12th Hindi Core 11. भक्तिन JCERT/JAC Reference Book

12th Hindi Core 11. भक्तिन JCERT/JAC Reference Book

 

12th Hindi Core 11. भक्तिन JCERT/JAC Reference Book

11. भक्तिन

महादेवी वर्मा जीवन परिचय

जन्म - 26 मार्च सन् 1907 ई.

स्थान - फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)

निधन - 11 सितंबर सन् 1987 ई. (इलाहाबाद)

शिक्षा - दीक्षा

आरंभिक शिक्षा - इंदौर

उच्च शिक्षा M.A संस्कृत (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) अंग्रेजी, संगीत और चित्रकला की शिक्षा घर पर हुई।

संपादन - चांद पत्रिका

साहित्यिक परिचय

काव्य संग्रह -

नीहार 1930

रश्मि 1932

नीरजा 1934

सांध्यगीत 1936

दीपशिखा 1942

सप्तपर्णा (अनूदित 1959)

प्रथम आयाम (1974)

अग्निरेखा (1990)

रेखाचित्र :-

अतीत के चलचित्र 1941

स्मृति की रेखाएँ 1943

संस्मरण :-

पथ के साथी (1956)

मेरा परिवार (1972)

स्मृतिचित्र (1973)

संस्मरण (1983)

निबंध संग्रह

पथ के साथी 1956

मेरा परिवार 1972

निबंध :-

श्रृंखला की कड़ियाँ 1942

पुरस्कार-

• ज्ञानपीठ पुरस्कार 'यामा 'संग्रह के लिए 1983 ईस्वी में

• उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का भारत भारती पुरस्कार

• पद्मभूषण सम्मान 1956 ईस्वी

हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख चार स्तंभों में से एक ।

• आधुनिक की हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण इन्हें आधुनिककाल की मीरा के नाम से जाना जाता है।

• कवि निराला ने उन्हें विशाल मंदिर की सरस्वती कहा है।

• अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरुआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य रही।

• मात्र 12 वर्ष की उम्र में उनका बाल विवाह (डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा से) हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित के समान अपना जीवन-यापन किया।

• साहित्य, संगीत, कला (चित्रकारी) के साथ-साथ पशु-पक्षी प्रेमी थी।

पाठ परिचय का मुख्य बिन्दु

• 'भक्तिन' महादेवी जी का प्रसिद्ध संस्मरणात्मक रेखाचित्र है। जो स्मृति की रेखाएं में संकलित है। जिसमें लेखिका ने अपनी सेविका भक्तिन के व्यक्तित्व का परिचय देते हुए उसके अतीत और वर्तमान का सुंदर चित्र खींचा है।

• भक्तिन एक संघर्षशील और स्वाभिमानी स्त्री है, जिसने धोखे और कपट से भरी सामाजिक मान्यताओं का डटकर सामना किया, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनसे हारकर अपने जीवन को पूरी तरह बदल लेती है।

• अपने आप को महादेवी जी की अनन्य सेविका के रूप में समर्पित करके उसके जीवन को भी देहाती बनाकर अपने रंग में रंग देती है।

• महादेवी जी भी भक्तिन को अपने व्यक्तित्व का अंश मानकर उसे खोना नहीं चाहती। उन्होंने यह भी बताया हैं कि भक्तिन एक ऐसी झुझारू महिला थी। जिसने अपने जीवन के संघर्षों से कभी हार नही मानी और अपना पूरा जीवन अपने उसूलों व अपने ग्रामीण संस्कृति के अनुसार ही जिया।

पाठ परिचय

संस्मरण की शुरुआत करते हुए लेखिका कहती हैं कि भक्तिन छोटे कद व दुबले पतले शरीर वाली बहुत ही सादगी पूर्ण जीवन जीने वाली महिला थी। लेकिन लेखिका की सेवा वह कुछ इस तरह से करती थी जैसे पवन पुत्र हनुमान, राम जी की किया करते थे। यानि बिना थके रात-दिन उनके लिए काम करती है।

लेखिका के पास जब वह पहली बार नौकरी के लिए आई तो उसने अपना नाम लक्ष्मी बताया था लेकिन वह नहीं चाहती थी कि उसे कोई उस नाम से पुकारे।

