
झारखण्ड
में पर्यटन
झारखण्ड
प्रदेश को संस्कृतियों एवं धर्मों का संगम क्षेत्र कहा जाता है। झारखण्ड वानस्पतिक
एवं जैविक विविधताओं से भरा हुआ प्रदेश है। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक
रूप से झारखण्ड में अनेक स्थल उपस्थित हैं, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते
हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए झारखण्ड में पर्यटन नीति 2015 लागू की गई है।
राज्य के पर्यटन स्थल
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झारखण्ड में स्थित प्रमुख पर्यटन स्थलों का संक्षिप्त विवरण निम्न है
डुम्बारी
पहाड़ी
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यह खूँटी जिला मुख्यालय से लगभग 20 किमी दूर अवस्थित है। इस पहाड़ी में बिरसा मुण्डा
का प्रशिक्षण शिविर था।
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इसे झारखण्ड में जलियाँवाला बाग जैसा महत्त्व प्राप्त है। इसे झारखण्ड 9 जनवरी, Fm
1900 को इसी स्थान पर जाट रेजीमेण्ट के कमिश्नर फोर्वेस के नेतृत्व में 400 मुण्डा
पुरुषों – स्त्रियों की (बिरसा मुण्डा को पकड़ने के लिए) नृशंस हत्या कर दी गई थी ।
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शहीदों की स्मृति में यहाँ सरकारी समारोह होता है एवं वार्षिक मेला लगता है।
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इसका नामकरण हुण्डरू नामक अंग्रेज अधिकारी
के नाम पर हुआ है।
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इस पहाड़ी पर सिकीहरी जल विद्युत स्टेशन है, जिसकी उत्पादन क्षमता 120 मेगावाट है।
आदिवासी
म्यूजियम
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यह राँची से 3 किमी पूर्व की ओर अवस्थित है। आदिवासी म्यूजियम वर्ष 1954 में रांची
में स्थापित देश का पहला आदिवासी म्यूजियम है। संग्रहालय के मुण्डा की प्रतिमा है।
पर बिरसा
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पूर्व में यह जनजातीय शोध संस्थान था। इसमें आदिवासियों की जीवनशैली, रहन-सहन, वेशभूषा
आदि का प्रर्दशन किया गया है।
अल्बर्ट
एक्का चौक
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अल्बर्ट एक्का झारखण्ड के एकमात्र सैनिक हैं, जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया
गया । अल्बर्ट एक्का रांची जिले के निवासी थे। वर्ष wa 1971 में भारत-पाक युद्ध में
शहीद हो गए थे। जहाँ रांची में इनकी मूर्ति स्थापित है, उस चौक को अल्बर्ट एक्का चौक
नाम दिया गया है।
पारसनाथ
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झारखण्ड के इस सर्वोच्च शिखर की ऊँचाई 1,365 मी है। इसकी चोटी पर शिखरजी जैन मन्दिर
स्थित है। जैन धर्म की मान्यता PowerPoy Po के अनुसार, यहाँ 24 में से 20 तीर्थंकरों
को निर्वाण प्राप्त हुआ था। अतः इस शिखर को सम्मेद शिखर के नाम से जाना जाता है।
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पारसनाथ के दर्शनीय स्थलों में सीतानाला जलप्रपात, कुंचुस्वामी तथा गणधर महाराज की
टोंक, गन्धर्वलाला जलप्रपात, सहस्रकूट, नन्दीश्वर द्वीप आदि प्रमुख हैं।
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जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने यहीं मोक्ष प्राप्त किया था और उन्हीं के
नाम पर इस पर्वत का नाम पार्श्वनाथ पड़ा जो आगे चलकर पारसनाथ कहलाया।
गोरगाँवा
गुफा
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भवनाथपुर के पश्चिम में स्थित इस गुफा में शिवलिंग है।
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यहाँ प्रतिवर्ष शिवरात्रि के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है ।
बरसो
पानी गुफा
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यह हजारीबाग जिले के बड़कागाँव प्रखण्ड के आंगो पंचायत के तहत मुख्यालय पहाड़ी की तलहटी
में अवस्थित है।
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स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस गुफा में ‘बरसो पानी’ बोलने से वर्षा होने लगती
है।
जुबली
पार्क
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जमशेदपुर के साकची के पास यह पार्क पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है।
