12th Hindi Core 5. सहर्ष स्वीकारा है JCERT/JAC Reference Book

12th Hindi Core 5. सहर्ष स्वीकारा है JCERT/JAC Reference Book

 

12th Hindi Core 5. सहर्ष स्वीकारा है JCERT/JAC Reference Book

5. सहर्ष स्वीकारा है

गजानन माधव मुक्तिबोध जीवन परिचय -

1. जन्म- 13 नवंबर 1917

स्थान - श्योपुर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश

निधन - 11 सितंबर 1964 हबीब गंज (भोपाल)

पिता - माधवराव

माता - पार्वती बाई पत्नी शांता (प्रेम विवाह)

2. शिक्षा - आरम्भिक (उज्जैन) बी ए (1938) इंदौर, एम ए (1954) नागपुर विश्वविद्यालय।

3. लेखन - कहानी, कविता, निबंध, आलोचना, इतिहास आदि विधाओं में साहित्य सृजन ।

कविता संग्रह - चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी भूरी खाक धूल तथा तार सप्तक में रचनाएं प्रकाशित।

कहानी संग्रह - काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी ।

आलोचना - कामायनी एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म संघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र।

आत्मकथा - एक साहित्यिक की डायरी ।

इतिहास - भारत : इतिहास और संस्कृति।

सम्पूर्ण रचना- (छह खंडों में) मुक्तिबोध रचनावली

4. आजीविका- 'नया खून' साप्ताहिक का लंबे समय तक संपादन करने के साथ -साथ उज्जैन के मॉडर्न स्कूल एवं राजनंद गांव के दिग्विजय कॉलेज में अध्यापन कार्य किया।

साहित्यिक विशेषताएं

1. मुक्तिबोध नई कविता के प्रमुख कवि हैं उनके संवेदना एवं ज्ञान का दायरा बहुत व्यापक है गहन विचार शीलता और विशिष्ट भाषा शैली के कारण उनके साहित्य की एक अलग पहचान है।

2. मुक्तिबोध का पूरा जीवन संघर्षों तथा विरोधों से भरा रहा है। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया जिसका असर उनकी कविताओं पर दिखाई देता है।

3. उनके साहित्य में स्वतंत्र भारत के निम्न मध्यम वर्ग की जिंदगी के कष्टों तथा विडंबनाओं का चित्रण हुआ है। उनकी प्रवृत्ति कविता लेखन के साथ-साथ गद्य लेखन आलोचना और गंभीर चिंतन के रूप में रही है।

4. उनके साहित्य की एक बड़ी विशेषता आत्मा लोचन की प्रवृत्ति है। उनकी आरंभिक रचनाएं माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित "कर्मवीर” मैं प्रकाशित हुई। 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित तार सप्तक में उनकी 16 कविताएं छपी। साथ ही उनके साहित्य संबंधी मान्यताएं भी पढ़ने को मिली - "मेरे बाल मन की पहली भूख सौंदर्य और दूसरी विश्व मानव का सुख दुख इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी"।

5. मुक्तिबोध की काव्य भाषा के कई स्तर प्राप्त होते हैं क्योंकि इनकी काव्य की प्रकृति विकासशील है। अतः उनकी भाषा का कई स्तर होना स्वाभाविक है। उन्होंने अपनी कविता के लिए शब्द साधना के नवीन बिंब, प्रतीक और अर्थ गढ़े।

6. बोलचाल की साधारण शब्द प्रयोगों के बीच सामासिक एवं संस्कृत निष्ठ शब्द आ जाते हैं। साथ ही उर्दू, अरबी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।

काव्यांश - 1

ज़िंदगी में जो कुछ है, जो भी है

सहर्ष स्वीकारा है;

