8. कवितावली (उत्तर कांड से)
1.
जीवन-परिचय
1.
जन्मः सन् 1532, बाँदा ज़िले के राजापुर गाँव (उत्तर प्रदेश) में माना जाता है।
2.
माता-पिता-आत्माराम दुबे (पिता) हुलसी दुबे (माता)
3.
शिक्षा-15-16 साल की उम्र में रामबोला पवित्र नगरी वाराणसी आये जहाँ पर वे संस्कृत
व्याकरण, हिन्दी साहित्य और दर्शनशास्त्र, चार वेद, छः वेदांग, ज्योतिष आदि की शिक्षा
अपने गुरु शेष सनातन से ली।
4.
गुरु-नरहरिदासः
5.
निधनः सन् 1623, काशी में।
2.
साहित्यिक-परिचय
I.
हृदय-सिन्धु मति सीप समाना। स्वाती सारद कहहि सुजाना।।
जौं
बरषै बर बारि विचारू। होहि कबित मुकुतामनी चारू ।।
कीरति
भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई ।।
भक्तिकाल
की सगुण काव्य-धारा में रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि गोस्वामी
तुलसीदास
में भक्ति से कविता बनाने की प्रक्रिया की सहज परिणति है। परंतु उनकी भक्ति इस हद तक लोकोन्मुख है कि वे लोकमंगल की साधना के कवि के
रूप में प्रतिष्ठित हैं।
।।. यह बात न सिर्फ़ उनकी काव्य-संवेदना की दृष्टि से, वरन्
काव्यभाषा के घटकों की दृष्टि से भी सत्य है। इसका सबसे प्रकट प्रमाण तो यही है कि
शास्त्रीय भाषा; संस्कृत में सर्जन-क्षमता होने के बावजूद उन्होंने लोकभाषा; अवधी व
ब्रजभाषा को साहित्य-रचना के माध्यम के रूप में चुना और बुना। जिस प्रकार उनमें भक्त
और रचनाकार का द्वंद्व है, उसी प्रकार शास्त्र व लोक का द्वंद्व है जिसमें संवेदना
की दृष्टि से लोक की ओर वे झुके हैं तो शिल्पगत मर्यादा की दृष्टि से शास्त्र की ओर।
III. शास्त्रीयता को लोकग्राह्य तथा लोकगृहीत को शास्त्रीय
बनाने की उभयमुखी प्रक्रिया उनके यहाँ चलती है। यह तत्व उन्हें विद्वानों तथा जनसामान्य
में समान रूप से लोकप्रिय बनाता है।
IV. उनकी एक अनन्य विशेषता है कि वे दार्शनिक और लौकिक स्तर
के नाना द्वंद्वों के चित्रण और उनके समन्वय के कवि हैं।
'द्वंद्व-चित्रण' जहाँ सभी विचार/भावधारा के लोगों को तुलसी-काव्य
में अपनी-अपनी उपस्थिति का संतोष देता है, वहीं 'समन्वय' उनकी ऊपरी विभिन्नता में निहित
एक ही मानवीय सूत्र को उपलब्ध कराकर संसार में एकता व शांति का मार्ग प्रशस्त करता
है।
V.
तुलसीदास की लोक व शास्त्र दोनों में गहरी पैठ है तथा जीवन व जगत की व्यापक अनुभूति
और मार्मिक प्रसंगों की उन्हें अचूक समझ है। यह विशेषता उन्हें महाकवि बनाती है और
इसी से प्रकृति व जीवन के विविध भावपूर्ण चित्रों से उनका रचना संसार समृद्ध है, विशेषकर
'रामचरितमानस'। इसी से यह हिंदी का अद्वित्तीय महाकाव्य बनकर उभरा है।
VI.
इसकी विश्वप्रसिद्ध लोकप्रियता के पीछे सीताराम कथा से अधिक लोक-संवेदना और समाज की
नैतिक बनावट की समझ है। उनके सीता-राम ईश्वर की अपेक्षा तुलसी के देश काल के आदर्शों
के अनुरूप मानवीय धरातल पर पुनः सृष्ट चरित्र हैं।
VII.
गोस्वामी जी ग्रामीण व कृषक संस्कृति तथा रक्त संबंध की मर्यादा पर आदर्शीकृत गृहस्थ
जीवन के चितेरे कवि हैं। तुलसीदास इस अर्थ में हिंदी के जातीय कवि हैं वे अपने समय
में हिंदी क्षेत्रों में प्रचलित सारे भावात्मक व काव्य भाषायी तत्वों का प्रतिनिधित्व
करते हैं।
इस
संदर्भ में भाव, विचार, काव्य-रूप, छंद और काव्यभाषा की जो बहुल समृद्धि उनमें दिखती
है वह अद्वितीय है।
VIII.
तत्कालीन हिंदी क्षेत्रों की दोनों काव्य भाषाओं अवधी व ब्रजभाषा तथा दोनों सांस्कृतिक
कथाओं सीताराम व राधाकृष्ण की कथाओं को साधिकार अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं।
IX.
उपमा अलंकार के क्षेत्र में जो प्रयोग-वैशिष्ट्य कालिदास की पहचान है, वही पहचान सांगरूपक
के क्षेत्र में तुलसीदास की है।
X.