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इस पार्क में रात को विद्युत प्रकाश में फव्वारों का सुन्दर दृश्य देखने को मिलता है।
सूरजकुण्ड
(सुर्यकुण्ड)
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यह एक प्रसिद्ध गर्म जल का कुण्ड है। इसका तापमान 169-190°
फॉरेनहाइट है। यह झारखण्ड का सबसे गर्म कुण्ड है ।
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यह हजारीबाग शहर से 72 किमी की दूरी पर जीटी रोड स्थित है।
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इस कुण्ड में उच्च मात्रा में सल्फर का पाया जाना चिकित्सीय कारणों से बहुपयोगी है।
काली-कोकिला
संगम क्षेत्र
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हावड़ा-मुम्बई मेन लाइन पर मनोहरपुर और पौसेता स्टेशन के पास काली और कोकिला
नदियों के संगम पर मकर संक्रान्ति का मेला लगता है।
बेसीसागर
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यहाँ प्राचीनकाल की 32 मूर्तियों के अतिरिक्त 7 शिवलिंग तथा 2 पाली लिपि एवं
प्राकृत लिपि में लिखे शिलालेख उपस्थित हैं।
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यह पश्चिमी सिंहभूम के मझगाँव प्रखण्ड में स्थित है। 7वीं सदी में राजा वेणु ने यहाँ
वेणुसागर का निर्माण करवाया था।
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यहाँ प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेला लगता है।
नेतरहाट
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रांची से 165 किमी दूर नेतरहाट को छोटानागपुर की रानी कहा जाता है। यहाँ गर्मी के मौसम
में भी हल्की ठण्ड रहती है।
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यह एक हिल स्टेशन है, जो 3,622 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ लोग सूर्योदय एवं सूर्यास्त
देखने आते हैं।
रामरेखा
धाम
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सिमडेगा से 29 किमी पश्चिम में कैराबेड़ा गाँव में रामरेखा पर्वत पर रामरेखा धाम स्थित
है।
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रामरेखा पर्वत पर 1,312 फीट की ऊँचाई पर स्थित रामरेखा धाम छोटानागपुर का प्रसिद्ध
स्थल है।
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ऐसा माना जाता है कि वनवास के समय में राम यहाँ ठहरे थे ।
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कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ पर मेला लगता है।
सिसईं
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यहाँ से 4 किमी दूर ऐतिहासिक स्थल अवस्थित है। सिसईं प्राचीनकाल में छोटानागपुर की
राजधानी था।
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सिसईं में नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित नवरत्न किला के अवशेष आज भी विद्यमान हैं।
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यहाँ से प्राप्त अवशेषों में धोबीघाट, योगीमठ, भूलभुलैया भवन आदि प्रसिद्ध हैं। गुमला
जिले के पालकोट तथा राजमड़ी गाँव का काँसा बर्तन उद्योग एक प्रसिद्ध कुटीर उद्योग है
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इस स्थल के समीप एक प्राकृतिक जलधारा है। इसके निकट ही एक धमधमिया पहाड़ है, जिस पर
चढ़ने से धमधम की आवाज़ होती है।
कोल्हुआ
(कौलेश्वरी पर्वत)
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चतरा के हण्टरगंज प्रखण्ड में 1,575 फीट की ऊँचाई पर कोल्हुआ या कोलेश्वरी पर्वत है।
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यहाँ हिन्दू एवं जैन धर्म से सम्बन्धित अनेक तीर्थस्थल हैं। यहाँ आदिवासियों के देवता
का भी निवास स्थान है।
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कोल्हुआ पर्वत को महाकाव्य और पुराण काल से सम्बन्धित प्रागैतिहासिक स्थल माना जाता
है।
दुआरी
गर्म झरना
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चतरा से 35 किमी पूर्व में गिद्धौर[-कटकमसाण्डी मार्ग पर स्थित यह स्थल पर्यटकों के
लिए आकर्षण का केन्द्र है ।
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यहाँ बलबल नदी के किनारे गर्म पानी का स्रोत है, जो चर्म रोगों के लिए औषधि का काम
करता है।
कुन्दा
गुफा
