12th Hindi Core 12. बाजार दर्शन JCERT/JAC Reference Book

12th Hindi Core 12. बाजार दर्शन JCERT/JAC Reference Book

 

12th Hindi Core 12. बाजार दर्शन JCERT/JAC Reference Book

12. बाजार दर्शन

लेखक परिचय

नाम - जैनेंद्र कुमार

जन्म वर्ष - सन् 1905

राज्य - उत्तर प्रदेश

जिला - अलीगढ़

मृत्यु सन -1990 में

काल - आधुनिक काल

पहचान - मनोवैज्ञानिक कथाकार

साहित्यिक विशेषताएं

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में जैनेंद्र जी प्रतिष्ठित हुए। इन्हें प्रेमचंद का पूरक भी माना जाता है हिंदी साहित्य जगत में यह सशक्त मनोवैज्ञानिक कथाकार और उपन्यास कारक माने गए हैं।

गांधीवाद से अत्यंत प्रभावित रहे हैं इनकी पहचान एक मौलिक कथाकार के रूप में की जाती है।

इनकी रचनाओं में मनोविज्ञान और अध्यात्म के शब्दों का प्रयोग मिलते हैं। पाठकों को आमंत्रित करके उनके साथ बातचीत करके रचनाओं को आगे बढ़ाने की परिपाटी इनकी रचनाओं में देखने को मिलती है।

भाषा शैली- इनकी रचनाओं में अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, खड़ी बोली अनुकूल शब्दावली का प्रयोग मिलता है। इनका किसी भाषा के प्रति विशेष लगाव या आग्रह देखने को नहीं मिलती। उदाहरण के लिए बाजार दर्शन में इन्होंने पर्चेजिंग पावर, गिल्टी, मनी बैग आदि जैसे अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया है, दूसरी तरफ इच्छा निरोध स्तपः अपदार्थ, संस्कृत के शब्द प्रयोग में लाए है उर्दू शब्दों का भी इन्होंने प्रयोग किया है।

प्रमुख रचनाएं - उपन्यास परख, सुनीता, त्यागपत्र

कहानी- खेल, पाजेब, नीलम देश की राजकन्या अपना अपना भाग्य, परख

ट्रिक - जैनेंद्र जी की प्रमुख रचनाओं को याद करने का ट्रिक-

ट्रिक- सुनीता ने खेल में पाजेब (पायल) को परख (जांच) कर नीलम देश की राजकन्या को उपहार स्वरूप भेंट दिया।

पुरस्कार एवं सम्मान-साहित्य अकादमी पुरस्कार (1966) में मुक्तिबोध उपन्यास के लिए, भारत भारती सम्मान तथा भारत सरकार द्वारा तीसरी सबसे बड़ी सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किए गए।

पाठ परिचय

प्रस्तुत निबंध जैनेंद्र जी द्वारा रचित एक ज्वलंत समस्या पर केंद्रित रचना है। उपभोक्तावाद या बाजारवाद को समझने के लिए आज भी इनकी रचना उपयोगी है। आइए इस पाठ से संबंधित कुछ प्रमुख जानकारी समझने की कोशिश करते हैं-

जैनेंद्र जी ने अपनी रचनाओं में जीवन के विविध समस्याओं को उभारा है इस निबंध में भी हम कुछ ऐसी समस्या से अवगत होंगे लेखक अपने कुछ मित्रों और परिचित लोगों के माध्यम से बाजारवाद की समस्या को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं जो निम्नलिखित है-

जहां एक तरफ पूर्वज धन संचय को आवश्यक मानते थे, वही आज पर्चेजिंग पावर का बोलवाला समाज में देखने को मिलता है जैनेंद्र जी ने अपने एक मित्र के द्वारा इस वाक्य के द्वारा दिखाने की कोशिश की है 'यह देखिए सब उड़ गया अब जो रेल टिकट के लिए भी बचा हो।'

बाजार की सार्थकता हमारी आवश्यकताओं से बाजार महत्व प्राप्त करती है। आज लोग दिखावे के चक्कर में पड़कर गैर आवश्यक वस्तुओं को खरीद लाते हैं और जबरदस्ती उसमें फिट होने की कोशिश करते हैं। लेखक ऐसे मुसीबत को रेशम की डोर से पड़ने वाली जकड़ माना है। शुरुआत में यह जकड़ अच्छी लगती है लेकिन बाद में पछताना पड़ता है।