विविध विषमताओं से ग्रस्त कलिकाल तुलसी का युगीन यथार्थ है, जिसमें वे कृपालु प्रभु
राम व रामराज्य का स्वप्न रचते हैं। युग और उसमें अपने जीवन का न सिर्फ उन्हें गहरा
बोध है, बल्कि उसकी अभिव्यक्ति में भी वे अपने समकालीन कवियों से आगे हैं।
XI.
प्रमुख रचनाएँ: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, दोहावली, कवितावली,
रामाज्ञा-प्रश्न
पाठ का सार
यहाँ
पाठ में प्रस्तुत 'कवितावली' के दो कवित्त और एक सवैया इसके प्रमाणस्वरूप हैं। पहले
छंद ("किसबी किसान...".) में उन्होंने दिखलाया है कि संसार के अच्छे-बुरे
समस्त लीला-प्रपंचों का आधार 'पेट की आग' का दारुण व गहन यथार्थ है; जिसका समाधान वे
राम-रूपी मेघ (घनश्याम) के कृपा-जल में देखते हैं। इस प्रकार, उनकी राम-भक्ति पेट की
आग बुझाने वाली यानी जीवन के यथार्थ संकटों का समाधान करने वाली है साथ ही जीवन-बाह्य
आध्यात्मिक मुक्ति देने वाली भी।
दूसरे
छंद (खेती न किसान को.....) में प्रकृति और शासन की विषमता से उपजी बेकारी व गरीबी
की पीड़ा का यथार्थपरक चित्रण करते हुए उसे दशानन रावण से उपमित करते हैं।
तीसरे छंद (धूत कहौ, अवधूत कहौ....) में भक्ति की गहनता और
सघनता में उपजे भक्त-हृदय के आत्मविश्वास का सजीव चित्रण है, जिससे समाज में व्याप्त
जाति पाति और धर्म के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस पैदा होता है। इस प्रकार
भक्ति की रचनात्मक भूमिका का संकेत यहाँ है, जो आज के भेदभाव मूलक सामाजिक-राजनीतिक
माहौल में अधिक प्रासंगिक है।
'रामचरितमानस' के लंका कांड से गृहीत लक्ष्मण के शक्ति बाण
लगने का प्रसंग कवि की मार्मिक स्थलों की पहचान का एक श्रेष्ठ नमूना है। भाई के शोक
में विगलित राम का विलाप धीरे-धीरे प्रलाप में बदल जाता है, जिसमें लक्ष्मण के प्रति
राम के अंतर में छिपे प्रेम के कई कोण सहसा अनावृत हो जाते हैं। यह प्रसंग ईश्वरीय
राम का पूरी तरह से मानवीकरण कर देता है, जिससे पाठक का काव्य-मर्म से सीधे जुड़ाव
हो जाता है और वह भक्त तुलसी के भीतर से कवि तुलसी के उभर आने और पूरे प्रसंग पर उसके
छा जाने की अनुभूति करता है। इस घने शोक-परिवेश में हनुमान का संजीवनी लेकर आ जाना
कवि को करुण रस के बीच वीर रस के उदय के रूप में दिखता है। यह उपमा अद्भुत है और काव्यगत
करुण-प्रसंग को जीवन के मंगल-विकास की ओर ले जाता है।
1. किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।
पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी ।।
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
'तुलसी' बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी।।
कठिन-शब्दार्थ :
किसबी = धन्धा चलाने वाला, श्रमजीवी।
बनिक = व्यापारी।
भाट = चारण।
चाकर = नौकर।
चपल = चंचल, चालाक।
पेट को = पेट के लिए
चेटकी = बाज़ीगर।
गिरि = पहाड़।
अटत = घूमना ।
गहन-गन = घना जंगल।
अहन = दिन।
अखेटकी = शिकारी।
घनस्याम = काले बादल
बड़वागिते = समुद्र की आग से।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'कवितावली'
उत्तर-कांड' से लिया गया है। इसके
रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। इसमें कवि ने चित्रण किया है कि जीवन-यापन हेतु सभी व्यक्ति
कोई-न-कोई कार्य अवश्य करता है; चाहे वह अधर्म या पाप ही क्यों न हो लेकिन पेट की आग
को बुझाने का एकमात्र सहारा राम का नाम है।
व्याख्या - गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि पेट भरने के लिए कोई मजदूरी करता है, कोई
खेती, कोई व्यापारी, कोई राजाओं का भाट, कोई नौकर, कोई उछलकूद करने में चालाक नट, कोई
चोर, कोई दूत और कोई बाज़ीगर बनकर पेट भरने का प्रयत्न करता है। कोई भिखारी बनने के
लिए भी विवश है। कई लोग अपना पेट भरने के लिए विद्याध्ययन करते हैं, कई विभिन्न गुणों
एवं कलाओं को सीखते हैं।
कोई पेट की खातिर पहाड़ों पर चढ़ते हैं, कोई पेट भरने के
लिए गहन वनों में शिकार करने के लिए विवश है। पेट ऊँच-नीच धर्म-अधर्म के सभी कार्य
करवाती है। यहाँ तक कि इस पापी पेट को भरने के लिए लोग अपने बेटा-बेटी को भी बेचने
को विवश हो जाते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि पेट की आग समुद्र की आग से भी तेज और
प्रबल है। इसे तो राम-नाम रूपी बादल ही अपनी कृपा (वर्षा) द्वारा बुझा सकते हैं। आशय
यह है कि जिस पर श्रीराम की कृपा हो जाती है, वह कभी दुःखी, दरिद्र व भूखा नहीं रहता
है।
विशेष :
1. समाज में भूख से उत्पन्न भयावह स्थिति का सजीव चित्रण
है।
2.