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कुन्दा किले से कुछ ही दूरी पर अवस्थित यह गुफा प्राचीनकाल की उच्च तकनीक का नमूना
है। इसके संकीर्ण प्रवेश द्वार में लेटकर ही जाया जा सकता है।
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अन्दर जाने पर एक हॉल मिलता है। इस गुफा के शिवलिंग वाले कमरे में हमेशा प्रकाश रहता
है, जबकि अन्य कमरों में अँधेरा रहता है।
तोपचाँची
झील
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यह धनबाद से 37 किमी की दूरी पर है
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यह कृत्रिम जलाशय राष्ट्रीय राजमार्ग-2 के निकट अवस्थित है। इसके चारों ओर वन तथा पहाड़ियाँ
हैं।
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यहाँ एक वन्यप्राणी अभयारण्य है। यहाँ चीता, लंगूरा हिरण, और जंगली सुअर आदि पाए जाते
हैं।
तेतुलिया
गर्म जलधारा
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यह धनबाद जिले में दामोदर नदी के तट पर अवस्थित है। यह एक गर्म जलधारा का झरना है।
कबरा
कला गाँव
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यह पलामू जिले में स्थित है, जो हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित है। यहाँ से पुरापाषाण,
नवपाषाण, ताम्रपाषाण तथा लौह पाषाणकाल के अवशेष मिले हैं।
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यह हड़प्पाकालीन स्थापत्य से जुड़ा स्थल है।
सेण्ट
कैथेडरल गिरिजाघर
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यह रांची में स्थित है। इसका निर्माण 1870-73 ई. में हुआ था।
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इस भवन की छत, स्तम्भ, मेहराब भव्य एवं सुन्दर हैं। इसकी निर्माण शैली गौथिक है।
रांची
हिल
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यह पहाड़ी रांची शहर के दक्षिण में स्थित है। यहाँ लेफ्टिनेन्ट कर्नल ओसले वर्ष
1939-48 ने एक ग्रीष्मकालीन आवास का निर्माण करवाया था।
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यहाँ एक शिव मन्दिर भी स्थित है। इसलिए यह पहाड़ी पर्यटन एवं धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण
है। यहाँ से सम्पूर्ण रांची का दृश्य दिखाई देता है।
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इसकी ऊँचाई 61मी है। यहाँ पर प्रतिदिन प्रातः
संध्या में आरती और पूजा होती है।
टैगोर
हिल
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यह पहाड़ी रांची के मोरहाबादी नामक स्थान पर स्थित है, इसलिए इसे मोरहाबादी पहाड़ी
भी कहा जाता है।
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रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिरीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे अपने विश्राम स्थल के
रूप में विकसित करने हेतु जमींदार हरिहर सिंह से 23 अक्टूबर, 1908 को खरीदा था ।
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वर्ष 1942 में लेफ्टिनेन्ट कर्नल ओसले ने यहाँ एक रेस्टहाऊस बनवाया था।
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इस हिल के समीप में श्रीरामकृष्ण मिशन आश्रम स्थित है।
रांची
लेक
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यह लेक (झील) 50 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत है। यह रांची शहर का सबसे बड़ा जलाशय है ।
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इसका निर्माण वर्ष 1942 में कर्नल ओसले ने करवाया था। यहाँ पर्यटकों के लिए नौका विहार
की व्यवस्था भी है।
एक्वा
वर्ल्ड (मछली घर)
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यह स्थल रांची राजभवन के पास स्थित है। यहाँ अनेक प्रकार की मछलियों की प्रजातियाँ
रखी गई हैं।
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यहाँ बच्चों के खेलने के लिए पार्क भी बनाया गया है जहाँ बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताओं
का आयोजन भी किया जाता है।
त्रिकूटांचल
आश्रम
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यह आश्रम देवघर से 24 किमी पूर्व में त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। इस आश्रम के अन्दर
