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☼ मांगी
गई मात्रा (Quanuty Demanded) से
अभिप्राय उस विशेष मात्रा से है जो एक उपभोक्ता,
एक निश्चित समय पर, एक कीमत विशेष पर खरीदने को तैयार है।
☼ माँग
(Demand) किसी वस्तु की
वे मात्राएँ है जिन्हें उपभोक्ता निश्चित कीमत पर एक निश्चित
समय में खरीदने के लिए तैयार है।
☼ माँग
फलन (Demand Function) किसी
वस्तु के लिए मांग (प्रभाव) तथा
इसके विभिन्न निर्धारक तत्वों (कारण) के
बीच कार्यात्मक सबंध (या कारण
तथा प्रभाव संबंध) को व्यक्त करता है। इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है।
Dx
= f(Px,P1,......Pn-1, Y, I,E)
उपभोक्ता
मांग के निर्धारक तत्व कारक
(Determinants
of Consumer Demand)
Dx
= X- वस्तु की माँग
Px
=X-वस्तु की कीमत
P1......Pn-1
= संबंधित वस्तु की कीमतें
Y
= उपभोक्ता की आय
T
= उपभोक्ता की रुचियां
E
= उपभोक्ता की आशंसाएं
T=
उपभोक्ता की रुचियाँ
E=
उपभोक्ता की आशसाएँ
☼ माँग
का नियम (Law of Demand) वस्तु
की कीमत तथा इसकी माँगी गई मात्रा के बीच विपरीत सबध को व्यक्त करता है। ज्यामितीय
दृष्टि से इसे नीचे की ओर गिरती हुई मांग वक्र
द्वारा व्यक्त किया जाता है। ध्यान दें कि मांग के नियम की
व्याख्या करते समय आपने देखा कि आप एक ही मांग पर आगे-पीछे सरक रहे हैं, तब आप या तो
माँग के विस्तार (कीमत के
घटने के कारण) अथवा मांग में संकुचन (कीमत के
बढ़ने के कारण) को व्यक्त कर रहे
थे। परंतु माँग में वृद्धि अथवा मांग में कमी अर्थात् माँग वक्र में खिसकाव
(Shift in Demand Curve) माँग के नियम द्वारा प्रकट
नहीं किया जाता है।
☼ व्यक्तिगत
माँग अनुसूची (Individual Demand Schedule) से
आभप्राय उस तालिका से है जो किसी निश्चित समय पर, एक व्यक्ति द्वारा किसी वस्तु की
विभिन्न कीमतों पर उसकी मांग की मात्राओं को दर्शाती है।
☼ बाजार
माँग अनुसूची (Marker Demand
Schedule) की परिभाषा किसी वस्तु की उन मात्राओं के रूप
में दी जाती है जो उस वस्तु के सभी उपभोक्ता किसी निश्चित समय पर संभव कीमतों पर खरोदेंगे।
☼ माँग
वक्र ( Demand Cune) के
ऋणात्मक ढलान अथवा माँग के नियम
के लागू होने के कई कारण हैं, जैसे; (i) घटती
सीमात उपयोगिता का नियम (ii) आय
प्रभाव, (iii) प्रतिस्थापन
प्रभाव (iv) नये
उपभोक्ता, (iv) विभिन्न
उपयोग।
☼ माँग
के नियम के अपवाद (Exceptions to the Law of Demand) निम्नलिखित
स्थिति में लागू नहीं होते हैं (i) प्रतिष्ठासूचक
वस्तु, (ii) उपभोक्ताओं
की अज्ञानता, (iii) गिफ्फन
पदार्थ।
☼ माँग
वक्र पर संचलन (Movement along the Demand Curve) जब
केवल किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी मांग में परिवर्तन होता है तो इसे
मांग वक्र के विभिन्न बिटुओं द्वारा प्रकट किया जाता है। इसे मांग वक्र पर संचलन या
वस्तु की मात्रा में परिवर्तन भी कहा जाता है। जब किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने
के कारण, उसकी माँग कम हो जाती है तो इसे माँग का संकुचन
(Contraction of Demand) कहते हैं। जब किसी वस्तु की
कीमत में कमी होने के फलस्वरूप उसकी माँगी गई मात्रा अधिक हो जाती है तो इसे माँग का
विस्तार (Extension of Demand) कहा
जाता है।
☼ माँग वक्र में खिसकाव
(Shift in Demand Curve) से अभिप्राय है कि मांग वक्र
प्रारंभिक माँग के ऊपर या नीचे, सरक
जाती है। इस प्रकार का परिवर्तन तब आता है जब कीमत के अतिरिक्त दूसरे तत्वों जैसे आय,
फैशन आदि में परिवर्तन होने से मांग कम या अधिक हो जाती है। जब समान कीमत पर अधिक मांग
की जाती है तब मांग वक्र का ऊपर की ओर
सरकाव
(Forward Shift in Demand Curve) होता है जब समान कीमत पर कम
मांग की जाती है, तब मांग वक्र में पीछे की ओर सरकाव
(Backwand Shift in Demand Curve) होता है। मांग वक्र का ऊपर
की ओर सरकाव मांग
में वृद्धि (Increase in Demand) की
स्थिति है। माँग वक्र का पीछे की ओर सरकाव मांग में कमी
(Decrease in Demand) की स्थिति है।
☼ मांग
में वृद्धि (Increase in Demand) के
मुख्य कारण निम्नलिखित है.