ब्रजभाषा का प्रयोग, कवित्त छंद, तत्सम शब्दों का प्रयोग, अनुप्रास अलंकार की प्रस्तुति
हुई है। 'राम घनस्याम' में रूपक अलंकार है।
2.
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक
को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका
बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं
एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी?'
बेदहूँ
पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे
सबै पे, रामा रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन
दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन
देखि तुलसी हहा करी।।
कठिन-शब्दार्थ
–
बलि
= भेंट-दक्षिणा।
वनिक
व्यापारी।
बनिज
= व्यापार।
चाकर
= नौकर
चाकरी
= नौकरी।
जीविका
बिहीन = जिसके पास आजीविका का कोई साधन न हो।
सीद्यमान
= दुःखी।
एक
एकन सों = एक-दूसरे से।
जाई
= जायें।
का करी = क्या करें।
बिलोकिअत = देखते हैं।
साँकरे = संकट में।
रावरें = आपने।
दसानन = रावण।
दुनी = दुनिया।
दुरित = पाप।
दहन = जलाना, नाश।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'कवितावली'
'उत्तर-कांड' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। इसमें तुलसीदास भगवान
राम से निवेदन कर रहे हैं कि संसार से इस गरीबी रूपी रावण का नाश कीजिए।
व्याख्या - गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि वर्तमान में देश की आर्थिक स्थिति खराब हो
गई है। किसानों के पास खेती नहीं हैं, भिखारियों को भीख और भेंट-दक्षिणा नहीं मिलती
है, बनियों का व्यापार नहीं चलता है तथा नौकरी चाहने वालों को नौकरी नहीं मिलती है।
इस प्रकार जीविका के बिना सब लोग दुःखी और चिन्ता से ग्रस्त होकर एक-दूसरे से यही कहते
हैं कि 'कहाँ जावें और अब क्या करें?' तुलसीदास कहते हैं कि वेदों और पुराणों में भी
कहा गया है और इस लोक में भी यह देखा जाता है कि ऐसे संकट के समय में प्रभु श्रीराम
ने ही सब पर कृपा की है।
तुलसीदास कहते हैं हे दीनबन्धु! आज गरीबी रूपी रावण ने सारी
दुनिया को दबा लिया है। लोग उसी प्रकार गरीब एवं दुःखी हैं, जिस प्रकार रावण के अत्याचारों
से लोग गरीब तथा दुःखी थे। अतः गरीबी द्वारा फैलाई गई पाप रूपी ज्वाला से जनता को दुःखी
व पीड़ित देखकर मैं तुलसीदास दुःख प्रकट करता हूँ तथा आपकी सहायता के लिए प्रार्थना
करता हूँ, कि आप आकर इन दुःखियों का उद्धार करें।
विशेष -
1. कवि तुलसीदास संसार की अधोगति देखकर दुःखी हैं तथा विनीत
भाव से प्रभु राम से प्रार्थना कर रहे हैं।
2. तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन है। बेरोजगारी व अकाल
का चित्रण है।
3. ब्रजभाषा का उचित प्रयोग, कवित्त छंद, तत्सम शब्दों का
प्रयोग तथा 'बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी' एवं 'दुरित-दहन देखि' में अनुप्रास अलंकार
'दारिद-दसानन' में रूपक की छटा प्रस्तुत है।
3. धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रूचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।
कठिन-शब्दार्थ :
धूत = त्यागा हुआ।
अवधूत = परमहंस, वीतराग संन्यासी।
रजपूतु = राजपूत।
जोलहा = जुलाहा
ब्याहब = विवाह करना।
काहू = किसी।
बिगार = बिगाड़ना।
सरनाम = प्रसिद्ध ।
गुलामु = सेवक, दास।
जाको जिसको
रुचै = अच्छा लगे।
ओऊ = और।
खैबो = खाना।
मसीत = मस्जिद ।
सोइबो = सोना।
लैबो = लेना।
दैबो = देना।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'कवितावली'
'उत्तर-कांड' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है।। इसमें कवि ने समकालीन
यथार्थ परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया है।
व्याख्या - कवि तुलसीदास कहते हैं कि मुझे कोई चाहे घर से त्यागा हुआ कहे, चाहे साधु-संन्यासी
कहे, राजपूत कहे, चाहे जुलाहा कहे। किसी की बात का कोई असर मुझ पर नहीं पड़ता है क्योंकि
किसी की भी बेटी के साथ मुझे अपने बेटे की शादी नहीं करनी है। न ही मुझे किसी की जाति
बिगाड़ने का कोई शौक है।
तुलसीदास तो सिर्फ राम का सेवक है, उनके सिवा उसे किसी से
भी कोई मतलब नहीं रखना है। जिसकी जैसी रुचि या पसन्द, वह उसके अनुसार जो इच्छा वो कहे
या करे। तुलसीदास कहते हैं मैं माँग के खा सकता हूँ, मस्जिद में सो सकता हूँ, मुझे
न तो किसी से कुछ लेना है और न ही किसी को कुछ देना है। कहने का भाव है कि समाज की
किसी भी प्रवृत्ति से तुलसीदास को कोई फर्क नहीं पड़ता है, वे राम भक्त हैं और उनकी
भक्ति में ही अपना जीवन लगा देंगे।
विशेष :
1. कवि समाज की व्यंग्य प्रवृत्ति से क्षुब्ध है तथा दास्य-भक्ति
से पूर्ण अपनी राम-भक्ति को स्पष्ट करते हैं।
2. ब्रजभाषा का प्रयोग, सवैया छंद तथा 'धूत कहौ अवधूत कहौ,
रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ' में अनुप्रास अलंकार है।
3. लेना एक न देना दो' लोकोक्ति का प्रयोग हुआ है।
लक्ष्मण - मूर्च्छा और राम का विलाप
1.