भगत जी के माध्यम से बाजार की सार्थकता दिखाने की कोशिश लेखक ने की है लेखक कहते हैं भगत जी एक चूर्ण बेचने वाले व्यापारी हैं वे जब भी बाजार जाते हैं केवल अपनी आवश्यकता की चीजों को खरीद कर लाते हैं अनावश्यक चीजों में उनकी कोई भी रुचि नहीं रहती है। दूसरी तरफ चूरन से वे इतना ही धन कमाते हैं जितने में उनका गुजर बसर हो जाए, बचे हुए चूर्ण को वे बच्चों में बांट देते हैं। इस तरह लेखक भगत जी के माध्यम से समाज में होने वाली दूरियों को मिटाने का तरीका मानते हैं दिखावे की प्रवृत्ति दिखावे की प्रवृत्ति ने लोगों में और संतोष ईर्ष्या का जहर घोल दिया है इसमें बाजारवाद का दोष साफ नजर आता है। लेखक कहते हैं लोगों को बाजार जाते समय अपने मन को खाली करके जाना चाहिए और केवल आवश्यक वस्तु को खरीदना चाहिए तभी समाज में फैली दूरी कम हो सकती है।

बाजार दर्शन निबंध का उद्देश्य इस निबंध के माध्यम से लेखक यही संदेश देना चाहते हैं कि हमें अपनी आवश्यकताओं को समझने की जरूरत है दिखावे के चक्कर में पड़कर हम समाज में विकृत मानसिकता को पैदा नहीं कर सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि बाजार की आवश्यकता आज लोगों को है। प्राचीन काल से ही यह प्रक्रिया चली आ रही है लोग पहले हाट-हटिया से आवश्यक वस्तुओं को खरीद लाते थे और वह भी साप्ताहिक, लेकिन आज इतने सारे दुकान, मॉल आदि जगह-जगह पर देखने को मिलती है हम इन सबके चकाचौंध में फंसकर असंतोष, ईर्ष्या को अपनाते जा रहे हैं।

बाजार दर्शन शीर्षक की सार्थकता पर्चेजिंग पावर + चाह = बाजर अर्थात पैसे की गर्मी या एनर्जी और सामान खरीदने की चाहत ने लोगो का रुझान बाजार की तरफ बढ़ा दिया। बाजार का अर्थ एक साधन है जहां खरीददार एवं विक्रेता एक-दूसरे की आवश्यकता के हिसाब से वस्तुओं और सेवाओं का आदान प्रदान करते हैं किन्तु आज हम बाजार के इशारों पर नाच रहे हैं और बाजार को अपने जीवन में महिमामंडित कर रहे हैं।

बाजार दर्शन पाठ के सारांश-

1) प्रस्तुत निबंध जैनेंद्र जी द्वारा रचित एक ज्वलंत समस्या पर केंद्रित रचना है।

2) लेखक अपने मित्रों और परिचित लोगों के माध्यम से बाजारवाद की समस्या को दर्शाने की कोशिश की हैं।

3) लेखक ने अनावश्यक वस्तुओं की खरीदारी को रेशम की डोर से पड़ने वाली जकड़ माना है।

4) लेखक के अनुसार शुरुआत में यह जकड़ अच्छी लगती है लेकिन बाद में पछताना पड़ता है।

5) भगत जी के माध्यम से बाजार की सार्थकता दिखाने की कोशिश लेखक ने की है।

6) लेखक की नजरों में बाजार की सार्थकता इस प्रकार से है-

क) बाजार लोगों को जरूरत का सामान उपलब्ध कराएं

ख) लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार बाजार से सामान खरीदें

7) लेखक ने माना है कि जिनके पास पर्चेंजिंग पावर है वह बाजार की गिरफ्त में आ जाता है।

8) लेखक के अनुसार बाजार से बचने के निम्न तरीके हो सकते हैं-

क) आत्मिक संतोष एवं आत्मा नियंत्रण

ख) पैसे के महत्व को समझना

ग) अपनी आवश्यकता की पहचान

9) लेखक अपने पड़ोसी चूरन बेचने वाले भगत जी का उदाहरण बाजार की सार्थकता देने के लिए करते हैं।

10) लेखक के अनुसार भगत बाजार से अपना सामान लेकर सीधे घर आ जाते हैं।

11) लेखक के अनुसार जो लोग अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखते वे समाज में सद्भावना का नाश करते हैं।

