Class 12 CM SoE Economics PRE-TEST-2 EXAMINATION (SESSION-2025-26) Answer key

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CM SCHOOL OF EXCELLENCE, JHARKHAND

CLASS - XII PRE-TEST-2 EXAMINATION (SESSION-2025-26)

SUBJECT - ECONOMICS (030)

FULL MARKS - 80 TIME-3 Hours

सामान्य अनुदेश

I. कृपया जांच लें कि इस प्रश्न पत्र में 9 मुद्रित पृष्ठ हैं।

II. इस प्रश्न पत्र में दो खंड हैं: खंड A - मैक्रो इकोनॉमिक्स, खंड B - भारतीय आर्थिक विकास।

III. इस प्रश्नपत्र में 20 बहुविकल्पीय प्रश्न हैं, जिनमें से प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का है।

IV. इस प्रश्नपत्र में 3 अंकों के 4 लघु उत्तर प्रकार के प्रश्न हैं जिनका उत्तर 60 से 80 शब्दों में देना है।

V. इस प्रश्नपत्र में 4 अंकों के 6 लघु उत्तर प्रकार के प्रश्न हैं जिनका उत्तर 80 से 100 शब्दों में देना है।

VI. इस प्रश्नपत्र में 6 अंकों के 4 दीर्घ उत्तर प्रकार के प्रश्न हैं जिनका उत्तर 100 से 150 शब्दों में देना है।

SECTION-A-MACROECONOMICS

1. दी गई आकृति में छायांकित क्षेत्र EFG क्या दर्शाता है? (सही विकल्प चुनें)

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(i) उपभोग < आय

(ii) बचत = शून्य

(iii) उपभोग > आय

(iv) बचत > शून्य

वैकल्पिक

(क) (i) और (ii)

(ख) (ii) और (iii)

(ग) (i) और (iv)

(घ) (iii) और (iv)

2. किसी देश की घरेलू सीमा के भीतर गैर-निवासियों को भुगतान की गई कारक आय से निम्न परिणाम निकलते हैं:

(रिक्त स्थान भरने के लिए सही विकल्प चुनें)

(क) घरेलू आय में वृद्धि।

(ख) राष्ट्रीय आय में कमी।

(ग) (a) और (b) दोनों

(घ) इनमें से कोई नहीं।

3. सुषमा ने 25000 रुपये का अपना कर्ज चुकाने के लिए एक-एक रुपये के सिक्के देने की कोशिश की, लेकिन ये सिक्के स्वीकार नहीं किए गए क्योंकि:

(क) मुद्रा आपूर्ति का भाग।

(ख) सीमित वैधानिक मुद्रा।

(ग) असीमित वैधानिक निविदा।

(घ) इनमें से कोई नहीं।

4. कथन 1: घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन से विदेशियों के लिए घरेलू सामान सस्ता हो जाता है।

कथन 2: घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन से आयात की मांग बढ़ जाती है।

विकल्प:

(क) दोनों कथन सत्य हैं।

(ख) दोनों कथन असत्य हैं।

(ग) कथन 1 सत्य है और कथन 2 असत्य है।

(घ) कथन 2 सत्य है और कथन 1 असत्य है।

5. नीचे दिए गए चित्र के आधार पर B और D द्वारा दर्शाए गए प्रवाह के प्रकार की पहचान कीजिए:

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विकल्प:

() वास्तविक प्रवाह

() धन प्रवाह

() नाममात्र प्रवाह

() राष्ट्रीय प्रवाह।

6. निम्नलिखित को सही क्रम में व्यवस्थित करें।यदि किसी राष्ट्र की सरकार निम्नलिखित को सही क्रम में व्यवस्थित करने का प्रयास कर रही है, तो मुद्रास्फीति अंतर की स्थिति को कम करना:

(i) प्रयोज्य आय में कमी

(ii) करों में वृद्धि

(iii) कुल मांग में कमी

वैकल्पिक

(क) (i), (ii), (iii).

(ख) (iii), (ii), (i).

() (ii), (iii), (i).

(घ) (ii), (i), (iii).

7. निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें:

कथन 1: राष्ट्रीय आय में घरेलू क्षेत्र के भीतर निवासियों और अनिवासियों दोनों द्वारा अर्जित आय शामिल है।

कथन 2: राष्ट्रीय आय में विदेश से प्राप्त शुद्ध कारक आय शामिल नहीं है।

विकल्प:

() दोनों कथन सत्य हैं।

(ख) दोनों कथन असत्य हैं।

(ग) कथन 1 सत्य है और कथन 2 असत्य है।

(घ) कथन 2 सत्य है और कथन 1 असत्य है।

8. निम्नलिखित जानकारी के आधार पर मुद्रा आपूर्ति M1 की गणना कीजिए।

विवरण

(करोड़ रुपये में)

(i) जनता के पास मुद्रा

84,000

(ii) बैंकों के पास मांग जमा

68,000

(iii) आरबीआई के पास अन्य जमा राशियाँ

3,612

(iv) डाकघर में कुल जमा राशि

22,500

(v) बैंकों में शुद्ध सावधि जमा

2,00,555

(सही विकल्प चुनें)

(क) 1,55,612 करोड़ रुपये

(ख) 1,61,140 करोड़ रुपये

(ग) 3,56,167 करोड़ रुपये

(घ) 3,78,667 करोड़ रुपये।

व्याख्या - सूत्र - M1 = C + DD + OD

​C (जनता के पास मुद्रा): 84,000

​DD (बैंकों के पास मांग जमा): 68,000

​OD (RBI के पास अन्य जमा): 3,612

M1 = 84,000 + 68,000 + 3,612 = 1,55,612

9. निम्नलिखित कथनों, अभिकथन (A) और कारण (R) को ध्यानपूर्वक पढ़ें और नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनें।

कथन (A): चालू खाता घाटा हमेशा पूंजी खाता अधिशेष की ओर ले जाता है।

कारण (R): चालू खाता घाटे के वित्तपोषण के लिए पूंजी प्रवाह की आवश्यकता होती है।

विकल्प:

(क) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं तथा कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।

(ख) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।

(ग) अभिकथन (A) सत्य है, परन्तु कारण (R) असत्य है।

(घ) अभिकथन (A) असत्य है, परन्तु कारण (R) सत्य है।

10. शिक्षिका सुश्री साक्षी, देश में प्रचलित मानदंडों और कानून के अनुसार, किसी भी वाणिज्यिक बैंक द्वारा देश के केंद्रीय बैंक के पास कुल जमा राशि का न्यूनतम प्रतिशत रखने की अवधारणा की व्याख्या कर रही थीं। उसके द्वारा समझाई गई अवधारणा को पहचानें और सही विकल्प चुनें:

(क) नकद आरक्षित अनुपात।

(ख) वैधानिक तरलता अनुपात।

(ग) रेपो दर।

(घ) बैंक दर।

11. निम्नलिखित आंकड़ों से किराए का मूल्य ज्ञात कीजिए:

विवरण

रु. (करोड़ों में)

(i) बाजार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद

18,000

(ii) स्वरोजगार की मिश्रित आय

7,000

(iii) सब्सिडी

250

(iv) ब्याज

800

(v) किराया

?

(vi) लाभ

975

(vii) कर्मचारियों का मुआवजा

6.000

(viii) अचल पूंजी का उपभोग

1,000

(ix) अप्रत्यक्ष कर

2,000

उत्तर- दिए गए आँकड़े (₹ करोड़ में):

GDP (बाजार मूल्य पर) = 18,000

अचल पूंजी का उपभोग (Depreciation) = 1,000

अप्रत्यक्ष कर = 2,000

सब्सिडी = 250

शुद्ध घरेलू उत्पाद (कारक लागत पर) = NDPfc = GDPmp - Depreciation - Indirect Tax + Subsidy

= 18,000 - 1,000 - 2,000 + 250 = 15,250

स्व-रोजगार की मिश्रित आय = 7,000

ब्याज = 800

लाभ = 975

कर्मचारियों का मुआवजा = 6,000

कारक आयों का योग = 7,000+800+975 +6,000 = 14,775

किराया = 15,250 - 14,775 = 475 करोड़

किराए का मूल्य 475 करोड़ रुपये है।

12. (क) "बैंकिंग प्रणाली की ऋण सृजन क्षमता निर्धारित करने में मुद्रा गुणक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।" उपयुक्त संख्यात्मक उदाहरण सहित इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- मुद्रा गुणक और ऋण सृजन के बीच सीधा संबंध होता है। मुद्रा गुणक वह कारक है जिससे बैंकिंग प्रणाली अपनी प्राथमिक जमा राशियों के आधार पर कुल मुद्रा की आपूर्ति को बढ़ाती है।

बैंकिंग प्रणाली की ऋण सृजन क्षमता मुख्य रूप से नकद आरक्षित अनुपात (CRR) या वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) जैसे कानूनी आरक्षित मानदंडों पर निर्भर करती है। मुद्रा गुणक का सूत्र निम्नलिखित है:

