7. बादल राग
कवि परिचय
मूल नाम - सूर्यकुमार
उपनाम - निराला
जन्म - 21 फरवरी 1898
मृत्यु - 15 अक्टूबर 1961
जन्म स्थान - महिषादल, जिला मिदनापुर, (पश्चिम बंगाल)
मूल निवास - गढ़ाकोला, जिला-उन्नाव (उत्तर प्रदेश)
भाषा ज्ञान - हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी
लेखन की भाषा - हिंदी
पिता - पंडित रामसहाय त्रिपाठी
पत्नी - मनोहरा देवी
पुत्र - पंडित रामकृष्ण त्रिपाठी
पुत्री - सरोज
कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने गद्य व पद्य लगभग सभी
विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है।
उनके छायावादी काव्य संग्रह में 'अनामिका' (1922 ई.), 'परिमल'
(1930 ई.), 'गीतिका' (1936 ई.), 'तुलसीदास' (1938 ई.) आदि रचनाएँ सम्मिलित है।
अन्य काव्य संग्रहों में 'कुकुरमुत्ता' (1942 ई.), 'अणिमा'
(1943 ई.), 'बेला' (1946 ई.), 'नये पत्ते' (1946 ई.), 'अर्चना' (1950 ई.),
'आराधना'
(1950 ई.), 'गीतगुंज' (1954 ई), 'अपरा' (1969 ई.), 'सांध्य काकली' (1969 ई.) आदि प्रमुख
है।
उपन्यास-
बिल्लेसुर बकरिहा, इरावती और रतिनाथ की चाची।
इसके
अलावा उन्होंने कहानी, निबंध, जीवनी, रेखाचित्र व आलोचनात्मकपरक रचनाएँ भी लिखी है।
उनका
संपूर्ण साहित्य 'निराला रचनावली' के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है।
साहित्यिक विशेषताएँ
1.
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक युगान्तकारी कलाकार
के रूप में प्रस्तुत हुए। वे हिन्दी के एक महान् कवि थे। उन्होंने भाव, भाषा, शैली,
छन्द आदि सभी को नवीन दिशा प्रदान करने में योगदान किया। वे नवीनता और स्वतन्त्रता
के गायक थे।
2.
निराला के काव्य में भावपक्षीय सबलता एवं प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं। निराला एक बहुपक्षीय
प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। विषयों की विविधता तथा नवीन प्रयोगों की प्रचुरता इनके
काव्य की मुख्य विशेषता थी।
3.
निराला पुरानी एवं जीर्ण परम्पराओं के विरोधी थे, उनके काव्य में क्रान्ति की आग एवं
पौरुष के दर्शन होते हैं।
4.
हिन्दी साहित्य में निराला जी का एक विशिष्ट स्थान है। यदि उनके काव्य का तटस्थ विश्लेषण किया जाये तो उसमें छायावाद,
प्रगतिवाद, प्रयोगवाद तथा नयी कविता की विशेषताओं को देखा जा सकता है।
5. निराला के काव्य में तत्त्व ज्ञान, रहस्यवाद तथा सामाजिक
चेतना का सुन्दर समावेश हुआ है। उनके काव्य के भाव-पक्ष की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-
(क) रहस्यवाद-निराला एक चिन्तनशील कवि थे। उनके काव्य में
स्वस्थ चिन्तन के परिणामस्वरूप रहस्यवाद प्रस्तुत हुआ है। वे अद्वैतवादी सिद्धान्त
के समर्थक थे। वे एक सर्वत्र आभासित होने वाली चेतन सत्ता में विश्वास रखते थे।
(ख) मानवतावाद-निराला मानवतावाद के ट्टर पोषक थे। वे मानव
को विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानते थे।
(ग) नारी-चित्रण-निराला ने अपने काव्य में अपने ही ढंग से
नारी-चित्रण प्रस्तुत किया है। उनके काव्य में नारी का नित्य नया रूप प्रस्तुत हुआ
है।
पाठ परिचय
1 निराला ने 'बादल राग' शीर्षक से छः कविताओं की रचना की
है।
2 पाठ्यपुस्तक में उनकी 'बादल राग-6' कविता 'अनामिका' कविता