शब्दार्थ- मामूली-सामान्य साधारण । प्रयोजन-मतलब । महिमा-महत्ता, गौरव। प्रमाणित-सिद्ध । माया-आकर्षण ओट-बचाव मनी बैग पैसे की गर्मी। पर्चेंजिग पावर क्रय शक्ति। फिजूल व्यर्थ । दरकार-आवश्यक । जरूरत-आवश्यकता। करतब तमाशा, कला। बेहया-बिना शर्म के। चाह-इच्छा अभिलाषा। काफी-पर्याप्त। परिमित-सीमित, निर्धारित । अतुलित-अपार (बहुत अधिक)। आग्रह-हठ पूर्वक प्रार्थना, खुशामद। कामना इच्छा, अभिलाषा। विकल-व्याकुल, परेशान। तृष्णा लालसा (इच्छा), प्यास । ईष्या-जलन, बेकार व्यर्थ। त्रास-दुख अनेकानेक-बहुत अधिक बहुतायत अधिकता अधिक संख्या में। सेंक-तपन। खुराक-भोजन। लक्ष्य-उद्देश्य। कृतार्थ-अनुग्रहित, उपकृत। शून्य-रिक्त, खाली। सनतन-शाश्वत, सदा बने रहने वाला। निरोध-रोकना। राह-मार्ग । कोशिश-प्रयत्न। अकारथ-व्यर्थ, बेकार। व्यापक-विस्तृत, फैला हुआ। कृश-कमजोर। संकीर्ण-संकरा। विराट-विशाल। क्षुद्र-नीच तुच्छ। बलात्-बलपूर्वक। आप्रयोजनिय-बिना मतलब का। अखिल-संपूर्ण। छ आना मुद्रा का पुराना रूप। सरनाम-नामी, प्रसिद्ध, मशहूर। खुशहाल-संपन्न । पेशगी आर्डर-समान के लिए अग्रिम पैसा देना। मान्य-माना हुआ। नाचीज-तुच्छ। अपदार्थ-महत्वहीन, नगण्य, तुच्छ। अकिंचित्कर-बेकार। अडीग निश्चल। निर्मम-ममता रहित। कुंठित जड़। दारूण-भयंकर। लीक-रेखा। वंचित रहित। कृतध्न-एहसान (उपकार) मानने वाला। लोक वैभव-सांसारिक धन दौलत। अपर दूसरी। स्प्रिचुअल-धार्मिक। प्रतिपादन वर्णन। सरोकार-मतलव स्पृहा-इच्छ। संचय इकट्ठा। अबलता कमजोर। कोसना-गाली देना। अभिवादन-स्वागत करना। तनिक-थोड़ा सा। पासोपेश-असमंजस। अप्रीति वैर, दुश्मनी। सहज स्वाभाविक। ज्ञात-मालूम। विनाशक-विनाश कारी, बर्बाद। सद्भाव-प्रेम की भावना। ग्राहक खरीदने वाला । बेचक-व्यापारी, बेचने वाला। ठगना-लूटना। पोषण-पालन।

प्रश्न अभ्यास

1. बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या क्या असर पड़ता है?

उत्तर- मनी बैग अर्थात पैसे की गर्मी या एनर्जी ने और दिखावे की चाहत ने बाजार को हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। बिना सोचे समझे खरीदे गए वस्तु पर हम कुछ देर के लिए इतरा तो लेते हैं पर बाद में समझ में आती है कि यह हमारे धन की बर्बादी थी और फिर पछताने के सिवा हमारे पास कुछ नहीं रहता

2. बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन सा सशक्त पहलू उभर कर आता है क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

उत्तर- बाजार में भगत जी का संयमी आचरण उभर कर सामने आता है। उनके लिए बाजार आवश्यकता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जहां पहले लोग मितव्यई और धन संचय के प्रति सचेत रहते थे वही सामान बखरी देते थे जिनकी आवश्यकता होती थी, वही आज लोग दिखावे के चक्कर में आकर आपस में ईर्ष्या और द्वेष की भावना रखने लगे हैं जो हमारे समाज के लिए हितकर नहीं है

3. बाजारूपन से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किस में है?

उत्तर- बाजारूपन का अर्थ बाजार के आकर्षण से है। बाजार का स्वभाव भी है हमसे फायदा उठाना, अपने आकर्षण के जाल में फंसा ना। अपनी आवश्यकता के हिसाब से खरीदारी करने वाला व्यक्ति ही बाजार की सार्थकता दे सकता है साथ ही साथ बाजार की भी जिम्मेदारी है कि वह हमें वही सामान उपलब्ध कराएं जिसकी आवश्यकता ग्राहकों को है।

4. बाजार किसी का लिंग जाति धर्म या क्षेत्र नहीं देखता वह देखता है कि सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में बा एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है आप इससे कहां तक सहमत हैं?

उत्तर- अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोग बाजार जाते हैं। बाजार वह स्थान है या पूर्ति करने कासाधन है जहां खरीदार एवं विक्रेता एक दूसरे से वस्तुओं और सेवाओं का आदान प्रदान करते हैं। अर्थात बाजार जरूरतमंद की आवश्यकता की पूर्ति करने का साधन है।

5. क्या अगर बाजार लिंग जाति धर्म क्षेत्र को देखता है तो बाजार की सार्थकता समाप्त हो जाएगी?