मुद्रा गुणक `=\frac1{L R R}`

यहाँ LRR (Legal Reserve Ratio) वह न्यूनतम प्रतिशत है जो बैंकों को अनिवार्य रूप से आरक्षित रखना पड़ता है।

मान लीजिए कि बैंकिंग प्रणाली में निम्नलिखित स्थितियाँ हैं:

प्राथमिक जमा (Initial Deposit): ₹1,000

कानूनी आरक्षित अनुपात (LRR): 10% (या 0.1)

मुद्रा गुणक =`=\frac1{0.1)` = 10

इसका अर्थ है कि बैंक अपनी प्रारंभिक जमा से 10 गुना अधिक ऋण सृजित कर सकते हैं।

चरण

जमा राशि (₹)

आरक्षित कोष (10%) (₹)

ऋण (₹)

प्रारंभिक

1,000

100

900

द्वितीय

900

90

810

तृतीय

810

81

729

---

---

---

---

कुल

10,000

1,000

9,000

बैंक ने ₹1,000 की जमा से ₹100 आरक्षित रखकर ₹900 का ऋण दिया। यह ₹900 पुनः बैंकिंग प्रणाली में जमा के रूप में वापस आता है, जिससे बैंक फिर से ऋण देते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक कुल जमा राशि ₹10,000 (1,000 × 10) नहीं हो जाती।

या

(ख) पिछले कुछ वर्षों में जन धन योजना, आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली, ई-वॉलेट, राष्ट्रीय वित्तीय स्विच (NFS) और अन्य जैसी पहलों ने नकदी रहित होने के लिए सरकार के संकल्प को मजबूत किया है।

इस बात का विस्तारपूर्वक वर्णन करें कि इन पहलों ने राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास को किस प्रकार प्रभावित किया होगा।

उत्तर- जन धन योजना, आधार, और डिजिटल भुगतान प्रणालियों (JAM ट्रिनिटी) जैसी पहलों ने भारत की राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित किया है:

1. औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार : ई-वॉलेट और यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों ने नकदी पर निर्भरता कम की है, जिससे लेनदेन का रिकॉर्ड रखना आसान हो गया है। इससे कर अनुपालन में सुधार हुआ है, जो प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय आय में वृद्धि करता है।

2. लीकेज में कमी और बचत: प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से सरकारी सब्सिडी सीधे बैंक खातों में भेजी जा रही है, जिससे बिचौलियों और भ्रष्टाचार में कमी आई है। 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, सरकार ने लीकेज रोककर लगभग ₹3.48 लाख करोड़ की बचत की है, जिसका पुनर्निवेश शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विकास कार्यों में किया जा रहा है।

3. वित्तीय समावेशन और ऋण उपलब्धता: जन धन योजना के तहत 55 करोड़ से अधिक खाते खोले गए हैं। इन खातों ने गरीबों के लिए बैंकिंग सेवाओं के द्वार खोले हैं, जिससे वे साहूकारों के बजाय औपचारिक ऋण (जैसे मुद्रा लोन) प्राप्त करने में सक्षम हुए हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश और उत्पादकता बढ़ी है।

4. लेनदेन लागत में कमी: आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS) और राष्ट्रीय वित्तीय स्विच (NFS) ने दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग बुनियादी ढांचे की लागत को कम किया है। बिना भौतिक बैंक शाखा के भी लोग बायोमेट्रिक पहचान के जरिए लेनदेन कर पा रहे हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों में गति आई है।

5. जीडीपी (GDP) और उत्पादकता में वृद्धि: डिजिटल भुगतान में प्रत्येक 1% की वृद्धि को प्रति व्यक्ति जीडीपी में लगभग 0.1% की वृद्धि के साथ जोड़ा गया है। डिजिटल साधनों ने छोटे व्यवसायों और स्ट्रीट वेंडरों को वैश्विक डिजिटल बाजार से जोड़ा है, जिससे उनकी आय और देश के समग्र आर्थिक विकास को मजबूती मिली है।

6. सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण: इन प्रणालियों ने विशेष रूप से महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया है। वित्तीय साक्षरता बढ़ने से बचत और निवेश की संस्कृति विकसित हुई है, जो लंबे समय में राष्ट्रीय आय के संचय में मदद करती है।

13. (क) श्री राजेश एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, वे घर पर कुछ बच्चों को पढ़ाते हैं और शुल्क प्राप्त करते हैं। उन्हें सरकार से प्रति माह पेंशन भी मिलती है। उन्होंने कंपनी के शेयरों में निवेश किया है जिससे उन्हें लाभांश प्राप्त होता है। कभी-कभी उनके बच्चे उन्हें जन्मदिन पर नकद उपहार देते हैं।

श्री राजेश की आय को कारक आय या हस्तांतरण आय के रूप में वर्गीकृत करें और अपने उत्तर के समर्थन में वैध कारण बताएं।

उत्तर-

आय का स्रोत

आय का प्रकार

कारण

घर पर बच्चों को पढ़ाकर प्राप्त शुल्क

कारक आय

यह आय सेवा (श्रम) प्रदान करने के बदले प्राप्त होती है।

सरकार से प्राप्त मासिक पेंशन

हस्तांतरण आय

पेंशन के बदले वर्तमान में कोई उत्पादन/सेवा नहीं दी जाती; यह एकतरफा भुगतान है।

कंपनी के शेयरों से प्राप्त लाभांश

कारक आय

यह आय पूँजी (निवेश) के उपयोग के बदले मिलती है।

बच्चों से जन्मदिन पर नकद उपहार

हस्तांतरण आय

यह बिना किसी वस्तु या सेवा के बदले दिया गया स्वैच्छिक भुगतान है।

या

(ख) आय विधि द्वारा राष्ट्रीय आय के आकलन से संबंधित चरणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- इस विधि को वर्गीकृत कार्यों के अनुसार विधि या साधन भुगतान विधि भी कहा जाता हैइस पद्धति के अनुसार देश के संपूर्ण व्यक्तियों एवं संस्थाओं की आय की गणना की जाती है तथा उनके कुल योग को राष्ट्रीय आय कते हैं

य विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित चरणों का प्रयोग किया जाता हैसभी वस्तुओं एवं सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया में सृजित आय के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं

य विधि में राष्ट्रीय आय की गणना करने के निम्नलिखित प्रमुख चरण है।

(A) विभिन्न साधनों को प्राप्त होने वाली आय को विभिन्न वर्गों में बांटना :- संसाधन आय के घटक निम्नलिखित है

(a) कर्मचारियों का पारिश्रमिक (b) लगान (c) व्याज (d) लाभ (e) मिश्रित आय

(B) घरेलू साधन आय की गणना :- घरेलू साधन आय की गणना करने के लिए कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान, व्याज एवं लाभ का योग करते हैं

अतः घरेलू साधन आय = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + लगान + व्याज + लाभ + मिश्रित आय

मिश्रित आय का अर्थ अनगिनत उद्यमो की आय जिसमें कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान , व्याज , लाभ को बांटना कठिन होता है।

(C) राष्ट्रीय आय की गणना :- घरेलू साधन आय में विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है

अतः राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय

14. (क) व्यापार संतुलन को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- वस्तुओं के निर्यात मूल्य तथा आयात मूल्य का अन्तर व्यापार संतुलन कहलाता है।

सूत्र के रूप में,

व्यापार संतुलन = दृश्य वस्तुओं का निर्यात मूल्य - दृश्य वस्तुओं का आयात मूल्य ।

(ख) "यदि कोई देश चालू खाता घाटे की स्थिति का सामना कर रहा है, तो व्यापार घाटा अवश्य होगा।" दिए गए कथन का औचित्य सिद्ध कीजिए।

उत्तर- यह कथन कि "यदि चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) है, तो व्यापार घाटा (Trade Deficit) अनिवार्य रूप से होगा," पूर्णतः सही नहीं है।

चालू खाते की संरचना: चालू खाते में केवल वस्तुओं का व्यापार (दृश्य व्यापार) ही नहीं, बल्कि सेवाओं का व्यापार (अदृश्य व्यापार) और अंतरण भुगतान (जैसे प्रेषण या रेमिटेंस) भी शामिल होते हैं।

चालू खाता = (वस्तु निर्यात - वस्तु आयात) + (सेवा निर्यात - सेवा आयात) + शुद्ध अंतरण भुगतान।

व्यापार घाटा बनाम चालू खाता घाटा:

व्यापार घाटा: यह तब होता है जब कोई देश वस्तुओं का आयात उनके निर्यात से अधिक करता है।

चालू खाता घाटा: यह तब होता है जब वस्तुओं, सेवाओं और अंतरणों का कुल योग ऋणात्मक होता है।

