12th Hindi Core 1. आत्म-परिचय, एक गीत JCERT/JAC Reference Book

12th Hindi Core 1. आत्म-परिचय, एक गीत JCERT/JAC Reference Book

 

12th Hindi Core 1. आत्म-परिचय, एक गीत JCERT/JAC Reference Book

1. आत्म-परिचय, एक गीत

आत्म-परिचय

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

कवि परिचय :-

1. हरिवंश राय बच्चन

2. जन्म - सन् 1907 ईस्वी, इलाहाबाद में निधन - सन् 2003 ई., मुंबई में

3. सन् 1942 से 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबद्ध तथा विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे।

4. हरिवंश राय बच्चन हालावाद के प्रवर्तक कवि थे।

5. प्रमुख रचनाएँ :- काव्य-संग्रह - मधुशाला (1935), मधुबाला (1938), मधुकलश (1938), निशा- निमंत्रण, एकांत-संगीत, आकुल अंतर, मिलन-यामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ।

आत्मकथा - क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दस द्वार से सोपान तक ।

अनुवाद - हैमलेट, जनगीता बाइक, मैकबेथ।

डायरी - प्रवासी की डायरी।

6. इनकी संपूर्ण रचनाएँ 'बच्चन ग्रंथावली' के नाम से दस खंडों में प्रकाशित हैं।

7. भाषा-शैली:- हरिवंश राय बच्चन छायावाद की लाक्षणिक- वक्रता के बजाय सीधी-सादी जीवंत भाषा और संवेदनशील गेय शैली में अपनी बात कही है।

8. मध्ययुगीन फ़ारसी कवि उमर खय्याम का मस्तानापन उनकी प्रारंभिक कविताओं विशेषकर 'मधुशाला' में देखने को मिलता है। जीवन एक तरह का मधुकलश है, दुनिया मधुशाला है, कल्पना साकी और कविता प्याला जिसमें डालकर जीवन पाठक को पिलाया जाता है।

कविता परिचयः -

1. आत्म-परिचय

2. यह कविता हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथात्मक कविता है।

3. इस कविता में कवि नें अपने जीवन से जुड़ी खट्टी-मीठी तथा सुख-दुःख से भरी यादों को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।

4. कवि के अनुसार जगजीवन से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं है। दुनिया अपने व्यंग्य-बाण और शासन-प्रशासन से चाहे जितना कष्ट दे, पर दुनिया से कटकर मनुष्य रह भी नहीं पाता है।

5. कवि इस कविता में दुनिया से अपने द्विधात्मक और द्वंद्वात्मक संबंधों का मर्म उद्घाटित किया है।

6. इस कविता में कवि नें दुनिया से अपना संबंध प्रीति-कलह और जीवन विरुद्ध का सामंजस्य बताया है।

7. उन्मादों में अवसाद, रोदन में राग, शीतल वाणी में आग आदि विरोधाभास मूलक सामंजस्य साधते-साधते कवि के जीवन में बेखुदी, मस्ती और दीवानगी उतर आई है।

8. कवि इस कविता के माध्यम से दुनिया के लोगों को मस्ती का संदेश दे रहे हैं।

सप्रसंग व्याख्या :-

काव्यांश-1

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ!

शब्दार्थ:- जग-जीवन = सांसारिकता। झंकृत = झंकार की ध्वनि ।

प्रसंगः- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से ली गई है। इस कविता में कवि अपने जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या:- कवि कहता है कि एक सांसारिक व्यक्ति के रूप में मैं संसार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अच्छी तरह समझता हूँ तथा समाज के प्रति दायित्व की अनुभूति मेरे अंदर है। इस दायित्त्व-बोध के बावजूद मेरे जीवन में नीरसता नहीं, प्यार ही प्यार है। दूसरे के दुख का अनुभव करते हुए मैं अपनी साँस के तारों को वीणा के समान झंकृत कर देता हूँ। कवि कहना चाहता है कि जिस प्रकार वीणा के तारों को स्पर्श करने से संगीत उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मेरी साँसें दूसरों के दुःख से संवेदनशील होकर कविता रचती हैं।