उत्तर- सभी धर्म जाति के लोग अगर एक बाजार से बिना भेदभाव किए खरीदारी करेंगे तो स्वता ही एकता की भावना में वृद्धि होगी।

बाजार दर्शनः बहुविकल्पी प्रश्न उत्तर

1) जैनेंद्र जी का जन्म वर्ष क्या है

क) 1905

ख) 1980

ग) 1970

घ) 1960

उत्तर -क) 1905

ट्रिक- जैनेंद्र जी के जन्म वर्ष को याद करने का ट्रिक (1905 ईसवी में बंगाल विभाजन हुआ था)

2) बाजार दर्शन पाठ के लेखक कौन है?

क) जैनेंद्र

ख) फणीश्वर नाथ रेनू

ग) धर्मवीर भारती

घ) भीष्म साहनी

उत्तर -क) जैनेंद्र

3) 'बाजार दर्शन' पाठ किस विधा में लिखा गया है?

क) कहानी

ख) कविता

ग) नाटक

घ) निबंध

उत्तर -घ) निबंध

4) 'बाजार दर्शन 'पाठ का मुख्य प्रतिपाद्य (उद्देश्य) क्या है?

क) बाजार की उपयोगिता को दर्शना

ख) आडंबर को दर्शाना

ग) दिखावा को बढ़ावा देना

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -क) बाजार की उपयोगिता को दर्शना

5) मनी बैग का अर्थ क्या है?

क) पर्स

ख) पैसे की गर्मी या एनर्जी।

ग) बैग

घ) मनी

उत्तर -ख) पैसे की गर्मी या एनर्जी

6) लेखक के मित्र किस के साथ बाजार गया था?

क) पत्नी के साथ

ख) लेखक के साथ

ग) मित्र के साथ

घ) भाई के साथ

उत्तर -क) पत्नी के साथ

7) लेखक के मित्र अनावश्यक वस्तुओं की खरीदारी का दोष किस पर डाल देते हैं?

क) अपनी पत्नी पर

ख) लेखक की पत्नी पर

ग) अपने ऊपर

घ) लेखक पर

उत्तर -क) अपनी पत्नी पर

8) पैसा को लेखक ने क्या माना है?

क) दुश्मन

ख) हितेषी

ग) मित्र

घ) पावर

उत्तर -घ) पावर

9) 'पर्चेजिंग पावर' का अभिप्राय बताएं?

क) क्रय शक्ति

ख) विक्रय शक्ति

ग) सीमित शक्ति

घ) अवमूल्यन शक्ति

उत्तर - क) क्रय शक्ति

10) आज लोग पैसों का दुरुपयोग किस प्रकार से कर रहे हैं?

क) आवश्यक वस्तुएं खरीद कर

ख) अनावश्यक वस्तुएं खरीद कर

ग) सामान्य वस्तुएं खरीद कर

घ) इनमें में से कोई नहीं

उत्तर -ख) अनावश्यक वस्तुएं खरीद कर

11) लेखक के मित्र ने बाजार को कौन सा नाम दिया है?

क) शैतान का जाल

ख) मंदिर के समान

ग) शांति देने वाला स्थान

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -क) शैतान का जाल

12) लेखक के मित्र ने ऐसे व्यक्तियों को क्या कहा है जो बाजार के जाल में नहीं फंसते?

क) शर्म वाले

ख) आदर्श व्यक्ति

ग) बेहया (बिना शर्म के)

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर - ग) बेहया (बिना शर्म के)

13) लेखक के अनुसार बाजार क्या है?

क) आकर्षण का केंद्र

ख) दिखावा का स्थान

ग) असंतोष उत्पन्न करने वाला स्थान

घ) इनमें से सभी

उत्तर -घ) इनमें से सभी

14) किसी वस्तु को पाने की लालसा को क्या कहते हैं?

क) तृष्णा

ख) संयम

ग) विवेक

घ) संतुष्टि

उत्तर -क) तृष्णा

15) लोग ना चाहते हुए भी किसके इशारे पर चलते है?

क) परिवार के इशारे पर

ख) समाज के इशारे पर

ग) बाजार के इशारे पर

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -ग) बाजार के इशारे पर

16) बाजारू संस्कृति लोगों में कौन सा भाव भर देता हैं?

क) असंतोष

ख) तृष्णा

ग) ईष्या

घ) इनमें से सभी।

उत्तर -घ) इनमें से सभी।

17) 'बाजार का जादू' कैसे व्यक्तियों पर चलता है?