दोहा
तव
प्रताप उर राखि प्रभु, जैहउँ नाथ तुरंत।
अस
कहि आयसु पाइ पद, बंदि चलेउ हनुमंत।।
भरत
बाहु बल सील गुन, प्रभु पद प्रीति अपार
मन
महुँ जात सराहत, पुनि-पुनि पवनकुमार ।।
कठिन-शब्दार्थ
:
तव
= तुम्हारा, आपका।
प्रताप
= तेज, वीरता, प्रभुत्व आदि का प्रभाव।
उर
= हृदय।
राखि
= रखकर।
जैहउँ
= जाऊँगा।
नाथ
= स्वामी, प्रभु।
अस
= इस तरह।
आयसु = आज्ञा।
पद = पैर।
बँदि = वंदना करके।
प्रीति = प्रेम।
महुँ = में।
पवनकुमार = हनुमान।
सराहत = प्रशंसा करना।
पुनि- पुनि बार-बार।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरित मानस'
'लंका-कांड' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। इस प्रसंग में 'लक्ष्मण-मूर्छा
और राम का विलाप' प्रस्तुत है। भरत के शील स्वभाव का हनुमान जी पर पड़ने वाले प्रभाव
का बहुत सुंदर चित्रण किया गया है।
व्याख्या- तुलसीदासजी बताते हैं कि लक्ष्मण को मूर्छा लगने पर हनुमान संजीवनी बूटी लाने
जाते हैं वापसी में उनकी मुलाकात भरत से होती है। वे भरत से कहते हैं कि हे प्रभो।
मैं आपका प्रताप, यश हृदय में रखकर तुरंत ही अर्थात् जल्दी ही भगवान राम के पास पहुँच
जाऊँगा। इस प्रकार कहते हुए हनुमान भरत की आज्ञा प्राप्त कर उनके चरणों की वंदना करके
चल दिए। भरत के बाहुबल, शील, गुण तथा प्रभु राम के प्रति अपार (अधिक) स्नेह को देखते
हुए व मन-ही-मन बार-बार प्रशंसा करते हुए हनुमान लंका की तरफ चले जा रहे थे।
विशेष :
1. हनुमान की भक्ति भावना तथा भरत के गुणों का वर्णन सुंदर
बन पड़ा है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग, दोहा छंद तथा 'पुनि-पुनि' में अनुप्रास
अलंकार है।
2. उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी ।।
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायऊ।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ।।
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ।।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू ।।
कठिन-शब्दार्थ :
उहाँ = वहाँ।
निहारी = देखकर।
मनुजअनुसारी = मानवोचित (चूँकि यहाँ राम को ईश्वर का अवतार
माना गया है)
अर्ध राति = आधी रात
कपि = बन्दर (हनुमान)।
आयउ = आया।
मोहि = मुझे।
काऊ = किसी प्रकार।
मृदुल = कोमल।
मम = मेरा।
बिपिन = वन।
आतप = धूप।
बाता = हवा।
बिकलाई = व्याकुलता।
जनतेउँ = जान पाता।
मनतेउँ = मानता।
ओहू = उस ।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरितमानस'
के 'लंका-कांड' के 'लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' प्रसंग से उद्धृत है। इसके रचयिता
गोस्वामी तुलसीदास है। इस प्रसंग में लक्ष्मण के मूर्छित अवस्था पर राम का करुण विलाप
है।
व्याख्या - उधर लंका में राम ने मूर्च्छित लक्ष्मण को देखा। तब वे व्याकुल व दुःखी होकर
मनुष्यों के समान शोक-भरे वचन कहने लगे कि आधी रात बीत चुकी है, परन्तु अभी तक हनुमान
नहीं आये। उस समय राम ने अधीरता से अपने लघुभ्राता लक्ष्मण को उठाकर अपने हृदय से लगा
लिया। राम बोले कि हे भाई! तुम अपने रहते मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा
स्वभाव सदा से कोमल था।
मेरा साथ देने के लिए तुमने माता-पिता तक को त्याग दिया था
और वन में हमारे साथ सर्दी, धूप तथा हवा (आँधी-तूफान) सब कष्ट सहन करते रहे। हे भाई
! तुम्हारा वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर तुम उठते क्यों नहीं?
