प्रकार का संरक्षण देती। अय्यर ने
अपने व्यवसाय की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की; फिर स्कूली शिक्षक और उसके बाद कोचीन
रजवाड़े के महाविद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए।
यह
रजवाड़ा आज केरल राज्य का एक भाग है। 1902 ई० में कोचीन के दीवान द्वारा उन्हें राज्य
के नृजातीय सर्वेक्षण में सहायता के लिए कहा गया। ब्रिटिश सरकार इसी प्रकार के सर्वेक्षण
सभी रजवाड़ों तथा अन्य इलाकों में कराना चाहती थी जो प्रत्यक्ष रूप से उनके नियंत्रण
में आते थे। अय्यर ने यह कार्य पूर्णरूपेण एक स्वयंसेवी के रूप में अवैतनिक सुपरिंटेंडेंट
के रूप में संपन्न किया। उनके इस कार्य की काफी सराहना की गई तथा तत्पश्चात् उन्हें
मैसूर रजवाड़े के इसी प्रकार के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त किया गया। इन सर्वेक्षणों से
वे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् बन गए।
कानूनविद्
शरत्चंद्र रॉय भी अग्रणी समाज-वैज्ञानिक माने जाते हैं। उन्होंने कुछ अवधि तक कानून
की प्रैक्टिस करने के पश्चात् 1898 ई० में राँची के एक ईसाई मिशनरी विद्यालय में अंग्रेजी
के शिक्षक के रूप में कार्यभार सँभाला। कुछ वर्षों पश्चात् उन्होंने पुनः राँची की
अदालत में कानून की प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी। 44 वर्ष राँची में निवास के दौरान उन्होंने
छोटा-नागपुर प्रदेश (आज को झारखंड) में रहने वाली जनजातियों की संस्कृति तथा समाज का
अध्ययन किया तथा वे इसके विशेषज्ञ बन गए। रॉय की रुचि जनजातीय समाज में, अदालत में
दुभाषिए के रूप में उनकी नियुक्ति के कारण भी हुई। अदालत में वे जनजातियों की परंपरा
तथा कानूनों को दुभाषित करते थे। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया
तथा जनजातियों को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने ओराँव, मुंडा तथा खरिया
जनजातियों पर भी काफी कुछ लिखा तथा रॉय भारत तथा ब्रिटेन के छोटा-नागपुर के मानवविज्ञानी
विशेषज्ञ माने जाने लगे।
प्रश्न 2. जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’-इस विवाद के दोनों पक्षों
के क्या तर्क थे?
उत्तर-
1930 एवं 1940 के दशकों में भारत में इस विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ कि भारत में
जनजातीय समाज का क्या स्थान हो और राज्य उनसे किस प्रकार का व्यवहार करे। एक तरफ अंग्रेज
प्रशासक एवं मानव-वैज्ञानिक थे जिनका मत था कि जनजातियों को संरक्षण देने में राज्य
को आगे आना चाहिए ताकि वे अपनी जीवन-पद्धति तथा संस्कृति को बनाए रख सकें। ऐसे विचारकों
को यह तर्क था कि यदि सीधे-सादे जनजातीय लोग हिंदू समाज तथा संस्कृति की मुख्य धारा
में सम्मिलित हो जाएँगे तो उनका न केवल सांस्कृतिक रूप से पतन होगा, अपितु वे शोषण
से भी नहीं बच पाएँगे। इसलिए ऐसे विचारक जनजातियों को अलग-थलग रखने के पक्ष में थे
ताकि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का अवसर मिलता रहे।
जनजातियों
को अलग-थलग रखने के विरुद्ध दूसरी तरफ ऐसे राष्ट्रवादी भारतीय भी थे जिनका यह मत था
कि जनजातियों के पिछड़ेपन को आदिम संस्कृति के संग्रहालय’ के रूप में ही बनाए नहीं
रखा जाना चाहिए। घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने जनजातियों
को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ के रूप में पहचाने जाने पर बल दिया। उन्होंने अनेक ऐसे साक्ष्य
भी दिए जिनसे यह प्रमाणित होता था कि वे लंबे समय तक हिंदुत्व से आपसी अंत:क्रिया द्वारा
जुड़े हुए थे। घूयें जैसे राष्ट्रवादी विचारकों का मत था कि जनजातियों को राष्ट्रीय
विचारधारा में सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसा करने में होने वाले दुष्परिणाम मात्र
जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित न होकर भारतीय समाज के सभी पिछड़े तथा दलित वर्गों में
समान रूप से देखे जा सकते हैं। विकास के मार्ग में आने वाली ये वे आवश्यक कठिनाइयाँ
हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता।
प्रश्न 3. भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा
जी०एस० घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें।
उत्तर-
ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी हरबर्ट रिजले मानवविज्ञान के मामलों में अत्यधिक रुचि रखते
थे। उन्होंने प्रजातियों का विभाजन उनकी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर किया।
उनके अनुसार भारत विभिन्न प्रजातियों के उविकास के अध्ययन की एक विशिष्ट प्रयोगशाला’
था तथा काफी लम्बे समय तक इन प्रजातियों में परस्पर विवाह सम्भव नहीं था क्योकि प्रत्येक
प्रजाति अंतर्विवाह पर बल देती थी। जैसे-जैसे विवाह संबंधी यह नियम शिथिल हुआ, वैसे-वैसे
विभिन्न प्रजातियों में विवाह होने लगे तथा जाति प्रथा की उत्पत्ति इसी का परिणाम है।
अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि रिजले के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति प्रजातीय
कारकों में निहित है। उन्होंने अपने मत की पुष्टि में यह तर्क दिया कि उच्च जातियाँ
आर्य प्रजाति की विशिष्टताओं से मिलती हैं, जबकि निम्न जातियों में मंगोल तथा अन्य
प्रजातियों के गुण देखे जा सकते हैं।
भारत
में जी०एस० घुर्ये को जाति तथा प्रजाति का अध्ययन करने वाला प्रमुख विद्वान् माना जाता
है। 1932 ई० में प्रकाशित उनकी पुस्तक कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ इस विषय पर लिखी गई
एक आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने जाति तथा प्रजाति के संबंधो
पर प्रचलित सिद्धांतों की विस्तारपूर्वक आलोचना की। घूर्ये; रिजले के इन विचारों को
अंशत: सत्य मानते थे तथा इसलिए उनसे पूरी तरह से सहमत नहीं थे। उनका मत था कि रिजले
द्वारा उच्च जातियों को आर्य तथा निम्न जातियों को अनार्य बताया जाना केवल उत्तरी भारत
के लिए ही सही है। भारत के अन्य भागों में विभिन्न प्रजातीय समूहों को आपस में काफी
लंबे समय से मेल-मिलाप था। अतः प्रजातीय शुद्धता केवल उत्तर भारत में ही बसी हुई थी
क्योंकि वहाँ अंतर्विवाह निषिद्ध था। शेष भारत में अपनी ही जाति या समूह में विवाह
करने का प्रचलन उन वर्गों में हुआ जो प्रजातीय स्तर पर वैसे ही भिन्न थे।
प्रश्न 4. जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएँ।
उत्तर-
जाति की कुछ परिभाषाएँ ऐसी हैं जो जाति के साथ-साथ जनजाति पर भी लागू होती हैं। इन
परिभाषाओं को ही जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा कहते हैं। उदाहरणार्थ-रिजले
ने अपनी पुस्तक ‘दि पीपुल ऑफ इंडिया’ में जाति को इन शब्दों में परिभाषित किया है,
“यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी
काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाय को स्वीकार करता
है और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट
होता है। यह एक ऐसी परिभाषा है। जो दी तो गई है जाति के संदर्भ में, परंतु जनजाति पर
भी लागू होती है। जनजाति भी अनेक परिवारों का एक समूह है जिसका एक विशिष्ट नाम होता
है। जनजाति के लोग भी अपनी उत्पत्ति किसी देवी-देवता से मानते हैं, निश्चित व्यवसाय
करते हैं तथा सजातीय समूह का निर्माण करते हैं।
प्रश्न 5. ‘जीवंत परंपरा से डी०पी० मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय
समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर-
डी०पी० मुकर्जी समाजशास्त्र के लखनऊ संपद्राय के जाने-पहचाने विद्वान रहे हैं जो शिक्षण
के अतिरिक्त बौद्धिक तथा जनजीवन में भी अपने समय के सर्वाधिक प्रभावशाली विद्वान थे।
मुकर्जी का मानना था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था ही उसका निर्णायक एवं विशिष्ट लक्षण
है तथा इसीलिए प्रत्येक सामाजिक विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि वह इस संदर्भ में इससे
जुड़ा हो। भारतीय संदर्भ में सामाजिक व्यवस्था का निर्णायक पक्ष इसका सामाजिक पक्ष
है क्योंकि इतिहास, राजनीति तथा अर्थशास्त्र पश्चिम की तुलना में भारत में कम विकसित
थे।
‘जीवंत
परंपरा से अभिप्राय उस परंपरा से है जो भूतकाल तक ही सीमित नहीं है, अपितु परिवर्तन
की संवेदनशीलता से भी जुड़ हुई है। अर्थात् यह वह परंपरा है जो भूतकाल से कुछ ग्रहण
कर उससे संबंध बनाए रखने के साथ-साथ नई चीजों को भी ग्रहण करती है। अतः जीवंत परंपरा
पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। भारतीय सामाजिक परंपराएँ जीवंत परंपराएँ हैं
जिन्होंने अपने आप को भूतकाल से जोड़ने के साथ-ही-साथ वर्तमान के अनुरूप ढाला है और
इस प्रकार समय के साथ अपने आप को विकसित कर रही हैं।
भारतीय
परंपराओं में श्रुति, स्मृति तथा अनुभव नामक परिवर्तन के तीन सिद्धांत निहित हैं। इसलिए
मुकर्जी ने सभी भारतीय समाजशास्त्रियों के लिए जीवंत परंपराओं का अध्ययन आवश्यक माना
है। उनका मत था कि भारतीय समाजशास्त्री के लिए केवल समाजशास्त्री होना ही पर्याप्त
नहीं है बल्कि उसकी प्रथम आवश्यकता भारतीय होना है। इस नाते उसके लिए लोकरीतियों, रूढ़ियों,
प्रथाओं तथा परंपराओं से जुड़कर ही सामाजिक व्यवस्था के अंदर तथा उसके आगे की वास्तविकता
को समझना जरूरी है। मुकर्जी का मानना था कि समाजशास्त्रियों में भाषा को सीखने तथा
भाषा की उच्चता-निम्नता और संस्कृति की पहचान करने की क्षमता होनी चाहिए।
प्रश्न 6. भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये
बदलाव के ढाँचे को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर-
भारतीय संस्कृति तथा समाज का एक लंबा इतिहास है। इसे बनाए रखने में इसकी संरचनात्मक
विशिष्टताओं एवं प्रमुख परपंराओं का विशेष योगदान रहा है। प्राचीनता, स्थायित्व, सहिष्णुता,
अनुकूलनशीलता, सर्वांगीणता, ग्रहणशीलता एवं आशावादी प्रकृति भारतीय संस्कृति तथा समाज
की प्रमुख विशिष्टताएँ हैं। हजारों वर्षों में हुए परिवर्तन के बावजूद ये विशिष्टताएँ
यथावत् बनी। हुई हैं। विभिन्न विद्वानों ने भारतीय संस्कृति तथा समाज की अलग-अलग विशिष्टताओं
का उल्लेख किया हैं एम०एन० श्रीनिवास ने सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता पर बल दिया है
तो ड्युमो ने श्रेणीबद्धता को प्रमुख माना है। योगेन्द्र सिंह ने श्रेणीबद्धता, समग्रवाद,
निरंतरता तथा लोकातीतत्व को प्रमुख माना है।
मैंडलबानी
ने भारतीय संस्कृति तथा समाज को समझने के लिए दो संकल्पनाओं को। इसकी कुंजी के समान
माना है- जाति तथा धर्म। जाति तथा धर्म ने परिवर्तनों के बावजूद न केवल । अपने स्वरूप
को बनाए रखा है, अपितु नवीन गुण भी ग्रहण किए हैं। इसी को डी०पी० मुकर्जी ने ‘जीवंत
परंपरा’कहा है। भारतीय संस्कृति तथा समाज की विशिष्टताएँ समय के साथ-साथ परिवर्तन की
संवेदनशीलता से जुड़ी रही हैं। इसीलिए भारतीय समाज की सभी संरचनात्मक विशिष्टताएँ आज
भी किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं।
प्रश्न 7. कल्याणकारी राज्य क्या है? ए० आर० देसाई कुछ देशों द्वारा
किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर-
ए० आर० देसाई ने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य की विसतृत
विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता तथा लागू
करता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा
का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराने
हेतु हर संभव कदम उठाता है। देसाई ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं
का उल्लेख किया है –
1.
कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता है अर्थात् वह कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने
के न्यूनतम कार्य ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी
के लिए सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग
करता है।
2.
कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य होता है। बहुदलीय चुनाव इस प्रकार के राज्य की
पारिभाषिक विशेषता है। इसी दृष्टि से समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों से भिन्न है।
3.
कल्याणकारी राज्य ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की
अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियों दोनों एक साथ कार्य
करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न
ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों में जनता को निवेश करने से रोकता है। यह जरूरत
की वस्तुओं और सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं
पर निजी उद्योगों का वर्चस्व होता है।
ए०आर०
देसाई कल्याणकारी राज्य के द्वारा दिए गए दावों की आलोचना करते हैं। उनका मत है कि
ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहते हैं
परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं।
वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित कल्याणकारी राज्य बाजार
के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी असफल रहे हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति
तथा अत्यधिक बेरोजगारी इसकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने इन तक के आधार पर देसाई ने
यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे
खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है।
प्रश्न 8. समाजशास्त्रीय शोध के लिए गाँव को एक विषय के रूप में लेने
पर एम०एन० श्रीनिवास तथा लुईस ड्यूमो ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर-
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत
रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा इस पर परिचर्चा
देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार
किया। उनका मत था कि गाँव एक आवश्यक सामाजिक पहचान है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत
पहचान की पुष्टि करते हैं। श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन
हुए हैं तथा गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे। वे विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक
तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे। इसीलिए उन्होंने उन सभी ब्रिटिश
प्रशासकों तथा सामाजिक मानववैज्ञानिकों की आलोचना की है जिन्होंने भारतीय गाँव का स्थिर,
आत्म-निर्भर तथा लघु गणतंत्र के रूप में चित्रण किया
लुईस
ड्यूमो गाँव के अध्ययन के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि जाति जैसी सामाजिक संस्थाएँ
गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान
पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और
लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक
संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसीलिए
ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो
सकता है।
प्रश्न 9. भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययन का क्या
महत्त्व है। ग्रामीण अध्ययन को आगे बढ़ाने में एम०एन० श्रीनिवास की क्या भूमिका रही
है?
उत्तर-
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययनों का विशेष महत्त्व है। वस्तुत: भारत
में समाजशास्त्र का विकास ही ग्रामीण अध्ययनों से हुआ है। ग्रामीण अध्ययनों के महत्त्व
के संबंध में एआर० देसाई का कहना है-“स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् ग्रामीण सामाजिक
संगठन, संरचना, प्रकार्य तथा उविकास का क्रमबद्ध अध्ययन जरूरी ही नहीं अत्यंत जरूरी
हो गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण भारतीय सरकार की प्रमुख उद्देश्य रहा है ताकि ग्रामीण
समाज से संबंधित समस्याओं का समाधान करके एक शोषण रहित धर्मनिरपेक्ष समाजवादी राज्य
बनाया जाए। भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र इसलिए आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि
भारत की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गाँव में ही रहती है।
ए०आर०
देसाई ने भारत में ग्रामीण समाज की आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना आदि के अध्ययन
को अति आवश्यक बताते हुए इसके निम्नलिखित तीन कारणों का उल्लेख किया है –
1.
भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसके लंबे इतिहास, जटिल सामाजिक संगठन, धार्मिक जीवन,
सांस्कृतिक प्रतिमान इत्यादि को अगर सही रूप में समझना है तो ग्रामीण भारत का अध्ययन
करना जरूरी है।
2.
भारतीय ग्रामीण समाज भी आधुनिक युग के नवीन विचारों से पूरी तरह प्रभावित है इसलिए
अगर विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों, जादू-टोने से लेकर तार्किक दृष्टिकोण तक, से अध्ययन
करना है तो ग्रामीण समाज को समझना जरूरी है।
3.
अंग्रेजी राज में भारत की ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन
हुए जिनके परिणामस्वरूप गाँवों की आत्म-निर्भरता समाप्त हो गई। जजमानी व्यवस्था, संयुक्त
परिवार, जाति व्यवस्था इत्यादि में परिवर्तन के कारण एक तरह से असंतुलन-सा पैदा हो
गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण करने के लिए भारतीय गाँवों का पर्याप्त ज्ञान होना जरूरी
है तथा ग्रामीण समाजशास्त्र इसमें सहायक हो सकता है।
भारत
में ग्रामीण अध्ययनों को आगे बढ़ाने में एम०एन श्रीनिवास की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका
रही है। उन्होंने ग्रामीण अध्ययनों में न केवल नृजातीय शोधकार्य की पद्धति के महत्त्व
एवं सार्थकता से अवगत कराया, अपितु भारतीय गाँवों में होने वाले तीव्र सामाजिक परिवर्तन
का भी विश्लेषण किया। इस प्रकार के अध्ययन भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए काफी उपयोगी
सिद्ध हुए। इस प्रकार, ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य
के परिप्रेक्ष्य में एक नई भूमिका प्रदान की।
क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. जनजातीय आंदोलन जैसे कितने और संघर्षों के बारे में आप जानते
हैं? पता लगाइए कि इन संघर्षों के पीछे कौन-से मुद्दे थे? आप और आपके सहपाठी इन समस्याओं
के बारे में ” क्या सोचते हैं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर-
भारत में जनजातीय आंदोलनों के अतिरिक्त अनेक समाज-सुधार आंदोलन भी हुए हैं जिनका उद्देश्य
समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर कर उनसे प्रभावित वर्गों का उत्थान करना रहा है।
ऐसे आंदोलन मुख्य रूप से निम्न जातियों (पूर्व में अस्पृश्य जातियाँ) तथा महिलाओं पर
अधिक केंद्रित रहे. हैं। अधिकतर जनजातीय आंदोलन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक तथा राजनीतिक
पहचान पर बल देते हैं। वास्तव में, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण इसी प्रकार
के आंदोलनों का फल है। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों, खदानों एवं फैक्टरियों के
निर्माण के कारण जनजातीय वर्गों पर एक असमान दबाव पड़ता है जिससे विस्थापन जैसी गंभीर
समस्या विकसित होने लगती है। भारत में पिछले पचास से अधिक वर्षों में 3,300 बड़े बाँध
बनाए गए हैं जिनके परिणामस्वरूप लगभग 21 से 33 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं।
जनजातीय
एवं दलित वर्गों की स्थिति विस्थापितों में और भी दयनीय है तथा 40-50 प्रतिशत विस्थापित
लोग जनजातीय समुदायों के ही हैं। घूर्ये ने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ कहा तथा
उन्हें भारत की. मुख्य धारा की संस्कृति में सम्मिलित करने पर बल दिया। ऐसा करने पर
जनजातियों में होने वाले आंदोलनों एवं संघर्षों के वैसे ही परिणामों की बात कही जैसे
कि अन्य पिछड़े वर्गों में रहे हैं। अस्पृश्यता समाप्त करने हेतु किए गए समाज-सुधार
आंदोलनों के पीछे भी इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर अस्पृश्यों के स्तों को ऊँचा
करना रहा है। इसी भाँति बाल विवाह, सती प्रथा, नरबलि जैसी कुप्रथाओं को लेकर हुए आंदोलनों
का लक्ष्य महिलाओं की स्थिति में सुधार करना था। महिला स्वतंत्रता जैसे आंदोलनों के
पीछे महिलाओं को समान अधिकार देने जैसा मुद्दा प्रमुख रहा है।
प्रश्न 2. जीवंत परंपरा से क्या तात्पर्य है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर-
डी०पी० मुकर्जी के अनुसार जीवंत परंपरा से तात्पर्य उस परंपरा से है जो भूतकाल से कुछ
ग्रहण कर एक ओर उससे अपने संबंध बनाए रखती है तो दूसरी ओर नई चीजों को भी ग्रहण करती
है। अत: एक जीवंत परंपरा पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। जीवंत परंपरा के उदाहरण
हमउम्र के बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों, पुरुषों एवं स्त्रियों द्वारा पहने
जाने वाले पहनावों, जाति एवं धर्म जैसी संस्थाओं में स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं।
आज से 50-60 वर्ष (लगभग दो पीढ़ी) पहले हमउम्र के बच्चे अपने परिवार में ही खेलते थे
क्योंकि परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होती थी तथा परिवार ही मनोरंजन का एक साधन
होता था। आज से 25-30 वर्ष पहले हमउम्र के बच्चे पड़ोसी बच्चों के साथ खेलते थे परंतु
इस बात का ध्यान रखा जाता था कि लड़कों के साथ लड़के ही खेलें तथा लड़कियों के साथ
लड़कियाँ ही खेलें। आज खेलों में इस प्रकार के प्रतिबंध शिथिल हो गए हैं। न केवल खेल
के रूप बदल गए हैं, अपितु लिंग जैसे निषेध समाप्त हो गए हैं। बहुत-से-बच्चों ने अपने
मनोरंजन का साधन टेलीविजन के प्रोग्राम अथवा कंप्यूटर गेम्स को बना लिया है जिसमें
उन्हें हमउम्र साथियों की आवश्यकता ही नहीं रहती।
जाति
जैसी संस्था जीवंत परंपरा का प्रमुख उदाहरण है। आज की जाति व्यवस्था तथा आज से 50 वर्ष
पूर्व की जाति व्यवस्था में काफी अंतर है। खान-पान एवं सामाजिक सहवास पर आधारित जातीय
निषेध समाप्त हो चुके हैं। अंतर्जातीय विवाह होने लगे हैं तथा जाति का अपने परंपरागत
व्यवसाय से संबंध काफी सीमा तक टूट गया है। यद्यपि जाति की अधिकांश विशेषताएँ बदल गई
हैं, तथापि जाति आज भी एक नए रूप में हमारे सामने है। जाति ने अपने इस रूप को बनाए
रखने के लिए राजनीति जैसे आधुनिक पहलुओं को अपना लिया है। राजनीति में आगे आने तथा
सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने अथवा इसे बढ़ाने हेतु जातीय एकता तथा समान स्तर की जातियों
में एकीकरण की भावना का विकास हुआ है।
प्रश्न 3. कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया उससे
अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार
के हवाले कर देना चाहिए। इस दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिए और दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक
सुनिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर-
कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया है उससे अधिक करना चाहिए अथवा
राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना
चाहिए। यह एक विवादास्पद मुद्दा है। ए०आर० देसाई जैसे मार्क्सवादी विद्वानों एवं राष्ट्रवादियों
द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि कल्याणकारी राज्य लोगों के कल्याण के जो दावे करता
है वे खोखले हैं। अमेरिका तथा यूरोप के राज्य, जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य
कहते हैं, अपने । नागरिकों को न केवल निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में
असफल रहे हैं, अपितु वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। वे धन के
असमान वितरण तथा अत्यधिक बेरोजगारी रोकने में भी असफल रहे हैं। अत: कल्याणकारी राज्यों
को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना
चाहिए।
दूसरी
ओर, अनेक विद्वान ऐसे हैं जो राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में हैं। उनका
तर्क है कि राज्य को केवल कानून बनाने तथा इसे लागू करने पर ही अपना ध्यान केंद्रित
करना चाहिए ताकि समाज में शांति बनी रहे एवं कानून का शासन स्थापित हो सके। बाकी सभी
कार्य राज्य को या तो स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देने चाहिए अथवा अन्य संस्थाओं को
स्थानांतरित कर देने चाहिए। राज्य से उन सब कल्याणकारी कार्यों की आशा नहीं की जा सकती
जो वह कर ही नहीं सकता। इसलिए कल्याणकारी राज्य निर्धनता, बेरोजगारी, सामाजिक भेदभाव,
नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, पूँजीवादियों की अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति, श्रमिकों
के शोषण आदि समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए हैं।
प्रश्न 4. क्या राज्य पहले की अपेक्षा आज अधिक कार्य कर रहा है या कम?
