Class 11 Economics 1. परिचय INTRODUCTION

Class 11 Economics 1. परिचय INTRODUCTION

 

Class 11 Economics 1. परिचय INTRODUCTION

1. परिचय INTRODUCTION

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Q. 1. निम्नलिखित कथन सही हैं अथवा गलत ? इन्हें तदनुसार चिन्हित करें:

(क) साख्यिकी केवल मात्रात्मक आँकड़ों का अध्ययन करती है।

Ans. गलत

(ख) सांख्यिकी आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करती है।

Ans. सही

(ग) आंकड़ों के बिना अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का कोई उपयोग नहीं है।

Ans. सही।

Q.2. उन क्रिया-कलापों की सूची बनाएँ जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं। क्या ये ये आर्थिक क्रिया-कलाप हैं?

Ans. उन क्रिया-कलापों की सूची जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग हैं ये हैं

(i) आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए वस्तुएँ खरीदना।

(ii) लाभ कमाने के लिए वस्तुएँ बेचना।

(iii) लाभ अर्जित करने के लिए वस्तुओं का उत्पादन करना।

(iv) किसी अन्य आदमी के लिए काम करना एवं बदले में भुगतान लेना। लेना।

(v) भुगतान पाने के लिए दूसरे व्यक्ति को सेवा प्रदान करना आदि।

हाँ, ये आर्थिक क्रियाएँ हैं क्योंकि ये मौद्रिक लाभ के उद्देश्य से की जाती हैं।

Q.3. सरकार और नीतिनिर्माता आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त नीतियों के निर्माण के लिए सांख्यकीय आँकड़ों का प्रयोग करते हैं। दो उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए।

Ans. पुराने समय से ही सरकार के लिए सांख्यिकी बहुत उपयोगी रही है। उस समय तो केवल राजा ही सांख्यिकी का प्रयोग करता था। अतः इसे राजनीतिक विज्ञान कहा जाता था। समय परिवर्तन के साथ राजतंत्र या राजव्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए, परन्तु सरकार के लिए किसी भी तंत्र में उपयोगिता कम नहीं हुई। इसके विपरीत, राज्य के कार्यों में इसकी भागीदारी बढ़ती चली गई। वर्तमान में निम्नलिखित कामों में सांख्यिकी का प्रयोग किया जाता है-

(i) उत्पादन, उपभोग, व्यापार, जनसंख्या, आय, बचत, निवेश आदि की विस्तृत जानकारी हासिल करने के लिए सांख्यिकी का प्रयोग किया जाता है।

(ii) सार्वजनिक बजट बनाने में सरकार अनुमानित आय व व्यय का लेखा-जोखा तैयार करने के लिए आँकड़ों का प्रयोग करती है।

(iii) कर प्रणाली बनाने, लागू करने एवं मूल्याकन करने में सांख्यिकीय तथ्यों का प्रयोग करती है।

(iv) औद्योगिक नीति की रचना आँकड़ों की अनुपस्थिति में नहीं बनायी जा सकती है।

(v) उपयुक्त आयात-निर्यात नीति, विदेशी विनिमय दर नीति के आँकड़ों की जरूरत पड़ती है।

(vi) विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों की जानकारी रखने के लिए सांख्यिकी का प्रयोग बहुत आवश्यक होता है।

(vii) नागरिक सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी, सफाई आदि की उपलब्धता एवं आवश्यकता संबंधी सूचनाएँ सरकार के लिए बहुत जरूरी होती हैं।

(viii) आर्थिक नियोजन के उद्देश्य निर्धारित करने, क्रियान्वयन व मूल्यांकन हेतु साख्यिकी का प्रयोग आवश्यक होता है।

(ix) देश में सुरक्षा का पुख्ता इन्तेजाम करने के लिए पड़ोसी देशों के सुरक्षा आँकड़ों के आधार पर अपनी आवश्यकताएँ तय की जाती है आदि।

Q. 4. आपकी आवश्यकताएँ असीमित हैं तथा उनकी पूर्ति करने के लिए आपके पास संसाधन सीमित हैं। दो उदाहरणों द्वारा इसकी व्याख्या करें।

Ans. वास्तविक जीवन में हमारी आवश्यकताएँ असीमित हैं और उन्हें संतुष्ट करने वाले संसाधन सीमित हैं। रेलवे की बुकिंग खिड़की पर लम्बी लाइन, भीड़ से युक्त यस एवं रेल आवश्यक वस्तुओं की कमी कोई भी देख सकता है। चीजों की सीमित उपलव्यता के कारण ही दुर्लभता की समस्या का सामना करना पड़ता है। संसायनों के वैकल्पिक प्रयोग के कारण भी आर्थिक समस्या पैदा होती है।

Q. 5. उन आवश्यकताओं का चुनाव आप कैसे करेंगे, जिनकी आप पूर्ति करना चाहेंगे ?

Ans. जिन आवश्यकताओं को हम संतुष्ट करना चाहते हैं, उनका चयन निम्न तथ्यों के आधार पर करेंगे-

(i) विभिन्न आवश्यकताओं की तीव्रता अधिक तीव्रता बाली आवश्यकताओं को पहले संतुष्ट करने के लिए चुनाव करेंगे।

(ii) आवश्यकताओं को संतुष्ट करने वाले संसाधनों की उपलब्धता एवं उनके वैकल्पिक प्रयोगों के आधार पर चयन करेंगे।

उपरोक्त तथ्यों का प्रयोग इस प्रकार से किया जायेगा ताकि हमें संतुष्टि का अधिकतम स्तर प्राप्त हो जाए।

Q. 6. आप अर्थशास्त्र का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? कारण बताइए ।

Ans. हम अर्थशास्त्र का अध्ययन निम्नांकित कारणों से करना चाहते हैं-

(i) यह उपभोग का अध्ययन है।

(ii) इसमें उत्पादन का अध्ययन किया जाता है।

(iii) अर्थशास्त्र में वितरण का भी अध्ययन है।

(iv) अर्थशास्त्र में अर्थव्यवस्था की कुछ मूलभूत समस्याओं का भी अध्ययन होता है। जैसे-

(a) समाज में विभिन्न आय वर्गों की जानकारी।

(b) साक्षरता का स्तर।

(c) देश में रोजगार का स्तर।

(d) देश के लिए सुनामी, भूकंप आदि जैसी चुनौतियाँ आदि।

इस प्रकार, अर्थशास्त्र के अध्ययन से हम जीवन के सामान्य कारोबार का अध्ययन करते है और इसे प्रभावित करने वाले कारकों का भी।