विपरीत स्थिति की संभावना: एक देश वस्तुओं के व्यापार में अधिशेष की स्थिति में हो सकता है, लेकिन यदि वह सेवाओं के भुगतान या विदेशों को दिए जाने वाले लाभांश/ब्याज में बहुत अधिक खर्च कर रहा है, तो उसे चालू खाता घाटा हो सकता है। इसके विपरीत, भारत जैसे देशों में अक्सर भारी 'व्यापार घाटा' होता है, लेकिन सेवाओं के निर्यात और प्रेषण के कारण 'चालू खाता घाटा' कम हो जाता है।

निष्कर्ष:- यद्यपि व्यापार घाटा चालू खाता घाटे का एक प्रमुख कारण होता है, लेकिन यह कहना गलत है कि CAD होने पर व्यापार घाटा अवश्य होगा। यह संभव है कि व्यापार संतुलन (वस्तुएं) सकारात्मक हो, लेकिन सेवाओं और आय के असंतुलन के कारण चालू खाता घाटे में हो। अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की आधिकारिक वेबसाइट पर भुगतान संतुलन (BoP) के आंकड़ों को देख सकते हैं।

15. नीचे दिए गए चित्र में मौद्रिक नीति की पहचान करें और उस तंत्र पर चर्चा करें जिसके माध्यम से यह नीति आर्थिक अस्थिरता को नियंत्रित करती है।

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उत्तर- चित्र में दिखाई गई मौद्रिक नीति का उपकरण खुले बाजार की क्रियाएँ है।

यह भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री की प्रक्रिया है।

स्थिति

केंद्रीय बैंक की कार्रवाई

प्रभाव

परिणाम

मुद्रास्फीति

सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री

वाणिज्यिक बैंकों से नकद केंद्रीय बैंक के पास चला जाता है।

बैंकों की ऋण देने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मांग घटती है और कीमतें स्थिर होती हैं।

मंदी

सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद

केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में नकद (₹) डालता है।

बैंकों के पास अधिक पैसा आता है, ब्याज दरें कम होती हैं और निवेश/मांग में वृद्धि होती है।

 विश्लेषण

बायाँ हिस्सा: केंद्रीय बैंक बैंकों/जनता को प्रतिभूतियां बेच रहा है और बदले में मुद्रा (₹) सोख रहा है। यह मुद्रास्फीति को रोकने के लिए किया जाता है।

दायाँ हिस्सा: केंद्रीय बैंक प्रतिभूतियां खरीद रहा है और अर्थव्यवस्था में मुद्रा (₹) छोड़ रहा है। यह मंदी से निपटने के लिए किया जाता है।

निष्कर्ष: खुले बाजार की क्रियाओं के माध्यम से RBI तरलता को संतुलित करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है।

16. (i) दो काल्पनिक अर्थव्यवस्थाओं A और B के लिए, उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति का मान क्रमशः 0.6 और 0.8 है। दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्वायत्त उपभोग को 40 करोड़ रुपये और निवेश व्यय को 100 करोड़ रुपये मानते हुए।

(क) अर्थव्यवस्था A के लिए आय के ब्रेक-ईवन स्तर की गणना कीजिए।

(ख) अर्थव्यवस्था B के लिए आय का संतुलन स्तर।

उत्तर- दी गई है:

स्वायत्त उपभोग (C) : 40 करोड़ रुपये

निवेश व्यय (I) : 100 करोड़ रुपये

MPC (A) : 0.6

MPC (B) : 0.8

(क) उत्तर-  अर्थव्यवस्था A के लिए आय का ब्रेक-ईवन स्तर

ब्रेक-ईवन बिंदु वह स्थिति है जहाँ कुल आय (Y) कुल उपभोग (C) के बराबर होती है, यानी बचत शून्य होती है।

उपभोग फलन का सूत्र: C = `=\overline C` + c(Y)

जहाँ c उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (MPC) है। ब्रेक-ईवन पर Y = C होता है।

Y = 40 + 0.6Y

Y - 0.6Y = 40

0.4Y = 40

`Y=\frac{40}{0.4}=100`

अर्थव्यवस्था A के लिए आय का ब्रेक-ईवन स्तर 100 करोड़ रुपये है।

(ख) उत्तर-   अर्थव्यवस्था B के लिए आय का संतुलन स्तर-

संतुलन स्तर पर, कुल आय (Y) कुल व्यय (C + I) के बराबर होती है।

अर्थव्यवस्था B के लिए उपभोग फलन: C = 40 + 0.8Y

निवेश (I): 100 करोड़ रुपये

संतुलन की स्थिति:Y = C + I

Y = (40 + 0.8Y) + 100

Y = 140 + 0.8Y

Y - 0.8Y = 140

0.2Y = 140

`Y=\frac{140}{0.2}=700`

अर्थव्यवस्था B के लिए आय का संतुलन स्तर 700 करोड़ रुपये है।

(ii) मान लीजिए कि भारतीय सरकार 40,000 करोड़ रुपये की रक्षा परियोजना के साथ सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देने का निर्णय लेती है।

अन्य सभी कारकों को स्थिर मानते हुए, दी गई स्थिति का अर्थव्यवस्था की आय, रोजगार और उत्पादन पर संभावित प्रभाव स्पष्ट कीजिए। (निवेश में परिवर्तन के कारण उत्पादन में होने वाले अंतिम परिवर्तन को दर्शाने के लिए उपयुक्त आरेख का प्रयोग करें)।

उत्तर- भारतीय सरकार द्वारा रक्षा परियोजना में 40,000 करोड़ रुपये का निवेश अर्थव्यवस्था में एक सकारात्मक गुणक प्रभाव (Multiplier Effect) पैदा करेगा। जब सरकार निवेश बढ़ाती है, तो इसका असर केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में आय और मांग का चक्र शुरू हो जाता है।

यहाँ इसका अर्थव्यवस्था के मुख्य पहलुओं पर प्रभाव दिया गया है:

1. उत्पादन पर प्रभाव- रक्षा परियोजना के लिए कच्चे माल (स्टील, तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स) की मांग बढ़ेगी। इसे पूरा करने के लिए घरेलू उद्योगों को अपना उत्पादन बढ़ाना होगा। इस प्रारंभिक निवेश के कारण "निवेश गुणक" सक्रिय हो जाता है, जिससे कुल उत्पादन (GDP) में होने वाली वृद्धि प्रारंभिक निवेश (40,000 करोड़) से कई गुना अधिक होती है।

2. आय पर प्रभाव- निवेश बढ़ने से उत्पादन के कारकों (जैसे श्रम और पूंजी) को भुगतान किया जाता है। फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों को वेतन और उद्यमियों को लाभ मिलता है। यह बढ़ी हुई आय जब बाजार में खर्च की जाती है, तो अन्य वस्तुओं (उपभोग की वस्तुओं) की मांग बढ़ती है, जिससे दूसरे क्षेत्रों में भी आय का सृजन होता है।

3. रोजगार पर प्रभाव- बढ़े हुए उत्पादन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कंपनियों को अधिक कार्यबल की आवश्यकता होगी।

प्रत्यक्ष रोजगार: रक्षा संयंत्रों और इंजीनियरिंग फर्मों में नई नौकरियां।

अप्रत्यक्ष रोजगार: रसद (logistics), आपूर्ति श्रृंखला और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसर।

निवेश और उत्पादन में परिवर्तन का आरेख-

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X-अक्ष: राष्ट्रीय आय/उत्पादन (Y) को दर्शाता है। Y-अक्ष: कुल मांग (AD) को दर्शाता है। जब सरकार 40,000 करोड़ रुपये का निवेश ΔI करती है, तो कुल मांग रेखा (AD) ऊपर की ओर खिसक जाती है। संतुलन बिंदु E1 से E2 पर चला जाता है। आप देखेंगे कि आय में होने वाली वृद्धि (ΔY), निवेश में की गई वृद्धि (ΔI) से काफी बड़ी है। यह अंतर ही गुणक प्रभाव कहलाता है।

40,000 करोड़ रुपये का यह निवेश अर्थव्यवस्था में मांग का विस्तार करेगा, जिससे मंदी जैसी स्थिति दूर होगी और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।

या

(iii) यदि किसी अर्थव्यवस्था में बचत फलन S = -50 + 0.2Y द्वारा दिया गया है और Y = 2000 करोड़ रुपये है; तो अर्थव्यवस्था का उपभोग व्यय 1650 करोड़ रुपये होगा, स्वायत्त निवेश 50 करोड़ रुपये होगा और उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति 0.8 होगी। सत्य या असत्य? उचित गणनाओं के साथ अपने उत्तर को सिद्ध कीजिए।

उत्तर- यद्यपि उपभोग व्यय और उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (MPC) के मान सही हैं, लेकिन 'स्वायत्त निवेश' का मान इस स्थिति में मेल नहीं खाता है।

बचत फलन (S) = -50 + 0.2Y

आय (Y) = 2,000 करोड़ रुपये

1. उपभोग व्यय (Consumption Expenditure -C) की गणना:

बचत (S) निकालने के लिए Y का मान बचत फलन में रखते हैं:

S = -50 + 0.2(2,000)

S = -50 + 400 = 350 करोड़ रुपये

हम जानते हैं कि Y = C + S,

इसलिए: C = Y – S

C = 2,000 - 350 = 1,650 करोड़ रुपये (यह भाग सत्य है)

2. उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (MPC) की गणना : बचत फलन से बचत की सीमांत प्रवृत्ति (MPS) का पता चलता है (S = -a + sY में s = MPS होता है)। यहाँ, MPS = 0.2

चूंकि MPC + MPS = 1,

इसलिए : MPC = 1 - 0.2 = 0.8 (यह भाग भी सत्य है)

3. स्वायत्त निवेश (Autonomous Investment - I) की जांच : संतुलन की स्थिति में, बचत (S) निवेश (I) के बराबर होनी चाहिए (S = I)। ऊपर की गई गणना के अनुसार, S = 350 करोड़ रुपये है। अतः, Y = 2,000 के संतुलन स्तर पर स्वायत्त निवेश 350 करोड़ रुपये होना चाहिए, न कि 50 करोड़ रुपये।

इसलिए पूरा कथन असत्य है।

 (iv) प्रभावी मांग को परिभाषित करें। यदि पूर्व-अनुमानित मांग, पूर्व-अनुमानित कुल आपूर्ति से अधिक हो, तो प्रभावी मांग के स्तर को समायोजित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को स्पष्ट करें।

उत्तर- केन्स ने 1936 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ' The General Theory of Employment, Interest and Money' में रोजगार सिद्धांत का उल्लेख किया। केन्स के अनुसार रोजगार प्रभावपूर्ण मांग पर निर्भर करती है

उपभोग सम्बन्धी वस्तुओं तथा विनियोग सम्बन्धी वस्तुओं की मांग के योग को प्रभावपूर्ण मांग कहते हैं।

प्रभावपूर्ण मांग ( ED ) = उपभोग मांग (C) + निवेश मांग (I)

जब पूर्व-अनुमानित मांग > पूर्व-अनुमानित पूर्ति (AD > AS) - यदि किसी समय अर्थव्यवस्था में पूर्व-अनुमानित (Ex-ante) मांग, पूर्व-अनुमानित कुल आपूर्ति से अधिक हो जाती है, तो अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। इसे समायोजित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:

1. स्टॉक में कमी- जब लोग उत्पादन से अधिक सामान खरीदना चाहते हैं, तो फर्मों के पास रखा हुआ पुराना स्टॉक कम होने लगता है। अवांछित रूप से स्टॉक में गिरावट आने लगती है।

2. उत्पादन में वृद्धि- अपने स्टॉक को पूर्व स्तर पर लाने और बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उत्पादक/फर्म अधिक उत्पादन करने का निर्णय लेते हैं। इसके लिए वे अधिक संसाधनों और श्रम का उपयोग करते हैं।

3. आय और रोजगार में वृद्धि- जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ता है, वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। नए लोगों को काम मिलने से देश की कुल आय में वृद्धि होती है।

संतुलन

समग्र मांग और आपूर्ति में संतुलन उस समय होता है जब किसी विशेष कीमत स्तर पर समग्र मांग समग्र पूर्ति के बराबर हो जाए। संतुलन स्तर की समग्र आपूर्ति से जुड़े रोजगार स्तर को संतुलन रोजगार (प्रभावपूर्ण मांग) कहा जाता है

Class 12 CM SoE Economics PRE-TEST-2 EXAMINATION (SESSION-2025-26) Answer key

चित्र में,

AD = समग्र मांग की रेखा , AS = समग्र पूर्ति की रेखा। ये दोनों वक्र एक दूसरे को E बिंदु पर काटती है जो संतुलन बिंदु हैइस बिंदु पर रोजगार ON के बराबर तथा विक्रय प्राप्तियां OM के बराबर है

17. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक एकीकृत अप्रत्यक्ष कर है जिसका उद्देश्य भारत की कर संरचना को सरल बनाना और राजस्व संग्रह को बढ़ावा देना है। एक पारदर्शी प्रणाली के माध्यम से कर अनुपालन में सुधार और कर चोरी को कम करके, जीएसटी में सरकारी राजस्व बढ़ाने की क्षमता है। इससे सरकारी व्यय और राजस्व के बीच के अंतर को कम करके राजकोषीय घाटे को घटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, राज्यों को जीएसटी मुआवजे में देरी, प्रारंभिक राजस्व की कमी और प्रशासनिक अक्षमता जैसी चुनौतियां अस्थायी रूप से राजकोषीय घाटे को प्रभावित कर सकती हैं। समय के साथ, एक सुव्यवस्थित जीएसटी प्रणाली राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और आर्थिक विकास में योगदान दे सकती है।

भारत ने अप्रैल 2023 में ₹1.87 लाख करोड़ का अब तक का सबसे अधिक मासिक जीएसटी संग्रह दर्ज किया। यह बेहतर अनुपालन और आर्थिक सुधार के कारण हुआ।

प्रश्न:

(i) सुचारु रूप से लागू की गई जीएसटी प्रणाली का आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर- एक सुव्यवस्थित जीएसटी (GST) प्रणाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निम्नलिखित लाभ प्रदान करती है जो अंततः आर्थिक विकास को गति देते हैं:

1. एकल साझा बाजार: 'एक राष्ट्र, एक कर' की अवधारणा ने पूरे भारत को एक एकीकृत बाजार में बदल दिया है, जिससे राज्यों के बीच व्यापार बाधाएं कम हुई हैं।

2. कैस्केडिंग प्रभाव की समाप्ति: जीएसटी ने 'कर पर कर' की समस्या को खत्म किया है, जिससे उत्पादन की लागत कम होती है और वस्तुएं प्रतिस्पर्धी बनती हैं।

3. रसद में दक्षता: अंतर-राज्यीय चेक पोस्ट हटने और ई-वे बिल प्रणाली से माल ढुलाई के समय और लागत में भारी कमी आई है।

4. व्यापार सुगमता : डिजिटल अनुपालन और सरलीकृत पंजीकरण प्रक्रियाओं के कारण नए व्यवसायों के लिए काम करना आसान हो गया है।

5. निवेश में वृद्धि: एक पारदर्शी और स्थिर कर संरचना विदेशी और घरेलू निवेशकों को आकर्षित करती है, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

(ii) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर में मुख्य अंतर निम्नलिखित है -

1. अंतिम भार :- प्रत्यक्ष कर का अंतिम भार उसी व्यक्ति को उठाना पड़ता है जो सरकार के कर का भुगतान करता है। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष कर जिसका सरकार को भुगतान एक व्यक्ति करता है किंतु अंतिम भार किसी अन्य व्यक्ति को उठाना पड़ता है।

2. कर का टालना :- प्रत्यक्ष कर को दूसरे व्यक्तियों पर नहीं टाला जा सकता जबकि अप्रत्यक्ष कर को दूसरे व्यक्तियों पर टाला जा सकता है।

3. प्रगतिशीलता :- प्रत्यक्ष कर साधारणतः प्रगतिशील होते हैं। इनका वास्तविक भार निर्धन व्यक्तियों की तुलना में धनी व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष कर साधारणतः प्रतिगामी होते हैं। इसका वास्तविक भार निर्धन व्यक्तियों पर धनी व्यक्तियों की तुलना में अधिक पड़ता है।

प्रत्यक्ष कर का उदाहरण :- आयकर, संपत्ति कर, निगम कर

अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण :- बिक्री कर, सीमा शुल्क, उत्पादन शुल्क

SECTION-B INDIAN ECONOMIC DEVELOPMENT

18. दिए गए अंश को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

भारतीय उद्योगों को वैश्विक बाजार में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाने के लिए, आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध हटा दिए गए और आयात शुल्क में उल्लेखनीय कमी की गई। उस क्षेत्र की पहचान करें जिसके अंतर्गत उपरोक्त सुधार लागू किया गया था और सही विकल्प चुनें।

(क) औद्योगिक

(ख) वित्तीय

(ग) कर

(घ) विदेशी व्यापार

19. औपनिवेशिक काल के दौरान व्यावसायिक संरचना में -------- क्षेत्र ने प्रमुख भूमिका निभाई।

(क) कृषि

(ख) विनिर्माण

(ग) सेवा

(घ) इंफ्रास्ट्रक्चर

20. मानव पूंजी आर्थिक विकास में योगदान देती है।

(i) श्रम की उत्पादकता में सुधार करना

(ii) तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देना

(iii) श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी आना

(सही विकल्प चुनें)

(क) (i) और (ii)

(ख) (i) और (iii)

() (ii) और (iii).

(घ) (i), (ii) और (iii).