आपको क्या लगता है-यदि राज्य इन कार्यों को करना बंद कर दे तो क्या होगा? (क्रियाकलाप
3)
उत्तर-
आज राज्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कार्य कर रहा है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के
अतिरिक्त राज्य बाजारी शक्तियों को नियंत्रित एवं नियमित करने तथा सामाजिक समस्याओं
के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य के कार्यों में निरंतर वृद्धि
हुई है। इसका प्रमुख कारण राज्य पर कमजोर वर्गों के हितों को संरक्षण देकर उनका सामाजिक-आर्थिक
उत्थान रहा है। साथ ही, परिवर्तन के परिणामस्वरूप जिन संस्थाओं में विकृतियाँ आ गई
हैं उन्हें दूर करने हेतु सामाजिक अधिनियम बनाना भी राज्य का कार्य समझा जाने लगा है।
यदि राज्य इन सभी कार्यों को करना बंद कर देगा तो अमीर और गरीब में अंतराल अत्यधिक
बढ़ने लगेगा तथा समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। उनका शोषण
बढ़ जाएगा तथा जीवनयापन अत्यंत कठिन हो जाएगा। यदि हम अपने पड़ोस में राज्य द्वारा
दी गई सुविधाओं एवं सेवाओं की एक सूची बनाएँ तो यह पहले राज्य द्वारा किए जाने वाले
कार्यों से अधिक लंबी होगी।
उदाहरणार्थ-
इस सूची को विद्यालय से ही प्रारंभ किया जा सकता है। पहले जो विद्यालय थे उनमें निम्न
जातियों के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। अधिक फीस होने के कारण केवल अमीर परिवारों
के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। अब यदि कोई विद्यालय ऐसा करता है तो उसकी न केवल
सरकारी सहायता बंद कर दी जाती है, अपितु इस कार्य हेतु उसे बंद भी किया जा सकता है।
स्कूलों में भवन का निर्माण सरकारी धन से होता है, प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों
का वेतन सरकार देती है, बच्चों से बहुत कम फीस ली जाती है, अनुसूचित जाति/जनजाति के
बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है, यदि बुक बैंक योजना है तो छात्र-छात्राओं
को पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाती हैं तथा कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए मुफ्त में
अतिरिक्त कक्षाओं का प्रबंध किया जाता है।
यदि
किसी विद्यालय में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु ‘आरक्षित स्थानों का पालन नहीं किया जाता
तो उस विद्यालय के विरुद्ध कठोर शासकीय कार्यवाही की जा सकती है। इसी भाँति, यदि हम
अपने पड़ोस में सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्यों की सूची बनाएँ तो यह पहले की तुलना
में काफी लंबी होगी। गलियों में प्रकाश की व्यवस्था, घरों में बिजली-पानी उपलब्ध कराने
की व्यवस्था, गंदगी की निकासी हेतु सीवर की व्यवस्था, बच्चों के खेल एवं मनोरंजन के
लिए-पार्को की व्यवस्था, समय-समय पर टूटी सड़कों एवं गलियों की मरम्मत करने या उन्हें
फिर से नया बनाने की व्यवस्था राज्य द्वारा ही की जाती है। इतना अवश्य है कि सरकार
द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं से सभी लोग कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। कुछ
लोग इन्हें अपर्याप्त मानकर सरकार एवं संबंधित सरकारी विभाग की आलोचना भी करते रहते
हैं। हो सकता है कि कार्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनकी आशा के अनुकूल
न हो रहा हो।
प्रश्न 5. मान लीजिए कि आपका कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है
और पहली बार पृथ्वी पर आया है और उसने कभी गाँव के बारे में नहीं सुना है। आप उन्हें
ऐसे कौन-से पाँच सुराग देंगे ताकि वे कभी गाँव को देखें तो उसे पहचान सकें। (क्रियाकलाप
4)
उत्तर-
यदि हम अपनी कक्षा में चार-पाँच छात्रों के छोटे समूह बनाकर उन सुरागों की पहचान करने
का प्रयास करें जो गाँव के लिए जरूरी होते हैं तो निश्चित रूप से कुछ ऐसे सुराग सामने
आ सकते हैं। इन सुरागों में लोगों का मुख्य रूप से कृषि व्यवसाय करना, संयुक्त अथवा
विस्तृत परिवारों में रहना, भू-क्षेत्र की दृष्टि से जनसंख्या का सीमित आकार होना,
प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध होना तथा सदस्यों की जीवन-पद्धति, विचारधारा एवं रहन-सहन
में सजातीयता होना प्रमुख रूप से उभरकर सामने आएँगे। लोगों का रूढ़िवादी होना या धार्मिक
मान्यताओं को अधिक महत्त्व देनी अथवा आवास का अनियमित रूप से होने जैसे सुराग भी सामने
आ सकते हैं। यदि कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है और पहली बार पृथ्वी पर आया
है तो वह गाँव में जाकर सरलता से इन सुरागों के माध्यम से इस तथ्य से । संतुष्ट हो
सकता है कि वह वास्तव में गाँव में ही है। गाँव भी चूंकि अनेक प्रकार के होते हैं इसलिए
उनको पहचानने के सुरागों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।
प्रश्न 6. टी०वी, फिल्म अथवा अखबारों में गाँव पर कितनी बार चर्चा की
जाती है? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर-
टीवी, फिल्म अथवा अखबारों में पहले गाँव की बहुत चर्चा हुआ करती थी। अनेक टीवी कार्यक्रम
अथवा फिल्में ग्रामीण परिवारों के इर्द-गिर्द ही निर्मित होते थे। अब अधिकांश टी०वी०
कार्यक्रम एवं फिल्में नगरों में बने स्टूडियों में बनाए जाने लगे हैं जिनमें गाँव
की चर्चा कम होने लगी है। इनमें नगरीय परिवारों; विशेष रूप से मध्य एवं उच्च वर्ग के
परिवारों का चित्रण अधिक होने लगा है। समाचार-पत्रों में भी अधिकांश घटनाएँ नगरों में
संबंधित ही प्रकाशित होती हैं। टी०वी० एवं फिल्मों की भाँति समाचार-पत्रों में भी गाँव
की चर्चा कम होने लगी है।
प्रश्न 7. क्या आपको लगता है कि नगर के लोग आज भी गाँव में रुचि रखते
हैं? अगर आप नगर में रहते हैं तो क्या आपका परिवार आज भी अपने गाँव के रिश्तेदार के
संपर्क में है? क्या इस प्रकार के संपर्क आपके पिता अथवा दादा की पीढ़ी में थे? (क्रियाकलाप
5)
उत्तर-
अनेक नगरीय लोग आज भी गाँव में रुचि रखते हैं। इसका प्रमुख कारण अपने नजदीकी रिश्तेदारों
का गाँव में होना है। यदि ऐसा परिवार रोजगार हेतु गाँव छोड़कर नगर में बसा है तो माता-पिता
या भाई-बहन हो सकता है अभी गाँव में ही हों। इसलिए नगर में रहते हुए भी ऐसे परिवार
गाँव के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखते हैं। गाँव से उन्हें गेहूं एवं अन्य वस्तुएँ अपने
नातेदारों से मिल जाती हैं तथा ऐसी वस्तुओं को उन्हें नगरों में लेने की आवश्यकता नहीं
पड़ती।
अधिकांश
ग्रामवासी नगरों में चूँकि रोजगार हेतु ही आए हैं इसलिए उनका गाँव से संपर्क बना रहता
है। दादा-दादी की पीढ़ी में भी इस प्रकार के संपर्क थे तो परंतु बहुत कम थे। उस समय
नगरों में जाकर बसने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। आवागमन के साधन भी उपलब्ध नहीं थे। अब
इस प्रकार क संपर्क बढ़े हैं। परंतु नगरों में स्थायी रूप से बसने वाले परिवारों की
आने वाली पीढ़ी में गाँव से संपर्क आने वाले समय में निश्चित रूप से कम हो जाएगा। वस्तुतः
धीरे-धीरे नगरवासियों की व्यक्तिवाद एवं व्यावसायिक प्रतिबद्धता के कारण अपने रिश्तेदारों
से गाँव में जाकर मिलने की आवृत्ति कम होती जाती है।
प्रश्न 8. क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो नगर छोड़ गाँव
में जाकर बस गया हो? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो वापस जाना चाहता हो?
