4. कैमरे में बंद अपाहिज
कवि परिचय
रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर 1929 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ
में हुआ था।
लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. करने
के पश्चात् वह पत्रकारिता व साहित्य सृजन में रम गए।
रघुवीर सहाय समकालीन हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं।
रघुवीर सहाय पेशे से पत्रकार थे। उन्होंने 'दिनमान' पत्रिका
का संपादन किया तथा 'प्रतीक' पत्रिका में सहायक संपादक रहे।
वह आकाशवाणी के समाचार विभाग से भी जुड़े रहे।
प्रमुख रचनाएँ:- सीढ़ियों पर धूप में, हँसो हँसो
जल्दी हँसो, लोग भूल गये हैं, आत्महत्या
के विरुद्ध, कुछ पत्ते कुछ चिट्ठियाँ (कविता संग्रह)। रास्ता जो इधर से है, जो आदमी
हम बना रहे हैं (कहानी-संग्रह)। दिल्ली मेरा परदेश, लिखने का कारण, लहरें और तरंग आदि
(निबंध - संग्रह)।
पुरस्कार व सम्मानः- रघुवीर सहाय को 1982 में 'लोग भूल गए हैं' कविता संग्रह
पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
इनके काव्य में जनजीवन से जुड़े अनुभव, मानवीय पीड़ा, अकेलापन,
असुरक्षा आदि की भावना को प्रमुखता से स्थान मिला है।
इनकी भाषा में देशज शब्दों का सुंदर संयोजन है। छंद के साथ
और छंद मुक्त दोनों ही प्रकार की कविताओं में अलंकारों का सुंदर प्रयोग दिखता है। इनकी
भाषा व्यंग्यात्मक तथा मुहावरेदार है।
आधुनिक हिंदी साहित्य के इस अप्रतिम कवि का निधन 30 दिसंबर
1990 को दिल्ली में हो गया।
पाठ-परिचय
"कैमरे में बंद अपाहिज” रघुवीर सहाय द्वारा लिखी हुई
एक मार्मिक कविता है। जिसमें सामाजिक विडंबनाओं को उसके वास्तविक रूप में हमारे सामने
लाने का प्रयास है।
इस कविता में एक अपंग व्यक्ति, जो स्वयं शारीरिक चुनौती का
सामना कर रहा है। उससे मीडिया समूह के लोग अमानवीयता के साथ पेश आते हैं।
इसमें कवि ने व्यक्ति की पीड़ा और मीडिया समूह के बीच के
संबंध को रेखांकित करने का प्रयास किया है।
किसी की पीड़ा को बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने वाले
व्यक्ति को उस पीड़ा के प्रति स्वयं संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन विडंवना यह है कि
कारोबारी दवाब के कारण उस पीड़ा के प्रति व्यक्ति असंवेदनशील हो जाता है।
यह कविता टेलीविजन स्टूडियो के भीतर की दुनिया को उभारती
है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसे केवल टी.वी. जगत से ही जोड़ कर देखा जाए। अपनी व्यंजना
में यह कविता हर ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा करती है, जो दुःख, दर्द, यातना, वेदना को
बेचना चाहता है।
इस कविता को शारीरिक चुनौती झेलने वाले लोगों के प्रति संवेदनशील
नजरिया अपनाने के लिए प्रेरित करते पाठ के रूप में देखा जा सकता है।
व्याख्या
काव्यांश - 1
हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में
उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा देता है?
(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या हैं?
जल्दी बताइए वह दुख बताइए बता नहीं पाएगा।
2. शब्दार्थ
समर्थ-सक्षम। शक्तिवान-ताकतवर। दुर्बल- कमजोर। बंद कमरे में-टी.वी.
स्टूडियो में। अपाहिज-अपंग, विकलांग। दुख-कष्ट।
3.
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह
भाग-2' में संकलित 'कैमरे में बंद अपाहिज' शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के
रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया
है। कवि का मानना है कि मीडिया वाले दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते
हैं।
4.
व्याख्या- कवि मीडिया के लोगों की मानसिकता का वर्णन करता
है। मीडिया के लोग स्वयं को समर्थ व शक्तिशाली मानते हैं। वे ही दूरदर्शन पर बोलते
हैं। अब वे एक बंद कमरे अर्थात् स्टूडियो में एक कमजोर व्यक्ति को बुलाएँगे तथा उससे
प्रश्न पूछेंगे। क्या आप अपाहिज हैं? यदि हैं तो आप क्यों अपाहिज हैं? क्या आपका अपाहिजपन
आपको दुख देता है? ये प्रश्न इतने बेतुके हैं कि अपाहिज इनका उत्तर नहीं दे पाएगा,
जिसकी वजह से वह चुप रहेगा। इस बीच प्रश्नकर्ता कैमरे वाले को निर्देश देता है कि इसको
(अपाहिज को) स्क्रीन पर बड़ा-बड़ा दिखाओ। फिर उससे प्रश्न पूछा जाएगा कि आपको कष्ट
क्या है? अपने दुख को जल्दी बताइए। अपाहिज इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा क्योंकि
ये प्रश्न उसका मजाक उड़ाते हैं।
5.