यदि मैं जानता कि मुझे वन में जाने पर भाई (लक्ष्मण) का बिछोह सहना पड़ेगा, तो मैं
पिता के उस वन में जाने वाले वचन को मानने से इनकार कर देता, अर्थात् वन में नहीं आता।
तुलसीदास बताते हैं कि राम लक्ष्मण पर आयी इस विपदा का कारण स्वयं को मानते हैं।
विशेष :
1. तुलसीदास ने प्रभु राम का मानवीय रूप तथा उनके विलाप का
मार्मिक वर्णन किया है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग, करुण रस, चौपाई छंद तथा अनुप्रास
अलंकार की छटा है।
3. सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ।।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
कठिन-शब्दार्थ :
सुत = पुत्र ।
बित = धन।
होहिं = होगा।
जाहिं = जाएगा।
अस = ऐसा।
जियँ = हृदय ।
जथा = यथा, जैसे ।
तात = अदरसूचक शब्द।
सहोदर = सगा।
करिबर = गजराज।
कर = सुंड। तोही = तुम्हारे।
जड़ = कठोर, संवेदनाहीन।
दैव = भाग्य ।
अवध = अयोध्या।
कवन = कौन।
बरु = भले ही।
फनि = साँप (मनिहार साँप)
अपजस = बदनामी।
माहीं = में।
छति = हानि, नुकसान।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरित मानस'
'लंका-कांड' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास है। लक्ष्मण के मूर्च्छित
होने पर राम का विलाप एवं उनके दुःख का मार्मिक चित्रण किया गया है।
व्याख्या - श्रीराम विलाप करते हुए बोले-हे भाई लक्ष्मण । संसार में पुत्र, धन, पत्नी,
मकान और परिवार बार बार मिलते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं अर्थात् ये जीवन में दोबारा
प्राप्त हो सकते हैं। परन्तु संसार में सगा भाई बार-बार नहीं मिलता है। इसलिए हृदय
में ऐसा विचार करके तुम जल्दी जाग जाओ।
हे लक्ष्मण । जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी दीन-हीन हो
जाता है, उड़ नहीं पाता है मणि के बिना साँप और सूंड के बिना हाथी अत्यन्त दीन एवं
व्यथित हो जाते हैं, उसी प्रकार भाग्य मुझे अगर जीवित रखेगा तो मेरा जीवन तुम्हारे
बिना व्यर्थ और सारहीन है। हे प्रिय लक्ष्मण ! अपनी पत्नी की खातिर प्यारे भाई को गँवाकर
मैं कौन-सा मुँह लेकर अयोध्या जाऊँगा? मैं जगत् में यह बदनामी भले ही सह लूँगा कि राम
ने स्त्री को खो देने पर कोई वीरता नहीं दिखाई, परन्तु पत्नी की हानि उतनी बड़ी बात
नहीं है, जितनी कि प्रिय भाई को खोने की हानि है।
विशेष :
1. तुलसीदास ने राम का भाई के प्रति प्रेम का सुंदर चित्रण
किया है।
2. अवधी भाषा, करुण रस, चौपाई छंद व 'जथा पंख बिनु खग अति
दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना' में उपमा 'होहिं जाहिं जग बारहिं बारा एवं 'जौं
जड़ दैव जिआवै मोही' में अनुप्रास अलंकार है।
4. अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्रवत सलिल राजिव दल लोचन ।।
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई ॥
सोरठा
प्रभु प्रलाप सुनि कान, बिकल भए बानर निकर
आइ गयउ हनुमान, जिमि करुना मुँह बीर रस ।।
कठिन-शब्दार्थ :
अपलोकु = अपयश ।
सोकु = शोक, दुःख ।
सुत = पुत्र
निठुर = निष्ठुर।
सहिहि = सह लेगा।
जननी = माता।
कुमारा = बेटा।
गहि = पकड़कर।
तासु = उसके।
पानी = हाथ।
सब बिधि = सब प्रकार से
उतरु = उत्तर, जवाब।
काह = क्या।
तेहिं = उन्हें ।
किन = क्यों नहीं।
सोच बिमोचन = शोक दूर करने वाला।
स्रवत = चूता है, बहता है।
सलिल = जल।
राजिव-दल लोचन = कमल-पत्र के समान नेत्र।
उमा = पार्वती।
अखंड = जिसके खंड या टुकड़े नहीं हो सकते।
निकर = समूह।
प्रलाप = प्रलाप - तर्कहीन वचन-प्रवाह, पागलों जैसी बात करना।
विकल = बेचैन ।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरित मानस' 'लंका-कांड' के
'लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप' से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास
है। लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर राम का करुण विलाप का मार्मिक चित्रण है।
व्याख्या - मूर्च्छित लक्ष्मण सेको लक्ष्यकर श्रीराम बोले कि हे प्रिय पुत्र (यहाँ लक्ष्मण) ! मेरा निष्ठुर
और कठोर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों को ही सहन करेगा? तुम अपनी माता के एक ही
पुत्र हो और तुम ही उस माँ के प्राणों के आधार हो। अर्थात् तुम्हारे बिना तुम्हारी
माँ जीवित नहीं रह सकेगी।
तुम्हारी माता ने सब प्रकार से सुख देने वाला और परम हितकारी
जानकर ही तुम्हें मुझे सौंपा था। अब जाकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगा? हे भाई। तुम
उठकर मुझे यह बात सिखाते (समझाते) क्यों नहीं?
