12th Hindi Core 9. रुबाइयाँ, गज़ल JCERT/JAC Reference Book

12th Hindi Core 9. रुबाइयाँ, गज़ल JCERT/JAC Reference Book

 

12th Hindi Core 9. रुबाइयाँ, गज़ल JCERT/JAC Reference Book

9. रुबाइयाँ, गज़ल

कवि परिचयः-

1. फ़िराक गोरखपुरी

2. मूल नाम - रघुपति सहाय 'फ़िराक'

3. जन्म 28 अगस्त, सन् 1896 ई.

जन्म-स्थान - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

4. निधन - सन् 1983 ई.

5. शिक्षा राम कृष्ण की कहानियों से शुरुआत करने के बाद अरबी, फारसी और अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त की।

6. 1917 ई. में डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुए, पर स्वराज आंदोलन के लिए 1918 में इस पद से त्याग-पत्र दे दिए।

7. 1920 ईस्वी में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण डेढ़ वर्ष जेल में रहे।

8. प्रमुख रचनाएँ - गुले नग्मा, बज़्मे ज़िंदगीः रंगे-शायरी, उर्दू गज़लगोई ।

9. सम्मान 'गुले नग्मा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

10. भाषा शैली :- फ़िराक ने परंपरागत भाव-बोध और शब्द - भंडार का उपयोग करते हुए उसे नई भाषा और नए विषयों से जोड़ा है। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढाला है।

11. उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। नज़ीर अकबराबादी, इल्ताफ़ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक गोरखपुरी का भी है।

12. फ़िराक की भाषा-शैली मीर और गालिब की तरह है।

कविता परिचयः-

1. रुबाइयाँ

2. फ़िराक की रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। भाषा सहज और प्रसंग भी सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी की याद दिलाता है।

3. यहाँ प्रस्तुत रुबाइयों में कवि ने माँ एवं बालक के अनूठे और पवित्र प्रेम को अभिव्यक्ति दी है।

4. बालक को हाथ में लेकर उछालने, नहलाने, कंघी करने, कपड़े पहनाने, दीप जलाने, दर्पण में उतरे चाँद का खिलौना देने तथा बिजली के लच्छे जैसी राखी भाई के हाथों में बांधने का प्रेम भरा चित्र इन रुबाइयों में है।

5. यहाँ पहले और दूसरे रुबाई में एक माँ के द्वारा अपने बच्चे को गोद में लेकर झूला झुलाने तथा निर्मल और स्वच्छ जल से उन्हें नहला कर उनके गेसुओं में कंघी करके अपने घुटनों में लेकर कपड़े पहनाने का सुंदर और आकर्षक चित्रण हुआ है।

6. तीसरे रुबाई में दीवाली के शाम एक माँ के द्वारा अपने बच्चे के घरौंदा में दीये जलाने, चौथे रुबाई में एक बच्चे का चंद्र खिलौना के लिए अपनी माँ से जिद्द करने का तथा पाँचवें रुबाई में रक्षाबंधन के त्यौहार के शुभ अवसर पर एक बहन के द्वारा अपने भाई के हाथों में राखी बाँधने का मनमोहक चित्रण हुआ है।

सप्रसंग व्याख्या:-

काव्यांश-1

आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी

हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी

रह-रह के हवा में जो लोका देती है

गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी

शब्दार्थ :- लोका देना = बच्चे को उछाल कर प्यार करने की एक क्रिया।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित 'रुबाइया से ली गई है। यहाँ कवि ने माँ एवं बच्चे के प्रेम का सुन्दर चित्रण किया है।

व्याख्या :- यहाँ कवि फ़िराक गोरखपुरी माँ एवं बच्चे के प्रेम का चित्रण करते हुए कहते हैं कि घर के आँगन में माँ अपने चाँद के टुकड़े अर्थात् बच्चे को गोद में भरे हुए हाथों पर झूला झुला रही है। बीच-बीच में माँ उसे हवा में उछाल देती है और फिर थाम लेती है, इस तरह लोका देना बच्चों को आनंद से भर देता है। बच्चे की खिलखिलाती हँसी से सारा घर गूंज उठता है।

विशेषः-

1. इस काव्यांश में माँ के निर्मल प्रेम, बालक की गूंज भरी हँसी और माँ की प्रसन्नता का सुंदर चित्रण हुआ है।

2. वात्सल्य - प्रेम की यह कविता बिंबात्मक है।

3. बच्चे के लिए 'चाँद के टुकडे' के प्रयोग में अतिशयोक्ति तथा 'रह-रह' में पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार की छटा है।