अगर हाँ, तो वे कौन-से कारण हैं जिनके लिए ये नगर छोड़ गाँव में जाकर बसना चाहते हैं?
(क्रियाकलाप 5)
उत्तर-
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो रोजगार की तलाश में बिना सोचे-समझे गाँव छोड़ देते हैं।
नगर में उन्हें पहले तो रोजगार मिलता ही नहीं और यदि रोजगार मिल भी जाता है तो वे इससे
अपने पूरे परिवार का खर्चा नहीं उठा सकते। नगरों में मकानों के महँगे किराये हैं तथा
जीवनयापन हेतु भी अधिक धन की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सबसे
निराश होकर पुनः गाँव जाने का निर्णय ले ले। वह यह सोचकर वापस गाँव चला जाए कि इतने
पैसे कमाकर तो वह गाँव में ही अपना गुजारा आसानी से कर सकता है।
उसके
साथ कोई ऐसी घटना भी घटित हो सकती है जो उसे नगरीय जीवन से विमुख कर दे। पहले कभी फिल्मों
में यह दिखाया जाता है था कि जब कोई हीरो गाँव से नगर पहली बार आता है तो या तो उसका
सामान चोरी हो जाता है या उसकी जेब काट ली जाती है या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता
है जो उसके भोलेपन का फायदा उठाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति वापस जाने को तैयार हो
जाते हैं। अधिकांश व्यक्ति, जिन्हें नगरीय जीवन ग्रामीण जीवन से अधिक सुविधा-संपन्न
लगता है, कभी भी गाँव वापस जाने के बारे में सोचते ही नहीं हैं। गाँव छोड़ने के कारणों
में नगरों में बच्चों हेतु उच्च, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की उपलब्धता, रोजगार
के अधिक अवसर, नगरीय जीवन का आकर्षण आदि प्रमुख हो सकते हैं।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. भारत में वर्ण का परिवर्तित रूप है –
(क)
आश्रम-व्यवस्था
(ख)
वर्ग-व्यवस्था
(ग) जाति-प्रथा
(घ)
वंशावली
प्रश्न 2. ‘संस्कृतिकरण विचारधारा से संबंधित विचारक का नाम है –
(क)
चार्ल्स कुले
(ख)
एन० के० दत्ता
(ग)
पी० एच० प्रभु
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन
प्रश्न 3. इनमें से कौन भारतीय समाज का परिवर्तन-बोधक वक्तव्य है ?
(क)
संयुक्त परिवार का आजकल विकास हो रहा है।
(ख) भारतीय समाज में जातिवाद बढ़ रहा है।
(ग)
वृद्ध व्यक्तियों के प्रति आदर का भाव बढ़ रहा है।
(घ)
आजकल व्यक्तिवाद घट रहा है।
प्रश्न 4. प्रभु जाति की अवधारणा मानसिक उपज है –
(क)
हट्टन की
(ख)
घुरिये की
(ग) एम० एन० श्रीनिवासन की
(घ)
डी० एन० मजूमदार की
प्रश्न 5. घुरिये ने जाति-व्यवस्था की कितनी विशेषताएँ बतायी हैं ?
(क)
8
(ख) 6
(ग)
10
(घ)
4
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सा व्यक्ति प्रसिद्ध समाजशास्त्री
है ?
(क) डी० एन० मजूमदार
(ख)
आर० एस० मजूमदार
(ग)
लाल बहादुर शास्त्री
(घ)
कपाड़िया राधा कांत
प्रश्न 7. ‘भारत में जाति एवं प्रजाति नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) जी०एस० घूयें।
(ख)
एम०एन० श्रीनिवास
(ग)
डी०पी० मुकर्जी
(घ)
एस०सी० दुबे
निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा किस वर्ष प्रारंभ
हुई?
उत्तर-
भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा 1919 ई० में प्रारंभ हुई।
प्रश्न 2. भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ किस विश्वविद्यालय
में हुआ?
उत्तर-
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ बंबई विश्वविद्यालय में हुआ।
प्रश्न 3. घूर्ये का जन्म कब हुआ था?
उत्तर-
घूयें का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण
परिवार में हुआ।
प्रश्न 4. घूर्ये की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर-
1932 ई० में लिखी ‘कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ घूयें की प्रमुख पुस्तक है।
प्रश्न 5. ‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय किसे दिया
जाता है?
उत्तर-
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय जी०एस० घूयें को दिया जाता है।
प्रश्न 6. घूर्ये भारत में समाजशास्त्र के किस संप्रदाय से संबंधित
रहे हैं?
उत्तर-
घूर्ये बंबई (मुम्बई) संप्रदाय से संबंधित प्रमुख विद्वान माने जाते हैं।
प्रश्न 7. डी०पी० मुकर्जी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर-
डी०पी० मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार
में हुआ था।
प्रश्न 8. ए० आर० देसाई का जन्म कब हुआ थ?
उत्तर-
ए० आर० देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था।
प्रश्न 9. ए० आर० देसाई की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर-
‘सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म’ ए० आर० देसाई की सुप्रसिद्ध पुस्तक है।
प्रश्न 10. एम० एन० श्रीनिवास का जन्म कब हुआ था?
उत्तर-एम०
एन० श्रीनिवास का जन्म 16 नवम्बर, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में
हुआ था।
प्रश्न 11. एम०एन० श्रीनिवास की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर-
‘सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ श्रीनिवास द्वारा रचित प्रमुख पुस्तक है।
प्रश्न 12. एम०एन० श्रीनिवास ने किस गाँव का अध्ययन किया है?
उत्तर-
एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।
प्रश्न 13. एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में किस परिप्रेक्ष्य
को अपनाया है?
उत्तर-
एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य को
अपनाया है।
प्रश्न 14. संस्कृतिकरण किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर-
संस्कृतिकरण की संकल्पना का प्रतिपादन एम०एन० श्रीनिवास ने किया है।
प्रश्न 15. प्रभु जाति किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर-
प्रभु जाति की संकल्पना के प्रतिपादक एम०एन० श्रीनिवास हैं।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले किन्हीं दो प्रारंभिक
विद्वानों का नाम लिखिए।
उत्तर-
एल०के० अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरत्चंद्र रॉय भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले
दो प्रमुख प्रारंभिक विद्वान् थे।
प्रश्न 2. संस्कृतिकरण किसे कहते हैं?
उत्तर-
संस्कृतिकरण वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति अपने रीति-रिवाज एवं
जीवन-पद्धति को बदलकर तथा किसी उच्च जाति का अनुकरण कर परंपरा से प्राप्त निम्न स्थान
को ऊँचा करने का प्रयास करती है।
प्रश्न 3. अंतःविवाह क्या है?
उत्तर-
अपने ही समूह में विवाह करना अंत:विवाह कहलाता है। जाति के संदर्भ में अपनी ही जाति
में विवाह अंत:विवाह कहा जाता है।
प्रश्न 4. बर्हिविवाह क्या है?
उत्तर-
अपने समूह से बाहर विवाह करना बर्हिविवाह कहलाता है। हिन्दू विवाह के संदर्भ में सगोत्र,
सपिंड या सप्रवर विवाह वर्जित हैं इसलिए इनसे बाहर अर्थात् अपने गोत्र, पिंड या प्रवर
से बाहर विवाह बहिर्विवाह कहलाता है।
प्रश्न 5. मुक्त व्यापार किसे कहते हैं?
उत्तर-
मुक्त व्यापार से अभिप्राय अर्थव्यवस्था अथवा आर्थिक संबंधों में राज्य के कम-से-कम
हस्तक्षेप से है। इसका शाब्दिक अर्थ व्यापार को खुला छोड़ देना है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. जी०एस० घूर्ये के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
भारत में समाजशास्त्र के साथ गोविंद सदाशिव घूर्ये का नाम बड़े सम्मान के साथ जुड़ा
हुआ है। वे भारत की प्रथम पीढ़ी के समाजशास्त्रियों में से हैं जिन्होंने भारत में
न केवल समाजशास्त्र को दृढ़ता से स्थापित किया वरन् कई ऐसे छात्र भी प्रदान किए जिन्होंने
देश के विभिन्न भागों में समाजशास्त्र विषय की स्थापना की एवं समाजशास्त्रीय शोध एवं
सिद्धांतों के द्वारा समाजशास्त्रीय साहित्य को समृद्धि प्रदान की।
घूयें
का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 ई० को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण
परिवार में हुआ। उनका शैक्षणिक जीवन प्रारंभ से ही उच्च कोटि का रहा। उन्होंने अपनी
सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। उन्होंने 1919 ई० में संस्कृत एवं बाद
में अंग्रेजी में बंबई के एल्फिन्स्टन कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक प्राप्त
कर एम०ए० की परीक्षा पास की।
1919
ई० में बंबई विश्वविद्यालय ने समाजशास्त्र विषय पढ़ाने के लिए पैट्रिक गैडिस को आमंत्रित
किया। उस समय घूयें एल्फिन्स्टन कॉलेज, बंबंई में संस्कृत के प्राध्यापक थे और यह कोई
भी नहीं जानता था कि वे एक दिन भारत के महान् समाजशास्त्री बन जाएँगे। गैडिस के भाषणों
को जो लोग सुनते थे, उनमें से घूयें भी एक थे। गैडिस ने ब्रिटिश विश्वविद्यालय में
समाजशास्त्र में प्रशिक्षण पाने के लिए घूयें का चयन किया।
उनकी
सिफारिश पर बंबई विश्वविद्यालय ने घूयें को लंदन भेजा। कुछ समय तक एल०टी० हॉबहाउस के
साथ अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच० रिवर्स के पास अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच
रिवर्स के पास कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में चले गए। वहाँ घूर्ये ने अनेक लेख लिखे तथा
रिवर्स के निर्देशन में “Ethnic Theory of Caste” (जाति का प्रजातीय सिद्धांत) विषय
पर अपना शोध कार्य किया। घूयें के कार्यों पर रिवर्स का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता था
और उनका झुकाव मानवशास्त्रीय महत्त्व के विषयों; जैसे नातेदारी और प्रसारवाद की ओर
था। घूयें के शोध कार्य की समाप्ति के पूर्व ही रिवर्स का देहावसान हो गया।
1923
ई० में घूयें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्ट्रेट की उपाधि ग्रहण कर भारत लौट आए।
1924 ई० में उन्हें बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के रीडर एवं विभागाध्यक्ष
पद पर नियुक्ति प्रदान की गई। 1934 ई० में घूयें को प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया
गया तथा 1959 ई० में वे यहाँ से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी उनकी सेवाएँ लेने के
लिए बंबई विश्वविद्यालय ने उनके लिए ‘प्रोफेसर एमरीटस’ (Ermeritus Professor) का एक
नया पद सृजित किया। घूयें ने 25 से भी अधिक पुस्तकों की रचना की है। उन्होंने 800 एम०ए०
छात्रों को शीघ्र कार्य एवं 87 छात्रों को डॉक्टरेट हेतु शोध कार्य के लिए निर्देशित
किया।
घूयें
के लेखन में इतिहास, मानवशास्त्र और समाजशास्त्रीय परंपराएँ विद्यमान हैं। उन्होंने
स्वयं को ही नहीं वरन् अपने छात्रों को भी अनुभवाश्रित अध्ययन एवं अनुसंधान करने के
लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत के अनेक समाजशास्त्र के अध्यापकों को शिक्षा प्रदान
की। वे Anthropological Society of Bombay’ के 1945-50 तक अध्यक्ष भी रहे। घूर्ये ने
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी’ (Indian Sociological Society) की स्थापना की और इसके
तत्वाधान में 1952 ई० में ‘सोशियोलॉजिकल बुलेटिन’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ
किया, जो आज भारत में ही नहीं वरन् विश्व की प्रमुख समाजशास्त्रीय पत्रिकाओं में से
एक है। वे 1966 ई० तक इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे। 1983 ई० में
90 वर्ष की आयु में घूयें का निधन हो गया।
प्रश्न 2. प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर-
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1.
