झारखण्ड शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद्, राँची
झारखण्ड राज्य के अन्तर्गत संचालित
सभी सरकारी तथा गैर-सरकारी सहायता प्राप्त (अल्पसंख्यक सहित) विद्यालयों के
शिक्षकों के लिए पाठ-योजना निर्माण हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (SOP)
झारखण्ड
राज्य की स्कूली शिक्षा प्रणाली में गुणवत्तापूर्ण, समावेशी एवं सुलभ शिक्षा सुनिश्चित
करने के लिए पाठ-योजना (Lesson Plan) एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आधारभूत शैक्षिक उपकरण
(Teaching Tools) है। राज्य की भौगोलिक, सामाजिक, भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता जहाँ
एक ओर शहरी क्षेत्र हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्गम ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्र को ध्यान
में रखते हुए एक सुविचारित पाठ-योजना शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी दिशा प्रदान
करती है।
राष्ट्रीय
शिक्षा नीति' 2020 तथा झारखण्ड शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, राँची के द्वारा
पूर्व में निर्गत दिशा-निर्देशों के अनुरूप शिक्षण प्रक्रिया को बाल-केंद्रित, अनुभवात्मक
एवं परिणामोन्मुख बनाने के लिए पाठ-योजना का निर्माण एवं उसका नियमित क्रियान्वयन अनिवार्य
है।
1.
पाठ-योजना की आवश्यकता :-
किसी
भी कार्य को सफलतापूर्वक पूर्ण करने के लिए पूर्व-नियोजित योजना आवश्यक है। शिक्षण
अधिगम के क्षेत्र में खासकर, झारखण्ड के परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता और भी महत्वपूर्ण
हो जाती है :-
- कक्षा में विविधता का
प्रबंधन- झारखण्ड के विद्यालयों में विभिन्न
भाषाई (संताली, मुंडारी, हो, खोरठा, कुडूख आदि) और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के
बच्चे आते हैं। प्रत्येक बच्चे की सीखने की गति और शैली अलग-अलग होती है। पाठ-योजना
शिक्षक को इस विविधता को ध्यान में रखते हुए शिक्षण रणनीतियाँ बनाने में मदद करती
है।
- समय का अधिकतम उपयोग-
विद्यालयों में एक कालांश (Period) आमतौर पर 40 से 45 मिनट का होता है। बिना योजना
के, अनावश्यक बातों या भटकाव में समय बर्बाद हो सकता है। पाठ-योजना सुनिश्चित
करती है कि समय का उपयोग सटीक रूप से विषयवस्तु को समझाने में हो। एक लिखित पाठ-योजना शिक्षक को ट्रैक
पर रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि निर्धारित पाठ्यक्रम समय-सीमा के
अन्दर पूरा हो।
- संसाधनों का प्रभावी उपयोग- झारखण्ड के कई दूरस्थ विद्यालयों में संसाधनों की सीमा है। ऐसे में,
उपलब्ध शिक्षण अधिगम सामग्री का सबसे प्रभावी उपयोग कैसे किया जाए, यह
पाठ-योजना के माध्यम से ही तय होता है।
2. पाठ-योजना के उद्देश्य :-
- सीखने के प्रतिफल (Learning Outcomes) का निर्धारण- इसका प्राथमिक उद्देश्य यह तय करना है कि किसी
विशिष्ट कक्षा के अंत में छात्र क्या नया ज्ञान प्राप्त करेंगे, कौन सा कौशल
सीखेंगे या उनके व्यवहार में क्या परिवर्तन आएगा।
- उचित शिक्षण विधियों (Pedagogy) का चयन- विषय की प्रकृति के अनुसार सबसे उपयुक्त शिक्षण विधि
का चुनाव करना। उदाहरण के लिए, विज्ञान के किसी विषय के लिए गतिविधि आधारित
शिक्षण (Activity-based learning) विधि का निर्धारण करना।
- पूर्व ज्ञान से नवीन ज्ञान को जोड़ना- छात्रों को जो पहले से पता है, विशेषकर उनके स्थानीय
झारखण्डी परिवेश और संस्कृति से जुड़ी बातें को नए विषय से जोड़ने की रूपरेखा
तैयार करना। इससे बच्चों के लिए विषय अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
- मूल्यांकन की रूपरेखा तैयार करना- पाठ पढ़ाने के बाद यह जाँचना आवश्यक है कि बच्चों ने
कितना सीखा। इसके लिए प्रश्नोत्तरी, वर्कशीट या रचनात्मक कार्यों का निर्धारण