संग्रह से संकलित है।
3
इस कविता में यद्यपि प्रकृति का चित्रण किया गया है, परन्तु यह उपदेशात्मक है।
4
इसके प्रथम भाग में बादल के कोमल और काम्य रूप का वर्णन किया गया है, परन्तु द्वितीय
भाग में बादल को क्रान्तिकारी और अतीव शक्तिशाली चित्रित किया गया है।
5
इसके द्वारा कवि ने सामूहिक क्रान्ति की घोषणा कर जहाँ उसकी अनिवार्यता को संकेतित
किया है, वहाँ उसे दलित जनों का सहायक और शोषकों का विनाशकर्ता भी बताया है।
6
इस दृष्टि से बादल को विप्लव का प्रतीक और क्रान्ति का दूत चित्रित कर कविवर निराला
ने उसे सामाजिक विसंगतियों एवं विषमताओं का संहारक चित्रित किया है।
7
बादल का गर्जन-तर्जन, अशनिपात, मूसलाधार वर्षण आदि जहाँ प्रकृति में जल-प्रलय मचा देता
है, वहाँ वह शोषितों को शोषकों का सामना करने की शक्ति प्रकट करने का सन्देश भी देता
है।
8
निराला की यह कविता मूल संवेदना की दृष्टि से अतीव ओजस्वी तथा विशिष्ट है।
काव्यांश
- 1
तिरती
है समीर-सागर पर
अस्थिर
सुख पर दुःख की छाया
जग
के दग्ध हृदय पर
निर्दय
विप्लव की प्लावित माया -
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा. कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!
कठिन-शब्दार्थ :
तिरती = तैरती या विचरण करती।
समीर = वायु।
अस्थिर = क्षणिक।
दग्ध = जला हुआ।
विप्लव = क्रान्ति, विनाश, अशान्ति।
प्लावित - बहा दिया गया।
रण-तरी = युद्ध की नौका।
घन = बादल।
भेरी = नगाड़ा।
उर = हृदय।
नवजीवन = नया जीवन।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह
'अनामिका' की कविता 'बादल राग' के छठे खण्ड से प्रकाशित है। कवि यहाँ बादल का आह्वान
क्रांति के रूप में कर रहे हैं। बादल नव जीवन, नव क्रांति के प्रतीक हैं।
व्याख्या- कवि निराला बादलों को क्रांति के प्रतीक बताते हुए नवजीवन का आह्वान कर रहे
हैं। वे कहते हैं कि हे क्रांतिकारी बादल, तुम वायु रूपी सागर के वक्षस्थल पर, विचरण
करने वाले, कभी स्थिर न रहने वाले सुखों पर दुःख की छाया बनकर मंडराने वाले परिवर्तनकारी
बादल हो। निर्दयी विनाशकारी माया के समान जो इच्छाएँ इस संसार में पूरी तरह से प्लावित
(फैली) हैं। तेरी युद्ध की नौका मनुष्यों की (उन्हीं) इच्छाएँ और आकांक्षाओं से भरी
हुई है।
तेरे बादलों की गर्जन से पृथ्वी के हृदय में नवजीवन की आशा
लिए हुए, अपना सिर ऊँचा कर जागृत अवस्था के सुप्त अंकुर तेरे इन क्रांति लाने वाले
बादलों की ओर ताक रहे हैं। कवि का भाव है कि किसान, मजदूर की आकांक्षाएँ बादलों को
नव-निर्माण के रूप में पुकार रही हैं। बादल जनता के लिए परिवर्तन युग प्रवर्तक के रूप
में हैं। उनका बरसना, गरजना नवजीवन की सृष्टि करना है।
विशेष :
1. कवि ने बादलों को क्रांति का प्रतीक बताया है। संसार के
दुःखी व निराश हृदय को बादलों की मूसलाधार वर्षा शान्ति-सुख प्रदान करती है।
2. शब्द-बिम्बों का प्रयोग, तत्सम प्रधान ओजस्वी शब्दावली,
लक्षणा-व्यंजना का प्रयोग हुआ है।
काव्यांश 2
फिर-फिर
बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर
क्षत-विक्षत हंत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर।
कठिन-शब्दार्थ :
वर्षण = बरसना।