संसार के लोगों को चिन्ता से मुक्त करने वाले श्रीराम शोकावेग
के कारण अनेक चिन्ताओं में डूब गये। उनके कमल की पंखुड़ी के समान नेत्रों से निरन्तर
जल (अश्रुकण) बहने लगे। तब शिवजी ने पार्वती से कहा हे उमा! श्रीराम एक (अद्वितीय)
और अखण्ड हैं अर्थात् स्वयं सम्पूर्ण एवं शोकमुक्त ईश्वर हैं, परन्तु इस अवसर पर कृपालु
प्रभु लीला करके सामान्य मनुष्यों जैसा आचरण कर भक्तों को सिखा रहे हैं।
प्रभु श्रीराम के विलाप को सुनकर वानरों का समूह दुःख से
व्याकुल हो उठा। उसी समय हनुमान आ गये, वे इस प्रकार आये, जैसे करुण रस में अचानक वीर
रस का प्रसंग आ गया हो, अर्थात् हनुमान के आने से शोक का वातावरण वीरता में बदल गया।.
विशेष :
1. तुलसीदास ने राम की व्याकुलता का सजीव चित्रण किया है।
प्रभु राम ने सामान्य मनुष्य की लीला की है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग हुआ है। करुण रस, चौपाई छंद तथा अनुप्रास
अलंकार है।
5. हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।।
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई ।।
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।
यह वृतांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ।।
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा ।।
कठिन-शब्दार्थ :
हरषि = प्रसन्न होकर।
भेटेउ = मिलना।
कृतग्य = आभारी, कृतज्ञ उपकार को मानने वाला।
सुजाना = समझदार, अच्छा ज्ञानी।
कीन्हि = किया।
हरषाई = हर्षित होकर।
ब्राता = झुण्ड, समूह।
लइ आवा = ले आए।
विषाद = दुःख।
वृतांत = किसी बीती हुई बात या घटी हुई घटना का विवरण ।
सिर धुनेऊ = पछताना।
पहिं = के पास ।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरित मानस'
'लंका-कांड' के 'लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप' से लिया गया है। इसमें हनुमान द्वारा
लाई गई संजीवनी बूटी से लक्ष्मण के ठीक होने का प्रसंग है।
व्याख्या - श्रीराम ने प्रसन्न होकर हनुमान को भेंटा, अर्थात् गले लगा लिया। परम ज्ञानी
(प्रभु) होकर भी वे हनुमान के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ हुए। तब वैद्य सुषेण ने तुरन्त
लक्ष्मण का उपचार किया। परिणामस्वरूप लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे, अर्थात् होश में
आ गये। प्रभु श्रीराम ने भाई लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया।
इस मिलन को देखकर सभी भालू, वानर आदि हर्षित हो गए। फिर हनुमान
ने सुषेण वैद्य को तुरन्त उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ से वे पहले उन्हें लाये
थे। लक्ष्मण की मूर्छा टूटने का समाचार जब रावण ने सुना, तब उसने अत्यन्त विषाद में
आकर निराशापूर्ण ग्लानि से बार-बार अपना सिर पीटा। तब व्याकुल होकर वह कुम्भकर्ण के
पास आया और विविध प्रकार के प्रयत्न करके उसने उसे गहरी नींद से जगाया।
विशेष :
1. कवि ने राम द्वारा हनुमान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की
है तथा लक्ष्मण के होश में आने पर रावण का दुःखी होना व्यक्त हुआ है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग है। चौपाई छंद एवं अनुप्रास अलंकार
है। 'सिर धुनना' मुहावरे का प्रयोग है।
6.
जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥
कुंभकरन
बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई ॥
कथा
कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ।।
तात
कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥
दुर्मुख
सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ।।
अपर
महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।
दोहा
सुनि
दसकंधर बचन तब, कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा
हरि आनि अब, सठ चाहत कल्यान ।।
कठिन-शब्दार्थ
:
निसिचर
= राक्षस।
कालु
= काल, मौत।
बैसा=बैठा।
सुखाई
= सूख गया।
हरि
आनी = हरण कर लाया।
दुर्मुख = कड़वी जुबान वाला।
जोधा = योद्धा।
सुररिपु = देवताओं का शत्रु।
मनुज अहारी = मनुष्य को खाने वाला।
अतिकाय = विशाल शरीर वाला।
अपर = दूसरा, अन्य।
समर = लड़ाई, युद्ध।
महि = धरती।
दसकन्धर = रावण।
बिलखान = बिलखता हुआ।
जगदम्बा = जगत् की माता, सीता।
सठ = दुष्ट ।
प्रसंग - प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह 'भाग 2 में संकलित 'रामचरित मानस'
'लंका-कांड' के 'लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप' से लिया गया है। काव्यांश में रावण
का भाई कुम्भकर्ण सीता का हरण करने पर उसे धिक्कार रहा है।
व्याख्या - तब कुम्भकर्ण जाग गया अर्थात् उठ बैठा। उस समय वह ऐसा दिखाई दे रहा था मानो
साक्षात् काल अर्थात् मृत्यु शरीर धारण करके बैठी हो। कुम्भकर्ण ने रावण से पूछा-कहो
भाई, क्या बात है? तुम्हारे मुख (दस मुँह) क्यों सूख रहे हैं?