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा है।

गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब

यह विचार-वैभव सब

दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब

मौलिक है, मौलिक है

इसलिए कि पल-पल में

जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है-

संवेदन तुम्हारा है।

2. शब्दार्थ- सहर्ष स्वीकारा है- खुशी-खुशी स्वीकार है, गरबीली- अहंकारी, गंभीर अनुभव- जीवन का व्यावहारिक ज्ञान, विचार वैभव - गंभीर ज्ञान राशि, अभिनव- नूतन, नया, मौलिक- स्वरचित, जागृत- चेतन अपलक - पलक न जाना झपकाना, संवेदन - अनुभूति।

3. प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग-2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता के इस अंश में कवि अपने प्रिय को संबोधित कर रहे हैं।

4. भावार्थ -

1. उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि मेरी जिंदगी में जो कुछ भी है सुख-दुख, अच्छा -बुरा, खट्टा मीठा यानि जो कुछ भी है। मैंने उन सभी को अपने जीवन में खुशी-खुशी स्वीकार किया है क्योंकि तुमने मुझे मेरी अच्छाइयों - बुराइयों, कमियों - खूबियों के साथ अपनाया है। मुझसे प्रेम किया है।

2. मेरी यह गरीबी, जिस पर सदा मैंने गर्व किया है। मेरे पास विचारशीलता की जो संपदा है, जो दृढ़ता है, संवेदना है, वह सब मेरा अपना है क्योंकि हर पल मेरे जीवन में जो कुछ भी सजीव और जागृत है, उसमें तुम्हारी संवेदना छुपी हुई है जो मुझे सबकुछ सहर्ष (खुशी-खुशी) स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है।

5. विशेष - इन पंक्तियों में कवि ने प्रिय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है। भाषा साहित्यक खड़ी बोली है। तत्सम बहुल शब्दावली है। "सहर्ष-स्वीकारा" में अनुप्रास अलंकार, पल-पल में पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार है। साथ में मुक्तक छंद का प्रयोग किया गया है। सर्वथा नवीन उपनामों का प्रयोग द्रष्टव्य है।

काव्यांश - 2

जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है

जितना भी उड़ेलता हूँ, भर - भर फिर आता है

दिल में क्या झरना है?

मीठे पानी का सोता है

भीतर वह, ऊपर तुम

मुस्काता चाँद ज्यों धरती पर रात - भर

मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

शब्दार्थ - रिश्ता - संबंध, उड़ेलना - न्योछावर कर देना, सोता- स्रोत ।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग -2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता के इस अंश में कवि अपने भीतर बैठे स्नेह की गंभीरता का वर्णन कर रहे हैं।

भावार्थ - उपरोक्त पंक्तियों में कवि अपने प्रिय से अपने गहरे रिश्ते को प्रकट कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि मेरे और तुम्हारे बीच में क्या संबंध है, मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूं। लेकिन मैं जितना भी तुम्हारे प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करता हूँ उतना ही मेरा दिल प्रेम से भर जाता है।

और अब तो मुझे ऐसा लगने लगा है जैसे मेरे दिल में प्रेम का कोई झरना बह रहा हो। या मीठे पानी का कोई सोता बह रहा हो। यहाँ पर कवि ने अपने दिल की तुलना मीठे पानी के झरने से की है। जो सदैव प्रेम रुपी जल से भरा रहता है।

कवि अपने प्रिय के प्रेम से न केवल अपने अंतर्मन बल्कि बाहरी रूप से भी भीगा हुआ महसूस करते हैं।

जिस तरह आसमान में चमकते हुए चांद की चांदनी रात भर धरती को रोशनी व शीतलता प्रदान करती है ठीक उसी प्रकार उनके प्रिय के खिलते हुए चेहरे की मुस्कुराहट उन पर हरदम छाई रहती हैं और उनको प्रेरणा देती रहती हैं।

विशेष - भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। "जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है" में संदेह अलंकार है। "जितना भी उड़ेलता हूँ, भर भर फिर आता है" में विरोधाभास अलंकार है। "दिल में क्या झरना है?" में प्रश्न अलंकार और "मुस्काता चाँद ज्यों धरती पर रात - भर" में उत्प्रेक्षा अलंकार है। "भर भर" में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। मुक्त छंद रचना होते हुए भी कविता में गेयता और लय विधमान है।