लक्ष्मी के गले में कंठी माला और उसका स्वभाव देखकर लेखिका ने उसका नाम भक्तिन रख दिया जिसे सुनकर वह बहुत खुश हो गई। महादेवी वर्मा जी ने इस कहानी को चार भागों में बांटा है।

पहले भाग में (जन्म और शादी)

लेखिका ने भक्तिन के जन्म व उसकी शादी के बारे में बताया है। वह इलाहाबाद के झूसी गाँव के एक गौपालक की इकलौती बेटी थी। 5 वर्ष की आयु में उसका विवाह हंडियां ग्राम के एक संपन्न गौपालक के पुत्र से हुआ। लेकिन छोटी आयु में उसके मां के मरने के बाद उसकी सौतेली मां ने महज नौ वर्ष की उम्र में उसका गौना (ससुराल भेज देना) करवा दिया।

भक्तिन की शादी के बाद भक्तिन के पिता बीमार रहने लगे और एक दिन उनकी मृत्यु हो गई लेकिन उनकी मृत्यु का समाचार सौतेली मां ने भक्तिन को नहीं दिया और सास ने भी पिता की मृत्यु का समाचार सीधे तो भक्तिन को नहीं बताया लेकिन उसने किसी बहाने से भक्तिन को मायके भेज दिया।

पिता से मिलने की आस में जब भक्तिन मायके पहुंची तो वहां पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर बहुत दुखी हुई। घर वापस पहुंचने पर उसने अपनी सास को खूब खरी-खोटी सुनाई।

दूसरे हिस्से में (शादी शुदा जीवन)

भक्तिन के शादीशुदा जीवन के बारे में बताया गया है। भक्तिन ने तीन बेटियों को जन्म दिया जिसके कारण उसे अपने परिजनों खासकर जेठानी व सास की उपेक्षा को सहन करना पड़ा था क्योंकि जेठानी के दो बेटे थे। और उन दिनों समाज में बेटियों को अहमियत नहीं दी जाती थी। इसीलिए भक्तिन व उसकी बेटियों के साथ भी हर चीज में भेदभाव किया जाता था। जहां जेठानी के बेटों को दूध मलाई और अच्छा भोजन दिया जाता था वही भक्तिन की बेटियों को मोटा अनाज खाने को दिया जाता था।

भक्तिन के खिलाफ उसके पति को भी परिवार के सदस्यों द्वारा उकसाया जाता था लेकिन भक्तिन का पति उसको बहुत प्यार करता था इसलिए वह उनके बहकावे में नहीं आता था। भक्तिन बाग-बगीचों, खेत-खलिहानों के साथ-साथ जानवरों की भी देखभाल करती थी।

उसने अपनी बड़ी बेटी का विवाह बड़े धूमधाम से किया लेकिन महज 36 साल की उम्र में भक्तिन के पति की मृत्यु हो गई। इस समय भक्ति 29 वर्ष की थी। इसके बाद तो भक्तिन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उसने किसी प्रकार अपनी दोनों बेटियों की शादी की और बड़े दामाद को घर जमाई बना कर अपने पास रखा।

तीसरे भाग में (जीवन का संघर्ष)

दुर्भाग्यवश बड़ी बेटी का पति भी मर गया और वह विधवा हो गई। परिजनों ने संपत्ति के लालच में भक्तिन की विधवा बेटी का विवाह भक्तिन के जेठ के बड़े बेटे के तीतरबाज साले से करवाना चाहा जिसे उसने मना कर दिया।

लेकिन कुछ समय बाद वह तीतरबाज भक्तिन की बेटी के घर में घुस गया। उस समय भक्तिन घर में नही थी। हालाँकि बेटी ने उस तीतरबाज को धक्का देकर बाहर निकाल दिया लेकिन बात गांव में फैल गई। पंचायत बुलाई गई जिसने दोनों का विवाह कराने का आदेश दे दिया। भक्तिन और उसकी बेटी को न चाहते हुए भी पंचायत का यह फैसला मानना पड़ा।