21. निम्नलिखित कथनों को पढ़िए, अभिकथन (A) और कारण (R)।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए:

कथन (A): वैकल्पिक विपणन चैनल छोटे और सीमांत किसानों के लिए आशा की किरण हैं।

कारण (R): मौजूदा बाजार चैनल बिचौलियों से छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा करने में सक्षम नहीं रहे हैं।

वैकल्पिक

(क) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं तथा कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।

(ख) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।

(ग) अभिकथन (A) सत्य है, परन्तु कारण (R) असत्य है।

(घ) अभिकथन (A) असत्य है, परन्तु कारण (R) सत्य है।

22. आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, गैर-औपचारिक क्षेत्र में अनौपचारिक रोजगार में लगे श्रमिकों का प्रतिशत 2018-19 में 68.2% था, जो 2021 में बढ़कर 71.8% हो गया। उपरोक्त स्थिति से पता चलता है कि ------ श्रमिक बाजार की अनिश्चितताओं के प्रति संवेदनशील हो गए हैं।

(क) अत्यधिक

(ख) कम

(ग) नहीं

(घ) इनमें से कोई नहीं।

23. निम्नलिखित पाठ को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

Class 12 CM SoE Economics PRE-TEST-2 EXAMINATION (SESSION-2025-26) Answer key

सभी आर्थिक गतिविधियों को आठ अलग-अलग औद्योगिक डिवीजनों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

सरलता के लिए, इन विभागों में कार्यरत सभी व्यक्तियों को तीन प्रमुख क्षेत्रों - प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र - में समूहित किया जा सकता है।

दिए गए पाठ के आलोक में, प्राथमिक क्षेत्र में निम्नलिखित --- शामिल हैं:

(रिक्त स्थान भरने के लिए सही विकल्प चुनें)

विकल्प:

(क) केवल (i)

(ख) (i) और (ii)

(ग) (iii), (iv) और (v)

(घ) (vi), (vii) और (viii)

24. संसाधन खत्म हो रहे हैं क्योंकि पर्यावरण का क्षरण पर्यावरण की ------ क्षमता से ज़्यादा हो रहा है। (खाली जगह भरने के लिए सही विकल्प चुनें)

() वहन

() अवशोषण

() आत्मसात्करण

() पुनर्जनन

25. कॉलम I में दिए गए पदों के समूह और कॉलम II में दिए गए संबंधित तथ्यों में से कथनों का सही युग्म चुनें:

कॉलम I

कॉलम II

(A) भारत में ग्रामीण ऋण के गैर-संस्थागत स्रोत

(i) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक।

(B) मध्यम अवधि का ऋण

(ii) अतिरिक्त भूमि की खरीद के लिए।

(C) सहकारी ऋण समितियाँ

(iii) किसानों को उचित ब्याज दर पर पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराना।

(D) रासायनिक खेती

(iv) अधिक स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक भोजन।

विकल्प:

(क) (A)-i

(ख) (B)-ii

(ग) (C)-iii

(घ) (D)-iv.

26. -------- कृषि एक ऐसी प्रणाली है जो पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने, बनाए रखने और बढ़ाने में सहायक है।

() पारंपरिक

() जैविक

() रसायन

(घ) बहुस्तरीय

27. निम्नलिखित कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़ें।

कथन 1: भारत और पाकिस्तान दोनों में, सेवा क्षेत्र विकास के एक प्रमुख स्रोत के रूप में उभर रहा है।

कथन 2: भारत के पड़ोसी देशों में चीन की जीवन प्रत्याशा दर सबसे अधिक है।

दिए गए कथनों के आधार पर निम्नलिखित में से सही विकल्प का चयन कीजिए:

() कथन 1 सत्य है और कथन 2 असत्य है।

(ख) कथन 1 असत्य है और कथन 2 सत्य है।

(ग) कथन 1 और 2 दोनों सत्य हैं।

(घ) कथन 1 और 2 दोनों असत्य हैं।

28. "चीन की एक-बच्चा नीति ने प्रजनन दर को सफलतापूर्वक कम किया, लेकिन कई दीर्घकालिक चुनौतियां भी पैदा कीं। चीन के भविष्य के विकास के लिए इस नीति के प्रमुख परिणामों का मूल्यांकन करें।"

उत्तर- चीन ने 1979 में लागू की गई एक-बच्चा नीति के माध्यम से तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या पर प्रभावी नियंत्रण किया। इस नीति ने अल्पकाल में सकारात्मक परिणाम दिए, किंतु दीर्घकाल में चीन के भविष्य के विकास के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न कीं।

सकारात्मक परिणाम-

1. प्रजनन दर में तीव्र गिरावट – कुल प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी आई, जिससे जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित हुई।

2. आर्थिक विकास में सहायता – कम आश्रित जनसंख्या के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे पर प्रति व्यक्ति अधिक निवेश संभव हुआ।

3. जीवन स्तर में सुधार – परिवारों की आय का बेहतर उपयोग हुआ और गरीबी घटाने में मदद मिली।

दीर्घकालिक चुनौतियाँ-

1. जनसंख्या का तीव्र वृद्धावस्था की ओर झुकाव – बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ने से पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर भारी दबाव पड़ा।

2. कार्यशील जनसंख्या में कमी – श्रमबल घटने से उत्पादन लागत बढ़ी और आर्थिक वृद्धि की गति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

3. लिंग अनुपात में असंतुलन – पुरुषों की संख्या अधिक होने से विवाह, सामाजिक स्थिरता और मानव तस्करी जैसी समस्याएँ उभरीं।

4. परिवार संरचना में तनाव – “4-2-1” संरचना (चार दादा-दादी, दो माता-पिता, एक संतान) ने एकल संतान पर सामाजिक व आर्थिक बोझ बढ़ाया।

5. नवाचार और उपभोग पर प्रभाव – युवा आबादी की कमी से दीर्घकाल में उपभोग और नवाचार क्षमता प्रभावित होने की आशंका।

निष्कर्ष- एक-बच्चा नीति ने चीन को जनसंख्या विस्फोट से बचाने और प्रारंभिक आर्थिक उछाल में मदद की, परंतु अब वही नीति वृद्ध होती आबादी, घटते श्रमबल और सामाजिक असंतुलन जैसी चुनौतियों का कारण बन रही है। इसलिए चीन द्वारा बाद में दो-बच्चा और तीन-बच्चा नीति अपनाना आवश्यक सुधार था, ताकि भविष्य के विकास को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाया जा सके।

29. (क) "हमारे ग्रह के भविष्य की रक्षा के लिए कार्बन उत्सर्जन से निपटना महत्वपूर्ण है।" उपरोक्त कथन के आलोक में इस वैश्विक चिंता से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर- आज की सबसे बड़ी वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती, जलवायु परिवर्तन, की गंभीरता को स्पष्ट करता है। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन वैश्विक तापमान वृद्धि, चरम मौसम घटनाओं, समुद्र-स्तर में वृद्धि और जैव-विविधता के क्षरण का प्रमुख कारण है। इस वैश्विक चिंता से निपटने के लिए बहु-स्तरीय और समन्वित रणनीतियाँ आवश्यक हैं।

1. ऊर्जा संक्रमण-

a. नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, जल और जैव-ऊर्जा) की ओर तेज़ी से संक्रमण।

b. कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना।

c. स्मार्ट ग्रिड और ऊर्जा भंडारण (बैटरी, हाइड्रोजन) का विकास।

2. ऊर्जा दक्षता में सुधार-

a. उद्योगों, भवनों और परिवहन में ऊर्जा-कुशल तकनीकों का उपयोग।

b. LED, ग्रीन बिल्डिंग कोड, और कुशल मशीनरी को प्रोत्साहन।

c.कम ऊर्जा में अधिक उत्पादन की नीति।

3. सतत परिवहन व्यवस्था-

a. विद्युत वाहनों और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा।

b. रेल, मेट्रो, साइकिल और पैदल यातायात-अनुकूल शहरों का विकास।

c. जैव-ईंधन और हाइड्रोजन आधारित परिवहन पर निवेश।

4. वन संरक्षण और कार्बन सिंक का विस्तार-

a. वनों की कटाई रोकना और वृक्षारोपण/पुनर्वनीकरण।

b. आर्द्रभूमि, मैन्ग्रोव और घासभूमियों का संरक्षण।

c. प्रकृति-आधारित समाधान अपनाना।

5. औद्योगिक और तकनीकी समाधान

a. कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण तकनीकों का विकास।

b. हरित हाइड्रोजन, स्वच्छ स्टील और सीमेंट उत्पादन।

c. परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।

6. नीति, बाजार और वैश्विक सहयोग-

a. कार्बन टैक्स और उत्सर्जन व्यापार जैसी बाजार-आधारित व्यवस्थाएँ।

b. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन के अंतर्गत पेरिस समझौता के लक्ष्यों को सख्ती से लागू करना।

c. अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल की वैज्ञानिक सिफारिशों के आधार पर नीतियाँ बनाना।

d. विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को वित्त और तकनीक सहायता।