क) जो संतुष्ट हो

ख) जिनका मन खाली हो

ग) जिनमें दिखावा ना हो

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -ख) जिनका मन खाली हो

18) मन खाली होने पर व्यक्ति क्या करता है?

क) अनावश्यक वस्तुएं खरीदता है।

ख) आवश्यक वस्तुएं खरीदना है।

ग) संतुष्ट रहता है।

घ) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर -क) अनावश्यक वस्तुएं खरीदता है।

19) अनावश्यक वस्तुएं खरीदने वाले व्यक्ति की स्थिति बाद में क्या होती है?

क) सुखद

ख) विचारणीय

ग) पछतावा वाली

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -ग) पछतावा वाली

20) अधिक से अधिक सामान खरीदना आज क्या बन गया है?

क) प्रतिष्ठा का विषय

ख) संतुष्टि का विषय

ग) ज्ञान का विषय

घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर -क) प्रतिष्ठा का विषय

21) आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करने का लक्ष्य बाजार को क्या प्रदान करता है?

क) सार्थकता

ख) बेरोजगारी

ग) समय की बर्बादी

घ) कीमत में वृद्धि

उत्तर -क) सार्थकता

22) आवश्यक और गैर आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी में कैसा ग्राहक अंतर नहीं कर पाता?

क) जिस ग्राहक को संतुष्टि हो

ख) जिस ग्राहक का मन खाली हो

ग) जिस ग्राहक का मन भरा हो

घ) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर -ख) जिस ग्राहक का मन खाली हो

23) बाजार में किस प्रकार की खरीदारी करने पर जेब पर जबरदस्त असर पड़ता है

क) आवश्यक वस्तुएं खरीद कर

ख) उपयोगी वस्तुएं खरीद कर

ग) अनावश्यक वस्तुएं खरीद कर

घ) सामान्य वस्तुएं खरीद कर

उत्तर -ग) अनावश्यक वस्तुएं खरीद कर

24) लेखक के पड़ोस में कौन रहते थे?

क) भगत जी

ख) गांधीजी

ग) लेखक के मित्र

घ) लेखक का परिवार

उत्तर -क) भगत जी

25) चूरन बेचने का काम कौन करते थे?

क) भगत जी

ख) गांधीजी

ग लेखक के मित्र

घ) लेखक का परिवार

उत्तर -क) भगत जी

26) दस वर्षों से लेखक ने किसे एकदाम पर चूरन बेचते हुए पाया?

क) अपने मित्र को

ख) अपने परिवार को

ग) भगत जी को

घ) अन्य किसी को

उत्तर -ग) भगत जी को

27) लोभ रहित और सादगी पूर्ण आचरण के कारण लोग किन्हें सम्मान दिया करते थे?

क) गांव वाले को

ख) घर वाले को

ग) भगत जी को

घ) अपने मित्र को

उत्तर -ग) भगत जी को

28) निबंध में कौन से व्यक्ति पर बाजार का जादू चलता दिखाई नहीं देता है?

क) लेखक पर

ख) भगत जी पर

ग) लेखक के मित्र पर

घ) इनमें से किसी पर नहीं

उत्तर -ख) भगत जी पर

29) 'अपदार्थ प्राणी' का क्या अर्थ है?

क) तुच्छ व्यक्त

ख) सम्मानित व्यक्ति

ग) गुस्सैल व्यक्ति

घ) दुखी व्यक्ति

उत्तर -क) तुच्छ व्यक्ति

30) बाजार से उत्पन्न हुए मतभेद पर लेखक क्या जताते हैं?

क) अफसोस

ख) चिंता

ग) दुख

घ) इनमें से सभी।

उत्तर - घ) इनमें से सभी।

31) लेखक बाजार पर आधारित अर्थशास्त्र को क्या मानते हैं?

क) नीति का शास्त्र

ख) अनीति का शास्त्र

ग) उपयोगी शास्त्र

घ) महत्वपूर्ण शास्त्र

उत्तर -ख) अनीति का शास्त्र

बाजार दर्शन लघुः उत्तरीय प्रश्न

1. बाजार दर्शन के लेखक कौन है यह पाठ किस विधा में लिखा गया है?

उत्तर - बाजार दर्शन पाठ के रचनाकार जैनेंद्र कुमार जी हैं एवं यह निबंध विधा में लिखी गई रचना है।

2. बाजार दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य (उद्देश्य) क्या है?

उत्तर - एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में बाजार की उपयोगिता एवं महत्व।

3. नी बैग का अर्थ क्या है?

उत्तर - पैसे की गर्मी या एनर्जी।

4. क्या केवल महिला ही बाजार को सार्थकता प्रदान करती है?