Q. 7. सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होतीं ! टिप्पणी कीजिए ।

Ans. सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं हैं यह कथन बिल्कुल सही है। इनका प्रयोग बिना सोचे-समझे कतई नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से कई बार गलत निर्णय ले लिए जाते हैं। ऐसे निर्णयों से अनर्थ हो जाता है। ऐसे आँकड़ों को गलत ढंग से सचालित करने या मूल मान्यताओं पर ध्यान न देने या आँकड़ों के दुरुपयोग के कारण होता है। जैसे-

माना एक सांख्यिकी का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति अपने चार सदस्यीय परिवार के साथ भ्रमण पर जाता है। रास्ते में उन्हें एक गहरा नाला पार करना पड़ता है। परिवार के मुखिया को उस नाले की औसत गहराई मालूम थी। उसने अपने परिवार के लोगों की औसत ऊँचाई ज्ञात की। परिवार की औसत ऊँचाई का मान नाले की औसत गहराई से ज्यादा निकला। अतः उसने प्रत्येक सदस्य को स्वतः नाला पार करने की अनुमति प्रदान कर दी। उसके दोनों बच्चे नाले में डूब गए और उनकी मौत हो गई। यह घटना गलत निष्कर्ष का परिणाम थी। वह यह भूल गया था कि नाला पार करने में औसत से काम नहीं चलेगा। नाला पार करने में तो प्रत्येक व्यक्ति का नाले की वास्तविक अलग-अलग गहराइयों से गुजरना पड़ेगा।

इसके लिए दूसरा उदाहरण भी दे सकते हैं। बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए सेना को किसी स्थान पर तैनात किया गया। बाद में सेना के एक ऐसे अधिकारी को जिसे सांख्यिकी का थोड़ा ज्ञान था, रिपोर्ट पेश करने को कहा गया। उसने आँकड़े एकत्र किए और यह पाया कि अन्य स्थानों की तुलना में बाढ़ से वहाँ ज्यादा लोग मरे जहाँ सैनिक तैनात किए गए थे। अतः उसने सैनिकों को सजा देने की सिफारिश कर डाली। परन्तु उसने यह हकीकत नजरअन्दाज कर दी कि बाढ़ का प्रकोप केवल उस स्थान पर ज्यादा था जहाँ सेना तैनात की गई थी बजाय उन स्थानों के, जहाँ सेना को तैनात नहीं किया गया था।

अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. एल्फ्रेड मार्शल के अनुसार अर्थशास्त्र क्या है ?

Ans. अल्फ्रेड मार्शल के अनुसार अर्थशास्त्र मानव जीवन के सामान्य कारोवार का अध्ययन है।

Q. 2. उपभोक्ता की परिभाषा लिखिए।

Ans. वह व्यक्ति जो आवश्यकता/आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए वस्तु खरीदता है, उपभोक्ता कहलाता है

Q. 3. उत्पादक का अर्थ लिखिए।

Ans. उत्पादक से अभिप्राय उस व्यक्ति से है जो लाभ कमाने के लिए वस्तुओं का उत्पाद्वन करता है।

Q. 4. आर्थिक क्रियाओं का अर्थ लिखिए ।

Ans. वे क्रियाकलाप जो मौद्रिक फायदे के लिए किए जाते हैं, आर्थिक क्रियाकलाप कहलाते हैं।

Q. 5. आर्थिक समस्याओं का मूल्य कारण बताइए ।

Ans. संसाधनों की सीमितता, आर्थिक समस्याओं का मूल कारण होती है।

Q. 6. अर्थशास्त्र का पारंपरिक वर्गीकरण लिखिए ।

Ans. अर्थशास्त्र को पारपरिक तरीके से निम्नांकित में वर्गीकृत किया जाता है-

(i) उपभोग, (ii) उत्पादन, एवं (iii) वितरण।

Q. 7. व्यावहारिक सांख्यिकी का अर्थ बताइए ।

Ans. व्यावहारिक सांख्यिकी उन सभी विषयों और तकनीकों का अध्ययन है जिनका प्रयोग व्यावहारिक जीवन में प्रयोग होने वाली विशेष समस्याओं के समाधान में किया जाता है, जैसे-जनसंख्या, राष्ट्रीय आय आदि।

Q. 8. आर्थिक आयोजन की परिभाषा दीजिए।

Ans. किसी अर्थव्यवस्था या सरकार द्वारा आर्थिक क्रियाकलापों के क्रमबद्ध निर्धारण को आर्थिक आयोजन कहते हैं।

Q. 9. सांख्यिकी कला है अथवा विज्ञान अथवा दोनों, बताइए ।

Ans. सांख्यिकी विज्ञान एवं कला दोनों है।

Q. 10. ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार सांख्यिकी शब्द का प्रयोग यदि एकवचन में होता है तो इसका क्या अर्थ है ?

Ans. आँकड़ों को एकत्रित करने या उनका प्रयोग करने का विज्ञान।

Q. 11. ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार सांख्यिकी शब्द का प्रयोग यदि बहुवचन में किया जाये तो इसका क्या अर्थ है ?

Ans. क्रमबद्ध एकत्रित सख्यात्मक तथ्य।

Q. 12. रैण्डम हाउस डिक्शनरी के अनुसार सांख्यिकी शब्द का प्रयोग यदि बहुवचन में हो तो इसका क्या अर्थ है ?

Ans. सांख्यिकी का अर्थ संख्यात्मक तथ्यो तथा आँकड़ों से लगाया जाता है।

Q. 13. सांख्यिकी आँकड़ों के विश्लेषण की क्या विधियाँ हो सकती हैं ?

Ans. विवरणात्मक या प्रायिकतात्मक।

Q. 14. जिन चरों को संख्याओं द्वारा मापा जाता है वे क्या कहलाते हैं?

Ans. मात्रात्मक आँकड़े।

Q. 15. अर्थशास्त्र में एकल समीकरण निदर्श का क्या अर्थ है ?

Ans. अर्थशास्त्र में एकल समीकरण निदर्श क्रेता, विक्रेता और निवेशकत्र्ता आदि के व्यवहारों का वर्णन करते हैं। ये यथातथ्य समीकरण नहीं होते हैं। इनके Exact समीकरण न होने का कारण छोड़े गए चर तथा मापन की त्रुटियाँ हैं।

Q. 16. बहु समीकरण निदर्श का अर्थ बताएँ।

Ans. बहु समीकरण निदर्श बाजार की संरचना, अर्थशास्त्र की संरधना का वर्णन है। अर्थव्यवस्था या बाजार की संरचना के वर्णन के लिए विभिन्न क्षेत्रकों या घटकों के निदर्श उपलव्ध होते हैं।