एक गुफा है। इस आश्रम की व्यवस्था अरुणाचल मिशन द्वारा की जाती है।
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यहाँ माता पार्वती का मन्दिर भी स्थित है। त्रिकूट पर्वत तीन शिखरों के कारण विशेष
रूप से चर्चित है।
मलूटी
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दुमका से 55 किमी की दूरी पर यह गाँव स्थित है। इसे मन्दिरों का गाँव भी कहा जाता है।
यह द्वारका नदी के तट पर स्थित है।
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इस गाँव में 108 मन्दिर हैं, जिनमें पाषाण काल की प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस
गाँव को पुरातत्व विभाग द्वारा पुरातात्विक प्रांगण के रूप में विकसित किया गया है
।
रॉक
गार्डन
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यह गोंदा पहाड़ी पर कांके रोड पर तथा डैम के बगल में स्थित है। इसी कारण यह मनोरम दृश्य
प्रस्तुत करता है।
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यहाँ पर काफी संख्या में दर्शक आते हैं।
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बनारी यह नेतरहाट से 25 किमी दूरी पर कोयल नदी के तट पर स्थित एक गाँव है।
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यहाँ अनेक पहाड़ियाँ तथा गुफाएँ हैं।
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मान्यता के अनुसार, पाण्डवों द्वारा यहाँ पर कुछ समय बिताया गया था ।
पालकोट
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मान्यताओं के अनुसार, यह रामायण काल का पम्पापुर के नाम से प्रसिद्ध था, जो वानरराज बालि तथा सुग्रीव की राजधानी थी ।
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यहाँ पर अनेक गुफाएँ हैं।
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पम्पापुर की गुफाएँ, झरने, वातावरण, पर्वतीय दृश्य तथा तालाब काफी मनोरम दृश्य प्रस्तुत
करते हैं ।
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यहाँ पर सती बगीचा एवं अन्य और भी कई बगीचें हैं।
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यहाँ से कुछ दूरी पर महाराज जगन्नाथ शाही का राजपरिवार रहता है ।
राज्य के प्रमुख किले
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झारखण्ड के प्रमुख किले निम्न प्रकार हैं
पलामू
किला
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लातेहार जिले की औरंगा नदी के तट पर स्थित इस किले का निर्माण चेरों वंश के शासकों
ने वर्ष 1560 में करवाया था। यहाँ पुराना किला एवं नया किला नामक दो किले हैं।
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किले के अन्दर 4 महल, अनेक मन्दिर और एक मस्जिद है ।
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इस किले का नागपुरी दरवाजा अत्यन्त आकर्षक है। इसकी ऊँचाई 40 फीट तथा चौड़ाई 15 फीट
है।
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पुराने किले का निर्माण चेरोवंशी शासक प्रताप राय और नए किले का निर्माण मेदिनी राय
ने कराया था।
रामगढ़
का किला
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रामगढ़ के किले का निर्माण रामगढ़ के राजा सराय ने करवाया था। यह मुगल शैली में निर्मित
है।
जैतगढ़
का किला
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इस किले का निर्माण पोरहाट के राजा अर्जुन सिंह ने करवाया था।
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यह चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम जिला) से 55 किमी दूर वैतरणी नदी के किनारे जैतगढ़ में
अवस्थित है।
तेलियागढ़ी
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यह प्रसिद्ध किला साहेबगंज के निकट राजमहल पहाड़ी पर स्थित है। इसे बंगाल का प्रदेश
द्वार कहा जाता था ।
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सूर शासक शेरशाह ने 1535 ई. में बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन महमूद को यहाँ पराजित
किया था।
गढ़
बाँध किला
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इस किले का निर्माण रामगढ़ राजवंश के राजा हेमन्त सिंह ने करवाया था। इस किले की स्थापत्य
कला अत्यन्त नवीन है
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इसमें लकड़ी के ऊँचे और नक्काशीदार दरवाजे, किले के चारों ओर बने अर्द्धचन्द्राकार