काव्यांश - 3

सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं

भूलूँ मैं तुम्हें भूल जाने की

दक्षिण ध्रुवी अंधकार - अमावस्या

शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं

झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं

इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित

रहने का रमणीय यह उजेला अब

सहा नहीं जाता है।

नहीं सहा जाता है।

शब्दार्थ- अमावस्या - जिस दिन चंद्रमा दिखाई नहीं देता, अंतर - हृदय, परिवेष्टित- घिरा हुआ, आच्छादित- ढका हुआ, अक्षम - सामर्थ्य हीन, भवितव्यता- भविष्य की आशंका, आत्मीयता - अपनापन।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग -2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता के इस अंश में कवि प्रेम से बाहर निकलने की इच्छा को व्यक्त किया है।

भावार्थ - कवि अपने प्रिय से कहता है कि तुम मुझे इतना दंडित करो कि मैं निराश होकर तुमको भूल जाऊं। वह यह भी जानते हैं यदि मैंने तुमको भुला दिया तो मेरे जीवन में प्रकाश की कोई किरण शेष नहीं रह जाएगी। मेरा जीवन वैसे ही अंधकारमय हो जाएगा जैसा अंधकार दक्षिणी ध्रुव पर अमावस्या के दिन होता है। मेरे जीवन की यह निराशा शरीर, मुख और हृदय सब ओर से मुझे घेर ले। मैं पूरी तरह से इस अंधकार में डूब जाऊं। कवि आगे कहते हैं कि मैं यह इच्छा क्यों करूं क्योंकि मेरे जीवन में सब ओर से तुम्हारा ही प्रकाश है।

यहाँ तक कि वो अपने जीवन के हर पहलू व अपने व्यक्तित्व को भी अपने प्रिय के प्रभाव से प्रभावित मानते हैं। उनके विचारों की सुंदरता और व्यक्तित्व में आयी दृढ़ता, जीवन में सीखे गंभीर अनुभव, उनके मन के भीतर बहने वाली भावों की सरिता (नदी) सब कुछ उनके प्रिय के कारण ही हैं।

विशेष- कविता के इस अंश में प्रिय से भूल जाने की कल्पना नूतन है। कवि यहां प्रेम की अधिकता से बाहर आना चाहते हैं। अनुप्रास अलंकार है। संस्कृत शब्दों की अधिकता है। भाषा खड़ी बोली हिंदी है। अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

काव्यांश - 4

ममता के बादल की मँडराती कोमलता

भीतर पिराती है

कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह

छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है

बहलाती - सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है।

शब्दार्थ- पिराती- तकलीफ होना ,आत्मीयता- अपनापन, भवितव्यता- भविष्य की आशंका।

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग-2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता के इस अंश में कवि प्रिय को दृढ़ता से भूल जाने का वर्णन किया है।

भावार्थ - उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि हे प्रिय। तुम्हारे प्रेम के बादल जो मँडरा कर हमेशा मेरे ऊपर प्रेम की वर्षा करते रहते हैं। अब ये सब मुझे भीतर ही भीतर पीड़ा देते हैं। जिस कारण मेरी अंतरात्मा भी कमजोर और क्षमताहीन हो गई हैं। अब हर बात पर तुम्हारा मुझे बहलाना, सहलाना और आत्मीयता दिखाना, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है। क्योंकि कवि को लगता है यह सब कुछ क्षणिक है और उनका प्रिय एक ना एक दिन उनको छोड़कर चला जाएगा, कल्पना मात्र से ही कवि को डर लगता है।

विशेष - यहां पर कवि प्रेम की अतिशयता से बाहर आना चाहते हैं। भाषा संस्कृत निष्ठ है। खड़ी बोली है। अनुप्रास, रूपक एवं मानवीकरण अलंकार एवं नवीन उपमानों का सुंदर प्रयोग हुआ है।

काव्यांश - 6

सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ

पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में

धुएँ के बादलों में

बिलकुल मैं लापता

लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है !!