Q. 17. सांख्यिकी परिणामों के विश्लेषण तथा प्रतिपादन में क्या ध्यान रखना चाहिए ?

Ans. सांख्यिकी विश्लेषण में आँकड़ों की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण स्थान है। त्रुटियों की संभावना तभी होती है जब आँकड़े या तो अपर्याप्त होते हैं, या आपस में तुलना करने के लायक न हो।

Q. 18. सांख्यिकीय परिणामों में गलती होने की संभावना का कारण बताएँ ।

Ans. आँकड़ों के एकत्रीकरण में परिभाषाओं तथा अवधारणाओं में अस्पष्टता के कारण गलत परिणामों पर पहुँचने की संभावना रहती है।

Q. 19. सांख्यिकीय भ्रांतियाँ क्यों उत्पन्न होती हैं ?

Ans. आँकड़ों को गलत तरीके से संचालित करने या मूल मान्यताओं पर ध्यान न देने या कुछ सूचको का दुरूपयोग करने से साख्यिकीय भ्रऑतियाँ उत्पन्न होती है।

Q. 20. प्रयोग-सिद्ध विश्लेषण या विज्ञान से क्या तात्पर्य है ?

Ans. प्रयोग-सिद्ध विश्लेषण या विज्ञान प्रयोग-सिद्ध विश्लेषण वह विश्लेषण है जिसमें नियमो की रचना तथा उसकी पुष्टि अनुभवों, प्रयोगों तथा आँकड़ों के आधार पर होती है।

Q. 21. सांख्यिकीय विधि क्या है ?

Ans. सांख्यिकीय विधि वह प्रविधि है जिसके द्वारा आँकड़ों का संकलन, उनका वर्गीकरण व सारणीयन, संक्षेपण, विश्लेषण और निर्वचन किया जाता है।

Q. 22. गुणात्मक आंकड़ों को किस प्रकार दर्शाया जाता है ?

Ans. क्रोटियों या श्रेणियों में।

Q. 23. सांख्यिकी का प्रयोग अर्थशास्त्री किसमें करते हैं ?

Ans. उत्पादन और उपभोग का विश्लेषण करने में।

Q. 24. सांख्यिकी विधियों का दुरूपयोग होने से क्या परिणाम निकलता है ?

Ans. सांख्यिकी निष्कर्ष का अशुद्ध होना।

Q. 25. मात्रात्मक आँकड़े क्या हैं ?

Ans. जब चरों को संख्याओं द्वारा मापा जाता है तो उन्हें मात्रात्मक आँकड़े कहते हैं।

Q. 26. स्टेटिस्टिक्स (Statistics) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के किस शब्द में हुई ?

Ans. स्टेटस (Status) ।

Q. 27. स्टेटिस्टिक्स (Statistics) शब्द की उत्पत्ति इटेलियन भाषा के किस शब्द से हुई ?

Ans. स्टेटिस्टा (Statista)

Q. 28. सांख्यिकी के जन्मदाता का क्या नाम है ?

Ans. ग्रीटफ्रायड एकेनवाल।

Q. 29. सांख्यिकी का एकवचन के रूप में अर्थ बताइए ।

Ans. एकवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ सांख्यिकीय विधियों (Statistical meth-ods) से है।

Q. 30. बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ लिखिए ।

Ans. बहुवचन के रूप में अंकों में व्यक्त की गयी सूचना अथवा आँकड़ों को सांख्यिकी कहते हैं।

Q. 31. सांख्यिकी की एक महत्वपूर्ण सीमा (Limitation) बताइए ।

Ans. सांख्यिकी केवल तथ्यों के समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं।

Q. 32. सांख्यिकी की परिभाषा लिखें ।

Ans. सांख्यिकी तथ्यों के संकलन, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन का विवेचन करती है।

Q. 33. 'तथ्यों के निर्वचन' का अर्थ बताइए ।

Ans. इसका अभिप्राय प्रस्तुत तथ्यों के निष्पक्ष एवं विवेकशील निष्कपों से है।

Q. 34. दो सांख्यिकीय विधियाँ लिखें ।

Ans.

(i) आँकड़ों का संकलन और

(ii) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण।

Q. 35. सांख्यिकीय उपकरण क्या होते हैं ?

Ans. सांख्यिकीय उपकरण वे उपकरण है जिनके द्वारा सांख्यिकीय विधियों को लागू किया जाता है।

Q. 36. सांख्यिकी का आधुनिक अर्थ क्या है ?

Ans. आधुनिक अर्थ में सांख्यिकी अनिश्चितता की परिस्थितियों में बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने की विधियों का समूह है।

Q. 37. आर्थिक विश्लेषण में प्रयुक्त होनेवाली सांख्यिकी विधियों को लिखें।

Ans. समकों का संकलन, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. सांख्यिकी क्या है?

Ans. ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार, "सांख्यिकी शब्द के दो अर्थ हैं- (i) बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ है, व्यवस्थित ढंग से एकत्रित किए गए संख्यात्मक तथ्य जैसे-जनगणना सम्बन्धी आँकड़े तथा (ii) एकवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ है आँकड़ों को एकत्रित करने, उनके वर्गीकरण तथा प्रयोग करने सम्बन्धी विज्ञान।"

Q. 2. सांख्यिकी की एक उचित परिभाषा दीजिए ।

Ans. सांख्यिकी (आँकड़ों के रूप में) तथ्यों के वे संख्यात्मक विवरण हैं जिनका विश्लेषण तथा निर्वचन किया जाता है और सांख्यिकी (विज्ञान के रूप में) वह विषय है जो संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन की विधियों का अध्ययन करता है।

Q.3. बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का क्या अर्थ है ?

Or, हॉरेस सेक्रिस्ट की सांख्यिकी की समंकों के रूप में परिभाषा दें।

Ans. बहुवचन के रूप सांख्यिकी का अर्थ अंको के रूप में व्यक्त की गई सूचना अथवा आँकड़ों से होता है। हॉरेस सेक्रिस्ट के अनुसार, "समक तथ्यों के उन समूहों को कहते हैं जो पर्याप्त सीमा तक अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं, जो अंकों में प्रकट किये जाते हैं, यथोचित शुद्धता के अनुसार जिनका आगणन अथवा अनुमान लगाया जाता है, जिन्हें किसी पूर्व-निश्चित उद्देश्य के लिए एक सुव्यवस्थित रीति द्वारा एकत्र किया जाता है तथा जिन्हें तुलना के लिए एक-दूसरे के सम्बन्ध मे रखा जा सकता है।"