विशेषः (क) इस काव्यांश में कवि की व्यक्तिवादी विचारधारा मुखरित हुई है।

(ख) संस्कृतनिष्ठ सरल खड़ी बोली हिंदी भाषा के प्रयोग से भाषा में प्रवाहमयता है।

(ग) जग-जीवन में अनुप्रास तथा 'साँसों के दो तार' में रूपक अलंकार की छटा है।

(घ) काव्यांश लयात्मक एवं गेय है।

काव्यांश-2

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा उनको,

जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ।

शब्दार्थ:- स्नेह-सुरा = प्रेम रूपी मदिरा । जग = संसार के लोग।

प्रसंगः- प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से ली गई है। इन पंक्तियों में कवि संसार के लोगों की परवाह किए बिना अपने 'मन' को अधिक महत्व दिया है।

व्याख्या :- कवि कहता है कि मैं प्रेम रूपी मदिरा पीकर हमेशा मस्त रहता हूँ। प्रेम करने, प्रेम देने और प्रेम बांटने की मस्ती में मैं संसार की बिल्कुल परवाह नहीं करता। संसार से ही प्रेम करते हुए मैं संसार को भूल जाता हूँ। संसार की यही रीति है कि सांसारिकता में डूबे रहने वालों को ही संसार महत्व देता है। इसके विपरीत मैं मन की बात मानता हूँ। अर्थात कवि संसार के बताए रास्ते पर नहीं चलता वह तो अपने मन की अभिव्यक्ति को ही अपनी सफलता मानता है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में कवि व्यक्ति- मन को अधिक महत्व दिया है।

(ख) संसार से अपने संबंध को कवि ने द्वंद्वात्मक रूप में उपस्थित किया है।

(ग) स्नेह-सुरा में रूपक तथा जो जग में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

(घ) तत्सम शब्दावली से युक्त सरल सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा के प्रयोग से भाषा में प्रवाहमयता है।

(ङ) कविता लयबद्ध एवं गेयात्मक है।

काव्यांश-3

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,

मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता

मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।

शब्दार्थ :- निज अपना उर हृदय । उदगार = भावों की अभिव्यक्ति ।

प्रसंग:- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से ली गई है। इन पंक्तियों में कवि अपने जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने कहा है कि मेरी कविता मेरे हृदय का उद्‌गार एवं उपहार है, जिसे मैं संसार को भेंट करता हूँ। कवि संसार को अपूर्णताओं, अभावों से भरा पता है। ऐसे संसार कवि को अच्छा नहीं लगता। अतः अपनी कविता में वह कल्पनालोक में विचरण करता है और एक सुंदर और पूर्ण संसार की सृष्टि करता है। अपने हृदय के सुंदर भावों की अभिव्यक्ति द्वारा वह संसार को एक सुंदर समाज का उपहार देता है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में कवि-हृदय की कल्पनाशीलता और व्यापकता को महत्व दिया गया है।

(ख) 'स्वप्नों का संसार' में रूपक अलंकार है।

(ग) संस्कृतनिष्ठ सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी के प्रयोग से भाषा में प्रवाहमयता है।

(घ) कविता लयातमक एवं गेय है।

काव्यांश-4

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ

जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!

शब्दार्थ :- दहा = जलना भव संसार । मौजों = लहरों।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से ली गई है। कवि ने इस कविता में अपने जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने अपना परिचय देते हुए कहा है कि मैं अपने हृदय में प्रेम की आग जलाए रखता हूँ और उसमें जला करता हूँ। इसीलिए सांसारिक सुख या दुःख, दोनों स्थितियों में मैं आनंदमग्न रहता हूँ। अर्थात संसार में प्रेम करने वाला कवि- व्यक्तित्व सुख से सुखी और दुःख से दुःखी नहीं होता। इस दुनिया के लोग जहाँ संसार रूपी सागर से पार उतरने के लिए धन रूपी नौका बनाते फिरते हैं, कवि संसार की लहरों पर मस्ती के साथ बहते रहता है। उसे तो पार जाने की इच्छा ही नहीं होती। अर्थात संसारी व्यक्ति दुःख से पार पाना चाहते हैं जबकि कवि दुःख में भी मस्ती ढूंढ लेता है।