4. 'लोका देना' में लोकभाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।

5. इस काव्यांश में सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

6. इसमें रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

काव्यांश-2

नहला के छलके छलके निर्मल जल से

उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके

किस प्यार से देखता है बच्चा मुँह को

जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े

शब्दार्थ :- निर्मल = स्वच्छ। गेसुओं = बालों। पिन्हाती = पहनाती ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित उर्दू कवि फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित 'रुबाइयाँ' से ली गई है। यहाँ कवि ने माँ एवं बच्चे के प्यार का एक सुन्दर चित्रण किया है।

 

व्याख्या :- यहाँ कवि माँ एवं बच्चे के संदर्भमें स्नान तथा स्नान के बाद की क्रियाओं का मार्मिक चित्रण करते हुए कहते हैं कि माँ छलके-छलके निर्मल जल से बच्चे को स्नान कराती है, उसके उलझे बालों में कंघी करती है तथा उसे घुटनों के बीच लेकर उसे कपड़े पहनाती है। माँ तो इन क्रियाओं के बीच प्रसन्न है ही, बालक भी घुटनों के बीच से माँ का चेहरा प्यार से देखता रहता है।

विशेष :-

1. इस काव्यांश में माँ एवं बच्चे के बीच के प्यार का सुंदर चित्रण हुआ है।

2. वात्सल्य-प्रेम की यह कविता बिम्बात्मक है।

3. 'छलके-छलके' में पुनरुक्ति प्रकाश तथा 'कंघी करके' में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

4. घुटनियों, पिन्हाती आदि लोक-भाषा के शब्दों के प्रयोग से कविता जीवंत बन गयी है।

5. इस काव्यांश में सरल एवं सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

6. इसमें रुबाई छंद का मनोरम प्रयोग हुआ है।

काव्यांश-3

दीवाली की शाम घर पुते और सजे

चीनी के खिलौने जगमगाते लावे

वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक

बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए

शब्दार्थ :- लावे = धान का भुना हुआ। दमक = चमक । घरौंदे = बच्चों द्वारा खेलने के लिए बनाया गया छोटा घर ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित उर्दू कवि फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित रुबाइयाँ से ली गई है। यहाँ कवि ने दीवाली के त्योहार तथा माँ एवं बच्चे के प्यार का एक सुन्दर चित्र अंकित किया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि फ़िराक गोरखपुरी ने दीवाली के त्योहार में घर की खुशी को चित्रित किया है। कवि कहता है कि दीवाली की शाम लिपाई-पुताई से सुन्दर बने घर को सजाया-सँवारा जाता है। चीनी के खिलौनों तथा धान के लावों से सारा घर जगमगा उठता है। माँ भी बच्चों के घरौंदों में जब दिये जलाती है तो उसके रूपवती चेहरे पर एक कोमल चमक भरी सुन्दरता छा जाती है, अर्थात् उसका सौन्दर्य वात्सल्य की चमक से बढ़ जाता है।

विशेष :-

1. इसमें दीपावली के त्योहार का सुंदर चित्रण हुआ है।

2. वात्सल्य-प्रेम की यह कविता बिंबात्मक है।

3. इस काव्यांश में सरल, सहज तथा चित्रात्मक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।

4. इसमें रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

काव्यांश - 4

आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है

बालक तो हई चाँद पै ललचाया है

दर्पण उसे दे के कह रही है माँ

देख आईने में चाँद उतर आया है

शब्दार्थ :- ठुनक = बच्चे का धीमे-धीमे रोना। ज़िदयाया = जिद्द करना। हई = है ही। दर्पण = आईना ।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित उर्दू कवि फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित रुबाइयाँ से ली गई है। यहाँ कवि ने चाँद के लिए बच्चे की जिद्द तथा माँ एवं बच्चे के बीच प्यार का सुन्दर चित्रण किया है।

व्याख्या : इस काव्यांश में कवि ने बालक की जिद्द एवं माँ की चतुराई का आकर्षक चित्रण किया है। आँगन में खड़े होकर बालक चाँद को देखकर ठुनक रहा है और चाँद को लेने की जिद्द कर रहा है। बालक का मन चाँद को देख ललचा गया है और माँ उसे हाथ में दर्पण पकड़ा कर कहती है कि लो देखो चाँद आईने में उतर आया है।