कमरे आदि प्रसिद्ध हैं। यह रामगढ़ जिले में स्थित है।
रातू
किला
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नागवंशी राजा का यह किला अत्यन्त विशाल है। यह किला रांची में स्थित है। इसका निर्माण
उदयनाथ शाहदेव ने 1870 ई. में करवाया था ।
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इसकी स्थापत्य कला में अंग्रेजी शैली देखने को मिलती है। इसमें दुर्गा एवं जगन्नाथ
स्वामी का मन्दिर भी स्थापित है।
विश्रामपुर
किला
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इसका निर्माण चेरो – राजवंश के सम्बन्धी विश्रामपुर के राजा तड़वन द्वारा करवाया गया
था। इस किले का निर्माण मुगल स्थापत्य कला शैली में किया गया है। इसके निकट एक मन्दिर
भी निर्मित है।
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इस किले एवं मन्दिर के निर्माण में लगभग 9 वर्ष का समय लगा था।
राज्य के प्रमुख मन्दिर
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झारखण्ड के प्रमुख मन्दिरों का वर्णन निम्न हैं
छिन्नमस्तिका
मन्दिर
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यह मन्दिर रामगढ़-बोकारो मार्ग पर रामगढ़ से 38 किमी की दूरी पर स्थित है। रामगढ़ जिले
के राजप्पा में स्थित यह मन्दिर दामोदर और भैरवी नदी (भेड़ा नदी) के संगम पर है।
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इसकी शिल्पकला कामाख्या मन्दिर की शिल्पकला से प्रभावित है।
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छिन्नमस्तिका मन्दिर में देवी काली की धड़ से अलग सर वाली मूर्ति प्रतिष्ठापित है।
यह भारत के प्रसिद्ध 51 शक्ति पीठों में से एक है। इस मन्दिर में महानवमी की पूजा सर्वप्रथम
सन्थाल आदिवासियों द्वारा की जाती है।
वैद्यनाथधाम
मन्दिर
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यह मन्दिर देवघर में स्थित है।
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वैद्यनाथ मन्दिर रावणेश्वर महादेव मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मन्दिर का
निर्माण राजा पूरनमल ने कराया था।
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यहाँ एक त्रिकुट चोटी भी स्थित है।
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इस मन्दिर की सीमा में कुल 12 मन्दिर हैं – वैद्यनाथ, पार्वती, लक्ष्मीनारायण, तारा,
काली, गणेश, सूर्य, सरस्वती, रामचन्द्र, देवी, अन्नपूर्णा और आनन्द भैरव। यहाँ श्रावण
माह में मेला लगता है।
जगन्नाथ
मन्दिर
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इस मन्दिर का निर्माण 1691 ई. में ठाकुर ऐनी शाह ने हटिया (रांची) में कराया था। यह
मन्दिर पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का अनुकरण है।
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यह लगभग 100 फीट ऊँचा है। यहाँ भी रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है, जो आषाढ़ माह में
आयोजित होती है।
वासुकीनाथ
मन्दिर
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यह मन्दिर दुमका-देवघर रोड पर दुमका से 25 किमी की दूरी पर स्थित है। दुमका में स्थित
इस मन्दिर में वैद्यनाथ धाम आने वाले यात्री अवश्य आते हैं।
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इस मन्दिर का निर्माण वासाकी तान्ती ने करवाया था। शिवरात्रि के दिन यहाँ विशाल मेला
लगता है।
आन्जनग्राम
मन्दिर
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यह गुमला जिले के आन्जनग्राम में अवस्थित है। इसे हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है।
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यहाँ देवी अंजनि की मूर्ति स्थापित है। यहाँ चक्रधारी मन्दिर में स्थापित शिवलिंग के
ऊपर चक्र है, जो अपनी शैली का अकेला उदाहरण है।
महादेवशाला
मन्दिर
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भगवान शिव का यह ऐतिहासिक मन्दिर मनोहरपुर और गोरलकेरा स्टेशन के बीच महादेवशाला स्टेशन
के पास अवस्थित है।
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यहाँ श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार तथा शिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है।