वज्र-हुंकार = वज्र के प्रहार से होने वाली भीषण आवाज।
अशनि-पात = बिजली का चमकना या गिरना।
शापित = शापग्रस्त।
क्षत-विक्षत = घायल।
हत = मरे हुए।
स्पर्द्धा = आगे बढ़ने की होड़।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह
'अनामिका' के छठे भाग 'बादल राग' से लिया गया है। निर्धन कृषकों द्वारा बादलों की प्रतीक्षा
करते बताया गया है जो परिवर्तन की आकांक्षा व ईच्छा लिए क्रांतिकारी बादलों को ताक
रहे हैं।
व्याख्या - कवि निराला बादल को विश्व में परिवर्तन लाने की शक्ति से सम्पन्न और क्रान्ति का प्रतीक
मानकर उसे सम्बोधित कर कहते हैं कि हे बादल! जब तू बार-बार भीषण गर्जना करते हुए घनघोर
रूप से धरती पर वर्षा करते हो, तो तेरी बिजली की भयंकर कड़क को सुनकर भयत्रस्त सांसारिक
लोग अर्थात पूँजीपति वर्ग के लोग अपना हृदय थाम लेते हैं।
वे घबरा उठते हैं। संकेत यह है कि सामाजिक क्रान्ति के उद्घोष
को सुनकर पूँजीपतियों के हृदय भयभीत होने लगते हैं, उन्हें अपनी सत्ता डगमगाती प्रतीत
होती है। निराला कहते हैं कि हे वीर बादल! तू अपने बिजली रूपी वज्रपात से ऐसे सैकड़ों
लताओं और वृक्षों को सशरीर तोड़ता-फोड़ता हुआ धरती पर सुला देता है, जो अपनी ऊँचाई
पर गर्व कर रहे थे और असीम आकाश को छूने की कोशिश कर रहे थे।
इसका प्रतीकार्थ यह है कि समाज का निम्न वर्ग दुःखों से आक्रान्त
है। अतएव क्रान्ति से ही उनका उद्धार हो सकता है। सामाजिक परिवर्तन के लिए रण-भेरी
का गर्जन अत्यावश्यक है।
विशेष -
1. कवि ने बताया है कि सामाजिक क्रांति आने से दलित-शोषितों
को नव-जीवन की आशा होती है।
2.
तत्समप्रधान ओजस्वी शब्दावली, मानवीकरण व अनुप्रास अलंकार, शब्द बिम्बों का प्रयोग
हुआ है।
काव्यांश
3
हँसते
हैं छोटे पौधे लघुभार
शस्य
अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ
हिलाते,
तुझे
बुलाते,
विप्लव-रव
से छोटे ही हैं शोभा पाते।
कठिन
शब्दार्थ :
शस्य
= हरा-भरा।
रवं
= आवाज, शोर, कोलाहल।
प्रसंग-
प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह 'अनामिका'
के छठे भाग 'बादल राग' से लिया गया है। इसमें कवि ने हरी-भरी धरती व खिलते-फूलते फूलों
द्वारा बादल का आह्वान (पुकारा) किया गया है।
व्याख्या
- कवि कहता है कि क्रान्ति के वर्षण-गर्जन से
पूँजीपति न केवल घबराने लगते हैं, अपितु जीवन को व्यर्थ मानकर धराशायी होने लगते हैं।
उन सभी पूँजीपतियों को गर्वोन्नत वृक्षों की भाँति पृथ्वी पर गिरते हुए देखकर छोटे
पौधे रूपी दलित वर्ग के लोग हँसते हैं।
वे उनके विनाश से जीवन प्राप्त करते हैं। इसी कारण अत्यधिक
हरियाली से प्रसन्न होकर वे अपने पत्ते रूपी हाथों को बार-बार हिलाकर तुम्हें धरती
की ओर आने के लिए आमन्त्रित करते हैं। तेरे द्वारा क्रांतिकारी भयंकर ध्वनि करने से
दलित वर्ग रूपी छोटे लता-वृक्ष तो प्रसन्न ही होते हैं, वे सदा शोभा भी पाते हैं। दूसरे
शब्दों में, क्रांति से निम्न व दलित वर्ग को अपने अधिकार भी प्राप्त होते हैं।
विशेष :
1. कवि प्रगतिवादी दृष्टिकोण के साथ बादलों को क्रांति और
विद्रोह का प्रतीक मानते हैं।
2. तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है। ओजस्वी भाषा व मुक्तक
छंद का प्रयोग है।
काव्यांश 4
अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।
कठिन-शब्दार्थ :
अट्टालिका = अटारी, भव्य-भवनों के ऊपरी कक्ष।
पंक = कीचड़।
प्लावन = बाढ़।
क्षुद्र = छोटा, तुच्छ।
जलज - कमल।
शैशव = बचपन।
नीर = जल।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह
'अनामिका' के छठे भाग 'बादल राग' से लिया गया है। इसमें कवि ने पूँजीपतियों में क्रांति
का भय तथा निर्धन-गरीबों में हर्ष की लहर को वर्णित किया है।
व्याख्या - कवि पूँजीपतियों के बड़े-बड़े भवनों को देखकर कहते हैं कि ये ऊँचे भवन अपनी
ऊँचाई द्वारा गरीब व निर्धन लोगों को भयभीत करते हैं। इन भवनों की ऊँचाइयाँ ही उनमें
डर भर देती हैं। इन्होंने गरीबों के शोषण से ही ऊँचे भवन निर्मित किये हैं। वर्षा से
जो जल-प्लावन (बाढ़) आता है उससे सबसे पहले कीचड़ ही बहता है। छोटे-से कमल के फूल तो
उस जल को स्पर्श कर और भी आनन्दित होते हैं।
कहने का भाव है कि कीचड़ पूँजीपतियों का पर्याय तथा कमल उन
गरीबों के समान है। गरीबों के बच्चे अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में जीने वाले सुकुमार
होते हैं। जिन पर प्रकृति का कोई असर नहीं होता बल्कि प्रकृति के विभिन्न रूप को देखकर
भी वे सदैव प्रसन्न रहते हैं। गरीब रोग-व्याधि, दुःख-पीड़ा सभी में समान स्थिति में
रहता है जबकि पूँजीपति ही सदैव अपने शोषण से उत्पन्न क्रांति के कारण भयभीत रहते हैं।
विशेष :
1. जल-प्लावन में कमल खिलता है अर्थात् कष्टों में भी सामान्य
वर्ग प्रसन्न रहता है जैसी विशेषोक्ति प्रस्तुत है।
2. शब्द लघु आकार लिए, तत्सम प्रधान खडी बोली है। बिम्बों
तथा अलंकारों का प्रयोग है।
काव्यांश 5
रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र गर्जन से बादल! त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं।
कठिन-शब्दार्थ :
रुद्ध = रोका गया।
कोष खजाना।
क्षुब्ध = अशान्त ।
तोष = सन्तुष्टि।
अंगना-अंक पत्नी की गोद।
त्रस्त = भयभीत ।
प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह
'अनामिका' के छठे भाग 'बादल राग' से लिया गया है। इसमें कवि ने बादलों से क्रान्ति
का आह्वान किया है कि वे अपनी गर्जना से पूँजीपतियों को आतंकित कर दें।
व्याख्या - कवि निराला कहते हैं कि शोषक-वर्ग का विनाश आवश्यक है। ये सामान्य जनता का
शोषण करते हैं। शोषकों एवं पूंजीपतियों ने जनता के अपार धन का शोषण करके उसे अपने खजानों
में बन्द कर रखा है। पूँजीपतियों के द्वारा धन का संचय करना एक प्रकार से विनिमय की
गति को बन्द करना है। ऐसा करने से गरीब और अधिक गरीब होते जा रहे हैं। पूँजीपतियों
को अपार धन राशि का संचय करके भी सन्तोष नहीं है। वे अपनी सुन्दर स्त्रियों के अंगों
से लिपटे रहने पर भी सदा आशंकित-आतंकित रहते हैं।
विशेष :
1. कवि ने बादलों के माध्यम से नव क्रांति की बात की है,
जिससे गरीबों एवं शोषितों को न्याय मिल सके, उनकी स्थिति में सुधार हो।
2. संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली, ओजस्वी भाषा तथा प्रवाहमयता
है। बिम्बों का सटीक प्रयोग है।
काव्यांश 6
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर।
चूस लिया है उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार!