शब्दार्थ – पाताल- धरती के नीचे, गुहा -गुफा, लापता- गुम, विवर – बिल, छेद ।

प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग-2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता के इस अंश में कवि प्रेम से बाहर निकलने की इच्छा को व्यक्त किया है।

भावार्थ - उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं तुम्हारी स्मृति रुपी पाताली गुफाओं में खो जाऊं। भले ही वह दंड पाकर मुझे कष्ट होगा फिर भी मैं तुम्हारे विस्मृति रूपी धुएं के बादलों में खोजाना चाहता हूं लेकिन इन बादलों में भी मुझे तुम्हारा ही सहारा मिल रहा है। अर्थात् यहां भी मैं अनुभव कर रहा हूं कि मेरे जीवन में जो भी प्रकाश विद्यमान है, सभी कुछ तुम्हारे कारण संभव हुआ है। अतः मैं हर स्थिति को तुम्हारी खुशी के लिए सहर्ष स्वीकार करता हूं।

विशेष - साहित्यक खड़ी बोली है। छंद मुक्त रचना होते हुए भी काव्य में एक लय विद्यमान है। कविता में संबोधन शैली का और तत्सम तद्भव शब्दावली का प्रयोग हुआ है। "ममता के बादल" में रूपक और "मँडराती कोमलता, छटपटाती छाती, बहलाती सहलाती आत्मीयता" में अनुप्रास अलंकार है।

काव्यांश - 7

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

या मेरा जो होता सा लगता हैं, होता सा संभव है

सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव है

अब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है

सहर्ष स्वीकार है

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा हैं।

शब्दार्थ - वैभव - संपति

प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह-भाग-2' में संकलित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'सहर्ष स्वीकारा है' से लिया गया है। कविता कि इस अंश में कवि अपने प्रिय के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

भावार्थ -

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि वर्तमान में जो कुछ भी मेरे पास है और भविष्य में जो कुछ भी मेरे पास होगा। वह सब कुछ तुम्हारी ही प्रेरणा से मेरे जीवन में सम्भव होगा।

और मैने अपनी जिंदगी में जो कुछ भी सुंदर या अच्छे कार्य किये है। यानि मैंने जो कुछ भी पाया है उसकी प्रेरणा भी तुम ही हो। अब तक जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है। मैने उसे सहर्ष स्वीकारा है।

इसीलिए कि जो कुछ भी मेरा है वह तुम्हें प्यारा है। यानि तुमने मुझे मेरी कमियों, मेरी खूबियों के साथ स्वीकार किया है। मेरे सुख-दुखों को स्वीकार किया, मेरे जीवन के उतार-चढ़ावों में मेरा साथ दिया है। इसीलिए यह सब मुझे भी स्वीकार है।

विशेष- भाषा साहित्यक खड़ी बोली है। मुक्तक छंद का प्रयोग किया गया हैं। "कारण के कार्यों, सहर्ष स्वीकारा है" में अनुप्रास अलंकार है। "होता सा" में उपमा अलंकार है।

प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1. टिप्पणी कीजिएः गरबीली गरीबी, भीतर की सरिता, बहलाती सहलाती आत्मीयता, ममता के बादल।

उत्तर

(क) गरबीली गरीबी -

इसका बहुत गहरा अर्थ है। प्रायः एक गरीब आदमी अपनी गरीबी से परेशान तथा हताश रहता है। उसे अपनी गरीबी पर दुख होता है। निराशा उसके चारों तरफ कायम रहती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए गरीबी दुख का कारण नहीं होती बल्कि अभिमान का कारण होती है। कवि ऐसे ही लोगों में से एक है। अतः उसने गरीबी को गरबीली गरीबी कहा है यानि अभावग्रस्त मगर सम्मान पूर्ण जिंदगी। कवि को अपनी गरीबी या अभावग्रस्त जिंदगी पर भी गर्व है। क्योंकि वो अपनी जिंदगी को पूर्ण आत्मसम्मान व स्वाभिमान के साथ जीते हैं।