विशेष :- (क) इन पंक्तियों में कवि की जीवन- शैली सांसारिक जीवन-शैली से भिन्न प्रकट हुई है।

(ख) 'भव-सागर' तथा 'भव-मौजों' में रूपक अलंकार है।

(ग) तत्सम शब्दावली से युक्त सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी के प्रयोग से भाषा प्रवाहमय है।

(घ) कविता लयबद्ध एवं संगीतात्मक है।

काव्यांश-5

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,

उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा,रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ।

शब्दार्थ :- यौवन जवानी। उन्माद = सनक, पागलपन । अवसाद = दुःख।

प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों में कवि अपने हृदय के उन्माद और अवसाद दोनों भावों को अभिव्यक्त किया है।

व्याख्या :- इस काव्यांश में कवि ने अपना परिचय देते हुए कह रहा है कि मैं जवानी की सनक से भरी जिंदगी जीता हूँ। जवानी की अत्यधिक मस्ती भरी भावना मुझे संसार से बेपरवाह बना देती है, किंतु उस लापरवाही में भी संसार के दुख का भाव छिपा रहता है। इसी कारण मुझे यह दुनिया बाहर से तो हँसती हुई दिखती है किंतु मेरे अंदर का कवि दुनिया के दुःख से रोता भी है। कवि स्वीकार करता है कि अपने प्रिय की याद लिए मेरा जीवन हास्य और रुदन दोनों का मिलन बन गया है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में कवि के हृदय की द्वंद्वात्मक भावना मुखरित हुई है।

(ख) 'उन्मादों में अवसाद लिए फिरना' में विरोधाभास है।

(ग) तत्सम शब्दावली युक्त सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी के प्रयोग से भाषा प्रवाहमय है।

(घ) कविता लयात्मक एवं गेय है।

काव्यांश-6

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?

नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!

फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!

शब्दार्थ :- यत्न = संग्रह करना, खोज करना । नादान = मूर्ख। दाना = बुद्धिमान। मूढ़ = मूर्ख।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से उद्धृत है। कवि इन पंक्तियों में सत्य को पहचान कर सीखे हुए ज्ञान को भूलाने की बात कह रहे हैं।

व्याख्या: कवि को यह संसार बड़ा विचित्र मालूम होता है। संसार को जानने-समझने, अर्थात् सत्य की खोज में सभी प्रयासरत हैं, किन्तु अभी तक लोग सत्य की खोज नहीं कर पाए हैं। इस संसार में वे ही व्यक्ति वास्तव में अज्ञानी हैं जो स्वयं को ज्ञानी मान बैठे हैं। इस संसार में मूर्ख और बुद्धिमान दोनों एक ही साथ रहते हैं। ऐसे में सीखने का प्रयास कवि को मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है। इसीलिए वह प्राप्त ज्ञान को भूल जाने की विद्या सीख रहा है। अर्थात् कवि संसार द्वारा सिखलाये ज्ञान को भूलकर अपने मन के अनुसार चलना सीख रहा है।

विशेष :- (क) इन पंक्तियों कवि ने सांसारिक ज्ञान को भूलाकर वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की बात कही हैं।

(ख) 'सब सत्य' में अनुप्रास तथा 'नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना' में विरोधाभास अलंकार है।

(ग) संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(घ) कविता लयात्मक एवं गेय है।

काव्यांश-7

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;

जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,

मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता !

शब्दार्थ :- और = दूसरा, तथा। वैभव = धन- दौलत, पग = पैर।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से उद्धृत है। कवि ने इस कविता में अपने जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- कवि अपना परिचय देते हुए कहता है कि मेरा संसार से कोई नाता ही नहीं है। यह संसार और यहाँ रहने वाले लोग स्वार्थ में जीते हैं। धरती के एक टुकड़े और धन-संग्रह की भावना हर सांसारिक मनुष्य में होती है। किन्तु मैं तो निःस्वार्थ भाव से पृथ्वी के ऐश्वर्य की उपेक्षा करता रहता हूँ। अपने कल्पना लोक में मैं प्रतिदिन ही एक नये संसार का निर्माण करता हूँ और पुनः मिटा देता हूँ। इस तरह मैं और संसार दोनों भिन्न स्तर की सोच रखते हैं।

विशेष :- (क) इन पंक्तियों में कवि ने जग और स्वयं में भिन्नता बतलाते हुए व्यक्तिवाद की प्रतिष्ठा की है।

(ख) 'मैं और, और जग और' में यमक अलंकार, बना-बना में पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार तथा जग जिस एवं प्रति पग में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

(ग) तत्सम शब्दों से युक्त सरल सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(घ) कविता लयात्मक एवं गेय है।

काव्यांश-8

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

शब्दार्थ :- रोदन = रोना। भूपों = राजाओं । प्रासाद - महल।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से लिया गया है। कवि ने इस कविता में अपनी जीवन- शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- कवि अपना परिचय देते हुए कहता है कि मेरे रोने में भी संगीत का आनन्द है और मेरी शीतल वाणी में भी आग समायी है। अर्थात् कवि संसार के दुःख-दर्द का गायन करता है। इस प्रकार उसका रुदन संसार कल्याण के - लिए है तथा उसकी मधुर वाणी में भी उसके हृदय की आग छिपी होती है। राजाओं के महल रूप में सांसारिक वैभव कवि के लिए महत्त्वहीन होते हैं। कवि के पास तो खंडहर का वह भाग है जिस पर राजाओं के महल न्यौछावर किये जा सकते हैं। अर्थात् कवि विरोधात्मक स्थितियों में जीते हुए वैरागी भाव से मस्ती में जीता है।

विशेष (क) इन पंक्तियों में सांसारिक वैभव को महत्वहीन बताया गया है।

(ख) 'निज रोदन में राग' तथा 'शीतल वाणी में आग' में विरोधाभास अलंकार है।

(ग) तत्सम शब्दों से युक्त सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(घ) यह कविता गेयात्मक है।

काव्यांश-9

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना !

शब्दार्थ :- दीवाना = बेपरवाह, पागल।

प्रसंग :- यह काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' से लिया गया है। कवि हरिवंश राय बच्चन ने इस कविता में अपनी जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- कवि कहता है कि मेरे रोने को दुनिया ने मेरा गान समझा। इसी तरह मेरी भावानुभूति के सहज प्रस्फुटन को दुनिया कविता मानती है। यह संसार मुझे कवि मानता है। किन्तु मैं तो स्वयं को एक दीवना भर मानता हूँ। कवि कहना चाहता है कि हृदय की पीड़ा ही प्रबल वेग में जब फूटती है, तब वह कविता बनती है। संसार कवि को मान्यता भी देता है, किन्तु कवि तो स्वयं को एक बेपरवाह मस्ती के गायक के रूप में देखता है। कवि के कथन का मुख्य आशय है कि कवि-व्यक्तित्व संसार से जुड़ा होने के साथ-साथ संसार की पीड़ा का सफल गायक भी है।

विशेष :- (क) इन पंक्तियों में कवि ने पीड़ा से ही कविता की ऊपज माना है।

(ख) 'क्यों कवि कह कर' में अनुप्रास अलंकार है।

(ग) सरल सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(घ) कविता लयात्मक एवं गेय है।

काव्यांश-10

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,

मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,

मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

शब्दार्थ -वेश पहनावा मादकता

मस्ती का भाव। निःशेष = जिसमें कुछ न बचे, संपूर्ण।

प्रसंग: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' लिया गया है। कवि ने इस कविता में अपने जीवन-शैली का परिचय दिया है।