कुम्भकर्ण का प्रश्न सुनकर रावण ने अभिमान के साथ वह सारी
कथा कह सुनाई कि वह किस प्रकार सीता का हरण कर लाया था। रावण ने फिर कहा कि हे भाई।
श्रीराम के वानरों ने बहुत से राक्षस मार डाले हैं। उन्होंने बड़े-बड़े योद्धाओं का
भी संहार कर डाला है। दुर्मुख, देवान्तक, नरान्तक, महायोद्धा अतिकाय, भारी-भरकम अकम्पन
तथा महोदर आदि दूसरे सभी प्रमुख रणधीर वीर राक्षस युद्धभूमि में मर चुके हैं।
रावण के ये वचन सुनकर कुम्भकर्ण दुःखी होकर कहने लगा - अरे
दुष्ट । जगत्-जननी सीता का अपहरण करके भी अब तू अपना कल्याण चाहता है? अर्थात् अब तेरा
कल्याण असम्भव है।
विशेष :
1. कवि ने राक्षस कुम्भकर्ण द्वारा प्रभु श्रीराम की महिमा
बताई है जो छः महीने सोने के बाद भी ये जानता है कि प्रभु श्रीराम का अमंगल करने वालों
का भला नहीं हो सकता है।
2. अवधी भाषा का प्रयोग किया है। व्यंग्य-वचनों का स्वाभाविक
कथन है।
3. 'जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा'
पंक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
पाठ के साथ
1. कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को
अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
उत्तर
- गोस्वामी तुलसीदास उच्च कोटि के सन्त एवं भक्त कवि थे। वे लोकनायक एवं लोकमंगल की
भावना से मण्डित थे। उन्होंने अपने युग की अनेक विषम परिस्थितियों को देखा; भुगता तथा
अपनी रचनाओं में स्वर दिया। समाज में व्याप्त भयंकर बेरोजगारी और भुखमरी को लेकर 'कवितावली'
आदि में आक्रोश के साथ अपना मन्तव्य स्पष्ट किया था। 'पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी' पंक्ति से पता चलता है कि तुलसीदास को तत्कालीन समय के किसान,
श्रमिक, भिखारी, व्यापारी, नौकर, कलाकार आदि की आर्थिक समस्याओं की गहरी समझ थी। कवितावली
के उक्त पंक्तियों द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि तुलसी को अपने युग की आर्थिक विषमता
की अच्छी समझ थी।
2. पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है- तुलसी
का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग - सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए ।
उत्तर
-तुलसीदास ने स्पष्ट कहा है कि ईश्वर-भक्ति रूपी मेघ या बादल ही पेट की आग को बुझा
सकते हैं। तुलसी का यह काव्य-सत्य उस
युग में भी था तो आज भी यह सत्य है। प्रभु की भक्ति करने से सत्कर्म की प्रवृत्ति बढ़ती
है। प्रभु की प्रार्थना से पुरुषार्थ और कर्मनिष्ठा का समन्वय बढ़ता है। इससे वह व्यक्ति
ईमानदारी से पेट की आग को शांत करने अर्थात् आर्थिक स्थिति सुधारने और आजीविका की समुचित
व्यवस्था करने में लग जाता है। इस तरह कर्मनिष्ठ भक्ति से तुलसी का वह काव्य-सत्य वर्तमान
का सत्य दिखाई देता है। कोरी अन्ध-आस्था एवं कर्महीनता से की गई भक्ति का दिखावा करने
से व्यक्ति पेट की आग नहीं बुझा पाता ।
3. तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी
?
धूत कही, अवधूत कहाँ, रजपूत कहाँ, जोलहा कहाँ
कोऊ काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के
बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता ?
उत्तर - तुलसी को यह कहने की जरूरत इसलिए पड़ी कि उस समय
कुछ धूर्त लोग उनके कुल-गोत्र और वंश जाति को लेकर झूठा प्रचार कर रहे थे। वे लोग काशी
में तुलसी के बढ़ते प्रभाव को देखकर उन्हें बदनाम करना चाहते थे। जाति-प्रथा से ग्रस्त
ऐसे लोगों को कड़ा उत्तर देने के लिए तुलसी ने ऐसा कहना उचित समझा। वैसे भी तुलसी ने
गृह-त्याग दिया था, सांसारिक संबंधों के प्रति उनका कोई मोह नहीं था। अतएव उनके सामने
बेटा या बेटी के विवाह करने का प्रश्न ही नहीं था। उस दशा में भी उनकी जाति बिगड़ने
की बात में या उसके सामाजिक अर्थ में कोई फर्क नहीं पड़ता।
4. धूत कहौ... वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह
दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ
तक सहमत हैं ?