(ख) भीतर की सरिता -

व्यक्ति के मन के भीतर जन्म लेने वाली कोमल भावनाओं को कवि ने "भीतर की सरिता" का नाम दिया है। तात्पर्य प्रेम रूपी भावना से है। यह प्रेम हृदय के अंदर नदी के समान प्रवाहित होता है। जैसे नदी मनुष्य के जीवन का पालन-पोषण करती है, वैसे ही प्रेम की भावना मनुष्य का तथा उसके आपसी संबंधों का पालन-पोषण करती है।

(ग) बहलाती, सहलाती, आत्मीयता-

जब व्यक्ति किसी से बहुत अधिक प्रेम करता हैं तो वह उसे विपरीत परिस्थितियों में धैर्य दिलाने की कोशिश करता हैं। उससे प्रेमपूर्ण व्यवहार कर उसकी परेशानियों को दूर करने का प्रयास करता है। लेकिन इन पंक्तियों में कवि के इस व्यवहार के प्रति शिकायती भाव भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। कवि को हर समय प्रेमिका की बहलाने और सहलाने वाला व्यवहार पसंद नहीं आता होगा।

(घ) ममता के बादल-

अपने प्रियजनों के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करना या अपने प्रियजनों से अत्यधिक प्रेम करना। दुःख की घड़ी में अपने इष्ट द्वारा किये गये ममत्व के व्यवहार से सुकुन मिलता है।

प्रश्न 2. इस कविता में और भी टिप्पणी-योग्य पद-प्रयोग हैं। ऐसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख कर उस पर टिप्पणी करें।

उत्तर- इसमें कवि ने अपने हृदय के अंदर स्नेह तथा प्रेम की भावनाओं को मीठे पानी का सोता कहा है। उसने स्नेह तथा प्रेम की भावनाओं की झरने से तुलना की है।

प्रश्न 3. व्याख्या कीजिए।

जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है

जितना भी उँड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है

दिल में क्या झरना है?

मीठे पानी का सोता है

भीतर वह, ऊपर तुम

मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर

मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या करते हुए यह बताइए कि यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार-अमावस्या में नहाने की बात क्यों की गई है?

उत्तर- कवि कहता है कि प्रिय तुम्हारा मेरा संबंध बड़ा अजीब है। मुझे यह समझ नहीं आता है। इसकी गहराई इससे ही पता चलता है कि मैं जितना प्रेम तुम्हें देता हूँ उसके बाद भी वह फिर आ जाता है। अर्थात् जितना प्रेम तुम पर उड़ेलता हूँ मैं फिर से प्रेममय हो जाता हूँ। कवि कहता है कि अपने हृदय की इस स्थिति से मैं विस्मित हूँ। मुझे समझ नहीं आता है कि यह सब क्या हो रहा है। मेरे हृदय में यह कहाँ से आ रहा है। मेरे हृदय में कब से यह मीठे पानी के झरने रूपी भावनाएँ संचारित हो रही हैं। इस झरने की विशेषता है कि यह कभी न समाप्त होने वाला है। इन सबके मध्य मुझे ज्ञात हुआ है कि मेरे हृदय में प्रेमरूपी जल का सोता बह रहा है और बाहर तुम मेरे जीवन में हो। तुम्हारा सुंदर खिलता हुआ चेहरा मेरे जीवन को इसी प्रकार प्रकाशित कर रहा है, जैसे चाँद रातभर धरती को प्रकाशित करता है। यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार-अमावस्या में नहाने की बात की गई क्योंकि कवि जीवन के धरातल में व्याप्त सच्चाई को भली प्रकार से जानता है। उसके जीवन में जो भी खुशियों के पल हैं, वे सब उसकी प्रेमिका के संग के कारण हैं। यदि प्रेमिका का प्यार न रहे, तो जीवन में व्याप्त दुख उसे छिन्न-भिन्न कर दे। कवि ने दुख को अंधकार की संज्ञा दी है।

प्रश्न 4.