प्रजाति का अर्थ जन-समूह से होता है; अत: इसमें पशुओं की नस्लों को सम्मिलित नहीं किया
जाता है।
2.
इस मानव समूह से तात्पर्य कुछ व्यक्तियों से नहीं है वरन् प्रजाति में मनुष्यों का
वृहत् संख्या में होना अनिवार्य है।
3.
इस मानव समूह में एक समान शारीरिक लक्षणों का होना अनिवार्य है। ये लक्षण वंशानुक्रमण
के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं। शारीरिक लक्षणों के
आधार पर इन्हें दूसरी प्रजातियों से पृथक् किया जाता है।
4.
प्रजातीय विशेषताएँ प्रजातीय शुद्धता की स्थिति में अपेक्षाकृत स्थायी होती हैं अर्थात्
भौगोलिक पर्यावरण के बदलने से भी किसी प्रजाति के मूल शारीरिक लक्षण नहीं बदलते हैं।
प्रश्न 3. प्रजाति के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर-
प्रजाति कुछ विशेष तत्त्वों से मिलकर बनती है। यह विशेष तत्त्व उसके अस्तित्व को दूसरी
प्रजातियों से भिन्न करते हैं। इन विशेष तत्वों के आधार पर ही प्रजाति का वर्गीकरण
होता है। सामान्य रूप से प्रजातियों में भी तीन प्रकार के तत्त्व पाए जाते हैं –
1.
अंतर्नस्ल के तत्त्व – एक प्रजाति के लोग दूसरी प्रजाति के
लोगों से विवाह नहीं करते हैं। इसका कारण पहले काफी सीमा तक भौगोलिक स्थिति रहा है।
भौगोलिक स्थितियों के कारण एक प्रजाति के लोग दूसरों से कम मिल पाते हैं। दूसरे, प्रत्येक
प्रजाति स्थायित्व रखने का प्रयत्न करती है। गतिशीलता के अभाव में अंतर्नस्ल का तत्त्व
उग्र रूप से पाया जाता है; जैसे-टुंड्रा प्रदेश के लैप, सेमॉयड और एस्कीमो मानव। इनमें
अंर्तप्रजातीय विवाह होता है। यही कारण है। कि इनमें अंतर्नस्ल के तत्त्व उग्र रूप
से मिलते हैं। इस प्रकार के विवाह से रक्त की शुद्धता, संस्कृति की रक्षा तथा समान
प्रजातीय लक्षणों का स्थायित्व होता है। ऊँची प्रजातियाँ भी अपनी रक्त की पवित्रता
को बनाए रखने के लिए अंर्तप्रजातीय विवाह करती हैं।
2.
विशेष शारीरिक लक्षणों के तत्त्व – प्रजातियों का वर्गीकरण
शारीरिक लक्षणों के आधार पर भी किया जाता है। प्रत्येक प्रजाति में कुछ विशेष शारीरिक
लक्षण पाए जाते हैं; जैसे-शरीर का रंग, बाल, आँख, खोपड़ी, नासिका, कद, जबड़ों की बनावट
आदि। वर्तमान समय में यातायात के साधनों में वृद्धि होने से शारीरिक लक्षण धीरे-धीरे
समाप्त होते जा रहे हैं।
3.
वंशानुक्रमण के लक्षणों के तत्व – मैंडल के सिद्धांत
से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सहवास से रक्त में उन्हीं लक्षणों का अस्तित्व होता
है जो पैतृक होते हैं या वंश परंपरा से चले आ रहे होते हैं। शारीरिक लक्षण एक श्रृंखला
के समान होते हैं जो वंश परंपरा के कारण अनेक पीढ़ियों तक चलते हैं, जैसे कि नीग्रो
का पुत्र नीग्रो ही होता है। वह कभी भी श्वेत प्रजाति के लक्षणों से युवत नहीं होता
है। प्रजाति की पवित्रता और संस्कृति की रक्षा पतृक गुणों के द्वारा ही होती है।
प्रश्न 4. प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण कौन-से माने जाते
हैं?
उत्तर-
प्रजाति के निश्चित लक्षण संख्यात्मक अनुमान प्रदान करते हैं जिन्हें अंकगणित की संख्याओं
में बताया जा सकता है, जबकि प्रजाति के अनिश्चित लक्षणों को मापा नहीं जा सकता है और
न ही अंकगणित की संख्याओं द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है। इनको केवल अनुमान द्वारा
ही ज्ञात किया जा सकता है। प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण निम्न प्रकार हैं
–
निश्चित लक्ष्ण |
अनिश्चित लक्षण |
1.
शीर्ष देशना, |
1.
त्वचा का रंग, |
2.
नासिका देशना, |
2.
आँखों का रंग एवं बनावट, |
3.
कद, |
3.
बालों का रंग और बनावट, |
4.
जबड़ों की बनावट, |
4.
होंठ, |
5.
खोपड़ी का घनत्व |
5.
कान एवं ठुड्डी तथा |
6.
हाथ-पैर की लंबाई, तथा |
6.
पलकें । |
7.
रक्त समूह । |
|
प्रश्न 5. डी०पी० मुकर्जी के जीवन के बारे में आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
भारतीय समाजशास्त्र को अमूल्य योगदान प्रदान करने वाले एक प्रमुख समाजशास्त्री ध्रुजटि
प्रसाद मुकर्जी हैं, जिन्हें प्यार से लोग ‘डी०पी०’ के नाम से पुकारते थे। भारतीय समाज
के विश्लेषण में मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को अपनाने वाले समाजशास्त्रियों में इनका
अग्रणी स्थान रहा है। वह अपने समय की एक महान् बौद्धिक विभूति, भारतीय समाजशास्त्र
के संस्थापकों में अग्रणी और भारतीय नवजाकरण के क्रांतिदूत माने जाते हैं। डी०पी० मुकर्जी
प्रतिष्ठित भारतीय सम्मनस्के जो थे ही, उनकी रुचि अर्थशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला
के क्षेत्र में भी थी। प्रो० मुकर्जी एक विद्वान, सुसंस्कृत और भावुक प्रकृति के यक्ति
थे। उनके संपर्क में आने वाले युवा लोग उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। और उनसे दिशा
निर्देश पाते थे।
डी०पी०
मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में
हुआ था यह वह समय था जब बंगाली साहित्यको पुनर्जागरण हो रहा था उन पर बंकिम चंद्र,
रवींद्रनाथ ठाकुर एवं शरत्चंद्र का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनमें भविष्य को देखने की
भी अद्भुत क्षमता थी। उनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता (कोलका) में हुई, किंतु अपने जीवन
का अधिकांश समय उन्होंने लखनऊ में व्यतीत किया। 1922 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय में
वे समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए जहाँ ने लगभग 32 वर्ष
तक कार्य किया बंगला भाषा में उन्हें विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनका दर्शनशास्त्र,
इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और कला, साहित्य व संगीत के सिद्धांतों
पर पूरा-पूरा अधिकार था। उन्होंने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों का इस प्रकार से समन्वय
किया कि वे मानव एवं संस्कृति के समक्ष आने वाली विभिन्न समस्याओं को आलोचनात्मक दृष्टि
से देख सकते थे।
लखनऊ
से सेवानिवृत्ति के एक वर्ष पूर्व 1953 ई० में उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के तत्कालीन
उपकुलपति डॉ० जाकिर हुसैन के निमंत्रण पर वहाँ अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष का पद
ग्रहण किया। यहाँ वे पाँच वर्षों तक रहे। इसी काल में वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक
अध्ययन संस्थान में समाजशास्त्र के अतिथि आचार्य के रूप में गए। मुकर्जी ‘भारतीय समाजशास्त्रीय
परिषद् के संस्थापेक सदस्य थे। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समाजशास्त्रीय परिषद् में भारत
की ओर से प्रतिनिधित्व किया और उसके उपाध्यक्ष भी रहे।
मुकर्जी
चूंकि अत्यधिक धूम्रपान करते थे अतः उन्हें गले का कैंसर हो गया तथा 5 दिसम्बर,
1962 ई० को वे स्वर्ग सिधार गए। मुकर्जी समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध थे और नियोजन
(Planning) में विश्वास करते थे। वे वर्ग एवं विशेषाधिकारों के भी विरुद्ध थे। डी०पी०
मुकर्जी एक बहुत ही प्रभावशाली और सफल प्राध्यापक, महान् सामाजिक विचारक, उपन्यासकार,
साहित्य और कला के विवेचक, संगीत पारखी, मानवतावादी दृष्टिकोण से ओतप्रोत मानव और कुशल
प्रशासक थे। वे समस्त ज्ञान की एकता और अनुभव के एकीकरण में विश्वास करते थे। वे हठवादी
मनोवृत्ति, ‘अन्य पंरपरा और संकुचित दृष्टिकोण के विरोधी थे।
प्रश्न 6. भारतीय संस्कृति के बारे में मुकर्जी के विचार बताइए।
उत्तर-
मुकर्जी के अनुसार भारतीय संस्कृति का इतिहास सांस्कृतिक समन्वय का इतिहास है। भारत
की मौलिक संस्कृति उपनिषदों में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है तथा इसीलिए इसमें सभी
क्रियाएँ मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करती हैं। रहस्यवादी परिप्रेक्ष्य
को मुकर्जी ने भारतीय संस्कृति का मौलिक परिप्रेक्ष्य माना है। उनके विचारानुसार बौद्ध
संस्कृति ने भारतीय संस्कृति को लचीला बना दिया। मुस्लिम शासनकाल में भारत की कोई विशेष
प्रगति नहीं हुई। परंतु अंग्रेजी शासनकाल में भारतीय समाज की अर्थव्यवस्था में अनेक
महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
नवीन
अर्थव्यवस्था, पश्चिमी शिक्षा तथा नवीन व्यवसायों ने भारतीय समाज में गतिशीलता की वृद्धि
की तथा परंपरागत मध्यम वर्ग की समाप्ति कर एक ऐसे नवीन व चालाक मध्यम वर्ग का निर्माण
किया जिसने सामाजिक-आर्थिक विकास में कोई विशेष भूमिका अदा नहीं की। इस मध्यम वर्ग
(मुख्यत: जमींदार) ने भारत में अंग्रेजी शासनकाल की जड़े मजबूत करने में सहायता प्रदान
की तथा इसी ने देश का विभाजन करने में भी सहायता दी। यह वर्ग भारत में अंग्रेजों की
तरह शोषण करता रहा है और भारत के पुनर्गठन व पुनर्निर्माण की ओर उसने कोई विशेष ध्यान
नहीं दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेजों ने भारतीय समाज का एकीकरण उस पर
जबरदस्ती लादी गई बनावटी एकरूपता से किया, इसलिए इसके दूरगामी दृष्टि से अच्छे परिणाम
नहीं हुए। उनका विचार था कि क्षेत्रीय संस्कृतियों की विशेषता की एकता से ही भारत ।
का नवनिर्माण हो सकता है।
प्रश्न 7. ए० आर० देसाई के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था। उन्होंने कानून