व्याख्या :- कवि हरिवंश राय बच्चन ने इस काव्यांश में अपना परिचय दीवाना के रूप में दिया है। कवि कहता है कि मेरी वेश- भूषा दीवानों जैसी है। दीवानों-सी मादकता और मस्ती लिये कवि संसार को भी मस्ती का संदेश देता है। उसके मादक और मस्त गीतों को सुनकर दुनिया के लोग झूम उठते हैं, सम्मान में झुक जाते हैं तथा मस्ती में लहराने लगते हैं। कवि बतलाना चाहता है कि कवि व्यक्तित्व न केवल बाहरी रूप में बल्कि आंतरिक रूप में भी दीवाना होता है, बेपरवाह और मस्त होकर समाज कल्याण के गीत गाता है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में कवि के द्वारा संसार के लोगों को मस्ती का संदेश दिया गया है।

(ख) 'झूम झुके' में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

(ग) तत्सम शब्दों से युक्त सरल और सहज खड़ी बोली हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(घ) पूरी कविता लयबद्ध एवं गेयात्मक है।

दिन जल्दी जल्दी ढलता है।

कविता परिचय :-

1. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

2. यह कविता हरिवंश राय बच्चन के कविता संग्रह 'निशा-निमंत्रण' से 'एक गीत' के रूप में उद्धृत है।

3. इस कविता में समय के महत्व को दो उदाहरणों- पथिक और चिड़ियों के माध्यम से बताया गया है।

4. दिन भर चलने के बाद थका हुआ पथिक मंजिल को नजदीक जानकर इस सोच के साथ जल्दी-जल्दी चलने लगता है कि कहीं रास्ते में रात ना हो जाए।

5. इसी प्रकार घोंसलों में प्रतीक्षारत बच्चों का ध्यान आते ही चिड़िया भी अपने पंखों को तेज गति के साथ हिलाते हुए अपनी मंजिल की ओर उड़ने लगती हैं।

6. इस गीत में कवि हरिवंश राय बच्चन के अकेलेपन की कुंठा और निराशा की भी अभिव्यक्ति हुई है।

सप्रसंग व्याख्या :-

काव्यांश-1

हो जाए न पथ में रात कहीं,

मंजिल भी तो है दूर नहीं-

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

शब्दार्थ :- पथ = रास्ता। मंजिल लक्ष्य । पंथी = पथिक, राही।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन का गीत 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' से लिया गया है। इस काव्यांश में एक पथिक के माध्यम से समय के महत्व को बताया गया है।

व्याख्या :- कवि कहता है कि दिन भर चलने के बाद थका हुआ पथिक मंजिल को नजदीक जानकर यह सोचते हुए जल्दी-जल्दी चलने लगता है कि कहीं रास्ते में ही रात न हो जाए। क्योंकि समय बहुत तेजी के साथ व्यतीत होता है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में समय की गतिशीलता और मंजिल की दूरी का सुंदर सामंजस्य स्थापित किया गया है।

(ख) 'जल्दी-जल्दी' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

(ग) खड़ी बोली हिंदी के सामान्य बोलचाल की भाषा के साथ संस्कृत और फारसी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।

काव्यांश-2

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगे-

यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

शब्दार्थ:- प्रत्याशा = उम्मीद। नीड़ों = घोंसलों। परों = पंखों ।

प्रसंग:- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन का गीत 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' से लिया गया है। इस काव्यांश में समय का तेजी के साथ गुजरने का एहसास और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कुछ कर गुजरने की भावना प्रकट हुई है।

व्याख्या:- सुबह में भोजन की तलाश ने निकली चिड़िया शाम होते ही जल्दी से अपने घोंसले की ओर उड़ने लगती है। उन्हें एहसास होता है कि घोंसलों में बैठे बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। दिन-भर के भूखे-प्यासे प्रतीक्षारत बच्चों का ध्यान आते ही चिड़ियों के पंखो में तेजी आ जाती है। बच्चों के प्रति ममता और स्नेह में उनके पंखो को शक्ति और स्फूर्ति मिलती है और वे तेजी के साथ अपने घोंसलों की ओर उड़ने लगती हैं। तात्पर्य यह कि समय की गतिशीलता के साथ लक्ष्य का सामंजस्य व्यक्ति को सफल बनाता है।