7. जन-जागरूकता और जीवनशैली में परिवर्तन

a. सतत उपभोग, ऊर्जा बचत और अपशिष्ट प्रबंधन।

b.लो-कार्बन जीवनशैली को सामाजिक आंदोलन बनाना।

c. शिक्षा और मीडिया के माध्यम से व्यवहार परिवर्तन।

या

(ख) औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

आधार

औपचारिक क्षेत्र

अनौपचारिक क्षेत्र

परिभाषा

इसमें वे सार्वजनिक और निजी संस्थान आते हैं जहाँ 10 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत होते हैं।

इसमें छोटे उद्यम, स्वयं का काम करने वाले और वे संस्थान आते हैं जहाँ श्रमिकों की संख्या 10 से कम होती है।

रोजगार सुरक्षा

यहाँ श्रमिकों को नियमित कार्य और रोजगार की गारंटी मिलती है।

यहाँ रोजगार की कोई निश्चितता नहीं होती; श्रमिकों को कभी भी काम से निकाला जा सकता है।

सामाजिक सुरक्षा

श्रमिक पेंशन, ग्रेच्युटी, और भविष्य निधि (PF) जैसे सामाजिक सुरक्षा लाभों के हकदार होते हैं।

श्रमिकों को आमतौर पर ऐसे कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त नहीं होते हैं।

कानूनी सुरक्षा

ये श्रमिक श्रम कानूनों और ट्रेड यूनियन के माध्यम से संरक्षित होते हैं।

यहाँ श्रम कानून प्रभावी ढंग से लागू नहीं होते और श्रमिकों का कोई संगठन नहीं होता।

कार्य की शर्तें

यहाँ कार्य के घंटे निश्चित होते हैं और अतिरिक्त कार्य के लिए भुगतान मिलता है।

यहाँ कार्य के घंटे अनिश्चित होते हैं और कार्य की शर्तें नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर करती हैं।

30. (क) "ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक शोषण के भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ सकारात्मक दुष्प्रभाव भी थे।"

इस कथन को कुछ वैध स्पष्टीकरणों के साथ सिद्ध कीजिए।

उत्तर- यद्यपि ब्रिटिश शासन का मुख्य उद्देश्य भारतीय संसाधनों का शोषण और ब्रिटेन के उद्योगों को लाभ पहुँचाना था, लेकिन इस प्रक्रिया में अनजाने में कुछ ऐसी संरचनात्मक नींव पड़ीं, जिन्होंने दीर्घकाल में स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास में सहायता की।

सकारात्मक दुष्प्रभाव (आधुनिक संस्थाओं का विकास):

1. रेलवे और संचार नेटवर्क: ब्रिटिशों ने अपने सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण तथा कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुँचाने के लिए रेलवे, टेलीग्राफ और डाक सेवाओं का एक बड़ा नेटवर्क बनाया, जो भारत के एकीकरण और भविष्य के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

2. आधुनिक प्रशासनिक और न्यायिक प्रणाली: ब्रिटिशों ने एक केंद्रीकृत नौकरशाही और कानूनी ढांचा स्थापित किया, जिसमें भारतीय सिविल सेवा और अदालतें शामिल थीं, जो आजादी के बाद भारत के लोकतांत्रिक प्रशासन के लिए आधार बनीं, भले ही ये शुरुआत में शोषण के लिए थीं।

3. एकीकृत बाजार और मुद्रा प्रणाली: ब्रिटिशों ने भारत को एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया, जहाँ वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह शुरू हुआ (हालांकि यह एकतरफा था)। उन्होंने एक स्थिर मुद्रा प्रणाली स्थापित करने का प्रयास किया, जिससे व्यापार में एकरूपता आई।

4. कृषि का व्यवसायीकरण (आंशिक): किसानों को नकदी फसलों (कपास, जूट) की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे वे विश्व बाजार से जुड़े (हालांकि इससे खाद्य सुरक्षा कम हुई)। इसने भविष्य के कृषि सुधारों के लिए एक आधार तैयार किया।

नकारात्मक प्रभाव (शोषण):

1. उद्योगों का विनाश: भारतीय हस्तशिल्प और उद्योगों को ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा के कारण भारी नुकसान हुआ।

2. धन का निष्कासन: भारत से धन और संसाधनों का इंग्लैंड की ओर बड़े पैमाने पर प्रवाह हुआ, जिससे भारत गरीब हुआ।

3. कृषि पर बोझ: भू-राजस्व नीतियों और नकदी फसलों पर जोर ने किसानों को कर्ज और अकाल के चक्र में फँसा दिया।

4. आर्थिक निर्भरता: भारत कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और ब्रिटिश उत्पादों का बाजार बनकर रह गया, जिससे उसकी अपनी अर्थव्यवस्था कमजोर हुई।

या

(ख) दी गई जानकारी को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

सेक्टर

व्यवसायिक संरचना (जनसंख्या का %)

राष्ट्रीय आय में योगदान (जीडीपी का %)

कृषि

85%

50%

उद्योग

9%

25%

सेवाएं

6%

25%

(i) स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय कृषि क्षेत्र की स्थिति की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- 85% जनसंख्या कृषि में संलग्न थी, जबकि राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान केवल 50% था। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र में-

  1. अत्यधिक जनसंख्या दबाव था,
  2. उत्पादकता बहुत कम थी,
  3. और प्रच्छन्न बेरोज़गारी व्यापक रूप से विद्यमान थी।

कृषि मुख्यतः परंपरागत, वर्षा पर निर्भर और निर्वाह-आधारित थी। किसानों की आय कम थी और जीवन स्तर पिछड़ा हुआ था।

(ii) ब्रिटिश शासन के दौरान प्राथमिक क्षेत्र के प्रदर्शन के पीछे किन्हीं दो कारणों को उजागर कीजिए।

उत्तर- ब्रिटिश शासन के दौरान प्राथमिक (कृषि) क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन के दो कारण

a. औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था-  ज़मींदारी, रैयतवारी और महालवारी जैसी व्यवस्थाओं ने किसानों का शोषण किया। ऊँचा लगान और असुरक्षित भू-स्वामित्व के कारण कृषि में निवेश नहीं हो सका।

b. नकदी फसलों पर ज़ोर- ब्रिटिश हितों के लिए कपास, नील, जूट जैसी नकदी फसलों को बढ़ावा दिया गया। इससे खाद्यान्न उत्पादन घटा, कृषि असंतुलन और अकाल की स्थिति बनी।

31. (क) पाकिस्तान की मानव विकास रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि लगभग 40% आबादी बहुआयामी रूप से गरीब है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां शिक्षा, सुरक्षित पेयजल और स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुंच है।

पाकिस्तान में गरीबी के कारणों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर- पाकिस्तान में गरीबी और उच्च बहुआयामी गरीबी सूचकांक के मुख्य कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता है:

1. कृषि क्षेत्र में पिछड़ापन और भूमि सुधारों का अभाव: पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और कृषि पर निर्भर है। वहाँ भूमि का वितरण अत्यधिक असमान है। बड़े जमींदारों का वर्चस्व होने के कारण छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के पास आय के सीमित स्रोत हैं, जो ग्रामीण गरीबी का मुख्य कारण है।

2. शिक्षा और कौशल विकास की कमी: शिक्षा तक सीमित पहुँच, विशेष रूप से ग्रामीण और महिला आबादी के लिए, गरीबी का एक बड़ा कारण है। कौशल विकास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में युवा कार्यबल उत्पादक रोजगार प्राप्त करने में असमर्थ रहता है, जिससे 'गरीबी का दुष्चक्र' बना रहता है।

3. उच्च जनसंख्या वृद्धि दर: पाकिस्तान में जनसंख्या वृद्धि दर ऊँची रही है। संसाधनों और आर्थिक विकास की तुलना में जनसंख्या का तेजी से बढ़ना प्रति व्यक्ति आय और संसाधनों (जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा) की उपलब्धता को कम कर देता है।

4. राजनीतिक अस्थिरता और नीतिगत असंतुलन: लगातार राजनीतिक अस्थिरता के कारण दीर्घकालिक आर्थिक नीतियां प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पातीं। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के बजट का एक बड़ा हिस्सा रक्षा और ऋण अदायगी (Debt Servicing) पर खर्च होता है, जिससे सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे (स्वास्थ्य, पेयजल) के लिए बहुत कम धन बचता है।

5. बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल, बिजली और पक्की सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच न होने के कारण बीमारी की स्थिति में गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है, जो उन्हें और अधिक गरीबी में धकेल देता है।

6. मुद्रास्फीति (Inflation) और आर्थिक संकट: हाल के वर्षों में खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने आम जनता की क्रय शक्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बाहरी ऋणों के दबाव ने आर्थिक संकट को गहरा कर दिया है।

(ख) विशेष आर्थिक क्षेत्र को परिभाषित करें।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) वह क्षेत्र है जहाँ उद्योगों को कर छूट, सरल नियम, बेहतर अवसंरचना और निर्यात प्रोत्साहन देकर आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन को बढ़ावा दिया जाता है।