कठिन शब्दार्थ :
जीर्ण = पुराना, कमजोर।
शीर्ष = दुर्बल ।
हाड़ = हड्डियाँ।
अधीर = व्याकुल।
पारावार = अथाह, समुद्र।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित काव्य-संग्रह
'अनामिका' के छठे भाग 'बादल राग' से लिया गया है। इसमें कवि ने किसानों द्वारा बादलों
को बुलाये जाने का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि बादलों को आमन्त्रित करते हुए कहता है कि हे क्रान्ति के बादल! जब तू
भयानक रूप में गर्जना करेगा, तब तेरे विद्रोह रूपी रथ की ध्वनि सुनकर पूँजीपति वर्ग
भयभीत होकर अपने नेत्रों को और मुख को ढक रहे हैं। अर्थात् क्रांति के स्वर को सुनकर
भयभीत व कंपित हो रहे हैं। हे बादल! जीर्ण-जर्जर भुजाओं वाला, दुर्बल शरीर वाला, अर्थात्
निरन्तर शोषित रहने और पुष्ट भोजन न पाने से अत्यन्त दुर्बल हाथ-पैरों वाला किसान तुम्हें
बड़ी आतुरता से बुला रहा है।
धनिक वर्ग ने किसान का शोषण कर दिया है। इससे उसकी ऐसी बुरी
दशा हो गई है। हे नवीन शक्ति और सामाजिक क्रान्ति से सम्पन्न बादला शोषित कृषक वगे
का इतना शोषण हो गया है कि वह अब मात्र हड्डियों का ढाँचा रह गया है, पूँजीपतियों ने
उसका सारा जीवन-रस चूस लिया है। हाड़-मांस ही अब उसके जीवन का आधार रह गया है। ऐसी
अवस्था में अब तुम ही उसके जीवन-दाता हो। हे जीवन रूपी जल के सागर! तुम्ही ऐसे शोषितों
को शोषण से मुक्ति दिलाकर बचा सकते हो, उनके जीवन में अपनी वर्षा रूपी क्रांति से परिवर्तन
लाकर संरक्षण प्रदान कर सकते हो।
विशेष :
1. कवि ने किसानों एवं गरीबों की स्थिति बताते हुए क्रांतिदूत
बादलों का आह्वान किया है।
2. भाषा संस्कृतप्रधान, ओजस्वी भाव तथा बिम्ब सादृश्यता युक्त
है।
कविता के साथ
प्रश्न 1. 'अस्थिर सुख पर दुःख की छाया' पंक्ति
में 'दुःख की छाया' किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तरः पूँजीपतियों के द्वारा सामान्य लोगों एवं किसानों
का शोषण किया जाता है। इस कारण पूँजीपतियों के पास पर्याप्त सुख के साधन होते हैं।
सामाजिक क्रान्ति से वे सदैव डरते हैं, क्रान्ति आने से सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा।
अतएव क्रान्ति या विनाश की आशंका को उनके सुख पर दुःख की छाया बताया गया है।
प्रश्न 2. 'अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत
वीर' पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया गया है?
उत्तरः इस पंक्ति में क्रान्ति के विरोधी एवं स्वार्थी पूँजीपतियों-शोषकों
की ओर संकेत किया गया है। जिस प्रकार बरसात में बिजली गिरने से बड़े-बड़े वृक्ष धराशायी
हो जाते हैं, पर्वतों की चोटियाँ खण्डित हो जाती हैं, उसी प्रकार - क्रान्ति होने से
बड़े-बड़े पूँजीपतियों का गर्व चूर-चूर हो जाता है और धन-सम्पन्न लोग भी धराशायी हो
जाते हैं। इस प्रकार इसमें क्रान्ति के प्रभाव की ओर संकेत हुआ है।
प्रश्न 3. 'विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा
पाते' पंक्ति में 'विप्लव-रव' से क्या तात्पर्य है? 'छोटे ही हैं शोभा पाते' ऐसा क्यों
कहा गया है?