विशेष :- (क) इस काव्यांश में चिड़ियों के मातृत्व-भाव का और उनके अपने बच्चों के प्रति अनन्य-प्रेम का मार्मिक चित्रण हुआ है।

(ख) नीड़ों से झाँकते बच्चों का दृश्य-बिंब का सुंदर प्रयोग हुआ है।

(ग) 'जल्दी-जल्दी' में पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकार का सौंदर्य है।

(घ) खड़ी बोली हिंदी भाषा का सरल और सहज प्रयोग हुआ है।

काव्यांश-3

मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊँ किसके हित चंचल?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

शब्दार्थ :- विकल = व्याकुल । शिथिल = सुस्त। विह्वलता = बेचैनी ।

प्रसंग :- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-2 में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन का गीत 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' से लिया गया है। इस काव्यांश में समय का तेजी के साथ गुजरने का एहसास और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कुछ कर गुजरने की भावना प्रकट हुई है।

व्याख्या :- कवि अपने जीवन को लेकर चिंतन करता है और पाता है कि उसके घर में ऐसा कोई नहीं है जो उसकी प्रतीक्षा कर रहा हो या जिसके हृदय में मिलने की व्याकुलता हो। ऐसी स्थिति में समय की गतिशीलता उसके पैरों को शिथिल कर देती है। कवि के पैर तो सुस्त होते जा रहे हैं तथा उसके हृदय में बेचैनी और निराशा भरती जा रही है। कवि का मन प्रिय-जन के अभाव में पीड़ा से भर जाता है। अकेलेपन का दर्द झेलता कवि बेचैन हो उठता है।

विशेष : (क) इस काव्यांश में कवि के अकेलेपन की पीड़ा का मार्मिक चित्रण हुआ है।

(ख) 'मुझसे मिलने को कौन विकल?' तथा 'मैं होऊँ किसके हित चंचल?' में प्रश्नालंकार तथा 'जल्दी-जल्दी' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सौंदर्य है।

(ग) संस्कृत शब्दावली के साथ खड़ी बोली हिंदी भाषा का सरल और सहज प्रयोग हुआ है।

अभ्यास पाठ के साथ

1. कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर 'मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ' विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?

उत्तर :- कवि हरिवंश राय बच्चन के ये दोनों कथन विपरीत से लगते हैं पर विपरीत नहीं। कवि संसार के दुख-दर्द की अनुभूति करता है तथा संसार को उन दुखों से मुक्त कराने के लिए प्रयत्नशील भी है। इसके बावजूद कवि सांसारिकता से अनासक्त है, वह स्वयं के कल्पना-लोक में विचरण करता है।

2. जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं - कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा ?

उत्तर :- कवि ने अनुभव किया है कि ज्ञानी और अज्ञानी, मूर्ख और बुद्धिमान एक ही जगह रहते हैं। कवि के कहने का तात्पर्य है कि इस संसार में न तो कोई पूर्ण ज्ञानी है और न ही कोई पूर्ण अज्ञानी। जिसे हम ज्ञानी कहते हैं उसे भी किसी विषय का अज्ञान होगा, दूसरी ओर अज्ञानी को भी किन्हीं विषयों का ज्ञान अवश्य रहता है। वास्तव में, ये दोनों पद सापेक्ष स्थिति में अर्थ देते हैं।

3. मैं और, और जग और, कहाँ का नाता - पंक्ति में 'और' शब्द की विशेषता बताइए।

उत्तर :- इस पंक्ति में 'और' शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है लेकिन दोनों का अर्थ अलग- अलग है। अतः इस पंक्ति में यमक अलंकार का चमत्कार उत्पन्न हुआ है। एक 'और' का प्रयोग 'दूसरा' एवं दूसरे 'और' का प्रयोग 'तथा' के रूप में किया गया है। 'और' शब्द की व्यंजना के द्वारा कवि स्वयं में और संसार में अंतर को स्पष्ट कर रहा है। स्वयं की अनासक्ति और जग की आसक्ति परकता को बतलाना कवि का उद्देश्य है।

4. शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?