Q. 4. एकवचन के रूप में सांख्यिकी का क्या अर्थ है ?

Or, सांख्यिकी की एकवचन अथवा विज्ञान के रूप में कोई परिभाषा दें।

Ans. एकवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ सांख्यिकी विज्ञान से है। लॉविट (Lovitt) के शब्दों में, "सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्या संबंधी तथ्यों के संग्रहण, वर्गीकरण और सारणीकरण से सम्बन्ध रखता है ताकि वे घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए आधार-स्वरूप प्रयोग हो सकें।"

Q. 5. सांख्यिकी की प्रकृति का विवेचन करें।

Ans. सांख्यिकी एक विज्ञान है क्योंकि अन्य विज्ञानों की भाँति इसकी विधियाँ क्रमबद्ध एवं सुनिश्चित हैं। हालाँकि इस विज्ञान के नियम अन्य विज्ञानों की भाँति पूर्णतः सत्य नहीं हैं, किन्तु वे सुव्यवस्थित अध्ययन के आधार पर निश्चित किए जाते हैं। सांख्यिकी को हम विज्ञानों का विज्ञान भी कह सकते हैं। क्रॉक्सटन तथा काउडन का कथन है कि सांख्यिकी एक विज्ञान नहीं वैज्ञानिक विधि है जिसका उपयोग सभी विज्ञानों द्वारा अनुसंधान करने में किया जाता है। इस प्रकार सांख्यिकी स्वयं ही विज्ञान नहीं अन्य विज्ञानों का आधार भी है।

Q. 6. सांख्यिकीय विधियों का क्या अर्थ है ?

Ans. सांख्यिकीय विधियाँ वे विधियाँ हैं जिनका उपयोग एकत्रित समकों की जटिलता को कम करके इस योग्य बनाना है कि उनका विश्लेषण एवं तुलना करके उनसे निष्कर्ष निकाले जा सके। यूल एवं केण्डाल के शब्दों में, "साख्यिकीय रीतियो से अभिप्राय उन रीतियों से है जिनका प्रयोग अनेक कारणों से प्रभावित समंको की व्याख्या करने के लिए किया जाता है।"

Q. 7. सांख्यिकी के उद्गम एवं विकास का वर्णन कीजिए ।

Ans. सांख्यिकी का उद्गम लैटिन शब्द स्टेटस (status) अथवा इटली के शब्द स्टेटिस्टा (statista) अथवा जर्मनी के स्टेटिस्टीक (statistik) शब्दों से मानी जाती है। इन शब्दों का संबंध राजनीति से है। पुराने जमाने में राज्य के कार्यों के संचालन में सांख्यिकी का प्रयोग किया जाता था। राजा कर लगाने के लिए जनसंख्या, भूमि, आय और लोगों के धन के बारे में सूचनाएँ एकत्र करवाता था। अतः उस समय सांख्यिकी राजनीति विज्ञान माना जाता था।

समय गुजरने के साथ-साथ साख्यिकी का प्रयोग बढ़ने लगा। कुछ समय तक इसे अर्थशास्त्र की एक शाखा माना गया। थोड़े ही समय में सांख्यिकी का विकास एक स्वतन्त्र विषय के रूप में शुरू हो गया। गाल्टन, बाउले, फिशर आदि सांख्यिकीविदों की साख्यिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज सभी परिमाणात्मक विश्लेषणों में सांख्यिकी का प्रयोग किया जाता है। सांख्यिकी का प्रयोग प्रयोगात्मक एवं अप्रयोगात्मक दोनों प्रकार के विश्लेषणों में किया जाता है।

Q.8. एकवचन के रूप में सांख्यिकी व बहुवचन के रूप में सांख्यिकी में भेद कीजिए।

Ans. एकवचन के रूप में सांख्यिकी व बहुवचन के रूप में सांख्यिकी में भेद-

एकवचन के रूप में सांख्यिकी

बहुवचन के रूप में सांख्यिकी

1. सांख्यिकी एक विज्ञान है।

1. सांख्यिकी तथ्यों का समूह है।

2. यह क्रियात्मक होती है।

2. यह मात्रात्मक होती है।

3. यह विश्लेषण के लिए उपकरण है।

3. यह वर्णनात्मक है।

4. बिना आँकड़ों के विश्लेषण उपकरण अर्थ-हीन होते हैं।

4. विश्लेषणों के प्रयोग के अभाव में ज्यादा अर्थ नहीं होता है।

5. सांख्यिकी विधियाँ अव्यवस्थित आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण, गणना, निर्वचन आदि में सहायक होती हैं।

5. ये प्रायः अव्यवस्थित रूप में नहीं जाते हैं।

Q. 9. सांख्यिकी विधियों को बताइए ।

Ans. आँकड़ों के संकलन, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, निर्वचन, निष्कर्ष आदि के लिए अपनायी गई प्रक्रियाओं को सांख्यिकी विधियाँ कहते हैं। सांख्यिकीय विधियों में निम्नलिखित को शामिल करते हैं-

1. आँकड़ों का संकलन

2. आँकड़ों का संक्षिप्तीकरण- (a) आँकड़ों का वर्गीकरण, (b) सारणीयन

3. आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण

4. आंकड़ों का विश्लेषण-आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिए निम्न उपाय किए जाते हैं-

(a) केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप,

(b) अपकिरण की माप,

(c) सहसंबंध,

(d) सूचकांक।

Q. 10. सांख्यिकी के उद्देश्यों का वर्णन करें।

Ans. (i) अनुत्तन्यान क्षेत्र में सांख्यिकी विथियों का प्रयोग करना।

(ii) विभिन्न समस्याओं का विवेचनात्मक अध्ययन करना।

(iii) प्राप्त सामग्री से महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालना एवं पूर्वानुमान लगाना।

(iv) भूतकालीन एवं वर्तमान समकों को संकलित करके उन्हें काल श्रेणी के रूप में प्रस्तुत करना।

(v) प्राप्त, समंकों को इस प्रकार रखना कि वे तुलना के योग्य हों।

(vi) परिवर्तनों के कारणों एवं परिणामों का मूल्यांकन करना।

Q. 11. अर्थशास्त्र की आधुनिक परिभाषा लिखिए ।

Ans. अर्थशास्त्र की कोई एक परिभाषा नहीं है। सामान्य रूप में, अर्थशास्त्र वह अध्ययन है जो हमें यह बताता है कि व्यक्ति और समाज अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तथा समाज के विभिन्न व्यक्तियों व समूहों में उपभोग हेतु वितरित करने के लिए इसका चुनाव कैसे करें कि वैकल्पिक प्रयोग वाले अल्प संसाधनों का नियोजन विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में कैसे हो।