विशेष:-

1. इस काव्यांश में बालक की जिद्द का स्वाभाविक वर्णन किया गया है।

2. माँ की चतुराई में वात्सल्य-प्रेम का बिंबात्मक एवं सुन्दर चित्रण हुआ है।

3. भाषा की सरलता उसके लोक-प्रयोग से जुड़कर प्रभावी बनी है।

4. चाँद के दर्पण में उतर आने में आकर्षक बिंब है।

5. 'ठुनक', 'जिदयाया', 'ललचाया' आदि लोक भाषा के शब्दों का एक नूतन प्रयोग है।

6. इसमें रुबाई छंद का प्रयोग हुआ है।

काव्यांश-5

रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली

छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी

बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे

भाई के है बाँधती चमकती राखी

शब्दार्थ :- घटा = बादल। गगन = आकाश। लच्छे = पैर में पहने जाने वाले चाँदी के आभूषण, राखी के रेशेदार धागे ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित रुबाइयाँ से ली गई है। इस कविता में रक्षाबंधन के त्योहार का आकर्षक चित्रण हुआ है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने रक्षाबंधन की सुबह के चित्र को प्रस्तुत किया है। कवि कहता है कि वर्षा ऋतु के सावन माह में रक्षाबंधन त्योहार की सुबह अत्यंत सुहावनी और रसमयी प्रतीत होती है। ऐसी सुबह में आसमान में हल्की-हल्की बदली छायी हुई है। बहनें बिजली की तरह चमकते लच्छे की तरह चमकती राखी भाई की कलाई पर बाँधती हैं।

विशेषः-

1. इस काव्यांश में रक्षाबंधन के त्योहार की सुबह का बिंबात्मक चित्रण हुआ है।

2. यहाँ चमकीली राखी, चमकीले लच्छे का चित्र अत्यंत सुन्दर है।

3. 'हल्की-हल्की' में पुनरुक्ति प्रकाश तथा 'बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे' में उपमा अलंकार है।

4. यहाँ रुबाई छंद का मनोरम प्रयोग हुआ है।

5. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है।

गज़ल

कविता परिचयः-

1. गज़ल

2. रुबाइयों की तरह ही फ़िराक गोरखपुरी की गज़लों में भी हिंदी समाज और उर्दू शायरी की परंपरा भरपूर है। इसका अन्द्भुत नमूना है यह गज़ल ।

3. कवि फ़िराक गोरखपुरी की प्रस्तुत गज़ल विभिन्न शेरों के माध्यम से जीवन और प्रकृति की विभिन्न सच्चाइयों से हमें परिचित कराते हैं।

4. इन शेरों के माध्यम से कवि फ़िराक प्रेम की सघनता, इश्क की समझदारी, कविता की वास्तविकता, प्रिय का वियोग आदि भावों के लिए सुंदर शब्द-चित्र प्रस्तुत करते हैं।

5. यह गज़ल कुछ इस तरह बोलती है कि जिसमें दर्द भी है, एक शायर की ठसक भी है और साथ ही है काव्य-शिल्प की वह ऊँचाई, जो गज़ल की विशेषता मानी जाती है।

सप्रसंग व्याख्या :-

काव्यांश-1

नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं

या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं।

शब्दार्थ :- नौरस = नया रस। गुंचे = कली। गिरहें = गाँठ । रंगो-बू = रंग एवं सुगंध। गुलशन = बगीचा।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी के 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि नें वसंत ऋतु के आने पर प्रकृति में व्याप्त सुंदरता का मनोरम चित्रण किया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में प्रकृति का मनोरम चित्र प्रस्तुत करते हुए कवि कहता है कि बाग में कलियाँ अपनी पंखुड़ियों की कोमल गाँठों को खोलते हुए फूल बन रही हैं। कलियाँ धीरे-धीरे विकसित होते हुए अपने हृदय में नये रसों का संचार करती हैं तथा ऐसा प्रतीत होता है कि रंग और खुशबू सारे बाग में बिखर (फैल) जाने के लिए तत्पर हैं।

विशेषः-

1. इस काव्यांश में प्राकृतिक सौन्दर्य का मनोरम चित्रण हुआ है।

2. फारसी शब्दों की बहुलता से भाषा में क्लिष्टता आयी है।

3. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-2

तारे आँखें झपकायें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं

तुम भी सुनो हो यारो। शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं

शब्दार्थ :- ज़र्रा-ज़र्रा = कण-कण। यारो = दोस्तों, मित्रों । शब = रात। सन्नाटे = खामोशी ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी के 'ग़जल' से लिया गया है। इस गजल में कवि नें रात के सन्नाटे का चित्रण करते हुए अपनी विभिन्न अनुभूतियों को प्रकट किया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने रात्रि-कालीन प्रकृति का सुंदर तथा आकर्षक चित्र प्रस्तुत किया है। कवि कहता है कि रात के समय तारे आँखें झपकाते हुए प्रतीत होते हैं। उस समय प्रकृति का कण-कण सोया रहता है, किंतु कवि को रात का यह सन्नाटा कुछ बोलता हुआ प्रतीत होता है। सन्नाटे के इस वार्तालाप को कवि अपने श्रोता-मित्रों को भी सुनाना चाहते हैं।