उत्तर :- कवि की विशेषता बतलाते हुए कहा गया है कि उसकी शीतल वाणी में आग होती है। अर्थात् कवि के विचार जोशीले होते हैं, उनमें क्रांति की आग होती है, जो संसार में परिवर्तन ला सकते हैं, किन्तु कवि इन विचारों को अत्यंत शीतल कोमल वाणी में कहता है, ताकि उसका प्रभाव स्थायी हो सके।

5. बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?

उत्तर :- पक्षियों के बच्चे अपने घोंसलों से शाम होते ही इस आशा में झाँकते होंगे कि उनके माता-पिता अब आयेंगे। दिन भर की भूख-प्यास और अकेलेपन से पीड़ित वे बच्चे भोजन की आशा में, अपने प्रिय माता-पिता से मिलन की आशा में उत्सुक नजरों से बाहर झाँक रहे होंगे।

6. दिन जल्दी-जल्दी ढलता है की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?

उत्तर :- प्रस्तुत कविता एक गीत है। गेयता के लिए कविता की इस प्रमुख पंक्ति की आवृत्ति हुई है। इस पंक्ति की आवृत्ति द्वारा कवि समय की अबाध गतिशीलता को व्यंजित करता है। कवि संदेश देना चाहता है कि जीवन की घड़ियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। अतः मंजिल तक पहुँचने में शीघ्रता करो।

कविता के आसपास

1. संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?

उत्तर :- इस संसार में सुख और दुःख की अनुभूति तो व्यक्ति का मन करता है, किसी वस्तु में सुख या दुःख नहीं होता। यदि हम सांसारिक कष्टों को रोते हुए झेलते हैं तो हमें दुःख होता है, किन्तु उन कष्टों को यदि हम हँसते-गाते झेलें, हमारा भाव सकारात्मक रहे तो खुशी और मस्ती का माहौल बनाया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-उत्तर :

1. संसार के लोग पृथ्वी पर क्या जोड़ते हैं?

(क). धर्म

(ख). मोक्ष

(ग). अर्थ

(घ). काम

2. कवि कैसे संसार को ठुकराता है?

(क). ईमानदार

(ख). सत्यनिष्ठ

(ग). कर्मशील

(घ). वैभवशाली

3. कवि उन्माद में क्या लिए फिरता है?

(क). अवसाद

(ख). अहसास

(ग). अहसान

(घ). अवसर

4. कवि के फूट पड़ने को समाज ने क्या कहा?

(क). छंद बनाना

(ख). बहाने बनाना

(ग). अभिनय करना

(घ). आँसू बहाना

5. 'आत्म परिचय' कविता में कवि का संदेश क्या है?

(क). मस्ती

(ख). हँसी

(ग). सुधारवाद

(घ). निष्क्रियता

6. 'आत्मपरिचय' कविता के रचनाकार हैं-

(क). जयशंकर प्रसाद

(ख). हरिवंशराय बच्चन

(ग). रामधारी सिंह दिनकर

(घ). सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

7. कवि किस का भार लिए फिरता है?

(क). घर-बार का

(ख). कार्यालय का

(ग). जग-जीवन का

(घ). आस-पास का

8. कवि जीवन में क्या लिए फिरता है?

(क). प्यास

(ख). आस

(ग). उल्लास

(घ). प्यार

9. कवि किस सुरा का पान करता है?

(क). स्नेह

(ख). उमंग

(ग). उत्साह

(घ). द्वेष।

10. कवि कैसा संसार लिए फिरता है?

(क). यथार्थ

(ख). आदर्श

(ग). स्वप्निल

(घ). सुखी।

11. कवि हृदय में क्या जला कर दहा करता है?

(क). स्मृतियाँ

(ख). अग्नि

(ग). कल्पनाएँ

(घ). स्नेह

12. कवि किस अवस्था का उन्माद लिए फिरता है?

(क). वृद्ध

(ख). प्रौढ़

(ग). युवा

(घ). किशोर

13. कवि अपने रोदन में क्या लिए फिरता है?

(क). राग

(ख). राम

(ग). रास

(घ). राज़

14. कवि की वाणी कैसी है?

