8. सामाजिक आंदोलन (Social Movements)

सामाजिक आंदोलन (Social Movements)

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

प्र० 1. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ कोई सामाजिक आंदोलन न हुआ हो, चर्चा करें। ऐसे समाज की कल्पना आप कैसे करते हैं, इसका भी आप वर्णन कर सकते हैं?

उत्तर- ऐसे समाज की कल्पना, जिसमें कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं हुआ होहमारे ऐसे समाज की कल्पना जिसमें कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं हुआ हो, इस प्रकार है सरल, परम्परागत एवं आदिम समाजों में प्रायः सामाजिक आन्दोलन नहीं होते थे, उनका जीवन काफी हद तक स्थिर था। ऐसे समाज में प्रदत्त गुणों का महत्त्व था और प्रदत्त गुणों के महत्त्व के कारण परम्परागत रूप से उच्च या शक्तिशाली वर्ग के लोगों को चुनौती भी नहीं दी जाती थी।

भाग्यवादी मान्यता के प्रबल होने के कारण व्यक्ति अपनी सामाजिक - आर्थिक प्रस्थिति को भगवान की देन मानता था तथा वह कितनी भी कष्टदायी क्यों न हो, अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम मानते हुए उससे संतुष्ट रहता था। इसलिए ऐसे समाजों में सामाजिक आन्दोलनों का प्रायः अभाव पाया जाता रहा है और परिवर्तनहीन ऐसे समाज अनेक पीढ़ियों तक एक जैसी विशेषताओं से मुक्त रहे हैं।

सामाजिक आन्दोलन विहीन उक्त समाज की कल्पना के कारणहमने निम्न कारणों से ऐसे समाज की कल्पना की है।

1. इस समाज में प्रदत्त प्रस्थिति और भाग्यवादी मनोवृत्ति का बोलबाला था।

2. इस समाज में संगठन और शोषण के प्रति जागरूकता का अभाव था।

3. इस समाज में लोग सामूहिक जीवन जीते थे। सामूहिक जीवन होने के कारण सभी कठिन परिश्रम करते थे तथा मिल-बाँटकर अपना जीवनयापन करते थे।

4. इसमें न तो किसी प्रकार के वर्गीय भेद विकसित हुए थे और न जाति जैसी संस्तरणात्मक श्रेणियों का विकास हुआ था।

उपर्युक्त स्थितियों में समाज के लोगों को न तो कभी सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता हुई और न ही इस दिशा में कोई प्रयास किये गये।

प्रश्न 2. निम्न पर लघु टिप्पणी लिखें

(अ) महिलाओं के आंदोलन

उत्तर: (1) भारत में 19वीं शताब्दी में महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों का आना: 19वीं शताब्दी के समाज सुधार आन्दोलनों में महिलाओं से सम्बन्धित अनेक मुद्दे उठाये गये। इनमें सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध एवं जाति भेद व अस्पृश्यता जैसी कुरीतियाँ प्रमुख थीं। इन प्रथाओं का विरोध करते हुए हिन्दी शास्त्रों का संदर्भ भी दिया गया।

(2) 20वीं सदी के प्रारम्भ में महिला आन्दोलन का स्वरूप:

1. 20वीं सदी के प्रारम्भ में राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर पर महिलाओं के संगठनों में वृद्धि हुई। भारतीय महिला एसोसिएशन, अखिल भारतीय महिला कॉन्फ्रेंस, भारत में महिलाओं की राष्ट्रीय काउंसिल आदि संगठनों की शुरुआत सीमित कार्यक्षेत्र से हुई, इनका कार्यक्षेत्र समय के साथ विस्तृत हुआ। ये संगठन ऐसा वातावरण बनाने में सफल हुए जहाँ महिलाओं के मुद्दों की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी।

2. स्वतंत्रता के पूर्व के काल में जनजातीय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले संघर्षों में महिलाओं ने पुरुषों के साथ भाग लिया। तिभागा आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन इसके उदाहरण हैं।

(3) महिला आन्दोलन का दूसरा दौर:सन् 1970 के दशक के मध्य में भारत में महिला आन्दोलन का नवीनीकरण हुआ। कुछ लोग इसे भारतीय महिला आन्दोलन का दूसरा दौर कहते हैं। इस दौर में 'स्वायत्त महिला आन्दोलन' कहे जाने वाले आन्दोलनों में वृद्धि हुई। ये महिला संगठन राजनैतिक दलों से स्वतंत्र थे। इस दौर में संगठनात्मक परिवर्तन के अलावा कुछ नए मुद्दे भी थे, जैसे महिलाओं के प्रति हिंसा, भू-स्वामित्व व रोजगार के मुद्दों की लड़ाई, यौन-उत्पीड़न तथा दहेज के विरुद्ध अधिकारों की माँग इत्यादि । महिला आन्दोलनों के फलस्वरूप महत्त्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन आए हैं।