की शिक्षा प्राप्त कर बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रो० घूयें के
निर्देशन में पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे इसी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र
के प्राध्यापक और बाद में विभागाध्यक्ष बन गए। देसाई कुछ समय तक ‘भारतीय साम्यवादी
दल के सदस्य भी रहे, किन्तु पार्टी के कुछ मुद्दों पर मतभेद हो जाने के कारण 1939 ई०
में उन्होंने दल की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 1953 ई० में वे ‘ट्राटस्कीवादी क्रांतिकारी
समाजवादी दल के सदस्य बन गए, किंतु उनकी समझौतेवादी प्रकृति न होने और खरी बौद्धिक
ईमानदारी ने अंततः 1961 ई० में उन्हें इस संगठन को भी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया।
फिर भी, वे आजीवन अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध रहे। बंबई
विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “स्वंतत्रता के बाद भारतीय विकास की
द्वंद्वात्मकता विषय पर गहन शोध कार्य किया।
देसाई
‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं। वे इस संस्था के
1978-80 के सत्र में अध्यक्ष थे तथा 1951 ई० में यूनेस्को की एक कार्य योजना ‘भारत
में समूह तनाव’ के सह-निदेशक थे। वे इसी संस्था के ‘बंबई के औद्योगिक श्रमिकों की साक्षरता
और उत्पादन संबंधी कार्य-योजना के मानद निदेशक भी रहे हैं। देसाई ‘इण्डियन काउंसिल
ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के राष्ट्रीय शोधार्थी (1981-83) भी रहे हैं। देसाई की प्रथम
प्रमुख कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ (हिन्दी अनुवाद) न केवल अपने
मार्क्सवाद शैक्षिक परिप्रेक्ष्य के करण एक नवीन प्रवृत्ति स्थापित करने वाला गौरव
ग्रंथ (क्लासिक) रहा है, अपितु इसे भारत में समाजशास्त्र का इतिहास के साथ समागम करने
वाली एक उत्कृष्ट प्रथम कृति कहा जा सकता है।
देसाई
ने इस ग्रंथ के बाद कई भिन्न विषयों; जैसे भारतीय राज्य, कृषक समाज व्यवस्था, प्रजातंत्रात्मक
अधिकार, नगरीकरण, कृषक आंदोलन आदि पर लिखा है। उनकी भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र नामक
संपादित पुस्तके अपने विषय की एक प्रामाणिक पाठ्य-पुस्तक मानी जाती रही है जिसके अब
तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने इसमें भारतीय कृषक व्यवस्था के सामंती
चरित्र को उजागर किया है। 1994 ई० में ए०आर० देसाई स्वर्ग सिधार गए।
प्रश्न 8. एम० एन० श्रीनिवास के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं
?
उत्तर-
एम० एन० श्रीनिवास भारत के एक सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री रहे हैं जिनका जन्म 16 नवंबरं,
1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय
से 1936 ई० में सामाजिक दर्शनशास्त्र में बी०ए० (आनर्स) किया। सामाजिक दर्शनशास्त्र
में उस समय समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र भी पढ़ाया जाता था। तत्पश्चात् श्रीनिवास
उच्च शिक्षा के लिए बंबई विश्वविद्यालय चले गए तथा वहीं 1938 ई० में “Marriage and
Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर एम०ए० समाजशास्त्र
की उपाधि प्राप्त की।
बाद
में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में
उन्हें प्रो० जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने
के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई। इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक
मानवशास्त्री ए०आर० रैडक्लिफ-ब्राउन तथा ई०ई० ईवांस-प्रिचार्ड के विचारों से अत्यधिक
प्रभावित हुए।
जिन
आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों
के आधार पर डी० फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of
South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित
हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया
है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. जाति एवं प्रजाति का अर्थ स्पष्ट कीजिए। जाति एवं प्रजाति
के बारे में जी०एस० घूर्ये के विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
जाति का अर्थ
हिंदी
का ‘जाति’ शब्द, संस्कृत भाषा की ‘जन’ धातु से बना है जिसका अर्थ ‘उत्पन्न होना’ व
‘उत्पन्न करना है। इस दृष्टिकोण से जाति से अभिप्राय जन्म से समान गुण वाली वस्तुओं
से है। परंतु समाजशास्त्र में जाति’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थों में किया जाता है।
रिजले (Risley) के अनुसार, यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य
नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक
व्यवसाये को स्वीकार करता है। और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय
समूह के रूप में स्पष्ट होता है।”
प्रजातिको
अर्थ
प्रजाति
एक जैविक अवधारणा है। यह मानवों के उस समूह को प्रकट करती है जिनमें शारीरिक व मानसिक
लक्षण समान होते हैं तथा ये लक्षण उन्हें पैतृकता के आधार पर प्राप्त होते हैं। शरीर
के रंग, खोपड़ी और नासिका की बनावट वे अन्य अंगों की बनावट के आधार पर विभिन्न प्रजाति
समूहों को देखते ही पहचाना जा सकता है। शारीरिक दृष्टि से विभिन्न प्रजातियाँ परस्पर
एक-दूसरे से अलग-अलग रही हैं, परंतु सभी लोग एक-दूसरे का अस्तित्व मानते रहे हैं।
परंतु
अमेरिका आदि की तरह यहाँ कभी भी रंगभेद पर आधारित प्रजातीय संघर्ष देखने को नहीं मिलता
है। इस प्रकार, जैविक अवधारणा के रूप में प्रजाति का प्रयोग सामान्यतः उस समूह के लिए
किया जाता है जिसके अंदर सामान्य गुण होते हैं अथवा जिसे समान शारीरिक लक्षणों से पहचाना
जा सकता है। हॉबेल (Hoebel) के अनुसार, “प्रजाति एक प्राणिशास्त्रीय अवधारणा हैं यह
वह समूह है जो कि शारीरिक विशेषताओं का विशिष्ट योग धारण करता है।”
जाति
एवं प्रजाति के बारे में जी०एस० घूयें के विचार
घूयें
की रुचि मां से Pाति और प्रजाति से संबंधित विषयों में रही है। उनका पी-एचडी। विषय
भी जाति का नृजातीय सिद्धांत’ था जिसके आधार पर 1932 ई० में उनकी प्रथम पुस्तक ‘भारत
में जाति एवं प्रजाति के नाम से प्रकाशित हुई। घूयें ने जाति को एक जटिल घटना बताते
हुए इसकी निश्चित शब्दों में कोई सामान्य परिभाषा तो नहीं दी है परंतु इसकी छः विशेषताओं
का उल्लेख किया है। जो इसका प्रतिनिधित्व करती हैं। ये विशेषताएँ हैं-समाज का खंडात्मक
विभाजन, संस्तरण, सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध, विभिन्न
जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य, निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव तथा
अंत:विवाह अर्थात् जाति से बाहर विवाह पर प्रतिबंध। घूर्ये ने जाति और उपजातियों के
भेद को स्पष्ट करते हुए कहा है। कि जिन्हें हम जातियाँ कहते हैं, वे उपजातियाँ हैं
और इन पर ही ये छ: विशेषताएँ लागू होती हैं। जाति के उद्भव के बारे में उन्होंने प्रजातीय
सिद्धांत का समर्थन किया है।
उनका
यह विचार रिजले से प्रभावित था परंतु उन्होंने रिजले के विचारों और प्रजातियों के वर्गीकरण
को यथावत् स्वीकार नहीं किया। जाति और प्रजाति में आंतरिक संबंध मानते हुए उन्होंने
हिंदू जनसंख्या को उसकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर छह वर्गों में विभाजित किया-
इंडो-आर्यन, पूर्व-द्रविड़, द्रविड़, पश्चिमी, मुंडा एवं मंगोलियन जाति के उद्भव के
बारे में घूयें ने कहा है-‘जाति व्यवस्थी इंडो-आर्यन संस्कृति के ब्राह्मणों को शिशु
है जिसका पालन-पोषण गंगा के मैदान में हुआ है और वहाँ से इसे देश के दूसरे भागों में
लाया गया।” अंतर्विवाह (सजातीय विवाह) की उत्पत्ति, जिससे ‘प्रजातीय शुद्धता के विचार
जुड़े हुए हैं, भी सर्वप्रथम गंगा के मैदान में रहने वाले ब्राह्मणों में हुई थी और
वहीं से अंतर्विवाह की धारणा और जाति व्यवस्था के अन्य तत्त्व ब्राह्मणों के अनुयायियों
ने देश के दूसरे भागों में फैलाए।
प्रश्न 2. घूर्ये द्वारा प्रतिपादित जाति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
घूयें ने जाति की कोई औपचारिक परिभाषा न देकर इसकी छह महत्त्वपूर्ण विशेषताओं वाली
विस्तृत परिभाषा पर बल दिया है। घूयें ने जाति के प्रमुख लक्षणों का वर्णन निम्नलिखित
छह शीर्षकों के अंतर्गत किया है –
1.
भारतीय समाज का खंडात्मक विभाजन – जाति व्यवस्था एक ऐसी
संस्था है जिससे भारतीय समाज खंडों में विभाजित हो गया है और यह विभाजन सूक्ष्म रूप
में हुआ है। प्रत्येक खंड के सदस्यों की स्थिति तथा भूमिका सुस्पष्ट व सुनिश्चित रूप
से परिभाषित हुई है। घूर्ये ने इसे सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता माना है। उनके शब्दों
में, इससे तात्पर्य यह है कि जाति व्यवस्था द्वारा बँधे समाज में हमारी भावना भी सीमित
होती है, सामुदायिक भावना संपूर्ण मनुष्य समाज के प्रति न होकर केवल जाति के सदस्यों
तक सीमित होती है तथा जातिगत आधार पर सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार,
प्रत्येक जाति समाज को एक बंद खंड है क्योंकि जाति का निर्धारण जन्म से होता है। किसी
भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण जन्म से, जन्म के समय होता है। इससे न तो बचा जा सकता
है और न ही इसे बदला जा सकती है।
2.