विशेष-
मीडिया
की मानसिकता पर करारा व्यंग्य है।
काव्यांश
में नाटकीयता है।
भाषा
सहज व सरल है।
व्यंजना
शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है।
काव्यांश - 2
सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता हैं
कैसा
यानि कैसा लगता हैं
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के
वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं
2. शब्दार्थ - रोचक-दिलचस्प। वास्ते-के लिए। इंतज़ार-प्रतीक्षा।
3. प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' में संकलित
'कैमरे में बंद अपाहिज' शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के रचयिता रघुवीर सहाय
हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया है। कवि का कहना है
कि मीडिया के लोग किसी-न-किसी तरह से दूसरे के दुख को भी व्यापार का माध्यम बना लेते
हैं।
4.
व्याख्या - इस काव्यांश में कवि कहता है कि मीडिया के लोग
अपाहिज से बेतुके सवाल करते हैं। वे अपाहिज से पूछते हैं कि-अपाहिज होकर आपको कैसा
लगता है? यह बात सोचकर बताइए। यदि वह नहीं बता पाता तो वे स्वयं ही उत्तर देने की कोशिश
करते हैं। वे इशारे करके बताते हैं कि क्या उन्हें ऐसा महसूस होता है।
थोड़ा
सोचकर और कोशिश करके बताइए। यदि आप इस समय नहीं बता पाएँगे तो सुनहरा अवसर खो देंगे।
अपाहिज के पास इससे बढ़िया मौका नहीं हो सकता कि वह अपनी पीड़ा समाज के सामने रख सके।
मीडिया वाले कहते हैं कि हमारा लक्ष्य अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना है और इसके लिए
हम ऐसे प्रश्न पूछेगे कि वह रोने लगेगा। वे समाज पर भी कटाक्ष करते हैं कि वे भी उसके
रोने का इंतजार करते हैं। वह यह प्रश्न दर्शकों से नहीं पूछेगा।
विशेष
कवि
ने क्षीण होती मानवीय संवेदना का चित्रण किया है।
दूरदर्शन
के कार्यक्रम निर्माताओं पर करारा व्यंग्य है।
काव्य-रचना
में नाटकीयता तथा व्यंग्य है।
सरल
एवं भावानुकूल खड़ी बोली में सहज अभिव्यक्ति है।
अनुप्रास
व प्रश्न अलंकार हैं।
मुक्तक
छंद है।
काव्यांश 3
फिर हम परदे पर दिखलाएंगे
फुली हुई आँख की एक बड़ी तस्वीर
बहुत बड़ी तस्वीर
(आशा हैं आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी देखिए
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
हमें दोनों को एक सा रुलाने हैं
आप और वह दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है)
अब मुस्कुराएँगे हम
आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम
(बस थोड़ी ही कसर रह गई)
धन्यवाद।
2.
शब्दार्थ -
कसमसाहट-बेचैनी।
अपंगता अपाहिजपन। धीरज-धैर्य । परदे पर-टी.वी. पर। वक्त - समय । कसर-कमी।
3.
प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह
भाग-2' में संकलित 'कैमरे में बंद अपाहिज' शीर्षक कविता से लिया गया है। इस कविता के
रचयिता रघुवीर सहाय हैं। इस कविता में कवि ने मीडिया की संवेदनहीनता का चित्रण किया
है। उसने यह बताने का प्रयत्न किया है कि मीडिया के लोग किस प्रकार से दूसरे के दुख
को भी व्यापार का माध्यम बना लेते हैं।
4.
व्याख्या - कवि कहता है कि दूरदर्शन वाले अपाहिज का मानसिक
शोषण करते हैं। वे उसकी फूली हुई आँखों की तस्वीर को बड़ा करके परदे पर दिखाएँगे। वे
उसके होंठों पर होने वाली बेचैनी और कुछ न बोल पाने की तड़प को भी दिखाएँगे। ऐसा करके
वे दर्शकों को उसकी पीड़ा बताने की कोशिश करेंगे। वे कोशिश करते हैं कि वह रोने लगे।
साक्षात्कार लेने वाले दर्शकों को धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं।
वे
दर्शकों व अपाहिज दोनों को एक साथ रुलाने की कोशिश करते हैं। तभी वे निर्देश देते हैं
कि अब कैमरा बंद कर दो। यदि अपाहिज अपना दर्द पूर्णतः व्यक्त न कर पाया तो कोई बात
नहीं। परदे का समय बहुत महँगा है। इस कार्यक्रम के बंद होते ही दूरदर्शन में कार्यरत
सभी लोग मुस्कराते हैं और यह घोषणा करते हैं कि आप सभी दर्शक सामाजिक उद्देश्य से भरपूर कार्यक्रम
देख रहे थे। इसमें थोड़ी-सी कमी यह रह गई कि हम आप दोनों को एक साथ रुला नहीं पाए।
फिर भी यह कार्यक्रम देखने के लिए आप सबका धन्यवाद।
5.
