6. उषा
कवि परिचय
जीवनकाल - 13 जनवरी 1911
मृत्युकाल - 12 मई 1993
जन्म-स्थल - देहरादून (उत्तराखंड)
मृत्यु- स्थल अहमदाबाद
माता
- परम देवी
पिता
- तारीफ सिंह
उपाधि-
कवियों का कवि - अज्ञेय
मूड्स का कवि -मलयज
हिंदी-उर्दू का दोआब - स्वयं कहा
संपादन
रुपाभ (1939 में इलाहाबाद शाखा में)
कहानी (1940 त्रिलोचन के साथ)
नया साहित्य (1946, मुंबई)
माया (1948-54 सहायक संपादक)
नया पथ
मनोहर कहानियाँ
'उर्दू-हिन्दी कोष' शब्द कोष का संपादन
साहित्यिक परिचय
प्रगतिशील और शिल्प के स्तर पर प्रयोग धार्मि कवि शमशेर की
पहचान एक बिंबधर्मी कवि के रूप में।
नए बिंब नए प्रतीक नए उपमान कविता के उपकरण
पुराने उपमान में भी नए अर्थ की चमक भरने का प्रयास
दूसरा सप्तक के कवि
काव्य संग्रह-
कुछ कविताएँ (1959)
कुछ और कविताएँ (1961)
चुका भी हूँ नहीं मैं (1975)
इतने अपने पास (1980)
अदिताः अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980)
बात बोलेगी, हम नहीं (1981)
काल तुमझें होड़ है मेरी (1988)
कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ (1995)
सुकुन की तलाश (1998)
प्रसिद्ध कविताएँ
अमन का राग (1952)
टूटी हुई बिखरी हुई
एक पीली शाम (1953)
समय साम्यवादी आदि।
गद्य रचनाएं
दो आब (निबंध संग्रह)
कुछ गद्य रचनाएं
कछ और गद्य रचनाएं
रिपोतार्ज प्लाट का मोर्चा
सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार 'चुका भी हूँ नहीं मैं' 1977
मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार मध्य प्रदेश सरकार 1987
कबीर सम्मान मध्य प्रदेश सरकार 1989
जीवनी- मेरे बड़े भाई शमशेर जी (1995) तेज बहादुर चैधरी
पाठ परिचय : उषा
उषा कविता में सूर्योदय के ठीक पहले उषा के आगमन के कारण
क्षण क्षण में बदलते हुए प्रकृति के स्वरूप का वर्णन है। कवि प्रयोगवादी हैं जिनके
उपमान बिंब प्रतीक सब अपने हैं।
सूर्योदय के ठीक पहले प्रकृति का जो दृश्य होता है, उस दृश्य
को चित्रित करने के लिए कवि ने 'उषा कविता' लिखी है। इस संपूर्ण कविता में कवि ने प्रकृति
का बहुत ही अद्भुत चित्र प्रस्तुत किया है। सूर्योदय से पूर्व प्रकृति का दृश्य कैसा
होता है, इस कविता के माध्यम से हमें भली-भांति पता चलेगा।
उषा कविता के अनुसार कवि को सुबह का रंग ऐसा प्रतीत होता
है, जैसे किसी गृहिणी ने अपने चूल्हे को राख से लीप दिया हो और जब सूर्य अपनी लालिमा
संपूर्ण पृथ्वी पर फैलाता है, उस वक्त कवि को वह लालिमा ऐसी प्रतीत होती है, मानो काले
सिलबट्टे पर किसी ने लाल खड़ी मिट्टी लगा दी हो।
अंत में कवि कहते हैं कि जब सूर्य पूरी तरह से उदय हो जाता
है, तब भोर का वह सुंदर दृश्य न जाने किस जादू के कारण गायब हो जाता है। बस इसी बात
का चित्र प्रस्तुत कविता उषा में किया गया है।
संप्रग व्याख्या
काव्यांश - 1
प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)
शब्दार्थ- नभ= आकाश, नीला शंख = अत्यधिक नीला, भोर = प्रातः काल
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्य पुस्तक आरोह भाग 2 'उषा 'शीर्षक कविता से
ली गई है इसके रचयिता शमशेर बहादुर सिंह हैं इस कविता में कवि ने भोर के बाद उषाकाल
के दौरान होने वाले सूर्योदय से पहले आकाश का का सुंदर वर्णन किया है।
व्याख्या- इस कविता में कवि ने प्रकृति का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। कवि सूर्य
के उदय होने से पूर्व के दृश्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह आकाश नीले शंख जैसा
प्रतीत होता है। जिस तरह से घर की औरतें सुबह उठकर अपना चूल्हा मिट्टी से लीपती हैं,
ठीक उसी तरह से यह संपूर्ण आकाश ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी ने इस आकाश को भी राख
से लीप दिया है।
विशेष -
* उषा का स्वाभाविक वर्णन है
* नये उपमानो का प्रयोग है।
* मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
* भाषा सरल, सहज तथा संस्कृतनिष्ठ हिंदी।
* उषा का मानवीकरण हुआ है।
* समस्त कविता बिंबात्मक है।
* नीला शंख में उपमा अलंकार।
काव्यांश - 2
बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
शब्दार्थ- सिल =रसोई का पत्थर का एक टुकड़ा जिस पर मसाले या चटनी पीसी जाती है
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्पुस्तक आरोह भाग 2 'उषा 'शीर्षक कविता से ली गई है। इसके रचयिता