उत्तर - नहीं बाजार की सार्थकता हर वैसा व्यक्ति प्रदान करता है जो बाजार से आकर्षित होता है।

5. लेखक के मित्र किस के साथ बाजार गया था? और बाजार से खरीदारी का श्रेय किसे दिया गया?

उत्तर - लेखक का मित्र अपनी पत्नी के साथ बाजार गया था। सारी खरीदारी लेखक के मित्र की पत्नी ने की।

6. पैसा को लेखक ने क्या माना है और क्यों?

उत्तर- लेखक ने पैसे को पावर माना है। लेखक पैसे को पावर कहते हैं क्योंकि पैसे के हिसाब से ही हम बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं।

7. पावर (शक्ति) का रस क्या है?

उत्तर - पर्चेजिंग पावर का अर्थ है क्रय शक्ति से।

8. एक बुद्धिमान और संयम पूर्वक रहने वाला व्यक्ति का आचरण पैसों के प्रति कैसा रहता है?

उत्तर- एक संयमी व्यक्ति पैसों को खर्च करने में संयम बरतता हैं।

9. आज लोग पैसों का दुरुपयोग किस प्रकार से कर रहे हैं?

उत्तर आज लोग अपनी आवश्यकता अनुसार वस्तुओं को ना खरीद कर अपने पर्चेजिंग पावर के अनुपात में सामान लाते हैं जो पैसे का दुरुपयोग है।

10. लेखक के मित्र ने बाजार के ऊपर में क्या टिप्पणी की?

उत्तर - लेखक के मित्र ने बाजार को आकर्षित करने वाला वह स्थान माना है जहां व्यक्ति चाह कर भी बच नहीं सकता।

11. लेखक के मित्र ने बाजार को कौन सा नाम दिया है और क्यों?

उत्तर - लेखक के मित्र ने बाजार को शैतान का जाल कहां है क्योंकि बाजार को इस प्रकार से सजाया जाता है कि व्यक्ति ना चाहते हुए भी खरीदारी करने पर विवश हो जाता है।

12. लेखक के मित्र ने ऐसे व्यक्तियों को क्या कहा है जो बाजार के जाल में नहीं फंसते?

उत्तर - लेखक के मित्र ने ऐसे व्यक्तियों को बेहया (बिना शर्म के) कहा है।

13. किन व्यक्तियों को बाजार का चकाचौंध प्रभावित नहीं कर पाता?

उत्तर - संयमी एवं बुद्धिमान व्यक्ति जो पैसे की व्यय (खर्च) करने में समझदारी अपनाते हैं और फिजूलखर्ची में अपना पैसा नहीं गंवा ते उन्हें बाजार का चकाचौंध प्रभावित नहीं कर पाता है।

14. लेखक के अनुसार बाजार क्या है?

उत्तर - लेखक के अनुसार बाजार वह स्थान है जहां पर व्यक्ति जाकर फंस जाता है बाजार लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। जहां लोग अपनी आवश्यकता को छोड़कर अनावश्यक वस्तुओं की खरीदारी में लग जाते हैं।

15. बाजार का क्या काम है?

उत्तर- लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करना।

16. लेखक ने बाजार के कौन से गुण का बखान किया है?

उत्तर - बाजार ना केवल लोगों के क्रय शक्ति को प्रभावित करता है बल्कि इससे सामाजिक असंतोष को भी बढ़ावा मिलता है।

17. बाजारू संस्कृति लोगों में असंतोष, तृष्णा और ईष्या जैसे भाव क्यों भर देते हैं?

उत्तर- लोग खरीदारी को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लेते हैं ऐसे में एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में लोग अपने मन में असंतोष तृष्णाीर्ष्या आदि जैसे भावों को पालना शुरू कर देते हैं।

18. तृष्णा का अर्थ बताएं?

उत्तर - किसी वस्तु को पाने की लालसा को तृष्णा कहते हैं।

19. बाजार लोगों के लिए तृष्णा का कारण कैसे बनता है?

उत्तर - आवश्यकता से अधिक वस्तुओं की खरीदारी हीव्यक्ति में तृष्णा का कारण बनता है।

20. लेखक के मित्र का खाली हाथ बाजार से आना किस बात की ओर संकेत करता है?

उत्तर- लोग बाजार को आवश्यकतानुसार खरीदारी का स्थान ना मानते हुए दिखावा का स्थान मानने लगे हैं।

21. लेखक ने बाजार को जादू करने वाला स्थान क्यों माना है?

उत्तर- लेखक के अनुसार बाजार वह स्थान है जहां पर लोग ना चाहते हुए भी बाजार के इशारे पर चलता है। ना चाहते हुए भी लोग अनावश्यक वस्तुओं को खरीद कर लाते हैं।

22. बाजार लोगों के क्रय शक्ति को किस तरह प्रभावित करता है?