पाठ-योजना के चरण में ही कर लिया जाता है।
3. पाठ-योजना का महत्व :-
- शिक्षक के आत्मविश्वास में वृद्धि- जब एक शिक्षक पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में प्रवेश
करता है, तो उसमें विषय को प्रस्तुत करने का एक अलग ही आत्मविश्वास होता है।
वह छात्रों के अप्रत्याशित प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भी मानसिक रूप से
तैयार रहता है।
- छात्रों की सक्रिय भागीदारी- एक अच्छी पाठ-योजना में केवल शिक्षक का व्याख्यान नहीं होता, बल्कि
छात्रों के लिए भी गतिविधियाँ शामिल होती हैं। इससे कक्षा नीरस नहीं होती,
छात्रों की रुचि बनी रहती है और विद्यालय में उनकी उपस्थिति दर (Attendance
rate) में सुधार होता है।
- निरंतरता और क्रमबद्धता- यह सुनिश्चित करता है कि पाठ्यक्रम एक तार्किक और मनोवैज्ञानिक क्रम में
आगे बढ़े सरल से कठिन की ओर (From simple to complex) 1 इससे छात्रों को विषय
की गहरी समझ विकसित करने में मदद मिलती है।
- समस्याओं का पूर्वानुमान- एक अनुभवी शिक्षक पाठ-योजना बनाते समय ही यह अनुमान लगा लेता है कि
छात्रों को किस बिंदु पर कठिनाई आ सकती है, और वह पहले से ही उस कठिनाई को
दूर करने के लिए अतिरिक्त उदाहरण या रणनीतियाँ तैयार रखता है।
- दस्तावेजीकरण और जवाबदेही- निरीक्षण के दौरान, पाठ-योजना इस बात का प्रमाणिक दस्तावेज़ होती है कि
कक्षा में क्या और कैसे पढ़ाया जा रहा है।
4. पाठ-योजना के लक्ष्य :-
- अधिगम प्रतिफल की प्राप्ति- झारखण्ड सरकार का लक्ष्य है कि सभी कक्षाओं के लिए निर्धारित अधिगम
प्रतिफल की प्राप्ति हो। लक्ष्योन्मुखी पाठ योजनाएँ इस लक्ष्य को जमीनी स्तर
पर लागू करने का प्रमुख साधन हैं।
- क्षमता-आधारित शिक्षा (Competency-Based Education) को बढ़ावा- रटने की प्रवृत्ति (Rote learning) को समाप्त कर
बच्चों में आलोचनात्मक सोच (Critical thinking), रचनात्मकता और समस्या समाधान
(Problem-solving) कौशल का विकास करना।
- परीक्षा परिणामों में गुणात्मक सुधार- व्यवस्थित और योजनाबद्ध शिक्षण के माध्यम से परीक्षा
परिणामों को बेहतर बनाना।
- छात्रों का सर्वांगीण विकास (Holistic Development)- शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं
है, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। पाठ-योजना के माध्यम से ऐसे
अवसर सृजित किए जाते हैं जहाँ बच्चों का अकादमिक, नैतिक, सामाजिक और मानसिक
विकास एक साथ हो सके।
उपरोक्त तथ्यों के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि पाठ-योजना
शिक्षण की केवल एक पूर्व-शर्त नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त शैक्षणिक साधन
(Pedagogical Tool) है। जब एक शिक्षक कक्षा में एक स्पष्ट और सुव्यवस्थित योजना के
साथ प्रवेश करता है, तो वह केवल एक विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि वह राज्य के भविष्य का
निर्माण कर रहा होता है। प्रभावी और नियमित पाठ योजना के माध्यम से ही राज्य के
सुदूर गाँवों से लेकर शहरों तक, हर बच्चे के लिए शिक्षा को आनंददायी, अर्थपूर्ण और
परिणामोन्मुखी बनाया जा सकता है।
पाठ-योजना के निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में
उपरोक्त अवधारणा के आलोक में निम्नांकित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई
है, जिसका अनुपालन हर स्तर पर किया जाना आवश्यक है -
1. प्रत्येक शिक्षक के लिए कक्षा संचालन से पूर्व संबंधित
विषय की पाठ-योजना तैयार करना अनिवार्य होगा।
2. प्रत्येक शिक्षक को आवंटित कक्षा एवं विषय के लिए
पाठ-योजना एक ही पंजी/इंडेक्स फाईल में संधारित की जाएगी, जिसका सत्यापन विद्यालय
के प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक द्वारा किया जाएगा।
3. शिक्षक अपने विद्यालय के प्रभारी