Q. 12. सांख्यिकी क्या करती है? संक्षेप में लिखिए।

Ans. (i) सांख्यिकी एक ऐसी युक्ति है जिसकी मदद से अर्थशास्त्री आर्थिक समस्या को समझ सकता है।

(ii) सांख्यिकी की मदद से अर्थशास्त्री आर्थिक तथ्यों को संविप्त एवं निश्चित रूप में दर्शा सकता है।

(iii) सांख्यिकी की मदद से आँकड़ों की बड़ी तादाद को संख्यात्मक रूप में प्रदर्शित कर सकता है।

(iv) विभिन्न आर्थिक कारकों में संबंध स्थापित करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।

(v) आयोजन एवं नीतियों के निर्माण में सांख्यिकी मदद करती है।

Q. 13. सांख्यिकी की विषय-सामग्री को संक्षेप में लिखें।

Ans. सांख्यिकी की विषय सामग्री से हमारा मतलब उन सभी यन्त्रों से है जिनका प्रयोग सांख्यिकी में होता है। इन्हें दो मुख्य वर्गों में इस प्रकार बाँटा जाता है-

1. सांख्यिकी विधियाँ- सांख्यिकीय विधियाँ वे पद्धतियाँ होती हैं जिनके द्वारा जटिल और संख्यात्मक तथ्यों का एकत्रीकरण तथा विश्लेषण किया जाता है। इनमें मुख्य विधियों हैं: ऑकड़ों का वर्गीकरण, सारणीयन, विश्लेषण, निर्वचन आदि।

2. व्यावहारिक सांख्यिकी- व्यावहारिक सांख्यिकी उन सभी विचियों और तकनीकों का अध्ययन होता है जिनका प्रयोग व्यावहारिक जीवन में प्रयोग होने वाली समस्याओं के हल करने में होता है, जैसे-जनसंख्या, राष्ट्रीय आय, औद्योगिक व कृषि उत्पादन आदि। इसे पुनः दो वनों में बाँटा जाता है-

(i) वर्णनात्मक व्यावहारिक सांख्यिकी- इसमें भूत और वर्तमान काल में एकत्रित तथ्यों का अध्ययन होता है जो कि ऐतिहासिक महत्व रखते हैं, जैसे काल मालाएँ औद्योगिक आँकड़े आदि।

(ii) वैज्ञानिक व्यावहारिक सांख्यिकी- इसमें आँकड़ों को किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के उद्देश्य से एकत्रित किया जाता है, जिसके आधार पर किसी विशेष सिद्धान्त का निर्माण किया जा सकता है।

Q. 14. सांख्यिकी की मुख्य सीमाएँ कौन-सी हैं ?

Ans. आधुनिक ढंग से सांख्यिकी ने एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है, परन्तु इस शास्त्र की कुछ सीमाएँ हैं जिनको ध्यान में रखकर इसका प्रयोग करना चाहिए। न्यूजहोम के अनुसार, सांख्यिकी अनुसंधान को एक बहुमूल्य साधन समझना चाहिए, परन्तु इसकी कुछ गम्भीर सीमाएँ होती हैं जिन्हें दूर किया जाना संभव नहीं होता है। ये सीमाएँ इस प्रकार हैं

(i) केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन।

(ii) केवल समूहों का अध्ययन।

(iii) सांख्यिकी का दुरुपयोग संभव है।

(iv) केवल विशेषज्ञों द्वारा प्रयोग।

(v) एकमात्र विधि नहीं है।

(vi) परिणाम केवल औसतन सत्य होते हैं।

(vii) सांख्यिकी साधन है, समाधान नहीं।

(viii) बिना सन्दर्भ के निष्कर्ष गलत हो सकते हैं।

Q. 15. "सांख्यिकी आँकड़े संख्यात्मक तथ्य होते हैं। किन्तु सभी संख्यात्मक तथ्य सांख्यिकी आँकड़े नहीं होते हैं।" स्पष्ट करें।

Ans. एक अकेली संख्या आँकड़े नहीं कहलाएगी, क्योंकि उससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अनेक तथ्यों से सम्बन्धित संख्याओं को सांख्यिकी कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी आपसी तुलना की जा सकती है तथा निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इसी प्रकार, एक वृत्त की परिधि तथा व्यास के अनुपात को सांख्यिकी नहीं कहा जाएगा। उदाहरण के लिए यह कहना कि हमारे कॉलेज में 1000 विद्यार्थी हैं, सांख्यिकी नहीं कहलाएगी, परन्तु यदि यह कहा जाए कि हमारे कॉलेज में बी.ए. में 300 विद्यार्थी हैं, बी. कॉम में 400 विद्यार्थी तथा बी.एस-सी में 300 विद्यार्थी हैं या भारत की जनसंख्या 1 अरब से ऊपर है, भारत के निर्यात 1,26,286 करोड़ रुपये के हैं, तो तथ्यों के इस समूह को सांख्यिकी कहा जाएगा। अतएव ये कहना ठीक है कि सभी सांख्यिकी को संख्या के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, परन्तु सभी संख्याएँ सांख्यिकी नहीं हैं। अतएव यह कहा जा सकता है कि सभी संख्यात्मक तथ्य आँकड़े नहीं होते।

Q. 16. सांख्यिकी तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए ।

Ans. सांख्यिकी तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध को निम्नलिखित आचारों पर स्पष्ट किया जा सकता है-

1. आर्थिक नियमों का प्रतिपादन तथा पुष्टिकरण समकों के विश्लेषण तथा निर्वचन द्वारा ही किया जाता है।

2. माँग का नियम, पूर्ति का नियम इत्यादि आर्थिक नियमों का विश्लेषण तथा व्याख्या संख्यात्मक तथ्यों के आधार पर ही की जाती है।

3. व्यावहारिक अर्थशास्त्र सम्बन्धित सभी समस्याओं, जैसे-जनसंख्या, बेरोजगारी की समस्या का विश्लेषण आँकड़ों के आधार पर ही किया जाता है।

अतः स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र में सांख्यिकी विधियों का प्रयोग बहुत अधिक किया जाता है।