(ब) जनजातीय आंदोलन

उत्तर- जनजातीय आन्दोलन देश भर में फैले विभिन्न जनजातीय समूहों के मुद्दे समान हो सकते हैं, लेकिन उनके विभेद भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।

(1) मध्य भारत में जनजातीय आन्दोलन: जनजातीय आन्दोलनों में से कई अधिकांश रूप से मध्य भारत की तथाकथित 'जनजातीय बेल्ट' में स्थित रहे हैं जैसे - छोटा नागपुर व संथाल परगना में स्थित संथाल, हो, ओरांव व मुंडा। नए गठित हुए झारखण्ड प्रदेश का मुख्य भाग इन्हीं से बना है। झारखण्ड में जनजातीय आन्दोलन का इतिहास सौ वर्ष पुराना है। जनजातीय आन्दोलन जनजातियों की समस्याओं को लेकर किए जाते हैं।

अंग्रेजी शासकों की नीतियाँ किसीन - किसी रूप में जनजातीय समाज को प्रभावित करती रही हैं तथा इन नीतियों के विरुद्ध जनजातियाँ संघर्षरत रहीं। बाहरी लोगों द्वारा अपने सांस्कृतिक मूल्यों को जनजातीय संस्कृति पर थोपने, वन एवं वन सम्पदा पर सरकारी एकाधिकार की नीति, बाहरी लोगों द्वारा जनजातियों का शोषण करने तथा अंग्रेजों की जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारवादी नीति के कारण अंग्रेजी काल में अनेक जनजातीय आन्दोलन हुए।

(2) पूर्वोत्तर भारत में जनजातीय आन्दोलन: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने राज्यों के निर्माण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ की, उसने इस क्षेत्र के सभी प्रमुख पर्वतीय क्षेत्र के जिलों में अशांति की प्रवृत्ति पैदा की। अपनी पृथक् पहचान तथा पारम्परिक स्वायत्तता के प्रति सचेत ये जातियाँ असम के प्रशासनिक तंत्र में सम्मिलित किए जाने के बारे में अनिश्चित थीं। एक मुख्य मुद्दा जो देश के विभिन्न भागों के जनजातीय आन्दोलनों को जोड़ता है, वह है जनजातीय लोगों का वन - भूमि से विस्थापन । इस अर्थ में पारिस्थितिकीय मुद्दे जनजातीय आन्दोलनों के केन्द्र में हैं। लेकिन इसी प्रकार पहचान की सांस्कृतिक असमानता व विकास जैसे आर्थिक मुद्दे भी हैं जिनके कारण जनजातियाँ आन्दोलन करती रही हैं।

प्र० 3. भारत में पुराने तथा नए सामाजिक आंदोलनों के बीच अंतर करना कठिन है। चर्चा कीजिए।

उत्तर- पुराने सामाजिक आंदोलन-

👉 वर्ग आधारित-अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए एकजुट।

👉 उपनिवेशवाद के विरोध में आंदोलन।

👉 राष्ट्रवादी आंदोलन तथा एक राष्ट्र के रूप में लोगों का एकजुट होना; जैसे-स्वतंत्रता आंदोलन।

👉 राष्ट्रवादी आंदोलन, जिसने विदेशी शक्तियों तथा विदेशी पूँजी के विरोध में सक्रियता दिखाई। मुख्यतः साधन संपन्न तथा शासनहीन वर्गों के बीच संघर्ष से संबंधित। मुख्य मुद्दा-शक्तियों का पुनर्गठन। अर्थात शक्तियों पर नियंत्रण कर उसे शक्तिमान लोगों से छीनकर शक्तिहीन लोगों को देना। श्रमिकों ने पूँजीपतियों के विरुद्ध गतिशीलता दिखाई। महिलाओं का पुरुषों के प्रभुत्व के प्रति संघर्ष आदि।

👉 राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढाँचे के अंदर क्रियाकलाप। जैसे- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व किया। कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ चीन ने चीनी क्रांति का नेतृत्व किया।

👉 राजनीतिक दलों की भूमिका की ही प्रधानता रहती थी तथा गरीब लोगों की बातें प्रभावपूर्ण तरीके से नहीं सुनी जाती थीं।

👉 इनका संबंध सामाजिक असमानता तथा संसाधनों के असमान वितरण को लेकर था तथा इन आंदोलनों के यही प्रमुख तत्व हुआ करते थे।

नए सामाजिक आंदोलन

👉 नए सामाजिक आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दशकों में 1960-1970 के दशक के मध्य प्रकाश में आए।

👉 इन आंदोलनों न केवल संकीर्ण वर्गीय मुद्दों को उठाया, बल्कि एक बड़े सामाजिक समूहों के विस्तृत तथा सर्वव्यापी मुद्दों को भी अपने आंदोलनों में शामिल किया।