शमशेर बहादुर सिंह हैं इस कविता में कवि ने भोर के बाद उषाकाल के दौरान होने वाले सूर्योदय
से पहले आकाश का का सुंदर वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि प्रातः काल का वर्णन करते हुए कहते हैं, कि जैसे जैसे सूर्य उदय होता है और अपने लालिमा
को संपूर्ण पृथ्वी पर बिखेरता है, वैसे-वैसे ही आकाश का रंग बदलने लगता है। प्रकृति
को सूर्य की लालिमा उस वक्त ऐसे प्रतीत होती है, मानो किसी ने काले रंग के सिल को लाल
केसर से धोकर साफ कर दिया हो।
काले सिल कहने का तात्पर्य रात के अंधेरे से है, जिसे सूरज
रुपी रोशनी ने साफ किया है। कवि फिर कहते हैं कि मुझे उस वक्त आकाश ऐसा लगता है, मानो
किसी ने काले रंग के स्लेट पर लाल खरी मिट्टी का प्रयोग किया हो।
कवि को काली अंधेरी रात स्लेट के समान लगती है और उन्होंने
सुबह की लालिमा को लाल खरी मिट्टी के रूप में प्रस्तुत किया है।
विशेष -
* उषा का स्वाभाविक वर्णन है
* नये उपमानो का प्रयोग है।
* मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
* भाषा सरल, सहज तथा संस्कृतनिष्ठ हिंदी।
* उषा का मानवीकरण हुआ है।
* समस्त कविता बिंबात्मक है।
काव्यांश - 3
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
और…….
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 'उषा 'शीर्षक कविता से ली गई है। इसके रचयिता
शमशेर बहादुर सिंह हैं इस कविता में कवि ने भोर के बाद उषाकाल के दौरान होने वाले सूर्योदय
से पहले आकाश का का सुंदर वर्णन किया है।
व्याख्या - प्रस्तुत कविता के अंतिम भाग में कवि ने सुबह के बदलते दृश्य का वर्णन करते हुए कहा है कि
मुझे सुबह का दृश्य सबसे ज्यादा सुंदर लगता है। आकाश की लालिमा में उषा की लालिमा को
देखकर लगता है कि कोई श्वेत वर्ण झिलमिलाती देह (नायिका) नीले जल में हिल रही हो। नीले
आकाश का धीरे-धीरे लाल रंग में परिवर्तित होना। यह सब कुछ ऐसा लगता है मानो किसी ने
प्रकृति पर अपना जादू चला कर सुंदर दृश्य को धीरे-धीरे बदला हो।
विशेष -
* उषा का स्वाभाविक वर्णन है
* नये उपमानो का प्रयोग है।
* मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
* भाषा सरल, सहज तथा संस्कृतनिष्ठ हिंदी।
* उषा का मानवीकरण हुआ है।
* समस्त कविता बिंबात्मक है।
प्रश्न अभ्यास
प्रश्न 1. कविता के किन उपमानों को देखकर यह
कहा जा सकता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्द चित्र है?
अथवा
'शमशेर की कविता गाँव की सुबह का जीवंत चित्रण
है।'-पुष्टि कीजिए।
उत्तर - कवि ने गांव की सुबह का सुंदर चित्रण करने के लिए
गतिशील बिंब योजना की है। नीला शंख, राख से लीपा चौका, काली सिल मे पीसा केसर और खड़िया
में बनी हुई स्लेट यह सब उपमान कविता को ग्रामीण परिवेश से जोड़ते हैं। भोर के समय
आकाश नीले शंख की तरह पवित्र लगता है। कवि ने नीले आकाश को राख से लीपे चौका के समान
बताया है। जो सुबह की नमी के कारण गिला लगता है।
दूसरे बिंब में काली सिल से तुलना की गई है। जो लाल केसर
से धोए हुए सिल लगता है अर्थात काली सिल या स्लेट गांव के परिवेश से संबंधित है।
आकाश के नीलेपन में जब सूर्य प्रकट होता है तो ऐसा लगता है
जैसे नीले जल में किसी युवती का गोरा शरीर झिलमिला रहा है। सूर्य के उदय होते ही उषा
का जादू समाप्त हो जाता है। ये सभी दृश्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें गतिशीलता
है।
इस प्रकार गांव के सुबह के शब्द चित्र प्रस्तुत किया गया
है। पहले चौका से लिपा जाता है, तभी सिल का प्रयोग होता है और उसके बाद ही बालक के
हाथ में स्लेट दी जाती है।
प्रश्न 2.
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)
नई कविता में कोष्ठक, विराम चिह्नों और पंक्तियों
के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता
में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।
उत्तरः नई कविता की एक विशेषता है जिसमें कवि कोष्ठक चिन्ह
और पंक्तियों के बीच के स्थान के माध्यम से भी अपनी बात कहता है । यह कोष्ठक में 'अभी
गीला पड़ा है' के द्वारा कवि ने यह बताया है कि चौकी की लिपाई अभी-अभी उषा बेला में
हुई है अर्थात उषा काल भी ओस की बूंदे के कारण नमी हैं। चौका का यह गीलापन प्रातः काल
की आद्रता काही सूचक है। उसका रंग मटमैला है। इसी तरह सुबह का आकाश भी दिखाई देता है।