32. नीचे दी गई छवि को देखें:

Class 12 CM SoE Economics PRE-TEST-2 EXAMINATION (SESSION-2025-26) Answer key

          पैनल ए                                 पैनल बी

दी गई छवि के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

(i) पैनल ए और पैनल बी में चिकित्सा उपचार के प्रकार की पहचान कीजिए।

उत्तर- पैनल ए : यह आयुर्वेदिक या पारंपरिक चिकित्सा को दर्शाता है। इसमें जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग किया जाता है (जैसा कि खरल और मूसल के चित्र से स्पष्ट है)।

पैनल बी : यह एलोपैथिक या आधुनिक चिकित्सा को दर्शाता है। इसमें रसायनों से बनी गोलियों, कैप्सूल और आधुनिक दवाओं का उपयोग किया जाता है।

(ii) पैनल ए की तुलना में पैनल बी में उपलब्ध चिकित्सा उपचार के प्रकार के लाभ और हानियों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- पैनल ए की तुलना में पैनल बी के लाभ और हानियाँ

लाभ :

1. त्वरित राहत : एलोपैथिक दवाएं बहुत तेजी से असर करती हैं, जो आपातकालीन स्थिति में जीवन रक्षक होती हैं।

2. वैज्ञानिक प्रमाण : ये दवाएं कड़े वैज्ञानिक परीक्षणों और क्लिनिकल ट्रायल से गुजरती हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता और खुराक सटीक होती है।

3. उपलब्धता : ये आधुनिक दवाएं फार्मेसी पर आसानी से उपलब्ध हैं और इनका उपयोग करना (जैसे गोली निगलना) सरल है।

हानियाँ :

1. दुष्प्रभाव : आधुनिक दवाओं के अक्सर कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स होते हैं, जैसे पेट में जलन, एलर्जी या लंबे समय तक उपयोग से अंगों पर प्रभाव।

2. लक्षणों का उपचार : अक्सर एलोपैथी केवल बीमारी के लक्षणों को दबाती है, जबकि आयुर्वेद जड़ से इलाज करने पर ध्यान केंद्रित करता है।

3. महंगा उपचार : जटिल बीमारियों के लिए आधुनिक चिकित्सा और सर्जरी काफी खर्चीली हो सकती है।

33. () (i) भारत सरकार ने आर्थिक विकास के प्रारंभिक वर्षों में औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की अधिक भूमिका पर जोर दिया। अपने उत्तर के समर्थन में कारण देते हुए इस कथन को सिद्ध कीजिए।

उत्तर- भारत सरकार ने 1947 में स्वतंत्रता के बाद अपनी प्रारंभिक पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक क्षेत्र  को "अर्थव्यवस्था के ऊंचे शिखर" के रूप में चुना। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक थे।

इस कथन को सिद्ध करने वाले प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1. निजी क्षेत्र के पास पूंजी का अभाव- स्वतंत्रता के समय भारतीय निजी उद्यमियों के पास भारी उद्योगों (जैसे लोहा और इस्पात, तेल शोधन, भारी मशीनरी) में निवेश करने के लिए आवश्यक विशाल पूंजी नहीं थी। इन उद्योगों में निवेश की वापसी की अवधि भी बहुत लंबी थी, जिसके कारण निजी क्षेत्र निवेश करने से कतराता था।

2. बाजार की मांग में कमी- आजादी के समय भारतीय आबादी की क्रय शक्ति बहुत कम थी। निजी क्षेत्र केवल वहीं निवेश करना चाहता था जहाँ उसे लाभ दिखे। निवेश के चक्र को गति देने और मांग पैदा करने के लिए सरकार को खुद निवेश की जिम्मेदारी लेनी पड़ी।

3. संतुलित क्षेत्रीय विकास - सरकार का उद्देश्य केवल विकास करना ही नहीं, बल्कि पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना भी था। निजी उद्यमी अक्सर औद्योगिक रूप से विकसित क्षेत्रों (जैसे बंदरगाहों के पास) में कारखाने लगाना पसंद करते थे। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां (PSUs) पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित कीं ताकि वहां रोजगार और बुनियादी ढांचा विकसित हो सके।

4. लोक कल्याण और समाजवाद का लक्ष्य- स्वतंत्रता के बाद भारत ने समाजवादी स्वरूप की अर्थव्यवस्था को अपनाया। इसका उद्देश्य धन को कुछ हाथों में केंद्रित होने से रोकना था। सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं का लाभ आम जनता तक सस्ती दरों पर पहुँचे।

5. बुनियादी ढांचे का निर्माण- किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए बिजली, परिवहन, संचार और भारी उद्योग आधारशिला होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र ने इन क्षेत्रों में निवेश करके वह आधार तैयार किया जिस पर बाद में निजी क्षेत्र भी विकसित हो सका।

(ii) "हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन पारिस्थितिक आधार पर इसकी आलोचना की गई।" - टिप्पणी।

उत्तर- "हरित क्रांति" भारत के कृषि इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। इसने 1960 के दशक के मध्य में भूखमरी के कगार पर खड़े भारत को खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया, लेकिन इसकी सफलता के साथ-साथ कई गंभीर पारिस्थितिक चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं।

इस कथन की व्याख्या निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है:

A. खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता (सकारात्मक पक्ष)

1. उत्पादन में भारी वृद्धि : उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYV seeds) के कारण गेहूँ और चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई।

2. आयात पर निर्भरता समाप्त : भारत 'शिप-टू-माउथ' (विदेशों से अनाज आयात करने वाली) स्थिति से निकलकर एक अनाज निर्यातक देश बन गया।

3. बफर स्टॉक : सरकार के पास आपात स्थिति के लिए पर्याप्त अनाज का भंडार जमा होना संभव हुआ।

b. पारिस्थितिक आधार पर आलोचना (नकारात्मक पक्ष)

हालाँकि उत्पादन बढ़ा, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव काफी चिंताजनक रहे हैं:

1. भूजल स्तर में गिरावट : HYV फसलों को बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में ट्यूबवेलों के अत्यधिक उपयोग से भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है।

2. मिट्टी की उर्वरता में कमी : रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के निरंतर उपयोग से मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्व नष्ट हो गए हैं और मिट्टी लवणीय या अम्लीय हो गई है।

3. जैव विविधता का ह्रास : हरित क्रांति ने केवल गेहूँ और चावल जैसी कुछ चुनिंदा फसलों पर जोर दिया। इससे दालों, तिलहन और मोटे अनाजों की खेती कम हो गई, जिससे फसल विविधता कम हो गई।

4. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ : कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से ये रसायन खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर गए हैं, जिससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ बढ़ रही हैं (जैसे पंजाब में 'कैंसर ट्रेन' का मुद्दा)।

5. पारिस्थितिक असंतुलन : कीटनाशकों ने हानिकारक कीटों के साथ-साथ मित्र कीटों (जैसे मधुमक्खियाँ और केंचुए) को भी खत्म कर दिया, जिससे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ गया।

या

(ख) (i) "सार्वजनिक क्षेत्र के वे उपक्रम जो लाभ कमा रहे हैं, उनका निजीकरण किया जाना चाहिए।" क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण बताइए।

उत्तर- निजीकरण के पक्ष में तर्क (सहमति के कारण)

1. सरकारी राजस्व में वृद्धि- लाभ में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण से सरकार को बड़ी मात्रा में धन प्राप्त होता है, जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब कल्याण जैसी योजनाओं में लगाया जा सकता है।

2. कार्यकुशलता में सुधार- निजी क्षेत्र में प्रबंधन अधिक दक्ष, प्रतिस्पर्धात्मक और परिणामोन्मुख होता है, जिससे उत्पादन और सेवा की गुणवत्ता बढ़ती है।

3. सरकारी बोझ में कमी- निजीकरण से सरकार का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कम होता है और वह नीति-निर्माण तथा नियमन पर अधिक ध्यान दे सकती है।

निजीकरण के विरोध में तर्क (असहमति के कारण)

1. नियमित आय का स्रोत समाप्त होना- लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रम सरकार के लिए स्थायी आय का स्रोत होते हैं। इनके निजीकरण से सरकार भविष्य की आय खो सकती है।

2. सामाजिक उद्देश्य प्रभावित होना- सार्वजनिक उपक्रम केवल लाभ नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, सस्ती सेवाएँ और सामाजिक कल्याण का उद्देश्य भी पूरा करते हैं। निजी क्षेत्र इन उद्देश्यों को प्राथमिकता नहीं देता।

3. एकाधिकार और मूल्यवृद्धि का खतरा- निजीकरण से कुछ क्षेत्रों में निजी एकाधिकार बन सकता है, जिससे उपभोक्ताओं को महँगी सेवाएँ मिल सकती हैं।

4. राष्ट्रीय एवं रणनीतिक हित- ऊर्जा, रक्षा, परिवहन जैसे क्षेत्रों में लाभ में चल रहे उपक्रमों का निजीकरण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध हो सकता है।

निष्कर्ष- अतः यह कहना कि लाभ कमा रहे सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण किया जाना चाहिए, उचित नहीं है। नीति-निर्माताओं को चयनात्मक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसमें केवल उन उपक्रमों का निजीकरण हो जो रणनीतिक रूप से कम महत्त्वपूर्ण हों, जबकि सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व वाले लाभकारी उपक्रम सार्वजनिक क्षेत्र में बने रहें।

(ii) वैश्वीकरण के कारण भारत में आउटसोर्सिंग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। क्या यह प्रवृत्ति पूरी तरह से लाभकारी है या श्रम के अनौपचारिकीकरण में वृद्धि किसी देश के विकास के लिए हानिकारक परिणाम साबित हुई है?