Q. 17. व्यवसाय तथा वाणिज्य में सांख्यिकी का क्या महत्व है ?

Ans. उद्योग-धन्चों में तथा व्यापारिक क्षेत्र में एक उत्पादक व व्यापारी के लिए भी साख्यिकी का उतना ही महत्व है जितना एक योजना-निर्माता को योजना बनाते समय सांख्यिकी की आवश्यकता होती है। उत्पादक को अपनी वस्तु की लागत तथा लाभ का अनुमान लगाना पड़ता है ताकि वह अपने उत्पादन का स्तर व व्यापारिक नीतियों का निरूपण कुशलता से कर सके। एक कुशल व्यापारी बस्तु की माँग के प्रति सदैव जागरूक रहता है क्योंकि उसके उत्पादन का आकार बढ़ती है और घटती हुई माँग पर निर्भर करता है। माँग का अनुमान लगाने के लिए तथा औसत एव सीमांत लागत का निरूपण करने के लिए प्रायः उत्पादक भूतकाल की माँग तथा भविष्य में की जाने वाली माँग के अनुमान पर ही वर्तमान की कल्पना कर सकता है। इन सब बातों के लिए प्रतिक्षण समकों का प्रयोग करना पड़ता है। समक का प्रयोग, उत्पादन व व्यवसायी को जहाँ एक ओर पुरानी भूलों व गलत नीतियों के सुधारने में सहायक होता है वहीं दूसरी ओर उसे भविष्य के लिए निर्मित की जाने बाली नीतियों के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं। विशेषकर बीमा कम्पनियो, बैंकों तथा निर्माणकारी विभागों के लिए सांख्यिकी का अत्यधिक महत्व है। सट्टेबाजों का तो जीवन ही साख्यिकी पर निर्भर करता है।

Q. 18. प्रयोग सिद्ध तथा संख्यात्मक विश्लेषण से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में लिखें।

Ans. संख्यात्मक विश्लेषण- संख्यात्मक विश्लेषण से अभिप्राय किसी विषय का अध्ययन करने की वह विधि है जिसके द्वारा उसके विभिन्न पहलुओं का ज्ञान आँकड़ों के आधार पर किया जा सकता है। अर्थशास्त्र में प्रमुख आर्थिक क्रियाओं, जैसे उपभोग, उत्पादन, विनिमय, वितरण आदि से संबंधित आँकड़ों के आधार पर संख्यात्मक विश्लेषण किया जा सकता है। इस विश्लेषण के अन्तर्गत सबसे पहले किसी समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित किये जाते हैं। इसके बाद उनका वर्गीकरण तथा प्रस्तुतीकरण किया जा सकता है। इसके पश्चात् उनका विश्लेषण किया जाता है तथा निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

प्रयोग सिद्ध विश्लेषण यह विश्लेषण किसी विषय का अध्ययन करने की वह विधि है जिसमें हम ऐतिहासिक विवरण द्वारा यह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं कि जब कुछ तथ्यों में परिवर्तन हुआ था तो क्या परिणाम हुआ। जब हम वस्तुओं की कीमतों तथा उनकी विक्री से सम्बन्धित आँकड़े इकट्ठे करते हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अधिकतर स्थितियों में जब वस्तु की कीमत अधिक होगी तो माँग कम होगी और जब माँग अधिक होगी तो कीमत कम होगी। इनमें विपरीत सम्बन्ध होता है। अर्थशास्त्र जैसे सामाजिक शास्त्रों में, जहाँ प्रयोगशालाओं में प्रयोग करना संभव नहीं है, प्रयोग सिद्ध विश्लेषण द्वारा ही इन नियमों की रचना की जाती है। इन्हें अनुभव सिद्ध विश्लेपण भी कहते हैं।

Q. 19. व्यावहारिक सांख्यिकी का क्या अर्थ है ?

Ans. व्यावहारिक सांख्यिकी के अन्तर्गत उन सब विधियों का अध्ययन किया जाता है जिनका उपयोग विशेष समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय आय, कृषि, उद्योग, बेरोजगारी, निर्धनता आदि का अध्ययन करने के लिए जिन सांख्यिकीय विधियों तथा तकनीकों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें व्यावहारिक सांख्यिकी कहा जाता है। ये दो प्रकार की होती हैं

(i) वर्णनात्मक व्यावहारिक सांख्यिकी, (ii) वैज्ञानिक व्यावहारिक सांख्यिकी।

Q. 20. साख्यिकी को संख्यात्मक तथ्यों के समुच्चय के रूप में परिभाषित करें। कुछ उदाहरण प्रस्तुत करें।

Ans. क्रमवद्ध एकत्रित संख्यात्मक तथ्यों को सांख्यिकी कहते हैं अथवा सांख्यिकी से अभिप्राय तथ्यों के उस समूह से है जो कि अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जिन्हें संख्यात्मक रूप में दर्शाया जा सकता है, पर्याप्त शुद्धता के साथ जिनकी गणना की जा सकती है, जिन्हें किसी पूर्व-निर्धारित उद्देश्य के लिए सुव्यवस्थित ढंग से इकट्ठा किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे के तुलनात्मक रूप में दर्शाया जा सकता है।

उदाहरण-भारत का जनगणना प्रतिवेदन 2001 ।

वित्तीय वर्ष 2002-2003 के लिए भारत की राष्ट्रीय आय के आँकड़े।

वर्ष 2001-2002 में भारत का सकल घरेलू पूँजी निर्माण आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Ans. सांख्यिकी से हमारा तात्पर्य तथ्यों के उस समूह से है जो कि अनेक कारणों द्वारा पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्यात्मक रूप में व्यक्त किए जा सकते हैं, यथोचित शुद्धता के अनुसार जिनकी गणना अथवा अनुमान लगाया जाता है, जिन्हें किसी पूर्व-निश्चित उद्देश्य के लिए एक सुव्यवस्थित ढंग से एकत्रित किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे के तुलनात्मक रूप में व्यक्त किया जा सकता है। इस परिभाषा के आधार पर इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. आँकड़ों के समूह- साख्यिकी आँकड़ों के समूह को कहते हैं। एक आँकड़े को सांख्यिकी नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के लिए, रश्मि की वार्षिक आय 6,00,000 रुपये है। यह सांख्यिकी नहीं कहलाएगी। इसके विपरीत यदि यह कहा जाए कि रश्मि की वार्षिक औसत आय 6,00,000 रुपये है, तो यह सांख्यिकी कहलाएगी।

2. गणना व अनुमान- आँकड़ों का संकलन दो प्रकार से किया जाता है-गणना द्वारा या अनुमान द्वारा। साख्यिकी में आँकड़े गणना व अनुमान, दोनों तथा किसी भी एक तरीके से प्राप्त होते हैं।

3. अंकों में दर्शाया जाता है- सांख्यिकी आँकड़े हमेशा संख्याओं में दर्शाए जाने चाहिए। गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन सांख्यिकी में नहीं किया जाता। यदि हम कहें कि रमेश लम्बा है और राज छोटा, तो यह सांख्यिकी आँकड़े नहीं होंगे। इसके विपरीत यदि यह कहें कि रमेश की लम्बाई 175 सेमी. है और राज की लम्बाई 170 सेमी है, तो यह तथ्य सांख्यिकी कहलाएंगे। ये संख्यात्मक अंकों में दर्शाया जाता है।