शादी के बाद तीतरबाज दामाद ने धीरे धीरे भक्तिन की सारी सम्पत्ति उड़ानी शुरू कर दी। जिससे उसकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई। एक बार तो लगान न दे पाने के कारण जमींदार ने उसे दिनभर कड़ी धूप में खड़ा रखा। भक्तिन ने इसे अपना अपमान समझकर और गांव छोड़ दिया। और लेखिका के घर आकर उनकी सेविका बन गई।

चौथे भाग में (लेखिका से संबंध)

लेखिका कहती हैं कि उसकी वेशभूषा किसी सन्यासिन की तरह थी लेकिन उसमें वह एक सधी हुई गृहस्थिन भी थी। वह बहुत नियम-धर्म से चलने वाली महिला थी। वह सुबह जल्दी उठकर नहाती धोती थी। लेखिका को बिल्कुल गांव घर के जैसे ही खाना बनाकर खिलाती थी। यहाँ तक कि हॉस्टल की लड़कियों को भी खिलाती-पिलाती थी।

वह बहुत ही मेहनती, ईमानदार व स्वामिभक्त थी। लेखिका की सेवा करना ही अब उसका एकमात्र धर्म बन गया था। वह एक तरह से लेखिका की छाया बन चुकी थी। लेकिन यहां भी वह पूर्ण रूप से अपने गांव घर के संस्कारों का पालन करती थी।

भक्तिन की एक खासियत थी कि वह दूसरों के मन की तो नहीं करती थी लेकिन दूसरों से अपने मन की अवश्य करवा लेती थी। हर गलत बात को भी अपने तर्क से सही ठहरा देती थी। लेखिका अगर देर रात तक काम करती तो वह भी कंबल बिछाकर नीचे फर्श में बैठकर लेखिका के साथ रात भर जागती रहती थी और अगर उन्हें किसी चीज की जरूरत होती तो वह खुशी-खुशी लाकर उन्हें दे दी थी।

लेखिका के स्वतन्त्रता आंदोलनों में भाग लेने के कारण उनके जेल जाने की संभावना बनी रहती थी। लेकिन भक्तिन जेल जाने से बहुत डरती थी फिर भी वह लेखिका की सेवा करने के लिए जेल जाने को भी तैयार थी। वह कहती थी कि जहां मेरी मालकिन रहेगी, वही मैं भी रहूंगी, फिर चाहे वह कालकोठरी ही क्यों ना हो।

यहां तक कि वह लेखिका को छोड़कर अपनी बेटी व दामाद के साथ जाने को भी तैयार नहीं हुई। भक्तिन लेखिका के मित्र गणों का बहुत सम्मान करती थी। कहानी के अंत में लेखिका, भक्तिन और अपने गहरे संबंधों व बेहतरीन तालमेल के बारे में कहती हैं कि वह ऐसी स्वामिभक्त सेविका को खोना नहीं चाहती हैं।

प्रश्न अभ्यास

प्रश्न 1. भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छुपाती थी ? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया ?

उत्तर - भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन अर्थात लक्ष्मी था और देवी लक्ष्मी धन-दौलत, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्या की देवी मानी जाती है। लेकिन अपने नाम के उलट लक्ष्मी (भक्तिन) तो बहुत ही गरीब महिला थी। लक्ष्मी नाम को सुनकर लोग उसका मजाक न उड़ाएं। इसीलिए वह अपना वास्तविक नाम लोगों से छुपाती थी।

भक्तिन के गले में कंठी माला और उसके आचार, व्यवहार व स्वभाव को देखते हुए उसे भक्तिन नाम लेखिका महादेवी वर्मा ने दिया।

प्रश्न 2. दो कन्या रत्न पैदा करने पर भक्तिन पुत्र महिमा में अंधी अपनी जेठानी द्वारा घृणा व उपेक्षा का शिकार बनी। ऐसी घटनाओं से ही अक्सर यह धारणा चलती है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। क्या इससे आप सहमत हैं?