उत्तर- वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप भारत में आउटसोर्सिंग (Outsourcing) में तीव्र वृद्धि हुई है, विशेषकर आईटी, बीपीओ, केपीओ, कॉल सेंटर, लॉजिस्टिक्स तथा विनिर्माण सेवाओं में। यह प्रवृत्ति आंशिक रूप से लाभकारी रही है, लेकिन इसके साथ श्रम के अनौपचारिकीकरण (Informalisation of Labour) में हुई वृद्धि ने कुछ गंभीर और हानिकारक परिणाम भी उत्पन्न किए हैं। अतः इसे पूरी तरह लाभकारी नहीं कहा जा सकता।

आउटसोर्सिंग के लाभ

1. रोजगार के नए अवसर- आउटसोर्सिंग से भारत में बड़ी संख्या में रोजगार सृजित हुए, विशेषकर शहरी क्षेत्रों के युवाओं के लिए। इससे बेरोजगारी कम करने में सहायता मिली।

2. विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि- आईटी और सेवा क्षेत्र में आउटसोर्सिंग के कारण भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई, जिससे भुगतान संतुलन मजबूत हुआ।

3. कौशल विकास और तकनीकी उन्नयन- वैश्विक कंपनियों के साथ काम करने से भारतीय श्रमिकों में तकनीकी कौशल, संचार क्षमता और प्रबंधन दक्षता का विकास हुआ।

4. आर्थिक वृद्धि को गति- सेवा क्षेत्र के विस्तार ने भारत की जीडीपी वृद्धि दर को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

श्रम के अनौपचारिकीकरण के हानिकारक परिणाम

1. रोजगार की असुरक्षा- आउटसोर्सिंग से जुड़े अधिकांश रोजगार ठेका आधारित, अस्थायी और अनौपचारिक होते हैं, जिनमें नौकरी की सुरक्षा नहीं होती।

2. सामाजिक सुरक्षा का अभाव- अनौपचारिक श्रमिकों को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि और अन्य श्रम लाभ नहीं मिलते, जिससे उनका सामाजिक-आर्थिक जीवन असुरक्षित हो जाता है।

3. मजदूरी पर दबाव- लागत कम करने के उद्देश्य से कंपनियाँ कम वेतन पर श्रमिकों को नियुक्त करती हैं, जिससे श्रम का शोषण बढ़ता है।

4. श्रमिक अधिकारों का कमजोर होना- अनौपचारिकीकरण से ट्रेड यूनियनों की भूमिका कमजोर होती है और श्रमिक अपनी आवाज प्रभावी ढंग से नहीं उठा पाते।

5. असमान विकास- आउटसोर्सिंग के लाभ मुख्यतः शहरी और शिक्षित वर्ग तक सीमित रह जाते हैं, जिससे सामाजिक और क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ती हैं।

निष्कर्ष- वैश्वीकरण के कारण भारत में आउटसोर्सिंग ने आर्थिक विकास, रोजगार और विदेशी आय के अवसर अवश्य बढ़ाए हैं, लेकिन इसके साथ-साथ श्रम के अनौपचारिकीकरण में वृद्धि ने रोजगार की गुणवत्ता, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों को कमजोर किया है।

अतः यह प्रवृत्ति पूरी तरह लाभकारी नहीं कही जा सकती। किसी भी देश के सतत और समावेशी विकास के लिए आवश्यक है कि आउटसोर्सिंग के साथ-साथ श्रम कानूनों का सुदृढ़ क्रियान्वयन, सामाजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण रोजगार सुनिश्चित किया जाए।

34. केस स्टडी को ध्यानपूर्वक पढ़ें और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ कामकाजी आयु वर्ग की आबादी काफी अधिक है। हालांकि, विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवा और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई उद्योग कुशल श्रमिकों की कमी का सामना कर रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय स्नातकों में से लगभग 60% आधुनिक रोजगार बाजार में रोजगार के लिए अनुपयुक्त हैं, क्योंकि उनके पास मौजूद कौशल और नियोक्ताओं द्वारा मांगे गए कौशल में अंतर है।

उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल क्षेत्र में, कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों के रखरखाव और स्वचालन में कुशल तकनीशियनों की तलाश कर रही हैं, लेकिन उपलब्ध अधिकांश कर्मचारी केवल पारंपरिक यांत्रिक प्रणालियों में प्रशिक्षित हैं। इसी प्रकार, सेवा क्षेत्र में नियोक्ताओं को अक्सर पर्याप्त डिजिटल और संचार कौशल वाले कर्मचारियों को खोजने में कठिनाई होती है।

वहीं दूसरी ओर, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में उचित प्रशिक्षण संस्थानों की कमी है, जिसके कारण रोजगार के अवसरों में क्षेत्रीय असमानताएँ उत्पन्न होती हैं। सरकार ने इस अंतर को पाटने के लिए स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसे कई कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजन सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना अभी भी एक चुनौती है।

(i) केस स्टडी में उजागर किए गए आर्थिक मुद्दे की पहचान करें और रोजगार की उपलब्धता पर इसके प्रभावों पर चर्चा करें।

उत्तर- केस स्टडी में मुख्य आर्थिक समस्या कौशल-असंगति और कौशल-अभाव की है। अर्थात् शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रणाली से निकलने वाले श्रमिकों के कौशल और उद्योगों द्वारा माँगे जा रहे आधुनिक कौशलों के बीच स्पष्ट अंतर है।

रोजगार की उपलब्धता पर प्रभाव:

1. बेरोजगारी और अल्प-रोजगार में वृद्धि : स्नातक डिग्री होने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार-योग्य नहीं हैं।

2. उद्योगों में उत्पादन बाधा : विनिर्माण (विशेषकर ईवी और स्वचालन), स्वास्थ्य और आईटी जैसे क्षेत्रों में कुशल श्रमिक न मिलने से विस्तार प्रभावित होता है।

3. क्षेत्रीय असमानताएँ : ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रशिक्षण संस्थानों की कमी से स्थानीय रोजगार अवसर सीमित रहते हैं।

4. निम्न उत्पादकता : आवश्यक डिजिटल, संचार और तकनीकी कौशलों की कमी से श्रम उत्पादकता घटती है।

(ii) भारतीय अर्थव्यवस्था में इस समस्या को कम करने में मदद करने वाले किन्हीं दो नीतिगत उपायों का सुझाव दीजिए।

उत्तर- समस्या को कम करने के लिए दो नीतिगत उपाय

1. उद्योग-सम्बद्ध प्रशिक्षण : पाठ्यक्रमों को उद्योग की वर्तमान व भविष्य की जरूरतों (ईवी, स्वचालन, एआई, डिजिटल कौशल) के अनुरूप नियमित रूप से अद्यतन किया जाए; इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग को बढ़ावा दिया जाए।

2. ग्रामीण/अर्ध-शहरी कौशल अवसंरचना का विस्तार : स्थानीय कौशल केंद्र, मोबाइल ट्रेनिंग यूनिट्स, और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, ताकि क्षेत्रीय असमानताएँ कम हों।

(iii) समस्या के समाधान के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर प्रकाश डालें।

उत्तर- सरकार द्वारा उठाए गए कदम

1. स्किल इंडिया मिशन : युवाओं को उद्योग-प्रासंगिक कौशल प्रदान करने के लिए व्यापक प्रशिक्षण पहल।

2. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना : अल्पकालिक, प्रमाणित प्रशिक्षण के माध्यम से रोजगार-योग्यता बढ़ाना।

3. अप्रेंटिसशिप और आईटीआई सुदृढ़ीकरण : कार्य-आधारित सीख को बढ़ावा और तकनीकी संस्थानों का आधुनिकीकरण।

4. डिजिटल स्किलिंग पर जोर : आईटी, संचार और उभरती तकनीकों में प्रशिक्षण के लिए ऑनलाइन/हाइब्रिड मॉड्यूल।

निष्कर्ष : कौशल-असंगति रोजगार सृजन में बड़ी बाधा है। उद्योग-सम्बद्ध प्रशिक्षण, क्षेत्रीय संतुलन और सरकार की लक्षित योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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