4. अनेक कारणों से प्रभावित- आँकड़े अनेक कारणों से प्रभावित होने चाहिए न कि किसी एक विशेष कारण मात्र द्वारा। उदाहरणस्वरूप, खेती की उत्पादकता अनेक कारणों से प्रभावित होती है, जैसे वर्षा की मात्रा, बीजों की किस्म, खाद की मात्रा और स्वरूप, भूमि की उत्पादकता आदि। यदि आँकड़े एक ही कारण मात्र से प्रभावित हैं, तो उस प्रभाव को हटाने पर आँकड़े प्राय सामान्य रहेंगे, जिनका अध्ययन कोई महत्व नहीं रखता है। अतः आँकड़े अनेक कारणों से पर्याप्त मात्रा में प्रभावित होने चाहिए, जिससे कि अच्छे गुणों के प्रभाव को बुरे गुणों से मिलाया जा सके।

5. पूर्व-निश्चित उद्देश्य के लिए- आँकड़ों के संकलन से पूर्व एक निश्चित उद्देश्व का होना जरूरी है। यद सकलनकर्ता के सामने आँकड़ों के संकलन करने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो यह सम्भव है कि वह आवश्यक आँकड़ों का संकलन न करके अनावश्यक आँकड़ों को संकलित कर ले। बिना उद्देश्य के संकलित आँकड़े उचित परिणाम नहीं देंगे।

6. व्यवस्थित ढंग से संकलित- आँकड़ों का संकलन एक व्यवस्थित ढंग से किया जाना चाहिए। संकलन से पूर्व एक योजना बना लेनी चाहिए, जिसके अनुसार आँकड़ों का संकलन किया जाएगा। अव्यवस्थित ढंग से संकलित आँकड़े अनेक प्रकार की अशुद्धियों को जन्म देते हैं तथा बहुत-से विश्लेषणों के लिए उपयुक्त भी नहीं होते।

7. परिशुद्धता के उचित स्तर के अनुसार- आँकड़ों के संकलन में एक उच्ब स्तरीय परिशुद्धता का होना जरूरी है। इसी प्रकार 50 छात्रों में 48 या 52 भी हो सकते हैं। परिशुद्धता का एक उचित स्तर विश्लेषण के स्वरूप के अनुसार बदलता रहता है। यह शुद्धता के उद्देश्य, उसकी प्रकृति, आकार, उपलब्ध संसाधनों के अनुसार होनी चाहिए।

8. एक-दूसरे से सम्बन्धित होना- आँकड़े विश्लेषण को स्पष्ट नहीं करते, क्योंकि इनके द्वारा तुलना भी नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए, 1999-2000 में भारत की शुद्ध राष्ट्रीय आय 4,63,768 करोड़ रुपये थी। यद्यपि इन आँकड़ों में उपरोक्त सभी गुण विद्यमान हैं, किन्तु तुलना का गुण नहीं है। ऐसी स्थिति में ये सांख्यिकी कहलाने के योग्य नहीं हैं। दूसरे उदाहरण के रूप में यदि यह कहा जाए कि 1999-2000 एवं 2005-06 में भारत की राष्ट्रीय आय क्रमशः 4,63,768 एवं 5,69,968 करोड़ रुपये थी। इनकी तुलना की जा सकती है। अतः ये सांख्यिकी कहलाने के योग्य हैं।

Q.2. एकवचन के रूप में सांख्यिकी की विशेषताओं का विवेचन कीजिए।

Ans. यह एक विधि है जिसके द्वारा आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण तथा निर्वचन किया जाता है। इसमें निम्नलिखित विधियों को शामिल किया जाता है।

1. आँकड़ों का संकलन- यह सांख्यिकी सर्वेक्षण का सबसे प्रमुख और बुनियादी काम है। इसमें उन सभी विधियों का वर्गीकरण किया जाता है जिनके द्वारा आँकड़ों का संकलन किया जाता है।

2. समंकों का व्यवस्थितिकरण- मूल रूप से एकत्र किए गए आँकड़े अव्यवस्थित होते हैं। विश्लेषण में सहायक बनाने के लिए इनको समय, स्थान, गुण आदि के आधार पर बाँटा जाता है। फिर इनका सारणीयन करते हैं।

3. आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण- आँकड़ों को सुगम, सरल व आकर्षक बनाने के लिए उन्हें बिन्दु या रेखा वित्रों की सहायता से दर्शाया जाता है।

4. आँकड़ों का विश्लेषण- मात्रात्मक आँकड़ों से सही निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए उनकी गणना की जाती है। गणना के आधार पर उनका निष्कर्ष निकाला जाता है। आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है

(i) केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप

(ii) अपकिरण की माप

(iii) सह-सम्बन्ध

(iv) प्रतिगमन

(v) सूचकांक।

5. आँकड़ों का निर्वचन- आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर निर्वचन किया जाता है। निर्वचन का कार्य अत्यन्त कठिन और सांख्यिकीय आँकड़े सम्बन्धी अनुभव पर आयारित हैं। इसके लिए विशेष अनुभव तथा विशिष्टता का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके आधार पर आँकड़ों का पूर्वानुमात्त लगाया जा सकता है।

अतः उपर्युक्त विशेषताएँ सांख्यिकी की एकवचन के रूप में हैं।

Q. 3. सांख्यिकी की प्रकृति, विषय-सामग्री तथा सीमाओं का वर्णन कीजिए।

Or, सांख्यिकी के क्षेत्र का वर्णन कीजिए ।

Ans. सांख्यिकी के क्षेत्र का अध्ययन तीन भागों में किया जा सकता है-

I. सांख्यिकी की प्रकृति, II. सांख्यिकी की विषय सामग्री, III. सांख्यिकी की सीमाएँ।

I. सांख्यिकी की प्रकृति- इसके अन्तर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि सांख्यिकी विज्ञान है अथवा कला। टिप्पेट के अनुसार, "सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों ही है। एक विज्ञान के रूप में यह आँकड़ों का व्यवस्थित ढंग से अध्ययन करती है तथा कला के रूप में वास्तविक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए आँकड़ों का प्रयोग करती है। कुछ विद्वानों ने सांख्यिकी को विज्ञान न कहकर सांख्यिकी विधियों का अध्ययन कहा है, क्योंकि इसकी विधियाँ सभी विज्ञानों में प्रयोग की जाती हैं।

II. सांख्यिकी की विषय सामग्री- सांख्यिकी की विषय-सामग्री को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है, जो इस प्रकार है-