उत्तर- यह सत्य है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। दो कन्याओं को जन्म देने के बाद भक्तिन को पुत्र महिमा में अंधी जेठानी तथा सास की उपेक्षा सहन करनी पड़ी। भक्तिन को उसके पति से अलग करने के लिए अनेक षड्यंत्र भी सास व जिठानियों ने किए। एक नारी दूसरी नारी के सुख को देखकर कभी खुश नहीं होती। पुत्र न होना, संतान न होना, दहेज आदि सभी मामलों में नारी ही समस्या को गंभीर बनाती है। वे ताने देकर समस्याग्रस्त महिला का जीना हराम कर देती हैं। दूसरी तरफ पुरुष को भी गलत कार्य के लिए उकसाती है।

आज हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। जहां पर पुत्रों को वंश का वारिस माना जाता है। इसीलिए बेटों को बेटियों से अधिक महत्व दिया जाता है। शिक्षा की कमी, अज्ञानता व अंधविश्वास के चलते कई बार अनजाने में ही महिलाएं (खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं) इस तरह के कार्य करती हैं। और उस समय के समाज में अधिकतर महिलाएं अशिक्षित होती थी।

इसीलिए ऐसी धारणा बनती चली गई कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। लेकिन अब समय बदल गया है। धीरे-धीरे लोगों की बेटियों के प्रति सोच भी बदलने लगी है। शिक्षित बेटियों व उनकी मांओं के साथ भेदभाव भी अब कम होने लगा है।

प्रश्न 3. भक्तिन की बेटी पर पंचायत द्वारा जबरन पति थोपा जाना एक दुर्घटना भर नहीं बल्कि विवाह के संदर्भ में स्त्री के मानवाधिकार (विवाह करें या ना करें अथवा किससे करें) इसकी स्वतंत्रता को कुचलते रहने की सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपरा का प्रतीक है। कैसे ?

उत्तर- नारी पर अनादिकाल से हर फैसला थोपा जाता रहा है। घर के बड़े बुजुर्ग खासकर पुरुष सदस्यों की इच्छा के अनुसार ही महिलाओं को अपना जीवन जीना पड़ता है। न सिर्फ शादी बल्कि जीवन के हर फैसले में महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन करने की यह परंपरा हमारे देश में सदियों से चली आ रही हैं।

प्राचीन काल में ही नहीं बल्कि आज भी हमारे देश में महिलाओं को उनके मानवाधिकारों से वंचित रखा जाता है। उनके जीवन से संबंधित हर फैसले को आज भी घर के अन्य सदस्यों द्वारा लिया जाता है। समय बदल चुका है। पहले के मुकाबले आज अधिक महिलाएं शिक्षित है। फिर भी उनके मानवाधिकारों का हनन होता हैं। यह सिर्फ अशिक्षित महिलाओं के साथ नहीं होता है बल्कि शिक्षित महिलाएं भी इसका शिकार होती है।

भक्तिन की बेटी के साथ भी यही हुआ। भक्तिन और उसकी विधवा बेटी की इच्छा ना होते हुए भी उसे उस तीतरबाज व्यक्ति के साथ सिर्फ इसलिए शादी करनी पड़ी क्योंकि गांव की पंचायत व बड़े बुजुर्ग यही चाहते थे। यह भक्तिन की बेटी के मानवाधिकारों का हनन ही तो था बल्कि विवाह के संदर्भ में स्त्री के मानवाधिकार को चलते रहने की सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपरा का प्रतीक।

प्रश्न 4. "भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा। क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं है"। लेखिका ने ऐसा क्यों कहा होगा ?

उत्तर- भक्तिन में सेवा-भाव है, वह कर्तव्यपरायणा है, परंतु इसके बावजूद उसमें अनेक दुर्गुण भी हैं। लेखिका उसे अच्छा कहने में कठिनाई महसूस करती है। लेखिका को भक्तिन के निम्नलिखित कार्य दुर्गुण लगते हैं -

• ग्रामीण संस्कृति के अनुसार विधवा होने के बाद भक्तिन हर वृहस्पतिवार को अपना सिर मुंडवा लेती थी। लेकिन लेखिका को महिलाओं का सिर मुंडवाना बिल्कुल पसंद नहीं था।

• वह लेखिका के इधर-उधर पड़े पैसे-रुपये भंडार-घर की मटकी में छिपा देती है। जब उससे इस कार्य के लिए पूछा जाता है तो वह स्वयं को सही ठहराने के लिए अनेक तरह के तर्क देती है।

• वह लेखिका को प्रसन्न रखने के लिए बात को इधर-उधर घुमाकर बताती है। वह इसे झूठ नहीं मानती। शास्त्र की बातों को भी वह अपनी सुविधानुसार सुलझा लेती है। वह किसी भी तर्क को नहीं मानती।

• वह दूसरों को अपने अनुसार ढालना चाहती है, परंतु स्वयं में कोई परिवर्तन नहीं करती।

• पढ़ाई-लिखाई में उसकी कोई रुचि नहीं है।

प्रश्न 5. भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का क्या उदाहरण लेखिका ने दिया ?