सूर्य
मन्दिर
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यह मन्दिर रांची-जमशेदपुर मार्ग पर रांची से 35 किमी की दूरी पर बुण्डू के निकट अवस्थित
है। इसका निर्माण तैमारा घाटी के पास पहाड़ियों और हरे-भरे जंगलों के बीच एक पहाड़ी
पर प्रधान नगर में किया, गया है।
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इस मन्दिर के शिल्पकार एस. आर. एन. कालिया हैं। मन्दिर में भगवान भास्कर की प्रतिमा
स्थापित है। यह मन्दिर रथ की आकृति का है।
कैथा
शिव मन्दिर
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रामगढ़ जिले में स्थित यह मन्दिर भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित
किया जा चुका है। इसका निर्माण रामगढ़ राज परिवार के दलेर सिंह ने 17वीं शताब्दी में
कराया था।
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इस मन्दिर में बंगाल, राजपूत और मुगल स्थापत्य कला शैली का उदाहरण मिलता है।
देवघर
धाम
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यह कोडरमा जिले में घोडसीमर में स्थित है।
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यह लगभग 1 मी गोलाई वाला चार फीट लम्बा शिवलिंग है, जो लगभग छठी सदी का है।
नौलखा
मन्दिर
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यह देवघर जिले में स्थित अपनी स्थापत्य कला के लिए विख्यात है।
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इसके निर्माण में नौ लाख रुपये खर्च हुए थे, जो रानी चारूशिला ने दिए थे।
हरिहर
धाम
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हरिहर धाम गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखण्ड में स्थित है।
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यहाँ श्रावण माह में श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। यहाँ शादी की रस्में भी सम्पन्न
की जाती हैं।
मधुबन
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यह जैनियों का तीर्थस्थल है। यह पारसनाथ पहाड़ी की तलहटी पर बसा है। यहाँ अनेक जैन
मन्दिर बने हैं।
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यहाँ 2000 वर्ष पुराने मन्दिर हैं। यहाँ के प्रमुख मन्दिर सोमाशरण, भोमिया जी, श्वेताम्बर
मन्दिर, आदिनाथ, नन्दीश्वर तथा चैत्यालय हैं।
केतार
सिद्धपीठ
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गढ़वा से 65 किमी दूर अवस्थित इस पीठ में दुर्गा की प्रसिद्ध प्रतिमा है।
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यहाँ एक माह तक चलने वाला चैत्र नवमी का मेला लगता है।
बिन्दु
धाम
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यह एक शक्तिपीठ धाम है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र रामनवमी के अवसर पर 15 दिनों का मेला
लगता है।
कन्हैया
स्थान
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यह राजमहल से 13 किमी की दूरी पर गंगा के तट पर स्थित है। इसमें कृष्ण की मूर्ति स्थापित
है।
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चैतन्य महाप्रभु इस मन्दिर में ठहरे थे तथा मान्यता है कि यहाँ उन्होंने भगवान कृष्ण
का साक्षात् दर्शन किया था।
मृगेश्वर
महादेव
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झारखण्ड तथा ओडिशा की सीमा पर चाईबासा से 70 किमी दूर इस स्थल पर श्रद्धालु श्रावण
माह में जल चढ़ाने तथा बच्चों का मुण्डन करवाने आते हैं।
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मृगेश्वर महादेव को मुर्गामहादेव भी कहा जाता है।
काली
मन्दिर
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यह रांची में चर्च रोड पर स्थित है। इस मन्दिर की स्थापना 19वीं शताब्दी में करुणामय
बनर्जी द्वारा की गई थी ।
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वर्ष 1915 में जानकीवल्लभ मिश्र ने इस मन्दिर का नाम काली स्थान रखा था।
देवड़ी
मन्दिर
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यह मन्दिर रांची जिले के तमाड़ प्रखण्ड से 3 किमी दूरी पर देवड़ी गाँव में स्थित है
।
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यहाँ 16 भुजा वाली देवी की मूर्ति स्थापित है। यह मन्दिर पालवंशियों ने 770-850 ई.