प्रधानाध्यापक/प्रधानाध्यापक से समन्वय स्थापित कर पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल
कक्षा-संचालन के एक सप्ताह एक पक्ष एक माह पूर्व प्रधानाध्यापक के समक्ष प्रति
हस्ताक्षर हेतु प्रस्तुत करेंगे तथा सत्यापन उपरांत शिक्षक उसे पुनः प्राप्त
करेंगे।
4. पाठ-योजना के निर्माण एवं प्रभावी क्रियान्वयन हेतु
शिक्षकों को अतिरिक्त अध्ययन करने के साथ-साथ आवश्यक शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM)
का विकास करना होगा।
5. शिक्षकों द्वारा संचालित की जानेवाली सभी कक्षाओं एवं
विषयों की पाठ-योजनाएँ हस्तलिखित/मुद्रित (दोनों में से किसी एक) रूप में तैयार कर
पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल में संधारित किया जाएगा।
6. पाठ-योजना तैयार करते समय यह सुनिश्चित किया जाएगा कि
संबंधित पाठ के सभी शिक्षण बिंदु उसमें समुचित रूप से समाहित हों।
7. किसी भी विषय के प्रत्येक अध्याय हेतु केवल एक पाठ-योजना
तैयार की जाएगी, जिसे पाठ प्रारंभ करने से पूर्व तैयार किया जाना अनिवार्य होगा।
8. विद्यालय में कक्षा संचालन की अवधि में पाठ-योजना
निर्माण से संबंधित किसी भी तरह का कार्य नहीं किया जाना सुनिश्चित किया जाए ताकि
कक्षा-संचालन या विद्यार्थियों के अध्ययन-अध्यापन पर किसी प्रकार का प्रतिकूल
प्रभाव नहीं पड़े।
9. पाठ-योजना का निर्धारित प्रारूप (अनुलग्नक-2) के रूप में
संलग्न है, जिसका अनुपालन किया जाना अनिवार्य होगा।
10. किसी अध्याय को पूर्ण करने में एक से अधिक कालांश
(Period) लग सकते हैं। ऐसी स्थिति में, विच्छेदित पाठ्यक्रम के अनुरूप अध्याय को
पूर्ण करने में जितने भी कालांश प्रयुक्त हों, उनका संक्षिप्त विवरण प्रतिदिन
पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल के यथानिर्धारित पृष्ठों में 'दैनिक शिक्षण गतिविधि'
(अनुलग्नक-1) के रूप में अंकित करना अनिवार्य होगा।
11. प्रत्येक शिक्षक द्वारा प्रतिदिन संचालित सभी कक्षाओं
एवं विषयों का संक्षिप्त विवरण पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल के यथानिर्धारित
पृष्ठों में दैनिक शिक्षण गतिविधि के रूप में अंकित करना अनिवार्य होगा।
12. प्रत्येक शिक्षक को अपनी पाठ-योजना पंजी इंडेक्स फाईल
प्रत्येक कक्षा में साथ लेकर जाना अनिवार्य होगा।
13. किसी भी अधिकारी द्वारा निरीक्षण के दौरान यदि
पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल की माँग की जाती है, वैसी स्थिति में केवल वर्तमान
शैक्षणिक सत्र की पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल उनके समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
14. प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक प्रबंधक द्वारा
यदि किसी कक्षा का औचक निरीक्षण किया जाता है तो वैसी स्थिति में पाठ-योजना
पंजी/इंडेक्स फाईल पर उनका प्रतिहस्ताक्षर उस तिथि में करना अनिवार्य होगा।
15. प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक को भी अपने विषयों
का कक्षा-संचालन से पूर्व पाठ-योजना तैयार करना अनिवार्य होगा एवं उनके पाठ-योजना
पंजी/इंडेक्स फाईल का सत्यापन राज्य स्तर एवं जिला स्तर से अनुश्रवण निरीक्षण हेतु
गठित टीम के सदस्यों /क्षेत्रीय शिक्षा संयुक्त निदेशक/जिला शिक्षा पदाधिकारी/जिला
शिक्षा अधीक्षक/क्षेत्र शिक्षा पदाधिकारी एवं प्रखण्ड शिक्षा प्रसार पदाधिकारियों के द्वारा
विद्यालय भ्रमण के क्रम में किया जाएगा।
16. प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक
किसी भी शिक्षक के द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल पर प्रतिहस्ताक्षर
करने के पूर्व निम्नांकित बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान देंगे। जैसे:-
(i) पाठ-योजना का निर्माण संबंधित विषय