उत्तर- भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का लेखिका ने निम्नलिखित उदाहरण दिए-

• ग्रामीण संस्कृति के अनुसार विधवा होने के बाद भक्तिन हर बृहस्पतिवार को अपना सिर मुंडवा लेती थी। लेकिन लेखिका को महिलाओं का सिर मुंडवाना बिल्कुल पसंद नहीं था।

• जब लेखिका चोरी हुए पैसों के बारे में भक्तिन से पूछती है तो वह कहती है कि पैसे मैंने सँभालकर रख लिए हैं। क्या अपने ही घर में पैसे सँभालकर रखना चोरी है।

• वह कहती है कि चोरी और झूठ तो धर्मराज युधिष्ठिर में भी होगा। नहीं तो वे श्रीकृष्ण को कैसे खुश रख सकते थे और संसार (अपने राज्य को कैसे) चला सकते थे। चोरी करने की घटनाओं और महाराज युधिष्ठिर के उदाहरणों के माध्यम से लेखिका ने शास्त्र प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का वर्णन किया है।

• इसीलिए उन्होंने भक्तिन को ऐसा करने से मना किया लेकिन भक्तिन ने शास्त्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि "तीरथ गए मुँड़ाए सिद्ध अर्थात् सिद्ध लोग सिर मुंड़वा कर ही तीर्थ को गए"। इस तर्क के आगे लेखिका कुछ नहीं बोल पायी। और भक्तिन हर बृहस्पतिवार को अपना सिर मुंड़वाती रही।

प्रश्न 6. भक्तिन के आ जाने से महादेवी वर्मा जी अधिक देहाती कैसे हो गई।

उत्तर- भक्तिन देहाती महिला थी। शहर में आकर उसने स्वयं में कोई परिवर्तन नहीं किया। भक्तिन के आने के बाद लेखिका को ग्रामीण संस्कृति, वहां के रहन-सहन, वेशभूषा आदि का अच्छा ज्ञान हो गया था। ऊपर से वह दूसरों को भी अपने अनुसार बना लेना चाहती है, पर अपने मामले में उसे किसी प्रकार का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। उसने लेखिका का मीठा खाना बिल्कुल बंद कर दिया। उसने गाढ़ी दाल व मोटी रोटी खिलाकर लेखिका की स्वास्थ्य संबंधी चिंता दूर कर दी। अब लेखिका को रात को मकई का दलिया, सवेरे मट्ठा, तिल लगाकर बाजरे के बनाए हुए ठंडे पुए, ज्वार के भुने हुए भुट्टे के हरे-हरे दानों की खिचड़ी व सफेद महुए की लपसी मिलने लगी। इन सबको वह स्वाद से खाने लगी। इसके अतिरिक्त उसने महादेवी को देहाती भाषा भी सिखा दी। इस प्रकार महादेवी भी देहाती बन गई।

अभ्यास पाठ के आसपास

प्रश्न 1. "आलो आँधारि" की नायिका बेबी हालदार और भक्तिन के व्यक्तित्व में आप क्या समानता देखते हैं ?