(i)
उपभोक्ता की आय
में वृद्धि (ii) प्रतिस्थापन
वस्तु की कीमत में वृद्धि, (iii) पूरक
वस्तु की कीमत में कमी (iv) वस्तु
के लिए उपभोक्ता की रुचि
तथा प्राथमिकता में वृद्धि.
(v) क्रेताओं की संख्या में वृद्धि
(vi) कीमत बढ़ने की संभावना.
(vii) भविष्य में उपभोक्ता की
आय बढ़ने की संभावना।
☼ माँग
में कमी (Decrease in Demand) के
मुख्य कारण निम्नलिखित है (i) उपभोक्ता की
आय में कमी, (ii) प्रतिस्थापन
वस्तु की कीमत में कमी, (iii) पूरक
वस्तु की कीमत में वृद्धि, (iv) वस्तु
के लिए उपभोक्ता की रुचि
तथा प्राथमिकता में कमी, (v) क्रेताओं
की संख्या में कमी, (vi) कीमत
कम होने की संभावना, (vii) भविष्य
में उपभोक्ता की आय कम होने
की संभावना
☼ सामान्य
वस्तुएँ (Normal Goods) ऐसी
वस्तुएँ हैं जिनका आय प्रभाव धनात्मक तथा कीमत प्रभाव ऋणात्मक होता है।
☼ निम्मकोटि
वस्तुएँ (Inferior Goods) ऐसी
वस्तुएँ हैं जिनका आप प्रभाव ऋणात्मक होता है।
☼ गिफ्फन
वस्तुएँ । Giffen Goods) ऐसी
निम्नकोटि की वस्तुएँ हैं जिसका आय प्रभाव
ऋणात्मक होता है तथा कीमत प्रभाव धनात्मक होता
है।
☼ पूरक
वस्तुएँ (Complementar Goods) वे
वस्तुएँ हैं, जो किसी आवश्यकता को संयुक्त रूप से संतुष्ट करती है जैसे पेन
और स्याही। अन्य शब्दों में पूरक वस्तुएँ ऐसी वस्तुएं हैं,
जिसमें एक वस्तु की मांग तथा दूसरी वस्तु की कीमत में ऋणात्मक
संबंध होता है। अर्थात्, एक वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी
पूरक वस्तु की मांग कम हो जाएगी तथा कीमत कम होने पर
पूरक वस्तु की मांग बढ़
जाएगी।
☼ स्थानापन्न
वस्तुएँ (Substiture Goods) वे
संबंधित वस्तुएं है जो एक-दूसरे के
लिए प्रयोग की जा सकती हैं। उदाहरण के लिए पेप्सी कोला और कोका कोला। स्थानापन्न वस्तुओं
में से एक वस्तु की मांग तथा दूसरी वस्तु की कीमत में धनात्मक संबंध होता है। अथात्,
एक वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी स्थानापन्न वस्तु की मांग बढ़ती है,
तथा कीमत कम होने पर मांग कम होती है।
☼ संबंधित
वस्तुएँ (Related Goods) तब
संबंधित होती है जब (a) एक
वस्तु (मान लो
X) की कीमत दूसरी वस्तु
(मान लो
Y) की मांग को प्रभावित करती है अथवा
(b) एक वस्तु की मांग दूसरी वस्तु की मांग में वृद्धि
या कमी लाती है। संबंधित वस्तुओं को निम्न प्रकार से
वर्गीकृत किया जाता है
☼ स्थानापन्न
वस्तुएँ तथा पूरक वस्तुएँ।
उदाहरण-
कार और पेट्रोल संबंधित तथा पूरक वस्तुएं हैं।
-
चाय और काफी संबंधित तथा स्थानापन्न वस्तुएँ हैं।
माँग
की लोच स्मरण रखें
(Remember an Elasticity of Demand)
☼ माँग की कीमत लोच
(Price Enticity (or Demand) यह किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप मांग
की अनुक्रियाशीलता का माप है। सामान्यतया, किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन तथा मांगी
गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन के बीच अनुपात के रूप में मापा जाता है।
☼ पूर्णतया लोचदार माँग