उत्तर- बाजार भाव स्थान है जहां लोग आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अनावश्यक वस्तुओं को भी खरीद कर लाते हैं इससे लोगों के जेब पर जबरदस्त असर पड़ता है।

23. लेखक के अनुसार बाजार के संदर्भ में मन खाली होने का क्या अर्थ है?

उत्तर - अधिक से अधिक पाने की इच्छा रखते हुए अनावश्यक वस्तुओं को को भी बाजार से खरीद कर लाने की स्थिति को ही मन खाली होने के अर्थ में लेखक लेते हैं।

24. बाजार का जादू ऐसे व्यक्तियों पर क्यों चलता है जिनका मन खाली हो?

उत्तर - मन खाली होने वाले व्यक्ति ही बाजार को सार्थकता देते हैं क्योंकि ऐसे व्यक्ति अधिक से अधिक वस्तु खरीदने के इच्छुक होते हैं और अनावश्यक वस्तुएं भी खरीद कर लाते हैं।

25. जिन व्यक्तियों का मन खाली होता है वैसे व्यक्ति किन तथ्यों (बात) में में भेद नहीं कर पाते?

उत्तर - आवश्यक और गैर आवश्यक वस्तुओं में ऐसे व्यक्ति अंतर नहीं कर पाते।

26. लेखक के अनुसार जब तक तृष्णा है दुःख है ऐसा लेखक क्यों कहते हैं?

उत्तर - तृष्णा का अर्थ है कुछ पाने की लालसा करना लेखक कहते हैं कि जब तक किसी वस्तु को पाने की लालसा हो तभी तक हमारे मन में दुख होता है ऐसी लालसा जब मन से समाप्त हो जाए तो मैं किसी भी चीज का दुख नहीं रहता।

27. बाजार के संबंध में तृष्णा का क्या अर्थ है?

उत्तर - लोग आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अनावश्यक वस्तुओं की ओर दौड़ते हैं क्योंकि उन्हें हर बाजार का हर वस्तु उन्हें आकर्षित कर रहा होता है।

28. अनावश्यक वस्तुएं खरीदने वाले व्यक्ति की स्थिति बाद में क्या होती है?

उत्तर - कुछ समय तक के लिए अनावश्यक वस्तुएं व्यक्ति को सुख देता है किंतु इसकी उपयोगिता ना होता देख व्यक्ति दुखी हो जाता है।

29. अधिक से अधिक सामान खरीदना आज प्रतिष्ठा का विषय बन गया है कैसे?

उत्तर- लोग दिखावे के जीवन में विश्वास करने लगे हैं इसलिए अधिक से अधिक वस्तुऐ खरीदना प्रतिष्ठा का विषय हो गया है।

30. लेखक बाजार के जादू से बचने का कौन सा उपाय बताते हैं?

उत्तर - लेखक कहते हैं कि जब मन खाली ना हो तभी बाजार जाए अर्थात आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करने का लक्ष्य लेकर ही बाजार जाना चाहिए।

31. हम बाजार को कैसे सार्थकता दे सकते हैं?

उत्तर - आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करके और गैर आवश्यक वस्तुओं को छोड़ कर हम बाजार को सार्थकता दे सकते हैं।

32. लेखक ने मन को वश में करने के क्या उपाय बताए हैं?

उत्तर- लेखक कहते हैं कि मन को वश में करने का मात्र उपाय यही है कि यह स्वाभाविक हो। हट पूर्वक किसी भी चीज का स्वीकार करना उचित नहीं है।

33. लेखक के अनुसार मोक्ष की राह क्या है?

उत्तर - कोई कार्य स्वाभाविक रूप से करना चाहिए। हट पूर्वक किया गया कोई भी कार्य मोक्ष नहीं दिला सकता।

34. मन की हार कब होती है?

उत्तर - जब हम मन में उत्पन्न हुए लोभ को हर्ट पूर्वक दबाने की कोशिश करते हैं तो यह मन की हार है। लोभ को हर्ट पूर्वक नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से दबाने की आवश्यकता है।

35. लेखक मनुष्य को जड़वत या शून्य ना होने की सलाह क्यों देते हैं?

उत्तर - मन में इक्षित वस्तुओं के ना होने से व्यक्ति जड़वत हो जाएगा। लेखक इससे बचने की सलाह देते है। आवश्यकता अनुसार मन में इच्छा रखने चाहिए ताकि लोग लोभ से बचे रहें।

36. जबरदस्ती लोभ से बचने पर क्या होगा?