तुम्हें भूल जाने की

दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या

शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं

झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं

इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित

रहने का रमणीय यह उजेला अब

सहा नहीं जाता है।

(क) यहाँ अंधकार-अमावस्या के लिए क्या विशेषण इस्तेमाल किया गया है उससे विशेष्य में क्या अर्थ जुड़ता है?

(ख) कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में किस स्थिति को अमावस्या कहा है?

(ग) इस स्थिति से ठीक विपरीत ठहरने वाली कौन-सी स्थिति कविता में व्यक्त हुई है? इस वैपरीत्य को व्यक्त करने वाले शब्द का व्याख्यापूर्वक उल्लेख करें।

(घ) कवि अपने संबोध्य (जिसको कविता संबंधित है कविता का 'तुम) को पूरी तरह भूल जाना चाहता है, इस बात को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने के लिए क्या युक्ति अपनाई है?

रेखांकित अंशों को ध्यान में रखकर उत्तर दें।

उत्तर-

(क) यहाँ अंधकार-अमावस्या के लिए दक्षिणी ध्रुव विशेषण का प्रयोग किया गया है। इससे विशेष्य में व्याप्त जो कालिमा है, वह और भी काली प्रतीत होती है। दक्षिणी ध्रुव में 6 महीने तक सूर्योदय नहीं होता है। अतः वहाँ कभी न समाप्त होने वाला काला अंधकार व्याप्त रहता है।

(ख) कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में दुख के समय को अमावस्या कहा है। जिस प्रकार अंधकार पूरे संसार को ढक लेता है, वैसे ही दुख रूपी अंधकार कवि के शरीर तथा आत्मा को ढक लेना चाहता है।

(ग) कविता की पंक्तियाँ जो प्रश्न में दी गई हैं, वहाँ पर अंधकार-अमावस्या की बात की गई है। लेकिन पंक्ति में जो 'रमणीय उजेला' शब्द है, वह इसके ठीक विपरीत स्थिति है। जिस प्रकार दुख रूपी अंधकार अमावस्या कवि के जीवन में व्याप्त है, वैसे ही प्रिय का सुंदर चेहरा उस प्रकाश के समान है, जो इस अंधेरे को उसके जीवन में गहराने नहीं देता है। उसे प्रकाशित करता रहता है।

(घ) कविता में संबोधित यह 'तुम' लेखक की प्रेमिका है। अपनी प्रेमिका को भूल जाने के लिए कवि ने अपनी बात को और भी प्रभावी रूप से इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त की है। उसने भूल जाने की, उसके जीवन में प्रेमिका के प्रभाव को उतार लेने, उसे झेलने तथा नहा लेने रूपी युक्तियाँ अपनाई हैं

प्रश्न 5. बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है-और कविता के शीर्षक सहर्ष स्वीकारा है में आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं। चर्चा कीजिए।

उत्तर - इसके अंदर व्याप्त अंतर्विरोध हम इस प्रकार पाते हैं। एक तरफ कवि अपनी प्रेमिका के आत्मीय संबंध से सुखी दिखाई देता है। उसे लगता है कि प्रेमिका का आत्मीयपन उसके जीवन में समा चूका है। उसके चेहरे मात्र से ही अपने जीवन को प्रकाशित मानता है। लेकिन दूसरे ही पल वह लेखिका की आत्मीयता को सह नहीं पाता। उसे प्रेमिका का अधिक बहलाना और सहलाना अखरने लगता है। उसे यह व्यवहार कष्ट देता है। लेकिन इसके बिना वह जी भी नहीं पाता। इस प्रकार की स्थिति को ही अंतर्विरोध कहते हैं। जहाँ किसी चीज़ के बिना मनुष्य रह नहीं सकता और फिर उससे कष्ट भी पाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. इस अवतरण के कवि तथा कविता का नाम लिखिए।

उत्तर: इस अवतरण के कवि का नाम गजानन माधव मुक्तिबोध हैं तथा कविता का नाम 'सहर्ष स्वीकारा है' है।

प्रश्न 2. कवि ने अपने जीवन में क्या-क्या स्वीकार किया है?