(Perfectly Elastic Demand) पूर्णतया लोचदार मांग उसे कहते हैं जिसमें कीमत में थोड़ा-सा
परिवर्तन होने पर मांग में अनंत परिवर्तन हो जाता है।
☼ पूर्णतया बेलोचदार माँग
(Perfectly Inelastic Demand) जब कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग में कोई परिवर्तन
नहीं होता तो इसे पूर्णतया बेलोचदार माँग कहते हैं।
☼ इकाई लोचदार माँग
(Unitary Elasticity Demand) माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कीमत में होने वाले
प्रतिशत परिवर्तन के बराबर मांग में प्रतिशत परिवर्तन होता है।
☼ इकाई से अधिक लोचदार
माँग (Greater than Unitary Elastic Demand): माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें
कीमत में होने वाले एक निश्चित प्रतिशत परिवर्तन के परिणामस्वरूप माँग में अपेक्षाकृत
अधिक प्रतिशत परिवर्तन होता है।
☼ इकाई से कम लोचदार माँग
( Less than Unitary Elastic Demand): माँग की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कीमत में
होने वाले एक निश्चित प्रतिशत परिवर्तन के कारण माँग में अपेक्षाकृत कम प्रतिशत परिवर्तन
होता है।
☼ माँग की कीमत लोच के
माप की विधियाँ है (Methods of Measurement of Price Elasticity of Dermand are):
(1) कुल व्यय विधि (2) आनुपातिक विधि। (3) बिंदु विधि या ज्यामितिक विधि।
☼ कुल व्यय विधि
(Total Expenditure Method) (1) माँग की कीमत लोच इकाई (Ed=1 ) तब होती
है जब उस पर किए जाने वाला कुल व्यय पूर्ववत् ही रहता है, चाहे वस्तु की कीमत बढ़े
या घटे। (ii) माँग की कीमत लोच इकाई से अधिक (Ed>1) तब होती है जब वस्तु
की कीमत के घटने पर माँग इतनी बढ़े कि कुल व्यय बढ़ जाए और वस्तु की कीमत के बढ़ने
पर माँग इतनी घटे कि कुल व्यय घट जाए। अत: वस्तु की कीमत तथा उस पर किए जाने वाले कुल
व्यय में विपरीत संबंध होता है। (iii) माँग की कीमत लोच इकाई से कम (Ed
<1) तब होती है जब वस्तु की कीमत के बढ़ने पर माँग इतनी घटे कि कुल व्यय बढ़ जाए
और वस्तु की कीमत के घटने पर माँग इतनी बढ़े कि कुल व्यय घट जाए। अत: वस्तु की कीमत
तथा उस पर किए गए कुल व्यय में धनात्मक संबंध पाया जाता है।
☼ अनुपातिक या प्रतिशत विधि (Proportionate or Percentage Method):
☼ बिंदु विधि या ज्यामितीय विधि (Point Method or Geometric Method):
☼ लोचदार माँग
(Elastic Demand) वह स्थिति है जिसमें Ed>1
☼ बेलोचदार माँग
(Inelastic Demand) वह स्थिति है जिसमें Ed<1
☼ पूर्णतया लोचदार माँग
(Perfectly Elastic Demand) वह स्थिति है जिसमें Ed=∞
☼ पूर्णतया बेलोचदार माँग
(Perfectly Inclastic Demand) वह स्थिति है जिसमें Ed = 0
☼ माँग की लोच को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Elasticity of Demand) (1) वस्तु की प्रकृति (2) प्रतिस्थापन वस्तु की उपलब्धि। (3) वस्तु के विभिन्न उपयोग (4) उपभोग का स्थगन। (5) उपभोक्ता की आय। (6) उपभोक्ता की आदता (7) किसी वस्तु पर खर्च की जाने वाली आय का अनुपात। (8) कीमत-स्तर। (9) समय अवधि।