उत्तर- आलो आंधारि की नायिका और लेखिका बेबी हालदार और भक्ति के व्यक्तित्व में निम्न समानता देखते हैं -

• दोनों ही कहानियां घर में काम करने वाली नौकरानी के जीवन पर आधारित है।

• बेबी हालदार और भक्तिन का जीवन भी संघर्षशील रहा है और लोगों के घरों में काम करती है

• दोनों महिलाओं के जीवन में समाज और परिवार की उपेक्षा एवं घृणा का सामना करना पड़ा।

• दोनों ही महिलाओं को अपने परिजनों के अत्याचारों को सहन करना पड़ा।

• बेबी हालदार ने सातवीं तक पढ़ाई की थी जबकि भक्तिन पूरी तरह से अनपढ़ है।

• बेबी हालदार एक घर में नौकरानी का काम करती हैं और भक्तिन लेखिका के घर में सेविका का काम करती है।

• दोनों ही कहानियां भिन्न थी, परंतु दोनों ही महिलाओं ने अपने स्वाभिमान और आत्मरक्षा के लिए अपने जीवन में संघर्षपूर्ण स्थिति का सामना डट कर किया।

प्रश्न 2: भक्तिन की बेटी के मामले में जिस तरह का फैसला पंचायत ने सुनाया, वह आज भी कोई हैरतंगेज़ बात नहीं है। अखबयों या टी०वी० समाचारों में आने वार्ता किसी ऐसी ही घटना की भक्तिन के उस प्रसंग के साथ रखकर उस परचर्चा करें?

उत्तर- भक्तिन की बेटी के मामले में जिस तरह का केसला पंचायत ने सुनाया, वह आज भी कोई हैरतअंगेज बात नहीं है। अब भी पंचायतों का तानाशाही रवैया बरकरार है। अखबारों या सी०ची० पर अकसर समाचार सुनने को मिलते हैं कि प्रेम विवाह को पंचायतें अवैध करार देती हैं तथा पति-पत्नी को भाई-बहिन की तरह रहने के लिए विवश करती हैं। वे उन्हें सजा भी देती हैं। कईं बार तो उनकी हत्या भी कर दी जाती है। यह मध्ययुगीन बर्बरता आज भी विद्यमान है।

प्रश्न 3: पाँच वर्ष की वर्ष में ब्याही जाने वाली लड़कियों में सिर्फ भक्तिन नहीं हैं, बल्कि आज भी हज़ारों अभागिनियाँ हैं। बाल-विवाह और उम्र के अनर्मलपन वाले विवाह की अपने आस-पास हो रहे सारे घटनाओं पर लेस्ली के साथ परिचर्चा करें।

उत्तर- विद्यार्थी स्वयं परिचर्चा करें।

प्रश्न 4: महादेवी जी इस पाठ में हिरनी सोना, कुत्ता बसंत, बिल्ली गोधूलि आदि के माध्यम से पशु-पक्षी को मानवीय संवेदना से उकेरने वाली लेखिका के रूप में उभरती हैं। उन्होंने अपने घर में और भी कई पशु-पक्षी पाल रखे थे तथा उन पर रेखाचित्र भी लिखे हैं। शिक्षक की सहायता से उन्हें ढूँढ़कर पढ़ें। जो 'मेरा परिवार' नाम से प्रकाशित हैं।

उत्तर - विद्यार्थी स्वयं पढ़ें।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-उत्तर :

प्रश्न 1: भक्तिन का गौना कितने वर्ष की उम्र में हो गया था?

(क) 6 वर्ष

(ख) 3 वर्ष

(ग) 10 वर्ष

(घ) 9 वर्ष

प्रश्न 2: भक्तिन की कितनी लड़कियां थीं?

(क) 3

(ख) 2

(ग) 1

(घ) 7

प्रश्न 3: जब भक्तिन के पति का निधन हुआ, लेखिका की उम्र तब कितनी थी?

(क) 20

(ख) 29

(ग) 27

(घ) 40

प्रश्न 4: भक्तिन का दामाद क्या लड़ाने का आदी था?

(क) बैल

(ख) मेंढक

(ग) तीतर

(घ) बाज

प्रश्न 5: भक्तिन का असली नाम क्या था?

(क) लक्ष्मी

(ख) पार्वती

(ग) स्तुत

(घ) सौम्या

प्रश्न 6: सेवा-धर्म में भक्तिन अपना मुकाबला किस भगवान से करती थी?

(क) शिव

(ख) राम

(ग) कृष्ण

(घ) हनुमान

प्रश्न 7. भक्तिन' पाठ किसे के द्वारा रचित है?

(क) महादेवी वर्मा

(ख) राजकुमार वर्मा

(ग) जैनेंद्र

(घ) धर्मवीर भारती

प्रश्न 8. भक्तिन का कद कैसा है?