👉 अमेरिका की सेना वियतनाम के खिलाफ खूनी खेल में संलिप्त थी।

👉 पेरिस में विद्यार्थियों ने श्रमिकों के दल की हड़तालों में शामिल होकर युद्ध के खिलाफ अपना विरोध जताया।

👉 अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग के द्वारा नागरिक अधिकार आंदोलन चलाया गया।

👉 अश्वेत शक्ति आंदोलन।

👉 महिलाओं के आंदोलन।

👉  पर्यावरण संबंधी आंदोलन।

👉 शक्तियों के पुनर्गठन के बजाय जीवन-स्तर के सुधार पर अधिक जोर। जैसे-सूचना का अधिकार, पर्यावरण की शुद्धता इत्यादि।

👉 इस तरह के आंदोलन लंबे समय तक राजनीतिक दलों की छतरी के तले रहना पंसद नहीं करते। इसके बजाय नागरिक सामाजिक आंदोलनों से जुड़कर गैर सरकारी संगठनों का निर्माण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गैर सरकारी संगठन अधिक सक्षम, कम भ्रष्ट तथा स्वतंत्र होते हैं।

👉 भूमंडलीकरण – लोगों की प्रतिबद्धता को आकार देना। संस्कृति, मीडिया, पारराष्ट्रीय कंपनियों, विधिक व्यवस्था-अंतर्राष्ट्रीय। इस कारण से कई सामाजिक आंदोलन अब अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं।

👉 आवश्यक तत्व-पहचान की राजनीति, सांस्कृतिक समग्रता, आकांक्षाएँ।

प्र० 4. पर्यावरणीय आंदोलन प्रायः आर्थिक एवं पहचान के मुद्दों को भी साथ लेकर चलते हैं। विवेचना कीजिए।

उत्तर- चिपको आंदोलन पारिस्थतिकीय आंदोलन का एक उपयुक्त उदाहरण है।

यह मिश्रित हितों तथा विचारध राओं का अच्छा उदाहरण हैं। रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक ‘अनक्वाइट वुड्स’ में कहते हैं कि गांववासी अपने गांवों के निकट के ओक तथा रोहडैड्रोन के जंगलों को बचाने के लिए एक साथ आगे आए। जंगल के सरकारी ठेकेदार पेड़ों को काटने के लिए आए तो गाँववासी, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल थीं, आगे बढ़े तथा कटाई रोकने के लिए पेड़ों से चिपक गए। गाँववासी ईंधन के लिए लकड़ी, चारा तथा अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जंगलों पर निर्भर थे।

उसने गरीब गाँववासियों की आजीविका की आवश्कताओं तथा राजस्व कमाने की सरकार की इच्छा के बीच एक संघर्ष उत्पन्न कर दिया। चिपको आंदोलन ने पारिस्थितिकीय संतुलन के मुद्दे को गंभीरतापूर्वक उठाया। जंगलों का काटा जाना वातावरण के विध्वंस का सूचक है, क्योंकि इससे संबंधित क्षेत्रों में बाढ़ तथा भूस्खलन जैसी प्राकृतिक विपदाओं का खतरा रहता है। इस प्रकार से, अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चिंताएँ चिपको आंदोलन का आधार थी।

प्र० 5. कृषक कृषक एवं नव किसानों के आंदोलनों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- 1. किसान आंदोलन औपनिवेशिक काल से पहले शुरू हुआ। यह आंदोलन 1858 तथा 1914 के बीच स्थानीयता, विभाजन और विशिष्ट शिकायतों से सीमित होने की ओर प्रवृत्त हुआ। कुछ प्रसिद्ध आंदोलन निम्नलिखित है-

👉 1859 की बंगाल में क्रांति जोकि नील की खेती के विरुद्ध था।

👉 1857 का दक्कन विद्रोह जोकि साहूकारों के विरोध में था।

👉 बारदोली सत्याग्रह जोकि गाँधी जी द्वारा प्रारंभ किया गया तथा भूमि का कर न देने से संबंधित आंदोलन था।

👉 चंपारन सत्याग्रह (1817-18)-यह नील की खेती के विरुद्ध आंदोलन था।

👉 तिभागो आंदोलन (1946-47)

👉 तेलांगना आंदोलन (1946-51)

2. नया किसान आंदोलन 1970 के दशक में पंजाब तथा तमिलनाडु में प्रारंभ हुआ। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न थीं-

👉 ये आंदोलन क्षेत्रीय स्तर पर संगठित थे।

👉 आंदोलनों का दलों से कोई लेना-देना नहीं था।

👉 इन आंदोलनों में बड़े किसानों की अपेक्षा छोटे-छोटे किसान हिस्सा लेते थे।

👉 प्रमुख विचारधारा – कड़े रूप में राज्य तथा नगर विरोधी।

👉 माँग का केंद्रबिंदु – मूल्य आधारित मुद्दे।

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