उत्तर - जबरदस्ती लोभ से बचने के प्रयास करने पर मन और भी दुर्बल हो जाएगा।

37. व्यक्ति को मनमाना नहीं करना चाहिए क्यों?

उत्तर - व्यक्ति को अपने मन का नहीं करना चाहिए क्योंकि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम जो कुछ करते हैं उससे सारा समाज प्रभावित होता है ऐसे में हमें वह काम नहीं करना चाहिए जिससे समाज को नुकसान हो।

38. लेखक के पड़ोस में कौन रहते थे और वे क्या काम करते थे?

उत्तर- लेखक के पड़ोस में भगत जी रहा करते थे वे चूरन बेचने का काम करते थे।

39. लेखक ने चूरन वाले की क्या विशेषताएं बतलाई ?

उत्तर- चूरन बेचने वाले भगत जी छः आना में चूरन बेचा करते थे वे काफी लोकप्रिय थे इसके बावजूद भी उन्होंने चूर्ण को केवल अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वेश्या व्यवसाय के लिए नहीं।

40. दस वर्षों में लेखक ने भगत जी को क्या करते हुए पाया?

उत्तर- दस वर्षों में लेखक ने भगत को तय समय पर चूर्ण बेचते हुए पाया। और छः पैसों से ज्यादा कभी उन्होंने चूरन को नहीं बेचा और बचे हुए चूर्ण को बच्चों में बांटते हुए पाया।

41. लोग भगत जी को इतना सम्मान क्यों देते थे?

उत्तर - भगत जी के लोभ रहित और सादगी पूर्ण आचरण के कारण लोग उन्हें सम्मान दिया करते थे।

42. लेखक के अनुसार किस पर बाजार का जादू नहीं चल सकता था और क्यों?

उत्तर- लेखक के अनुसार भगत जी पर बाजार का जादू नहीं चल सकता था क्योंकि वह संतोषी व्यक्ति थे साथ ही साथ उन्हें यह ज्ञात था कि उन्हें बाजार से क्या खरीदना है।

43. बाजार को भगत जैसे व्यक्ति से सार्थकता मिलती है कैसे?

उत्तर - भगत जी अपनी आवश्यकता अनुसार बाजार से सामान लाया करते थे उन्हें बाजार के अनावश्यक वस्तुओं से कोई लेना-देना नहीं रहता था। इस तरह से पैसे का सही उपयोग और अपनी आवश्यकता के हिसाब से सामान को लाना बाजार की सार्थकता को बढ़ाता है।

44. आपदार्थ प्राणी का क्या अर्थ है? लेखक ने अपदार्थ प्राणी किसे और क्यों कहा ?

उत्तर - अपदार्थ प्राणी का अर्थ तुच्छ व्यक्ति से है। लेखक ने भगत को तुच्छ व्यक्ति कहा है क्योंकि वे बहुत पढ़े-लिखे विद्वान नहीं थे।

45. लेखक ने किसी निर्बल व्यक्ति माना है?

उत्तर - संचय की तृष्णा और वैभव की चाह रखने वाले व्यक्ति को लेखक ने निर्बल माना है।

46. लोक वैभव की शक्ति किसके सामने चूर-चूर हो जाता है?

उत्तर - धन दौलत ऐश्वर्या अर्थात लोग वैभव की शक्ति भगत जी जैसे सामान्य व्यक्ति के सामने चूर- चूर हो जाता है।

47. पर्चेजिंग पावर (क्रय शक्ति) के गर्व से लोग किस तरह प्रभावित हो रहे है?

उत्तर पर्चेजिंग पावर से लोगों में दूरियां बढ़ती हैं लोग दिखावे और प्रतिष्ठा के चक्कर में एक दूसरे से कटे कटे से रहने लगते हैं लोगों में ईर्ष्या की भावना भी जागृत होती है।

48. बाजार लोगों में कौन-कौन सी भावनाओं को भरता है?

उत्तर द्वेष ईर्ष्या एक दूसरे से दूरी बनाकर रहना आदि जैसी भावनाएं बाजार के कारण लोगों में देखने मे मिलता है।

49. बाजार के किस विडंबना पर लेखक अफसोस जताते हैं?

उत्तर - बाजार से उत्पन्न हुए मतभेद और उपभोक्तावाद की संस्कृति को बढ़ावा लेखक अफसोस जताते हैं।

50. लेखक किसे अनीति का शास्त्र मान रहे हैं? और क्यों?

उत्तर - लेखक बाजार पर आधारित अर्थशास्त्र को अनीति का शास्त्र मान रहे हैं क्योंकि ऐसा बाजार जो मानवता का पोषण ना करके आर्थिक पोषण कर रहा है वह शास्त्र लेखक की नजरों में बेकार है।


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