विशेष-
अपाहिज
की बेचैनी तथा मीडिया व दर्शकों की संवेदनहीनता को दर्शाया गया है।
मुक्त
छंद है।
उर्दू
शब्दावली का सहज प्रयोग है।
'परदे
पर' में अनुप्रास अलंकार है।
व्यंग्यपूर्ण
नाटकीयता है।
प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न 1. कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों
में रखी गई हैं-आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?
उत्तर : प्रस्तुत कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं।
ये पंक्तियाँ अलग-अलग लोगों से सम्बन्धित हैं। उदाहरण के लिए संचालक कैमरामैन को लक्ष्य
कर कहता है कि -
(i) कैमरा दिखाओ, इसे बड़ा-बड़ा
(ii) कैमरा
बस करो।
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है।
इसी प्रकार कुछ पंक्तियाँ दर्शकों को लक्ष्य कर रखी गई हैं।
कुछ संवाद अपंग व्यक्ति एवं संचालक से सम्बन्धित हैं। इन कोष्ठकांकित पंक्तियों का
औचित्य यह है कि दूरदर्शन पर कार्यक्रम संचालन की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाए जो कि कैमरे
के पीछे बोली जाती है तथा संचालक का बनावटी उद्देश्य की पूर्ति वाला स्वार्थी और छद्म-रूप
प्रकट हो जाये। वैसे कविता में भावगत सजीवता लाने एवं संवेदना का स्तर बढ़ाने में इनका
विशेष औचित्य है।
प्रश्न 2. 'कैमरे में बन्द अपाहिज' करुणा के
मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है-विचार कीजिए।
उत्तर:- 'कैमरे में बन्द अपाहिज' शीर्षक कविता में संचालक
अपंग व्यक्ति के प्रति करुणा एवं संवेदना दिखाता है, परन्तु उसका उद्देश्य अपने कार्यक्रम
को लोकप्रिय एवं बिकाऊ बनाना है, वह उसकी अपंगता बेचना चाहता है। अतः कार्यक्रम काफी
रोचक बने, इसलिए वह करुणा दिखाता है। परन्तु उसकी करुणा एकदम बनावटी है, उसमें क्रूरता
छिपी हुई है। संचालक द्वारा अपाहिज से बार-बार पूछा जाता है कि क्या आप अपाहिज हैं?
अपाहिजपन से कितना दुःख होता है? अपाहिज होना कैसा लगता है? इस तरह के प्रश्न पूछना
उनकी संवेदनहीनता को प्रकट करता है तथा दूरदर्शन पर दिखाये जाने वाले ऐसे कार्यक्रम
कारोबारी दबाव के कारण संवेदनारहित एवं क्रूरता वाले होते हैं।
प्रश्न 3. 'हम समर्थ शक्तिवान' और 'हम एक दुर्बल
को लायेंगे' पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?
उत्तरः- वर्तमान काल में दूरदर्शन के संचालक एवं मीडिया वाले
स्वयं को बहुत ताकतवर मानते हैं। वे सोचते हैं कि हम जैसा चाहें वैसा कार्यक्रम दर्शकों
को दिखा सकते हैं। किसी दुर्बल और कमजोर अपंग को सम्मान दिला सकते हैं और उसे दूरदर्शन
पर लाकर सबकी सहानुभूति दिला सकते हैं। संवेदनहीन मीडियाकर्मियों की दूषित मनोवृत्ति
एवं व्यापारिक नीति पर कवि ने सशक्त व्यंग्य किया है।
प्रश्न 4. यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना
कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा
उद्देश्य पूरा होगा?
उत्तर:- यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति
अर्थात् अपंग और दर्शक, दोनों एक-साथ रोने लगें, तो प्रश्नकर्ता (संचालक) को लगेगा
कि उसका कार्यक्रम काफी प्रभावपूर्ण और संवेदनायुक्त बन गया है। प्रश्नकर्ता जिस लोकप्रियता
के उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करना चाहता था, यद्यपि वह अपंग व्यक्ति
से लगातार पूछे गये बेतुके प्रश्नों से असंवेदित व अलोकप्रिय ही रहा। फिर भी यदि वह
दर्शकों में संवेदना जगा पाता, करुणा का संचार करता और सहानुभूति जगा पाने में सफल
रहता और यही सफलता उसके कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने में काम आती
प्रश्न 5. 'परदे पर वक्त की कीमत है' कहकर
कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपना नजरिया किस रूप में रखा है?
उत्तर:- दूरदर्शन पर साक्षात्कार के प्रति कवि ने यह दृष्टिकोण
व्यक्त किया है कि दूरदर्शन पर कार्यक्रम दिखाना काफी महंगा पडता है।
साक्षात्कार प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति अपंगता दिखाता है,
अपाहिज का दुःख-दर्द प्रसारित करता है। सबकुछ तय सीमा में जल्दी-जल्दी करना चाहता है।
इस प्रक्रिया में उसकी अपंगता के प्रति दया या सहानुभूति नहीं रहती है। इसमें व्यावसायिक
स्वार्थ, क्रूरता एवं बनावटीपन हावी रहता है। कवि ने ऐसे दृष्टिकोण को सर्वथा निन्दित
मानकर इस पर आक्षेप किया है।