विशेष:-

1. इसमें रात्रि कालीन प्रकृति का आकर्षक चित्रण हुआ है।

2. 'ज़र्रा- ज़र्रा' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार, 'शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं' में विरोधाभास अलंकार तथा पूरे काव्यांश में मानवीकरण अलंकार की छटा है।

3. फारसी शब्दों की बहुलता से भाषा में क्लिष्टता आई है।

4. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-3

हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला

किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।

शब्दार्थ :- किस्मत = भाग्य । इक = एक ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फिराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस गज़ल में कवि की विभिन्न अनुभूतियाँ प्रकट हुई हैं।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि अपने भाग्य की वास्तविकता का बयान कर रहा है। उसके अनुसार कवि को और उसकी किस्मत को दोनों को एक ही काम मिला है। दोनों का एक ही काम रोने का है। कवि कहता है कि हम किस्मत पर रो लेते हैं और किस्मत हम पर रो लेती है।

विशेष:-

1. इन पंक्तियों में कवि जीवन की दुरावस्था, दुर्भाग्य को व्यंजित किया गया है।

2. कवि कर्म में रत कवि का भाग्य कभी उस पर मुस्कुराता नहीं, हमेशा दोनों एक-दूसरे के लिए दुःखी होते हैं।

3. फारसी मिश्रित सरल बोलचाल की भाषा का प्रयोग से यह काव्यांश प्रसाद गुण संपन्न है।

4. इसमें गज़ल छंद है।

काव्यांश-4

जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें

मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं

शब्दार्थ:- परदा = रहस्य, राज ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस गजल में कवि की विभिन्न अनुभूतियाँ प्रकट हुई हैं।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने दूसरों को बदनाम करने वालों की वास्तविकता को उजागर किया है। कवि कहता है कि जो मुझे बदनाम करते हैं, वे यदि सोचकर देखें तो उन्हें पता चलेगा कि वे मुझे बेपरदा करते हुए मुझे बदनाम कर रहे हैं या अपने ही चरित्र पर से परदा उठाकर दुनिया को अपने बारे में बता कर स्वयं बदनाम हो रहे हैं।

विशेष:-

1. इस काव्यांश में कवि ने दूसरों पर छींटाकशी करने वालों पर व्यंग्य किया है।

2. फारसी शब्दावली से युक्त इस काव्यांश की भाषा अत्यंत सरल, सहज एवं प्रभावोत्पादक है।

3. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-5

ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो - हवास

तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं

शब्दार्थ :- कीमत = मूल्य । बदुरुस्ती-ए-होशो हवास = विवेक के साथ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि नें प्रेम के महत्व का प्रतिपादन किया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि प्रेम के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहता है कि प्रेम में होशो-हवास या विवेक का मूल्य नहीं होता है। विवेक के साथ प्रेम की कीमत हम नहीं समझ पाते। प्रेम का मूल्य तो दीवाना बनकर ही समझा जा सकता है। प्रेम का सौदा तो केवल दीवाना होकर ही किया जा सकता है।

विशेष:-

1. इस काव्यांव में प्रेम को खरीदने वाले या उसका मूल्य लगाने वालों पर व्यंग्य किया गया है।

2. कवि का कहना है कि प्रेम तो स्वयं को खोकर ही पाया जा सकता है, जो दीवाने की स्थिति होती है।

3. भाषा में फारसी शब्दों के प्रयोग से क्लिष्टता आयी है।

4. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-6

तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है

सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं

शब्दार्थ- गम = दुःख। पासे-अदब = लिहाज, सम्मान। खयाल = ध्यान।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि- हृदय की प्रेम की पीड़ा का मार्मिक चित्रण हुआ है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने प्रेम के संबंध में बड़ी सटीक भावाभिव्यक्ति की है। अपनी प्रिया के दुःख के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए प्रेमी को दुनिया का भी ध्यान रहता है, इसलिए दुनिया से छिपकर वह प्रेम के दर्द में आँसू बहा लेता है। कवि प्रिय के वियोग में दुखी होता है किन्तु अपने दुःख का बखान वह खुलकर नहीं कर पाता और मौन रुदन से अपने दिल को तसल्ली देता है।