संस्तरण या सौपानिक विभाजन – जाति व्यवस्था में ऊँच-नीच की परंपरा
स्थापित होती है। इसी कारण प्रत्येक जाति दूसरी जाति की तुलना में असमान होती है अर्थात्
प्रत्येक जाति दूसरी . से उच्च अथवा निम्न होती है। सैद्धांतिक रूप से कोई भी दो जातियाँ
समान नहीं होतीं। हम की । भावना सीमित होने से सदस्य केवल अपनी जाति के लोगों को ही
महत्त्व देते हैं और उनमें श्रेष्ठता की भावना भी जन्म लेती है। परंतु कुछ ऐसी भी जातियाँ
हैं जिनमें सामाजिक दूरी इतनी कम है कि उनमें ऊँच-नीच के आधार पर जो सामाजिक संरचना
स्पष्ट हुई है वही संस्तरण परंपरा है। जातीय संस्तरण रक्त की पवित्रता, पूर्वजों के
व्यवसाय के प्रति आस्था व अन्यों के साथ भोजन-पानी के प्रतिबंध आदि विचारों पर आधारित
होती है।
3.
सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध
– भारतीय जाति व्यवस्था प्रत्येक जाति के सदस्यों के लिए अपने समूह के बाहर भोज़न
और सामाजिक सहवास पर नियंत्रण रखती है। इन नियमों का बड़ी. कठोरता से पालन किया जाता
है। प्रत्येक जाति में ऐसे नियम बड़े सूक्ष्म रूप से बनाए गए हैं जो यह निर्धारण करते
हैं कि किसी जाति के सदस्य को (मुख्यतः जो ऊँची जातियों के हैं) कहाँ कच्चा भोजन करना
है, कहाँ पक्का तथा कहाँ केवल जल ग्रहण करना है और जल पीना भी निषिद्ध है ये नियम पवित्रता
तथा अपवित्रता के विचार से संचालित होते हैं।
4.
विभिन्न जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य
– जिस प्रकार जाति व्यवस्था में संस्तरण है ठीक उसी प्रकार इसमें विभिन्न जातियों
के लिए भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित होते हैं। उनके अधिकार तथा कर्तव्य
केवल धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित न रहकर लौकिक विश्व तक फैले हुए होते हैं। विभिन्न
जातियों के मध्य होने वाली अंत:क्रिया इन्हीं नियमों से संचालित होती है।
5.
निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव – मुख्यत: सभी जातियों
के कुछ निश्चित पेशे होते हैं। और जाति के सदस्य अपने उन्हीं पैतृक पेशों को स्वीकार
करते हैं। उन्हें छोड़ना उचित नहीं समझा जाता। कोई भी पेशा, चाहे वह व्यक्ति की आवश्यकता
की पूर्ति करे या न करे, उसे । मानसिक संतोष हो या न हो; व्यक्ति को परंपरागत पेशों
को ही अपनाना पड़ता है। इस प्रकार, जाति व्यवसाय के चुनाव को भी सीमित कर देती है जो
जाति की भाँति जन्म पर आधारित तथा वंशानुगत होता है। समाज के स्तर पर जातिगत श्रम-विभाजन
में कठोरता देखी जाती है तथा विशिष्ट व्यवसाय कुछ विशिष्ट जातियों को ही दिए जाते हैं।
6.
अंतःविवाह – सभी जातियाँ अंत:विवाही होती हैं अर्थात् जाति के
सदस्यों को अपनी ही जाति में विवाह करना पड़ता है। घूयें का भी यहीं मत है कि जाति
व्यवस्था का अंत:विवाही सिद्धांत इतना कठोर है कि समाजशास्त्री इसे जाति व्यवस्था का
प्रमुख तत्त्व मानते हैं। व्यावहारिक रूप : में यह अंत:विवाह भी भौगोलिक सीमा के अंतर्गत
बंधा हुआ है। एक जाति की कई उपजातियाँ होती हैं और प्रायः एक ही प्रांत में रहने वाली
उपजातियों में विवाह होते हैं। अंतः विवाह के नियम जाति व्यवस्था को आगे बढ़ाने में
सहायता करते हैं।
प्रश्न 3. मुकर्जी के परंपरा एवं परिवर्तन के बारे में विचारों की समीक्षा
कीजिए।
उत्तर-
डी०पी० मुकर्जी मार्क्सवादी थे, किंतु वे स्वयं को मार्क्सवादी के स्थान पर ‘मार्क्सशास्त्री
(Marxologist) कहलाना अधिक पसंद करते थे। उन्होंने भारतीय इतिहास का द्वंद्वात्मक प्रक्रिया
द्वारा विश्लेषण किया है। उनके अनुसार परंपरा तथा आधुनिकता, उपनिवेशवाद तथा राष्ट्रवाद,
व्यक्तिवाद और समूहवाद में द्वंद्वात्मक संबंध हैं। ये एक-दूसरे को प्रभावित करते तथा
होते हैं। मुकर्जी का द्वंद्ववाद का आधार मानवतावादे रहा है जो संकुचित नृजातीय एवं
राष्ट्रीय विचारों की सीमाओं से परे था। उन्होंने मार्क्स के सिद्धांतों को भारतीय
परंपरा के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया। मुकर्जी ने ‘भारतीय समाज के अध्ययन के लिए परंपराओं
के अध्ययन को आवश्यक बताया।
यही
कारण है कि परंपरा का विवेचन मुकर्जी के अध्ययन का मुख्य केंद्र-बिंदु रहा। उन्होंने
इसके प्रकारों, स्तरों इनमें आपसी द्वंद्व एवं परिवर्तन का गूढ़ विवेचन किया। यही नहीं,
उन्होंने भारतीय परंपरा और परिवर्तन (आधुनिकता) के मध्य संघर्ष की द्वंद्वात्मक व्याख्या
कर भारतीय समाजशास्त्र में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। मुकर्जी ने भारतीय परंपरा
में अनेक प्रकारों के विरोधों का उल्लेख किया और इस आधार पर परंपराओं के द्वंद्वात्मक
अध्ययन का सुझाव दिया। मुकर्जी भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के द्वंद्व
की चर्चा करते हैं। मुकर्जी के विचारानुसार सामाजिक मूल्यों एवं वर्ग हितों में पहले
पारस्परिक संघर्ष एवं अंतरखेल या क्रिया (Interplay) होता है, फिर उनमें समन्वय पैदा
होता है। यह प्रक्रिया चलती रहती है और इससे समाज में परिवर्तन होता रहता है।
मुकर्जी
के अनुसार, भारत में यह प्रक्रिया मुसलमानों के आगमन एवं उनके प्रभाव से ही प्रारंभ
हुई, जो आज तक चली आ रही है। ब्रिटिश शासन के प्रभाव से भारत में एक नवीन मध्यम वर्ग
का उदय हुआ जिसकी जड़े न तो परंपरा में थीं और न आधुनिकता में ही, वरन् यह दोनों का
समन्वय था। भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के फलस्वरूप अनेक सांस्कृतिक
विरोधाभास भी उत्पन्न हुए। सांस्कृतिक विरोधाभासों एवं नवीन वर्गों के उदय के कारण
भारत में संघर्ष एवं समन्वय की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई। मुकर्जी के अनुसार, इस संघर्ष
एवं समन्वय को भारत में विद्यमान वर्ग संरचना के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए और
इसे आगे बढ़ाने के लिए योजना का सहारा लिया जाना चाहिए। मुकर्जी ने परंपराओं के अनेक
प्रकार के विरोधों का उल्लेख किया है। उनका मत है कि कस्बों एवं नगरों में स्वेच्छावाद
पनप रहा है, व्यक्तिवादी प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही है और समूहवादी परंपरा का विरोध
हो रहा है।
उनका
कहना है कि परंपराओं में उत्पन्न हो रहे इस प्रकार के विरोधाभासों का अध्ययन किया जाना
चाहिए। उन्होंने आंतरिक एवं बाह्य भारतीय पंरपरा का इस्लामिक परंपरा से द्वंद्व सहित
भारतीय परंपरा में निहित उच्च परपंरा और स्थानीय परंपरा के द्वंद्व की उदाहरण सहित
विवेचना की है। सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने अत्रेय ब्राह्मण ग्रंथ के
‘चरेवेति-चरेवेति’ अर्थात् ‘आगे बढ़ो, आगे बढ़ो’ की धारणा को स्वीकार किया है। मुकर्जी
की दृष्टि में धर्म से संबंधित परंपराएँ, जो आज भी अपनी निरंतरता बनाए हुए हैं और नगरीय
मध्यम वर्ग की नवीन परंपराओं के बीच द्वंद्व या संघर्ष पाया जाता है। समाजशास्त्री
इन पर इस दृष्टि से विचार करता है कि परंपराओं का विकास संघर्ष या द्वंद्व के माध्यम
से होता है। स्वेच्छात्मक क्रिया के अभाव के कारण भारतीय समाज को एक लाभ अवश्य मिला
है। कुछ मध्यम वर्गों को छोड़कर, भारतीय जीवन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता लोगों में
नैराशय या कुंठा का अभाव है।
यदि
हम भारतीय किसान तथा परिवार के मुखिया को देखें तो पाएँगे कि उनमें ‘आकांक्षाओं का
स्तर’नीचा पाया जाता है। यह आकांक्षाओं का स्तर परंपराओं द्वारा निर्देशित होता है
जो अधिकतर भारतीयों के लिए संस्कृति और मूल्यों का स्तर निर्धारित करते हैं। मुकर्जी
ने परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व का भी उल्लेख किया है। इन्होंने इन्हें क्रमश: वाद
और प्रतिवाद के रूप में दर्शाया है। दोनों के संघर्ष से ही आधुनिकीकरण पनपता है जो
दोनों का समन्वय भी है। उनका मत है कि आधुनिकीकरण को समझने के लिए परंपरा को समझना
आवश्यक है क्योंकि वर्तमान का अध्ययन भूतकाल के संदर्भ में ही किया जा सकता है। मुकर्जी
के अनुसार हमारी परंपराओं में परिवर्तन के तीन तत्त्वों-श्रुति, स्मृति तथा अनुभव को
मान्यता प्रदान की गई है।
अनुभव
को विशेषतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है। कई उपनिषद् तो व्यक्तिगत अनुभवों
पर ही आधारित हैं। व्यक्तिगत अनुभव शीघ्र ही सामूहिक अनुभव के रूप में पुष्पित हुआ।
सामूहिक अनुभव को ही परिवर्तन का प्रमुख सिद्धांत माना गया है। यदि हम विभिन्न संप्रदायों
या पंथों की उत्पत्ति पर विचार करें तो पाएँगे कि उनके संत-संस्थापकों ने उन्हें अपने
व्यक्तिगत अनुभव से प्रारंभ किया, उनका अनुष्ठानों, मंदिरों तथा पुजारियों से कोई संबंध
नहीं था। उन्होंने जो कुछ कहा, स्थानीय बोली या भाषा में कहा, न कि संस्कृत में। उन्होंने
अधिकतर जातियों एवं वर्गों को ही अपने पंथ से संबंधित प्रमुख बातें बताईं। उन्होंने
स्त्रियों को समान स्थिति प्रदान की तथा प्रेम, स्नेह एवं सहजता या स्वाभाविकता का
उपदेश दिया। इन संतों का लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और उन्होंने परंपराओं पर भी काफी
प्रभाव छोड़ा।
उच्च
परंपराएँ प्रमुखतः बौद्धिक थीं तथा स्मृति और श्रुति में केंद्रित थीं जहाँ परिवर्तन
का सिद्धांत द्वंद्वात्मक अर्थनिरूपण या व्याख्या द्वारा उपलब्ध था। यही प्रक्रिया
हमें मुसलमानों में भी देखने को मिलती है। उनमें सूफियों के प्रेम और अनुभव पर विशेष
जोर दिया गया। परंपराओं के विकास में जहाँ द्वंद्वात्मक योग्यता का काफी प्रभाव रहा
है, वहाँ अनुभव का भी प्रभाव रहा है। यहाँ यह मानना या कहना अनुचित होगा कि बुद्धि-विचार
ऐतिहासिक दृष्टि से अनुभव, प्रेम, स्नेह आदि की तुलना में परंपराओं में परिवर्तन के
अभिकरण के रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मुकर्जी ने बताया है कि जब कभी उच्च और निम्न
बौद्धिक परंपराओं में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होगी, तब उसका अनुमान लगा लिया जाता
है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें वैचारिक दृष्टि से एक-दूसरे के निकट ला दिया जाता है।
भारतीय
समाज जाति प्रधान समाज रहा है। यह एक ऐसा समाज है जिसने वर्गों के निर्माण को रोका
है तथा सब प्रकार की वर्ग-चेतना को दबाया है। यहाँ तो चुनावों में भी वर्ग चेतना; जातीय
चेतना यो भावना के अंतर्गत समाहित होती है। भारतीय समाज भी पश्चिमी समाज के समान बदल
रही है, परंतु यहाँ पश्चिमी समाज के सम्मुने उतना विघटन नहीं हुआ है। भारतीय सामाजिक
व्यवस्था के अध्ययन के लिए भारतीय समाजशास्त्री को समाजशास्त्र में एक भिन्न परिप्रेक्ष्य
को अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि इसकी विशेष परंपराएँ हैं; इसके विशेष प्रतीक और संस्कृति