(क) लंबा

(ख) छोटा

(ग) मझोला

(घ) बौना

प्रश्न 9. भक्तिन सेवक-धर्म में किस से स्पर्धा करने वाली है? (IMP.)

(क) हनुमान

(ख) शबरी

(ग) सुग्रीव।

(घ) लक्ष्मण

प्रश्न 10. भक्तिन का वास्तविक नाम क्या था? (IMP.)

(क) सोना

(ख) दुर्गा

(ग) ऊषा

(घ) लक्ष्मी

प्रश्न 11. भक्तिन कहाँ की रहने वाली थी ? (IMP.)

(क) हाँसी

(ख) झाँसी

(ग) झूसी

(घ) झझूसी

प्रश्न 12. भक्तिन का विवाह किस आयु में हुआ था? (IMP.)

(क) पाँच वर्ष

(ख) सात वर्ष

(ग) नौ वर्ष

(घ) ग्यारह वर्ष।

प्रश्न 13. भक्तिन का गौना किस आयु में हुआ था ?

(क) पाँच वर्ष

(ख) सात वर्

(ग) नौ वर्ष

(घ) ग्यारह वर्ष।

प्रश्न 14. भक्तिन की बेटियाँ किसकी 'घुघरी' चबाती थी?

(क) गेहूँ-चने की

(ख) मक्का-चने क

(ग) गेहूँ-बाजरा की

(घ) चने-बाजरा

प्रश्न 15. भक्तिन की कहानी कैसी है?

(क) दुखद

(ख) अधूरी

(ग) सुखद

(घ) पूरी।

प्रश्न 16. भक्तिन के पति का जब देहांत हुआ, तो भक्तिन की आयु कितने वर्ष थी ? (IMP.)

(क) उन्नीस

(ख) पच्चीस

(ग) उनतीस

(घ) तीस।

प्रश्न 17. 'दुर्लध्य होता है?

(क) कठिन समय

(ख) कठोर व्यक्ति

(ग) जिसे पार करना कठिन हो

(घ) जो पार हो

प्रश्न 18. भक्तिन लेखिका को कौन-सी चाय देती थी?

(क) अदरक की

(ख) सौंफ की

(ग) तुलसी की

(घ) इलायची की।

प्रश्न 19. लेखिका की हिरनी का नाम था (IMP.)

(क) सुंदरी

(ख) सोना

(ग) गोधूलि

(घ) वसंती।

प्रश्न 20. भक्तिन कारावास से किस प्रकार डरती थी ? (IMP.)

(क) यमलोक की तरह

(ख) कठोर परिश्रम की तर

(ग) पराये घर की तरह

(घ) अपने ससुराल की तरह।

प्रश्न 21. भक्तिन की कितनी बेटियां थी?

(क) दो

(ख) तीन

(ग) एक

(घ) चार।

प्रश्न 22. महादेवी वर्मा का जन्म किस सन् में हुआ था ?

(क) 1905

(ख) 1906

(ग) 1907

(घ) 1908.

प्रश्न 23. महादेवी वर्मा को स्त्रियों का क्या करना अच्छा नहीं लगता था?

(क) फैशन करना

(ख) सिर मुड़ान

(ग) प्रेम विवाह करना

(घ) नृत्य करना।

प्रश्न 24. महादेवी वर्मा का निधन किस वर्ष हुआ था?

(क) 1987

(ख) 1988

(ग) 1989

(घ) 1990.

प्रश्न 25. महादेवी वर्मा अपने परिवार में किस के लिए प्रख्यात थी ? (IMP.)

(क) पाक विद्या के लिए

(ख) संगीत-कला के लिए

(ग) दया भावना के लिए

(घ) पशु-पक्षी पालन के लिए।

प्रश्न 26. महादेवी वर्मा को 'यामा' पर कौन-सा पुरस्कार मिला था ?

(क) मंगला प्रसाद

(ख) पहल

(ग) ज्ञानपीठ

(घ) सोवियत भूमि।

प्रश्न 27. भारत सरकार ने महादेवी वर्मा को किस अलंकरण से सम्मानित किया

(क) पद्मश्री

(ख) पद्मभूष

(ग) शारदा

(घ) सरस्वती।


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