उत्तरः कवि ने अपने जीवन में गर्वयुक्त गरीबी, गंभीर अनुभव, विचार-वैभव, दृढ़ता आदि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया है।

प्रश्न 3. कवि को गरीबी कैसी लगती है और क्यों?

उत्तरः कवि को गरीबी गर्वीली लगती है क्योंकि उसे गरीबी भी उसके प्रेरणास्रोत प्रभु द्वारा प्राप्त हुई है।

प्रश्न 4. इस कविता का काव्य सौंदर्य लिखिए।

उत्तरः रहस्यवादी भावना का चित्रण हुआ है।

खड़ी बोली का प्रयोग है। माधुर्म गुण संपन्न भाषा है।

संस्कृत के तत्सम, तद्भव और विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग है।

शांत रस की प्रधानता है।

अनुप्रास, रूपक और उपमा स्वरमैत्री अलंकारों की छटा दर्शनीय है। रहस्यमयी भावना मुखरित हुई है।

बिंब - योजना अत्यंत सरल है। छंद मुक्त रचना होते हुए भी कविता में लय विधमान है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 5. कवि के भीतर कौन पीड़ा पहुँचाती है?

उत्तरः कवि के भीतर ममता के बादल की मँडराती हुई कोमलता पीड़ा पहुँचाती है।

प्रश्न 6. कवि की आत्मा कैसी हो गई?

उत्तरः कवि की आत्मा कमज़ोर और अक्षम हो गई है।

प्रश्न 7. अब कवि को क्या बरदाश्त नहीं होती?

उत्तरः अब कवि को बहलाती, सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती।

प्रश्न 8. कवि किससे दंड की प्रार्थना करते हैं और क्यों?

उत्तरः कवि प्रभु से दंड की प्रार्थना करते हैं क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में उन्हें भूलने की भूल की है।

प्रश्न 9. इस उपर्युक्त काव्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

काव्य-सौंदर्य

आत्माभिव्यंजना का सजीव चित्रांकन हुआ है।

खड़ी बोली का प्रयोग है।

मुक्तक छंद का प्रयोग है।

तत्सम, तद्भव एवं विदेशी शब्दावली का प्रयोग है।

अनुप्रास, रूपक, उपमा पदमैत्री अलंकारों का प्रयोग हुआ है।

बिंब-विधान अतीव सुंदर एवं सटीक है।

प्रश्न 10. कवि के व्यक्तिगत संदर्भ में किसे 'अमावस्या' कहा गया है?

उत्तरः कवि के व्यक्तिगत संदर्भ में प्रतिकूल परिस्थितियों एवं पीड़ा को अमावस्या कहा गया है। कवि के जीवन में अपार दुख एवं समस्याओं ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था।

प्रश्न 11. 'अमावस्या' के लिए प्रयुक्त विशेषणों का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तरः कवि के व्यक्तिगत संदर्भ में प्रतिकूल परिस्थितियों एवं पीड़ा को अमावस्या कहा गया है। कवि के जीवन में अपार दुख एवं समस्याओं ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था।

12. 'रमणीय उजेला' क्या है और कवि उसके प्रश्न स्थान पर अंधकार क्यों चाह रहा है?

उत्तर: रमणीय उजेला से तात्पर्य प्रिय की कृपा का प्रतिफल है जो सुख, आनंद से परिपूर्ण है।

प्रश्न 13. 'तुम से ही परिवेष्टित आच्छादित' - यहाँ 'तुम' कौन है? आप ऐसा क्यों मानते हैं?