विशेष:-

1. इस काव्यांश में कवि ने प्रेम की पीड़ा, सघनता, गहराई और समझदारी को दिखलाया है।

2. 'चुपके-चुपके' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

3. फारसी शब्दों के प्रयोग से भाषा में क्लिष्टता आई है।

4. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-7

फ़ितरत का कायम है तवाजुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी

उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं

शब्दार्थ :- फ़ितरत = आदत । तवाजुन = संतुलन। आलमे-हुस्नो-इश्क = सौंदर्य और प्रेम का जगत ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि ने प्रेम के प्रति संपूर्ण समर्पण करने का भाव अभिव्यक्त किया है।

व्याख्या: इस काव्यांश में कवि ने प्रेम में खोने और पाने के सिद्धांत की व्याख्या की है। कवि का कहना है कि प्रेम और सौन्दर्य की स्थिति में भी प्रेमी को अपनी आदत को सन्तुलित बनाये रखना पड़ता है। क्योंकि प्रेम में तभी पाना होता है, जब हम अपने आपको प्रेम में खो देते हैं, प्रेम के प्रति अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं।

विशेष:-

1. इस काव्यांश में कवि ने प्रेम और सौन्दर्य में खोने और पाने के महत्त्व को बतलाया है।

2. उर्दू शायरी की श्रृंगारिकता का यहाँ स्पष्ट प्रभाव है।

3. उर्दू-फारसी शब्दों के प्रयोग से भाषा में क्लिष्टता आई है।

4. इसमें गज़ल छंद है।

काव्यांश-8

आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो

ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं

शब्दार्थ: आबो-ताब अश्आर = चमक-दमक के साथ। बैत = शेर ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि नें यह बताया है कि कविता कवि-हृदय की पीड़ा है।

व्याख्या : इस काव्यांश में कवि ने कविता के प्रभाव का विश्लेषण किया है। कवि कहता है कि यह दुनिया केवल बाहरी चमक-दमक के प्रभाव में आती है, उसके पीछे भागती है। किन्तु दुनिया की सच्चाई शेरों-कविताओं की दमक में दिखायी पड़ती है, जो वास्तव में कवि के हृदय की पीड़ा है। कवि के आँसू ही छंद बनकर दुनिया की चमक बनकर सबको आकर्षित करते हैं।

विशेष:-

1. यहाँ कविता को कवि के हृदय की पीड़ा वेदना के भाव से उत्पन्न होना बतलाया गया है।

2. 'जगमग बैतों की दमक है या मोती रोले हैं' में संदेह अलंकार की छटा है।

3. भाषा में फारसी शब्दों के प्रयोग क्लिष्टता आ गई है।

4. इसमें गज़ल छंद है।

काव्याश-9

ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को रात गए गर्दू पै फ़रिश्ते बाबे-गुनह जग खोले हैं

शब्दार्थ :- अंजुमने-मय = शराब की महफिल । रिंद = शराबी । गर्दू = आकाश आसमान। फ़रिश्ते = देवदूत । बाबे-गुनाह = पाप का अध्याय ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि कहते हैं कि रात के समय शराब की महफिल में शराबियों को अपनी प्रेमिका या ईश्वर की याद आती है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ईश्वर की अनुभूति का बयान करता है। कवि कहता कि रात बीतने पर आकाश में फ़रिश्ते इस संसार को पाप के अध्याय का दर्शन कराते हैं। तात्पर्य कि इस दुनिया में अधिकतर पाप-कर्म रात के अंधेरे में होते हैं, किन्तु उसी अंधेरे में आसमानी फ़रिश्ते की दुआ भी मिलती है। ठीक उसी तरह जैसे शराब की महफिल में ही शराबियों को अपने प्रेमी या ईश्वर का स्मरण हो आता है।

विशेष:-

1. यहाँ कवि नें पाप-कर्म एवं बुराई के बीच ही अच्छाई एवं प्रेम के उदय को जीवन में महत्त्वपूर्ण माना है।