जिसकी कक्षा शिक्षक लेते हैं उसी से संबंधित है या नहीं।
(ii) राज्य स्तर से जो प्रारूप/Format
दिया गया है, उसी के अनुरूप पाठ-योजना का निर्माण किया गया है या नहीं।
17. पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल पूर्ण
हो जाने पर उसे प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक के पास कार्यालय में जमा कर पावती
रसीद प्राप्त की जाएगी तथा आगामी कार्य हेतु नई पाठ-योजना पंजी इंडेक्स फाईल का उपयोग
किया जाएगा। वर्तमान में संचालित शैक्षणिक सत्र से संबंधित पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स
फाईल सत्र समाप्ति तक विद्यालय में सुरक्षित रखना प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक
की जिम्मेदारी होगी।
18. यदि किसी शिक्षक द्वारा निर्धारित
समय-सारणी के अलावे, अतिरिक्त कक्षाएँ संचालित की जाती हैं, तो उनके लिए विस्तृत पाठ-योजना
तैयार करना आवश्यक नहीं होगा। तथापि, उन अतिरिक्त कक्षाओं का संक्षिप्त विवरण 'दैनिक
शिक्षण गतिविधि' के रूप में पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल के यथानिर्धारित पृष्ठों में
अंकित करना अनिवार्य होगा।
19. एकल शिक्षकीय विद्यालय वाले शिक्षकों
को विस्तृत पाठ-योजना तैयार किया जाना आवश्यक नहीं है, लेकिन उन्हें प्रत्येक दिन के
दैनिक शिक्षण गतिविधि की संक्षिप्त विवरणी से संबंधित प्रारूप (अनुलग्नक-1) को अद्यतन
करना अनिवार्य होगा।
20. पाठ-योजना हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों
में से किसी एक भाषा में तैयार की जा सकती है।
21. पाठ-योजना के निर्माण तथा कक्षा
में उसके क्रियान्वयन के संदर्भ में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, झारखण्ड सरकार
के अन्तर्गत किसी कार्यालय से कोई आदेश/ निर्देश निर्गत है, उसे इस मानक संचालन प्रक्रिया
के आलोक में यथासंशोधित समझा जाए।
नोट :- इस मानक संचालन प्रक्रिया
(SOP) के साथ कक्षा का नाम 8, विषय - इतिहास, पुस्तक आधुनिक भारत, अध्याय संख्या
06, अध्याय का नाम 1857 की क्रांति का पूर्ण पाठ-योजना (समेकित 06 दिन का) तैयार कर
एवं प्रत्येक दिन ली जानेवाली अलग-अलग विषय की कक्षाओं की दैनिक शिक्षण गतिविधि किस
प्रकार अद्यतित की जानी है, उसका नमूना भी तैयाार कर संलग्न किया जा रहा है।
विश्वासभाजन
ह०/- (शशि रंजन) निदेशक
पाठ-योजना प्रारूप (Lesson Plan Format)
झारखण्ड शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण
परिषद्, राँची
MY SCHOOL, MY RESPONSIBILITY...
पाठ-योजना पंजी/इंडेक्स फाईल
(Lesson Plan Register/INDEX File)
शिक्षक का नाम - …………………………
शिक्षक EVV ID - …………………………
पदनाम - …………………………
संपर्क संख्या - …………………………
विद्यालय का नाम- …………………………
प्रखण्ड - …………………………
जिला - …………………………
राज्य - झारखण्ड
अनुलग्नक : 1
प्रत्येक दिन के दैनिक शिक्षण गतिविधि
की संक्षिप्त विवरणी से संबंधित प्रारूप :-
|
दिनांक |
कक्षा |
घंटी |
विषय |
पाठ का नाम |
उप विषय वस्तु |
पृष्ठ सं. (पाठ-योजना) |
शिक्षक का हस्ताक्षर |
प्रधानाध्यापक का हस्ताक्षर |
अभ्युक्ति |
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अनुलग्नक : 2
पाठ-योजना सं०
माह -
दिनांक - …….. से ………
कक्षा -
विषय -
अध्याय -
पृष्ठ संख्या - .........
पाठ को पूर्ण करने में लगने वाली कालांश
(Period) की कुल संख्या - ………
सामान्य उद्देश्य :-
अधिगम प्रतिफल/विशिष्ट उद्देश्य :-
शिक्षण-विधि :-
शिक्षण अधिगम सहायक सामग्री :-
पूर्व ज्ञान :-
प्रस्तुतीकरण (Presentation)
|
दिन/तिथि |
शिक्षण / अध्यापन बिन्दु |
शिक्षक क्रियाशीलता |
छात्र क्रियाशीलता |
श्यामपट्ट कार्य |
मूल्यांकन |
पुनरावृत्ति :-
गृह-कार्य :-
अन्य बिंदु :-
शिक्षक का नाम एवं हस्ताक्षर
प्रधानाध्यापक का हस्ताक्षर
अनुश्रवण पदाधिकारी का हस्ताक्षर