उत्तर - 'धूत कहौ' इत्यादि सवैया में तुलसी की सच्ची भक्ति-भावना
एवं स्वाभिमानी स्वभाव का परिचय मिलता है। उन्होंने कहा है 'लैबो को एक न दैबों को
दोऊ'। इससे उनके स्वाभिमान की स्पष्ट झलक दिखलाई पड़ती है। तुलसीदास को न किसी से लेना
है न ही देना अर्थात् बेकार के प्रपंचों में नहीं पड़ना है, न ही स्वार्थवश किसी की
जी हजूरी करनी है। स्वयं को 'सरनाम गुलाम है राम को' कहा है, अर्थात् स्वयं को श्रीराम
प्रभु का एक सच्चा समर्पित भक्त बताया है। वे स्वयं को तन-मन-वचन से अपने स्वामी श्रीराम
का सेवक मानते हैं। अपने आराध्य के प्रति निष्ठा को स्वाभिमान के साथ व्यक्त करने में
उनकी वास्तविकता का परिचय मिल जाता है।
5. व्याख्या करें-
आरोह
(क) मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन
हिम आतप बाता।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पितु बचन मनतेउँ
नहिं ओहू ।।
ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि
करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै
मोही ।।
(ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको
एकु न दैबको दोऊ ।।
(घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को
पचत, बेचत बेटा-बेटकी ॥
उत्तर (अ) शक्ति-बाण लगने से लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने
तथा संजीवनी बूटी को लेकर हनुमान के आने में विलम्ब होने से श्रीराम भावुक हो गये।
तब वे भ्रातृत्व प्रेम के आवेश में कहने लगे कि हे भाई। तुमने मेरे लिए अपने माता-पिता
का त्याग किया और मेरे साथ वन में आये। मेरे सुख के लिए तुमने वन में सर्दी-गर्मी,
आँधी आदि कष्टों को सहा। यदि मुझे पता होता कि वन में आकर तुम्हारा वियोग सहना होगा
तो मैं पिता के वनवास के आदेश को अस्वीकार कर देता।
(ब) मूछित लक्ष्मण को देख कर श्रीराम अपना मोह और भ्रातृ-प्रेम
प्रकट करते हुए कहने लगे कि हे भाई! तुम ही मेरी शक्ति हो। जिस प्रकार पंखों के बिना
पक्षी, सूंड के बिना हाथी की दशा अत्यन्त दीन-हीन हो जाती है। यदि निर्दयी भाग्य ने
मुझे तुम्हारे बिना जीवित रखा, तो मेरी दशा भी ऐसी ही दीन-हीन हो जायेगी।
(स) तुलसीदास अपने युग की बेरोजगारी एवं भुखमरी आदि स्थितियों
को लक्ष्य कर कहते हैं कि मुझे किसी के घर-परिवार तथा धन-दौलत का आश्रय नहीं चाहिए।
मैं तो लोगों से भिक्षा माँगकर और मस्जिद में सोकर सन्तुष्ट हूँ। मुझे किसी से कुछ
लेना-देना नहीं है।
(द) तुलसी बताते हैं कि संसार में पेट की आग शान्त करने के
लिए ही लोग ऊँचे-नीचे और धर्म-अधर्म आदि के कार्य करने को विवश हो जाते हैं। पेट-पूर्ति
के लिए ही लोग बेटा-बेटी तक को बेचने को तैयार हो जाते हैं। संसार के सारे काम-धन्धे
पेट की भूख के कारण ही किये जाते हैं।
6. भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने
प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे
सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर - महाकवि तुलसीदास ने भक्ति-भावना के कारण भले ही यह
कह दिया कि प्रभु श्रीराम विलाप करते समय नर लीला कर रहे थे। परन्तु प्रिय भ्राता लक्ष्मण
के मूर्छित होने पर अनिष्ट की आशंका से श्रीराम ने जो विलाप किया, उसका चित्रण तुलसी
ने सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में किया। क्योंकि सच्ची अनुभूति द्वारा ही मार्मिक
एवं करुणाजनक चित्र प्रस्तुत हो सकता है। अतः हम इस बात से सहमत हैं।
7. शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को
करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?
उत्तर - सुषेण वैद्य ने कहा था कि सुबह होने से पहले संजीवनी
बूटी आने पर ही लक्ष्मण का उपचार हो सकेगा, अन्यथा प्राण बचाना असंभव है। भोर होने
के करीब थी, परन्तु हनुमान तब तक नहीं आये थे। अतएव श्रीराम लक्ष्मण के अनिष्ट की आशंका
से करुण विलाप करने लगे। उन्हें विलाप करते देखकर सारे भालू और वानर सेना भी शोकग्रस्त
हो गये। उसी समय हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आ गये। विशाल पहाड़ को उखाड़कर लाने तथा
साहसी कार्य करने से हनुमान को देखते ही सभी में आशा-उत्साह का संचार हो गया। अतः अचानक
इस परिवर्तन से करुण रस के बीच वीर-रस (स्थायी भाव-उत्साह) का आविर्भाव कहा गया है।
8. जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई । नारि हेतु प्रिय
भाइ गँवाई ।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष
छति नाहीं ।
भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप वचन
में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
उत्तर - भाई के शोक में डूबे श्रीराम के इस प्रलाप को सुनकर
यद्यपि स्त्री को बुरा लगेगा। वह सोचेगी कि भाई की तुलना में पत्नी को हीन समझा जाता
है; परन्तु प्रलाप-विलाप में व्यक्ति बहुत कुछ कह जाता है। जिसके कारण प्रलाप किया
जा रहा हो, उसे औरों की अपेक्षा अधिक प्रिय बताया जाता है। यह सामान्य लोक-व्यवहार
की बात है। कवि के अनुसार राम उस समय नर-लीला कर रहे थे। अतः उनका उक्त प्रलाप वचन
शोकावेग का ही परिचायक है।