उत्तरः 'विप्लव-रव' का आशय क्रान्ति का स्वर है। जब क्रान्ति
होती है, तो उसका सबसे अधिक लाभ छोटे लोगों अर्थात् शोषित गरीबों को मिलता है। क्रान्ति
की उथल-पुथल से सम्पन्न लोगों का सब कुछ छिन जाता है और छोटे लोग लाभान्वित रहते हैं।
इसी आशय से कवि ने 'छोटे ही शोभा पाते' कहा है।
प्रश्न 4. बादलों के आगमन से प्रकृति में होने
वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती है?
उत्तर : बादलों के आगमन से प्रकति में अनेक परिवर्तन आ जाते
हैं। बादलों की गर्जना से, बिजली कड़कने और मूसलाधार बरसने से भय का वातावरण बन जाता
है। बिजली गिरने से बड़े-बड़े लता-वृक्ष धराशायी हो जाते हैं, बाढ़ आ जाती है, विनाश
का दृश्य भी दिखाई देता है, लेकिन एक लाभ होता है छोटे-छोटे पौधे एवं खेतों की हरियाली
लहराने लगती है। कमल खिल जाते हैं तथा धरती अंकुरित हो जाती है। सारी प्रकृति में परिवर्तन
आ जाता है।
व्याख्या कीजिए -
1. तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुःख की छाया –
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया -
व्याख्या- कवि निराला बादलों को क्रांति के प्रतीक बताते
हुए नवजीवन का आह्वान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हे क्रांतिकारी बादल, तुम वायु रूपी
सागर के वक्षस्थल पर, विचरण करने वाले, कभी स्थिर न रहने वाले सुखों पर दुःख की छाया
बनकर मंडराने वाले परिवर्तनकारी बादल हो। निर्दयी विनाशकारी माया के समान जो इच्छाएँ
इस संसार में पूरी तरह से प्लावित (फैली) हैं। तेरी युद्ध की नौका मनुष्यों की (उन्हीं)
इच्छाओं और आकांक्षाओं से भरी हुई है।
2. अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक, पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन
व्याख्या - कवि पूँजीपतियों के बड़े-बड़े भवनों को देखकर
कहते हैं कि ये ऊँचे भवन अपनी ऊँचाई द्वारा गरीब व निर्धन लोगों को भयभीत करते हैं।
इन भवनों की ऊँचाइयाँ ही उनमें डर भर देती हैं। इन्होंने गरीबों के शोषण से ही ऊँचे
भवन निर्मित किये हैं। वर्षा से जो जल-प्लावन (बाढ़) आता है उससे सबसे पहले कीचड़ ही
बहता है। छोटे-से कमल के फूल तो उस जल को स्पर्श कर और भी आनन्दित होते हैं।
कला की बात
प्रश्न 1. पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण
किया गया है। आपको प्रकृति का कौन-सा मानवीय रूप पसंद आया और क्यों?
उत्तरः प्रस्तुत कविता में प्रकृति पर मानव-व्यापारों का
आरोप कर मानवीकरण किया गया है। वैसे इसमें प्रकृति के अनेक मानवीय रूप चित्रित हैं,
परन्तु हमें उसका यह रूप पसन्द में आया-हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार शस्य अपार. हिल-हिल
खिल-खिल.. हाथ हिलाते तुझे बुलाते.. इस अंश में छोटे पौधों को शोषित वर्ग का प्रतीक
बताया गया है। वे बादल रूपी क्रान्ति के आने की सम्भावना से हँसते हैं और खुश होकर
उसे हाथ हिला-हिलाकर बुलाते हैं। कवि की मानवीकरण की यह कल्पना मनोरम है।
प्रश्न 2. कविता में रूपक अलंकार का प्रयोग
कहाँ-कहाँ हुआ है? सम्बन्धित वाक्यांश को छाँटकर लिखिए।
उत्तर : रूपक अलंकार का प्रयोग तिरती है समीर-सागर पर अट्टालिका
नहीं है रे आतंक-भवन यह तेरी रण-तरी भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर ऐ जीवन के पारावार!