उत्तरः यहाँ तुम कवि का प्रिय है। कवि ने कविता अपने प्रिय को संबोधित करके कही है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी

1. मुक्ति बोध का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

क. 13 नवंबर सन् 1917 ग्वालियर

ख. 13 नवंबर सन् 1916 भोपाल

ग. 13 नवंबर सन् 1911 उज्जैन

घ. 13 नवंबर सन् 1918 बनारस

2. मुक्ति बोध की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी?

क. 11 सितंबर सन् 1964 दिल्ली

ख. 11 सितंबर सन् 1965 लखनऊ

ग. 12 सितंबर सन् 1964 भोपाल

घ. 11 सितंबर सन् 1970 प्रयाग

3. "सहर्ष स्वीकारा है" का शाब्दिक अर्थ है-

क. दुःख के साथ है

ख. खुशी के साथ है

ग. खुशी से अपनाया है

घ. इनमें से कोई नहीं

4. मुक्ति बोध को किस युग का कवि माना जाता है-

क. आधुनिक प्रयोगवादी युग

ख. छायावादी युग

ग. द्विवेद्वी युग

घ. ये सभी

5. भूरि-भूरि खाक धूल, चाँद का मुँह टेढ़ा है, कविता संग्रह है-

क. मुक्ति बोध

ख. निराला

ग. बच्चन

घ. दिनकर

6. कवि ने किसको सहर्ष स्वीकार किया है-

क. लाभ-हानि

ख. अच्छा-बुरा

ग. सुख-दुःख

घ. कोई नहीं

7. कवि अपने प्रेरक व्यक्तित्व किसको मानता है?

क. माँ

ख. बहन

ग. प्रेमिका

घ. ये सभी

8. कवि किसको भुला देना चाहता है--

क. अपने प्रेरक को

ख. भाई को

ग. पिता को

घ. माँ को

9. कवि के हृदय में कैसा चेहरा बसा हुआ है-

क. हँसता हुआ

ख. दुःख भरा

ग. रोता हुआ

घ. ये सभी

10. कवि चाहकर भी किसको नहीं भूल सकता है-

क. प्रणेता को

ख. प्रेमिका को

ग. ईश्वर को

घ. पत्नी को

11. बहलाती सहलाती आत्मीयता कैसी आत्मीयता है?

क. संदेशपूर्ण

ख. सांत्वना देने वाली

ग. दुःखद

घ. विचार प्रदान करने वाला

12. 'ममता के बादल' कैसे बादल होते हैं?

क. वर्षा के

ख. आँधी के

ग. प्रेम के

घ. गर्जना के

13. कवि ने अंधकार को कैसा कहा है?

क. दक्षिणी ध्रुवी

ख. उत्तरी ध्रुवी

ग. पूर्वी ध्रुवी

घ. पश्चिमी ध्रुवी

14. कवि से क्या नहीं सहा जाता है?

क. गहन अंधकार

ख. रमणीय उजाला

ग. धूप में खड़ा होना

घ. शोर-शराब

15. 'सहर्ष स्वीकारा है' में ग़रीबी को माना गया है?

क. कष्टकारी

ख. रंगीली

ग. गरबीली

घ. श्राप

16. पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में-यहाँ 'विवरों' का अर्थ है-

क. बादल

ख. बिल

ग. गुफा

घ. शिविर

17. 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता में कवि ने अपनी प्रियतमा के चेहरे की तुलना किससे की है?

क. कमल से

ख. आने से

ग. चाँद से

घ. आकाश से

18. 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता के अनुसार ममता के बादल की मंडराती कोमलता कहाँ पिराती है?

क. बाहर

ख. भीतर

ग. बीच

घ. सर्वत्र

19. 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता में बहलाती सहलाती आत्मीयता क्या नहीं होती है?

क. बर्दाश्त

ख. फालतू

ग. जहरीली

घ. कम

20. भीतर की सरिता का अर्थ है-

क. मनोभाव

ख. अशांति

ग. क्रांति

घ. जमीनी नदी


Post a Comment

Hello Friends Please Post Kesi Lagi Jarur Bataye or Share Jurur Kare