2. 'गए गर्दू' में अनुप्रास अलंकार है।

3. फारसी शब्दों के प्रयोग से भाषा में क्लिष्टता का आ गई है।

4. इसमें गज़ल छंद का उपयोग हुआ है।

काव्यांश-10

सदके फ़िराक एज़ाज़े-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़

इन गज़लों के परदों में तो 'मीर' की गज़लें बोले हैं

शब्दार्थ :- सदके = धन्य होना। एज़ाज़े-सुखन = बेहतरीन (प्रतिष्ठित) शायरी।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि फ़िराक गोरखपुरी की 'गजल' से लिया गया है। इस काव्यांश में कवि ने अपनी बेहतरीन गज़लों की समानता प्रसिद्ध गज़लकार मीर तकी 'मीर' की गज़लों से दिखलायी है।

व्याख्या:- इसमें कवि ने अपनी गज़लो की खुलकर प्रशंसा की है। कवि फ़िराक गोरखपुरी अपनी बेहतरीन गज़लों के प्रति सदका करते हुए अर्थात् सर झुकाते हुए कहते हैं कि मेरी गजलों ने ऐसी आवाज उड़ा ली है या ऐसी बातें कही हैं कि सुनने वाले को इन गजलों में 'मीर' की गजलें बोलती जान पड़ती हैं।

विशेषः-

1. इस काव्यांश में कवि ने अपनी कविता की तुलना प्रसिद्ध शायर मीर तकी 'मीर' की कविता से करते हुए दोनों में समानता का भाव व्यक्त किया है।

2. यहाँ कवि का अपनी कविता के प्रति स्वाभिमान का भाव व्यक्त हुआ है।

3. उर्दू-फारसी शब्दों से युक्त भाषा के प्रयोग से गज़ल की भाषा में क्लिष्टता का आ गई है।

पाठ के साथ:

अभ्यास

1. शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?

उत्तर :- राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहने के पीछे कवि का भाव उसकी पवित्रता को व्यंजित करने का है। बादल का बिजली से जो संबंध है, वही संबंध भाई-बहन के प्यार का है। जिस तरह बिजली अपनी चमक से प्रेम और सत्य को प्रकट करती है, उसी तरह राखी की चमक भी भाई-बहन के प्रेम और सत्य को व्यंजित करती है।

2. खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?

उत्तर: खुद का परदा खोलने का अर्थ है अपनी वास्तविकता को दुनिया के सामने प्रकट कर देना। जब व्यक्ति दूसरों के दोषों को दुनिया को दिखाने लगता है तो वास्तव में वह उस दूसरे व्यक्ति को बेपरदा नहीं करता है बल्कि स्वयं बेपरदा हो जाता है। दुनिया को उसके बुरे चरित्र का पता चल जाता है।

3. 'किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं' इस पंक्ति में शायर की किस्मत के साथ तना-तनी का रिश्ता अभिव्यक्त हुआ है। चर्चा कीजिए।

उत्तर :- शायर और शायर की किस्मत के बीच अटूट रिश्ता है, वह रिश्ता तना-तनी का है। दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं और दोनों एक-दूसरे के लिए रोते हैं। शायर किस्मत से कहता है कि तुम अच्छे नहीं हो और किस्मत भी शायर को कहती है कि तुम्हारे कारण मैं बुरी हूँ।

टिप्पणी करें -

(क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता ।

उत्तर:- गोदी के चाँद अर्थात् बच्चे और गगन के चाँद के बीच गहरा रिश्ता है। गगन का चाँद बच्चे के कोमल मन में कल्पना का अनोखा संसार रच देता है। बच्चे का मन गगन की चाँद रूपी खिलौने को लेने की जिद्द करता है। बच्चे की माँ चाँद के प्रतिबिंब को भी चाँद ही समझाकर अपनी गोद के चाँद (बच्चे) को बहलाती है।

(ख) सावन की घटाएँ व रक्षाबंधन का पर्व ।

उत्तर:- सावन और सावन की घटाओं के बीच भाई-बहन के पवित्र प्यार का पर्व रक्षाबंधन आता है। सावन की घटाएँ बिजली की चमक लाती हैं और वही चमक राखी के लच्छों में होती है। सावन का संबंध झीनी घटा से और झीनी घटा का संबंध बिजली से है, ऐसा ही भाई-बहन का संबंध है।

कविता के आसपास

1. इन रुबाइयों से हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोगों को छाँटिए।

उत्तरः- चाँद के टुकडे, लोका देती है, खिलखिलाते बच्चे की हँसी, छलके-छलके निर्मल जल से, उलझे हुए गेसुओं, पिन्हाती कपड़े, इक धर्म दमक, बच्चे के घरौंदे, ठुनक रहा है, ज़िदयाया है, ललचाया है आदि में हिंदी, उर्दू और लोक भाषा मिला-जुला प्रयोग हुआ है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-उत्तर

1. 'रुबाइयाँ' किसकी रचना है ?