प्रश्न 3. इस कविता में बादल के लिए 'ऐ विप्लव
के वीरा, ऐ जीवन के पारावारा' जैसे संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है। बादल राग' कविता
के शेष पाँच खण्डों में भी कई सम्बोधनों का इस्तेमाल किया गया है। जैसे अरे वर्ष के
हर्षी, मेरे पागल बादला, ऐ निर्बन्धा, ऐ स्वच्छंदा, ऐ उद्दामा, ऐ सम्राटा, ऐ विप्लव
के प्लावना, ऐ अनंत के चंचल शिशु सुकुमारा उपर्युक्त संबोधनों की व्याख्या करें तथा
बताएँ कि बादल के लिए इन संबोधनों का क्या औचित्य है?
उत्तर : अरे वर्ष के हर्ष बादल वर्ष-भर में वर्षा-ऋतु में
मूसलाधार बरस कर धरती को हरा-भरा बनाते हैं। इसलिए यह सम्बोधन उचित है।
मेरे पागल बादल बादल आकाश में अपनी स्वच्छन्द गति से मण्डराते
रहते हैं, स्वेच्छा से गरजते एवं मस्त बने रहते हैं। यह कथन बादलों की मस्त चाल के
लिए उचित है।
ऐ निर्बन्ध बादल सर्वथा स्वच्छन्द होते हैं। वे किसी के बन्धन
या नियन्त्रण में नहीं रहते हैं। इसलिए इन्हें निर्बन्ध अर्थात् बंधनमुक्त कहा है।
ऐ उद्दाम - बादल पूर्णतया निरंकुश और असीमित आकाश में उमड़ते-घुमड़ते
हुए घनघोर गर्जना करते रहते हैं। इन पर किसी का अधिकार नहीं होता है।
ऐ विप्लव के प्लावन - बादलों के मूसलाधार बरसने से विनाशकारी
बाढ़ भी आ जाती है। यह सम्बोधन 'उचित है।
ऐ अनन्त के चंचल शिशु सुकुमार बादल चंचल शिशु की तरह सुकुमार
भी होते हैं, नटखट बच्चों की तरह मचलते हैं। प्रकृति के चंचल शिशु-समान है। अतः यह
सम्बोधन उचित है।
प्रश्न 4. कवि बादलों को किस रूप में देखता
है? कालिदास ने मेघदूत काव्य में मेघों को दूत के रूप में देखा। आप अपना कोई काल्पनिक
बिम्ब दीजिए।
उत्तर : कवि बादलों को सामाजिक परिवर्तन लाने वाले क्रान्ति
प्रवर्तक के रूप में देखता है। क्रान्ति के आगमन से शोषित वर्ग का हित होता है। महाकवि
कालिदास ने अपने खण्ड-काव्य 'मेघदूत' में बादलों को यक्ष के दूत रूप में चित्रित किया
है।
नोट - काल्पनिक बिम्ब स्वयं बनाइए।
प्रश्न 5. कविता को प्रभावी बनाने के लिए कवि
विशेषणों का सायास प्रयोग करता है जैसे - अस्थिर सुख। सुख के साथ अस्थिर विशेषण के
प्रयोग ने सुख के अर्थ में विशेष प्रभाव पैदा कर दिया है। ऐसे अन्य विशेषणों को कविता
से छाँटकर लिखें तथा बताएँ कि ऐसे शब्द-पदों के प्रयोग से कविता के अर्थ में क्या विशेष
प्रभाव पैदा हुआ है।
उत्तर : दग्ध-हृदय - 'दग्ध' विशेषण लगने से दुःख सन्ताप
की अधिकता व्यक्त हो रही है।
निर्दय विप्लव- 'निर्दय' विशेषण लगने से विप्लव को अधिक क्रूर और हृदयहीन
व्यंजित किया गया है।
सुप्त अंकुर - 'सुप्त' विशेषण से अंकुरों को मिट्टी के अन्दर दबा हुआ
बताया गया है।
घोर वज्र-हुँकार - 'वज्र' के साथ 'घोर' व 'हुँकार' के प्रयोग से उसकी भयानकता
का प्रभाव व्यक्त हुआ है।
अचल-शरीर- 'अचल' विशेषण से शरीर की घायल दशा को व्यक्त किया गया है। जो हिल-डुल नहीं
सकता है।
रुद्ध कोष- रुद्ध' विशेषण से खजानों की सुरक्षा व्यक्त हुई है। अर्थात् रुका हुआ, संरक्षित
कोष।
आतंक-भवन - भवन को उसकी ऊँचाइयों के कारण आतंक-भय का स्थान बताने के लिए 'आतंक' विशेषण
प्रयुक्त हुआ है।
बुलाता कृषक अधीर- इसमें अधीर' विशेषण से कृषक की आकुलता एवं व्यथा की व्यंजना हुई है। जो वर्षों
से बदलाव की वर्षा के लिए हर्षित (प्यासा) है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
1. 'बादल राग' के कवि हैं
A. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
B.