तथा सामाजिक क्रियाओं के विशेष प्रतिमान हैं। तत्पश्चात् भारतीय परंपराओं, संस्कृति
तथा प्रतीकों पर आर्थिक और प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है। इन सबका अध्ययन
भारतीय समाजशास्त्रियों को करना है।
प्रश्न 4. ए० आर० देसाई के राज्य संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
समाजशास्त्रीय दृष्टि से राज्य एक ऐसी संस्था है जो कि शक्ति के वितरण तथा इसके प्रयोग
के एकाधिकार से संबंधित है। राज्य को समाज की वह संस्था, पहलू या माध्यम कहा जा सकता
है जो कि बल प्रयोग की ताकत एवं अधिकार रखती है, अर्थात् जो बलपूर्वक नियंत्रण लागू
कर सकती है। यह शक्ति समाज के सदस्यों को नियंत्रित करने के काम भी आ सकती है और अन्य
समाजों के विरुद्ध भी। राज्य का काम चलाने के लिए शासनतंत्र या सरकार होती है, जो राज्य
का संस्थात्मक पहलू है। राज्य की अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य के सभी नियमों का
पालन करना उस राज्य के सदस्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति इसका पालन
नहीं करता है, तब राज्य अपनी प्रभुसत्ता के आधार पर दंड देने का अधिकार रखता है। सरकार
की संस्था बिना राज्य की धारणा के काई वास्तविकता नहीं।
ए०आर०
देसाई की रुचि आधुनिक पूँजीवादी राज्य (जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहने
का दावा करता है) के विश्लेषण में थी तथा इसे विश्लेषण में उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण
को अपनाया। उन्होंने अपने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य
की विस्तृत विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता
तथा लागू करंता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों
की सुरक्षा का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार
उपलब्ध कराने हेतु हर संभव कदम उठाता है।
देसाई
ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है –
1.
सकारात्मक राज्य – कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता
है। ऐसा राज्य उदारवादी राजनीति के शास्त्रीय सिद्धांत की ‘लेसेज फेयर’ नीति से भिन्न
होता है अर्थात् केवल उदारवादी होने मात्र से किसी राज्य को कल्याणकारी राज्य नहीं
कहा जा सकता है। कल्याणकारी राज्य कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के न्यूनतम कार्य
ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक
नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।
2.
लोकतांत्रिक राज्य – कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य
होता है। लोकतंत्र कल्याणकारी राज्य के उदय की एक अनिवार्य शर्त है। औपचारिक लोकतांत्रिक
संस्थाओं; विशेष रूप से बहुदलीय चुनाव कल्याणकारी राज्य की परिभाषिक विशेषता समझी जाती
है। यही कारण है। कि उदारवादी चिंतकों ने समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों को इस परिभाषा
से बाहर रखा है।
3.
मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला राज्य – कल्याणकारी राज्य मिश्रित
अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी
कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियाँ दोनों एक साथ कार्य करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य
न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों
में जनता को निवेश करने से रोकता है। कमोबेश कल्याणकारी राज्य जरूरत की वस्तुओं और
सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं पर निजी उद्योगों
को वर्चस्व होता है।
ए०आर०
देसाई ने कुछ ऐसे तरीके बताए हैं जिनके आधार पर कल्याणकारी राज्य द्वारा किए गए कार्यों
का परीक्षण किया जा सकता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं –
1.
क्या कल्याणकारी राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा
का ध्यान रखता है?
2.
क्या कल्याणकारी राज्य आय संबंधी असमानताओं को दूर करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम
उठाता है।
3.
क्या कल्याणकारी राज्य अर्थव्यवस्था को इस प्रकार से परिवर्तित करता है, जहाँ पूँजीपतियों
की अधिक-से-अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति पर, समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए
रोक लगाई जा सकती हो?
4.
क्या कल्याणकारी राज्य स्थायी विकास के लिए आर्थिक मंदी तथा तेजी से मुक्त व्यवस्था
का ध्यान रखता है?
5.
क्या कल्याणकारी राज्य सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराता है?
उपर्युक्त
आधारों को ध्यान में रखते हुए देसाई ने उन देशों के प्रदर्शन का परीक्षण किया है जिनको
अक्सर कल्याणकारी राज्य कहा जाता है; जैसे-ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य।
अधिकांश आधुनिक पूँजीवादी राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहने हेतु बढ़ा-चढ़ाकर
दावे पेश करते हैं, परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा
देने में असफल रहे हैं। वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित
कल्याणकारी राज्य बाजार के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी विफल रहे
हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति तथा अत्यधिक बेरोजगारी इनकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने
इन तर्कों के आधार पर देसाई ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव
कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है।
कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी
होने का प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न 5. एम०एन० श्रीनिवास के गाँव संबंधी विचारों को संक्षेप में
बताइए।
उत्तर-
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत
रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा. इस पर
परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी
स्वीकार किया। 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in
Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर उन्होंने एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त
की। बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई०
में उन्हें प्रो०जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस
लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई।
इसके
पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने
के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० डिक्लिफ-ब्राउन
(A,R.Radcliffe-Brown) तथा ई० ई० ईवांस-प्रिचार्ड (E.E. Evans-Pritchard) के विचारों
से अत्यधिक प्रभावित हुए। जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के
लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी०फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion
and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952
ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम सँस्कृतिकरण’
की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।
एम०एन०
श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव को अपने अध्ययन को आधार बनाया तथा यह मत प्रकट
किया कि गाँव की एक आवश्यक सामाजिक पहचान होती है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान
की पुष्टि करते हैं। गाँव पर श्रीनिवास द्वारा लिखे गए लेख निम्नलिखित दो प्रकार के
हैं –
1.
गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय ब्योरा और इन ब्योरों पर परिचर्चा, तथा
2.
भारतीय गाँव जिस प्रकार सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं उस
पर ऐतिहासिक एवं अवधारणात्मक परिचर्चाएँ।
गाँव
की एक संकल्पना के रूप में उसकी उपयोगिता के प्रश्न पर श्रीनिवास का अन्य विद्वानों
से विवाद भी हुआ उदाहरणार्थ- लुईसयूमो का मत था कि आति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव
की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर
निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग
एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक
संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं और जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसलिए
ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो
सकता है।
ड्यूमो
जैसे विद्वानों के तर्कों के विपरीत श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव की अपनी एकीकृत
पहचान होती है और ग्रामीण एकता ग्रामीण सामाजिक जीवन में काफी महत्त्वपूर्ण है। वह
भारतीय गाँव को स्थिर, आत्म-निर्भर एवं छोटे गणतंत्र के रूप में चित्रित करने के विरुद्ध
थे। ऐतिहासिक तथा सामाजिक साक्ष्यों द्वारा श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि वास्तव में
गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। यहाँ तक कि गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं
थे और विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर
जुड़े हुए थे।
श्रीनिवास
ने एस०सी० दुबे तथा डी०एन० मजूमदार के साथ मिलकर भारतीय समाजशास्त्र में उस समय के
ग्रामीण अध्ययन को प्रभावशाली बनाया।.. रामपुरा गाँव के अध्ययन में श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण
की प्रक्रिया का भी पता लगाया। संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति
किसी उच्च जाति; सामान्यतया प्रभु जाति को अपना आदर्श मानकर उसके रीति-रिवाजों को अपनाने
लगती है तथा कालांतर में परंपरा से जो स्थान उसे मिला हुआ है उससे ऊँचे स्थान को प्राप्त
करने का प्रयास करती है। निम्न जातियाँ संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में मांस भक्षण एवं
मदिरापान जैसी खाने की परंपरा को बदलकर शाकाहारी भोजन अपनाने लगती हैं। श्रीनिवास को
रामपुरा का अध्ययन संस्कृतिकरण की अवधारणा के कारण ही अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर
पाया है।
गाँव के अध्ययन में समाजशास्त्र को नृजातीय शोध कार्य की पद्धति के महत्त्व से परिचय कराने को एक मौका दिया। इस पद्धति पर आधारित अध्ययनों द्वारा भारतीय गाँव में हो रहे परिवर्तनों की जानकारी से विकास की योजनाएँ बनाने में सहायता मिली। ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक नवीन भूमिका प्रदान की। मात्र आदिम मानव के अध्ययन तक सीमित रहकर, इसे आधुनिकता की ओर आगे बढ़ते समाज के लिए भी उपयोगी बनाया जा सकता है।