(क) फ़िराक गोरखपुरी

(ख) फिराक सुल्तानपुरी

(ग) मजरूह सुल्तानपुरी

(घ) अहमदपुरी।

2. माँ अपने प्यारे बेटे को कहाँ लिए खड़ी है?

(क) घर के मंदिर में

(ख) घर की छत पर

(ग) घर के आंगन में

(घ) घर के द्वार पर।

3. बच्चे की हँसी से क्या गूंज उठता है?

(क) ऑगन

(ख) घ

(ग) संपूर्ण वातावरण

(घ) संपूर्ण व्यक्तित्व।

4. माँ बार-बार हवा में क्या उछालती है?

(क) गेंद

(ख) फल

(ग) कपड़ा

(घ) बच्चा।

5. हवा में बच्चे की क्या गूंज रही है?

(क) घुंघरू

(ख) पायल

(ग) रोना

(घ) हँसी।

6. माँ बच्चे को कैसे जल से नहलाती है?

(क) गर्म जल

(ख) गंगा जल

(ग) निर्मल जल

(घ) यमुना जल ।

7. किस पर्व पर घर लिपे-पुते, साफ- सुधरे तथा सजे-धजे होते हैं?

(क) दशहरा

(ख) रक्षाबंधन

(ग) होली

(घ) दीवाली

8. घर में किससे बने सुंदर खिलौने रखे हैं।

(क) चीनी- चाय पत्ती

(ख) चीनी मिट्टी

(ग) रेत-मिट्टी

(घ) सीमेंट- नेता

9. दीवाली के अवसर पर रूपवती के मुख पर क्या होती है ?

(क) एक नर्म चमक

(ख) एक गर्म चमक

(ग) एक ठण्डी चमक

(घ) एक सरल चमक।

10. बालक किस पर ललचाया है?

(क) सूरज पर

(ख) चाँद पर

(ग) तारे पर

(घ) खिलौने पर।

11. माँ अपने पुत्र को क्या देती है?

(क) खिलौना

(ख) चाँद

(ग) दर्पण

(घ) सितारा।

12. किसके लच्छे चमक रहे हैं?

(क) राखी के

(ख) परांदी के

(ग) दुपट्टे के

(घ) ऑचल के।

13. राखी के लच्छे किस तरह चमक रहे हैं?

(क) सूरज के

(ख) चाँद की

(ग) दर्पण

(घ) बिजली।

14. 'रूबाइयाँ में किस गुण का प्रयोग है?

(क) प्रसादगुण

(ख) ओजगुण

(ग) माधुर्य गुण

(घ) कोई नहीं।

15. 'रुबाइयाँ' में किस छंद का प्रयोग है?

(क) दोहा

(ख) सवैया

(ग) चौपाई

(घ) रुबाई।

16. रुबाइयाँ में किस शैली का प्रयोग है ?

(क) भावपूर्ण चित्रात्मक शैली

(ख) वर्णनात्मक शैली

(ग) अभिधात्मक शैली

(घ) इनमें से कोई नहीं

17. 'रुबाइयाँ' में किस रस का प्रयोग है?

(क) करुण

(ख) शांत

(ग) वात्सल्य

(घ) वीर।

18. "ग़ज़ल' किसकी रचना है?

(क) फिराक मलिक

(ख) फिराक गोरखपुरी

(ग) फिराक सुल्तानपुरी

(घ) फिराक सिद्दीकी।

19. 'गजल' में कवि ने किस ऋतु का वर्णन किया है?

(क) वर्षा

(ख) शरद

(ग) ग्रीष्म

(घ) बसंत ।

20. फूल की कलियाँ किसे खोल कर खिल उठती है ?

(क) पंखुड़ियों को

(ख) पत्तों को

(ग) गाँठों को

(घ) रेशों को।

21. रात्रि के गहन अंधकार में प्रकृति का क्या सोया हुआ है?

(क) जन-जन

(ख) मन-मन

(ग) तन-तन

(घ) कण-कण।

22. रात्रि के गहन अंधकार में क्या टिमटिमा रहे हैं।

(क) तारे

(ख) जुगनू

(ग) बिजली

(घ) दिए।

23. तारे क्या झपकाते हैं?

(क) म

(ख) तन

(ग) आँखें

(घ) चाँद।

24. कौन कवि को बदनाम करना चाहता है?