कमलकांत त्रिपाठी 'निराला'
C.
सूर्यकांत तिवारी 'निराला'
D.
कमलकांत तिवारी 'निराला'
2. कवि बादल का आह्वान किस रूप में करता है?
A.
वर्षा
B. क्रांति
C.
मजबूरी
D.
शांति
3. मानव जीवन में सुख कैसा है?
A.
स्थिर
B. अस्थिर
C.
मायावी
D.
अदृश्य
4. मानव जीवन में किस छाया का आवागमन चलता रहता है?
A. सुख-दुःख की
B.
शांति-अशांति की
C.
स्थिर-अस्थिर की
D.
गतिहीन-गतिशील की
5. कविता में बादल किस का प्रतीक है?
A. क्रांति
B.
निम्नवर्ग
C.
शांति
D.
उच्चवर्ग
6. क्रांति का सबसे अधिक लाभ किसे मिलता है?
A.
धनी वर्ग को
B.
छात्र वर्ग को
C.
मध्य वर्ग को
D. निम्न वर्ग को
7. अंगना-अंग से लिपटे कौन काँप रहे हैं?
A. धनी
B.
निर्धन
C.
दुर्ब
D.
बीमार
8. बादलों को अधीरता से कौन बुला रहा है?
A.
वृक्ष
B. कृषक
C.
योद्धा
D.
बालक
9. क्रांति के बादलों की वज्र गर्जना से कौन-सा वर्ग भयभीत हो जाता
है?
A. पूँजीपति वर्ग
B.
श्रमिक वर्ग
C.
निम्न वर्ग
D.
कृषक वर्ग
10. 'रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष' - यहाँ रुद्ध का अर्थ है
A. रुका हुआ
B.
क्रोधित
C.
भरा हुआ
D.
खाली
11. शैशव का सुकुमार शरीर किसमें हँसता है?
A.
वर्षा
B.
घायलावस्था
C. रोग-शोक
D.
गर्मी
12. 'जीर्ण बाहु है, शीर्ण शरीर' यहाँ 'शीर्ण' का अर्थ है
A. क्षीण
B.
विशाल
C.
घायल
D.
मोटा
13. 'बादल राग' कविता में रण-तरी किस से भरी होने की बात कही है?
A.
धन
B. आकांक्षाओं
C.
नवजीवन
D.
गर्जन
14. 'रुद्ध घोष है क्षुब्द तोष' यहाँ क्षुब्ध का अर्थ है-
A. खिन्न
B.
हृदय
C.
किसान
D.
तप्त
15. 'बादल राग' कविता में सुख को कैसा बताया गया है?
A.
स्थिर
B. अस्थिर
C.
अदृश्य
D.
मायावी
16. आतंक-अंक पर कौन काँप रहे हैं?
A.
निम्न वर्ग
B. धनी
C.
कृषक
D.
श्रमिक
17. 'जल-विप्लव-प्लावन' हमेशा किस पर होता है?
A.
ज़मीन पर
B.
वायु पर
C. कीचड़ पर
D.
नभ पर
18. 'निराला' ने अट्टलिकाओं को क्या कहा है?
A.
अजायबघर
B.
चिकित्सालय
C. आतंक-भवन
D.
योग भवन