(क). मृदुल

(ख). कठोर

(ग). उग्र

(घ). शीतल

15. कवि स्वयं को दुनिया का एक नया क्या मानता है?

(क). प्रेमी

(ख). दीवाना

(ग). परवाना

(घ). रक्षक

16. कवि कैसा संदेश लिए फिरता है?

(क). सांत्वना का

(ख). बलिदान का

(ग). मस्ती का

(घ). समर्पण का

17. हरिवंशराय बच्चन का जन्म किस सन् में हुआ था?

(क). 1907

(ख). 1908

(ग). 1909

(घ). 1910

18. हरिवंशराय बच्चन का निधन कहाँ हुआ था?

क. दिल्ली

ख. मुंबई

ग. कोलकाता

घ. इलाहाबाद

19. 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' कविता में कवि ने समय को कैसा माना है?

(क). स्थिर

(ख). परिवर्तनशील

(ग). तीव्र

(घ). उग्र

20. " दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' कविता में कवि हताश और दुखी क्यों है?

(क). पत्नी से तलाक होने के कारण

(ख). प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण

(ग). संतान सुख से वंचित होने के कारण

(घ). परिवार से बिछुड़ने के कारण

21. 'मंजिल भी तो है दूर नहीं' यह विचार किस के मन में आ रहाहै?

क. पंथी के

ख. पर्वतारोही के

ग. सैनिक के

घ. खिलाड़ी के

22. 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' गीत किस कवि का है?

क. प्रसाद

ख. निराला

ग. दिनकर

घ. बच्चन

23. 'हो जाए न पथ में रात कहीं' सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?

क. कबूतर

ख. चिड़िया

ग. चिड़िया के बच्च

घ. पंथी

24. किसके बच्चे प्रत्याशा में हैं?

(क). बुलबुल के

(ख). चिड़िया के

(ग). कोयल के

(घ). मैना के

25. नीड़' का अर्थ है-

(क). जल

(ख). कमल

(ग). तालाब

(घ) घोंसला

26. घर जाते हुए कवि के पग शिथिल क्यों हो जाते हैं?

क. घर पर उसका कोई इंतजार नहीं कर रहा

ख. घर जाकर वह क्या करेगा?

ग. उसे अपने घर जाने की जल्दी नहीं

घ. उसे अपना घर अच्छा नहीं लगता

27. बच्चों की याद आते ही चिड़िया क्या करती है?

क. चीं-चीं करती है

ख. तेज़ी से उड़ती है

ग. दाना चुगती है

घ. पंख फैलाती है

28. कवि के हृदय में कैसे भाव भरे हुए हैं?

(क). प्रसन्नता

(ख). उत्साह

(ग). विह्वलता

(घ). घृणा

29. दिन ढलने के साथ ही बच्चे कहाँ से झाँकने लगे होंगे?

(क). खिड़की से

(ख). छत से

(ग). दरवाज़े से

(घ). नीड़ों से

30. शीघ्र अपने बच्चों के पास पहुँचने की इच्छा चिड़िया की किस क्रिया से प्रकट होती है

क. चहचहाने से

ख. तेज़ उड़ने से

ग. पीड़ा में तड़पने से

घ. जल्दी-जल्दी दाना चुगने से

31. 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' गीत में नीड़ों से झाँक रहे बच्चों का ध्यान चिड़ियों के परों में क्या भरता है?

(क). शिथिलता

(ख). विकलता

(ग). चंचलता

(घ). विह्वलता

32. मुझसे मिलने को कौन विकल? 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' गीत का यह प्रश्न उर में क्या भरता है?

(क). शिथिलता

(ख). चंचलता

(ग). विह्वलता

(घ). आश्चर्य

33. "मैं होऊँ किसके हित चंचल?" दिन जल्दी-जल्दी ढलता है" गीत का यह प्रश्न पैरों को कैसा कर देता है?

(क). चंचल

(ख). शिथिल

(ग). विह्वल

(घ). उपर्युक्त सभी

Post a Comment

Hello Friends Please Post Kesi Lagi Jarur Bataye or Share Jurur Kare