(क) परिवार के लोग

(ख) रिश्तेदार

(ग) समाज के लोग

(घ) देश के लोग।

25. कवि किस कीमत को अदा करने की बात कहते हैं?

(क) प्रेम की

(ख) शिक्षा की

(ग) भोजन की

(घ) कपड़े की।

26. कवि किसको संबोधित करता है?

(क) माँ को

(ख) बहन को

(ग) भाई को

(घ) प्रियतमा को।

27. कवि किसका सौदा करने के लिए कह रहा है?

(क) घरका

(ख) खेतका

(ग) प्रियतमा का

(घ) रिश्तों का।

28. कवि प्रियतमा की भावना का सम्मान करता है?

(क) पीड़ा

(ख) खुशी

(ग) प्रेम

(घ) आदर्श

29. कवि को अपनी प्रियतमा के साथ-साथ किसका ख्याल है?

(क) परिवार

(ख) समाज

(ग) दुनिया

(घ) देशा

30. किसका तवाजून कायम है?

(क) प्यार का

(ख) आदी का

(ग) नियमों का

(घ) फितरत का।

31. कवि किसकी चमक की बात कर रहा है।

(क) मोती

(ख) शेरों

(ग) हीरा

(घ) तारी।

32. शराब की महफिलों में शराबियों को क्या याद आता है?

(क) शराब

(ख) प्रियतमा

(ग) समाज

(घ) गजल।

33. रात गए फरिश्ते आकाश में संपूर्ण संसार का क्या खोलते हैं?

(क) पाप का अध्याय

(ख) पूण्य का अध्याय

(ग) धर्म का अध्याय

(घ) धर्म का अध्याय।

34. फिराक किस पर सदके जाता है?

(क) गीत की आवाज

(ख) मन की आवाज

(ग) प्रेम की आवाज

(घ) शायरी की आवाजा

35. कवि अपनी गजलों को किनके प्रति समर्पित करता है?

(क) मिर्जा गालिब

(ख) मीरा

(ग) मजरूह सुल्तानपुरी

(घ) गुलाम अली।

36. 'गजल' में किस छंद का प्रयोग है?

(क) रुबाई

(ख) दोहा

(ग) चौपाई

(घ) गजल ।

37. 'फितरत कायम है तवाजुन आलमे हुस्नो इश्क में भी' पंक्ति में कौन-सी भाषा है?

(क) तत्सम् प्रधान

(ख) तद्भव प्रधान

(ग) उर्दू-फारसी

(घ) बजभाषा।

38. 'गजल' में किस रस का प्रयोग है?

(क) श्रृंगार

(ख) करूण

(ग) शांत

(घ) वात्सल्य

39. 'तेरे गम का पासे अदब है कुछ दुनिया का ख्याल भी है' पंक्ति में भाषा कौन-सी है?

(क) संस्कृत

(ख) उर्दू-फारसी

(ग) बोलचाल क

(घ) तद्भव।

40. 'सदके फिराक एजाजे-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़'-पंक्ति में भाषा कौन-सी है ?

(क) तत्सम प्रधान

(ख) तद्भव प्रधान

(ग) उर्दू-फारसी

(घ) ब्रजभाषा ।

41. पठित गजल के अनुसार रात के सन्नाटे क्या कर रहे हैं?

(क) खामोश है

(ख) कुछ बोल रहे हैं

(ग) पसरे हैं

(घ) जाग रहे हैं।

42. पठित गजल के अनुसार रात में कौन बोल रहे हैं ?

(क) सन्नाटे

(ख) बच्चे

(ग) पक्षी

(घ) भूत

43. गजल के अनुसार आँखें कौन झपका रहे हैं?

(क) तारे

(ख) बच्चे

(ग) पक्षी

(घ) सूर्य चंद्रमा।

44. 'फितरत का कायम है तवाजुन' यहाँ 'तवाजुन' का क्या अर्थ है-

(क तराजू

(ख) राज्य

(ग) संतुलन

(घ) स्थिरता।

45. 'फितरत का कायम है तवाजुन' - यहाँ 'फितरत' का अर्थ है-

(क) भाग्य

(ख) समय

(ग) प्रकृति

(घ) पाखंड।

46. 'रात गए गर्दू पै फरिश्ते' यहाँ 'गर्द' का अर्थ है-

(क) आकाश

(ख) भगवान

(ग) इंद्र

(घ) धरती।

47. 'तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं' यहाँ 'ज़र्रा जर्रा' का अर्थ है

(क) जरा-जरा

(ख) जरा-सा

(ग) क्षण-क्षण

(घ) कण-कण।


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