के मध्य बनवाया था।
भद्रकाली
मन्दिर
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यह मन्दिर चतरा जिले के भदुली गाँव में स्थित है। यहाँ चार फीट ऊँची माँ भद्रकाली की
मूर्ति स्थापित है जो एक ही शिलाखण्ड में तराशी गई है। इस मन्दिर का प्रांगण 196 एकड़
का है जिसमें एक यज्ञशाला और संग्रहालय निर्मित है।
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संग्रहालय में इस मन्दिर प्रांगण के उत्खनन से प्राप्त 418 मूर्तियाँ व अवेशष रखे गए
हैं।
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यहाँ कोठेश्वरनाथ स्तूप भी स्थित है, जिसके चारों ओर भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ अंकित
हैं।
माँ
कुलेश्वरी मन्दिर
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यह मन्दिर चतरा जिले के दक्षिण-पश्चिम में 1575 फीट ऊँचे कोल्हुआ पहाड़ पर स्थित है
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इस मन्दिर में माँ दुर्गा की स्वरूप माँ कुलेश्वरी देवी की काले पत्थर की ढाई फीट ऊँची
मूर्ति स्थापित है।
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कई जैन धर्मावलम्बियों का यह मानना है कि इस पर्वत शिखर को 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ
तथा महापुराण रचयिता आचार्य जिनसेन ने अपना साधना स्थल बनाया था।
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यहाँ कई स्थानों पर भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ भी उकेरी गई हैं। इसी कारण यह स्थान हिन्दू,
बौद्ध और जैन धर्म का संगम स्थल माना जाता है।
माँ
योगिनी मन्दिर
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यहः मन्दिर गोड्डा में बाराकोपा पहाड़ी पर स्थित है।
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यहाँ पर भक्तों द्वारा लाल वस्त्र चढ़ाए जाते हैं। यहाँ कि ऐसी मान्यता है कि यहाँ
पर सती माता का दाहिना जाँघ गिरा था। यहाँ पर जाँघ की आकृति का शैल अंश है, जो प्रतिमा
स्वरूप है, इसलिए यह मन्दिर सती माता के नाम से प्रसिद्ध है।
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इस मन्दिर का निर्माण रानी चारूशिला देवी ने करवाया था ।
हल्दी
घाटी मन्दिर
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यह मन्दिर कोरांबे ( गुमला ) ग्राम में स्थित है।
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यह स्थान नागवंशी राजाओं तथा रक्सेल राजाओं के लिए हल्दीघाटी के मैदान की तरह था ।
इस मन्दिर की स्थापना 1470 ई. में नागवंशी राजा चेतकर्ण ने करवाई थी।
महामाया
मन्दिर
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यह मन्दिर लोहरदगा के हारडीह नामक ग्राम में स्थित है। इसका निर्माण नागवंशी राजा गजघण्ट
ने 908 ई. में कराया था ।
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यहाँ काली माँ की मूर्ति स्थापित है, जिसे मंजूषा में बन्द रखा जाता है।
> ऐसी मान्यता है कि मूर्ति (देवी माँ) को किसी ने प्रत्यक्ष आँख से देख लिया, तो उसकी आँखों की रोशनी चली जाती है। इसी कारण पुजारी आँखों पर पट्टी बाँधकर पूजा करते हैं ।