1. सांख्यिकी विधियाँ- यूल तथा कैन्डल के अंनुसार, "सांख्यिकी विधियों से हमारा अभिप्राय उन विधियों से है जो अनेक कारणों से प्रभावित संख्यात्मक आँकड़ों की व्याख्या करने के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है।" सांख्यिकी विधियों के अन्तर्गत वे सब वियियों शामिल की जाती हैं जिनका सम्बन्ध संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, व्यवस्थीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन से है।

2. व्यावहारिक सांख्यिकी- व्यावहारिक सांख्यिकी के अन्तर्गत उन सब विधियों का अध्ययन किया जाता है जिनका उपयोग विशेष समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय आय, कृषि, उद्योग, बेरोजगारी, निर्धनता आदि का अध्ययन करने के लिए जिन सांख्यिकी विधियों तथा तकनीकों का प्रयोग किया जायेगा, उन्हें व्यावहारिक सांख्यिकी कहा जायेगा। व्यावहारिक सांख्यिकी दो प्रकार की होती है-

(i) वर्णनात्मक व्यावहारिक सांख्यिकी- वर्णनात्मक व्यावहारिक सांख्यिकी वह सांख्यिकी है जिसका उद्देश्य वर्तमान तथा भूतकालीन आँकड़ों का विवरण प्राप्त करना है। इसके द्वारा सम्बन्धित घटनाओं के भूतकाल तथा वर्तमान के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। जनसंख्या, कीमत, कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन आदि के आँकड़ों का अध्ययन इसी के अन्तर्गत किया जाता है।

(ii) वैज्ञानिक व्यावहारिक सांख्यिकी- वैज्ञानिक व्यावहारिक सांख्यिकी वह सांख्यिकी है जिसके अन्तर्गत समकों को किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के उद्देश्य से एकत्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हम राष्ट्रीय आय में कृषि के घटते हुए योगदान तथा उद्योगों के बढ़ते हुए योगदान से सम्बन्धित आँकड़ों के आधार पर आर्थिक विकास के सम्बन्ध में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तो इसे वैज्ञानिक व्यावहारिक सांख्यिकी कहा जायेगा।

III. सांख्यिकी की सीमाएँ- आधुनिक युग में सांख्यिकी ने एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। परन्तु इस शास्त्र की कुछ सीमाएँ हैं जिनको ध्यान में रखकर इसका प्रयोग करना चाहिए। न्यूजहोम के अनुसार, "सांख्यिकी को अनुसंधान का एक मूल्यवान साधन समझना चाहिए। परन्तु इसकी कुछ गम्भीर समस्याएँ हैं जिन्हें दूर किया जाना सम्भव नहीं है।" साख्यिकी की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ निम्नलिखित हैं-

1. केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन- सांख्यिकी केवल ऐसे तथ्यों का अध्ययन करती है जिन्हें संख्याओं के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत गुणात्मक तथ्यों जैसे ईमानदारी, मित्रता, बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, देश-प्रेम, न्याय आदि का अध्ययन नहीं किया जाता।

2. केवल समूहों का अध्ययन- सांख्यिकी के अन्तर्गत संख्यात्मक तत्वों के समूहों का अध्ययन किया जाता है। इसमें एक विशेष इकाई का अध्ययन नहीं किया जाता है।

3. एकमात्र विधि नहीं है- सांख्यिकी विधि किसी समस्या के अध्ययन की एकमात्र विधि नहीं है। इस विधि द्वारा कई बार प्रत्येक समस्या का सर्वोत्तम हल नहीं किया जा सकता।

4. आँकड़ों में एकरूपता तथा सजातीयता का होना- संख्यात्मक आँकड़े एकरूप व सजातीय होने चाहिये।

5. परिणाम केवल औसतन सत्य होते हैं- सांख्यिकी के नियम केवल औसत के रूप में ही सत्य होते हैं। ये केवल प्रवृत्ति को ही प्रकट करते हैं।

6. बिना सन्दर्भ के निष्कर्ष गलत हो सकते हैं- सांख्यिकी निष्कर्षों को भली प्रकार समझाने के लिए यह आवश्यक है कि उन परिस्थितियों का भी अध्ययन किया जाए जिनमे निष्कर्ष निकाले गए हों अन्यथा वे असत्य सिद्ध हो सकते हैं।

7. केवल विशेषज्ञों द्वारा उपयोग- सांख्यिकी का प्रयोग केवल उन व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकता है जिन्हें सांख्यिकी विधियों का विशेष ज्ञान है। अनजान साधारण व्यक्ति इसका प्रयोग नहीं कर सकते।

Q. 4. सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों ही है, कैसे ?

Ans. सांख्यिकी विज्ञान एवं कला दोनों ही है।

विज्ञान के रूप में - विज्ञान क्रमबद्ध ज्ञान का भण्डार होता है जिसके नियम व्यापक एवं अखण्ड होते हैं। इसमें भविष्य की दृष्टि से अनुमान लगाने की क्षमता होती है। ज्ञान की कोई भी शाखा जो किसी भी प्रकार के तथ्यों को वर्गीकृत (Classify) करती है, उनका सम्बन्ध स्पष्ट करती है और अनुक्रम का दिग्दर्शन कराती है, वह विज्ञान कहलाने की अधिकारी होती है। तथ्य ही केवल किसी को विज्ञान नहीं बनाते अपितु उनको उपयोग में लाने वाली पद्धतियाँ ही उसको विज्ञान बनाती हैं। विज्ञान की परिभाषा कर उपर्युक्त कसौटी पर सांख्यिकी को कसने पर स्पष्ट है कि सांख्यिकी एक विज्ञान है, जिसके द्वारा प्रत्येक प्रकार के विषयों का अध्ययन किया जा सकता है। इसके द्वारा भविष्य के लिए पूर्वानुमान भी लगाए जा सकते हैं। महांक जड़ता नियम (Inertia of Large Numbers) तथा सांख्यिकीय नियमितता का सिद्धान्त (Law of Statistical Regularity) सांख्यिकी के सामान्य नियम हैं जिनको प्रत्येक विज्ञान में प्रयोग किया जा सकता है।

सारांश यह है कि सांख्यिकी को विज्ञान इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इसका अध्ययन एक सुव्यवस्थित विधि के द्वारा होता है और इसके नियम अन्य दूसरे विज्ञानों के समान सार्वभौमिक होते हैं। सभी स्थानों पर समान रूप से कार्यान्वित किए जा सकते हैं। क्रॉक्स्टन तथा काउडन (Croxton and Cowden) के मतानुसार, "सांख्यिकी एक विज्ञान नहीं है। वह एक वैज्ञानिक विधि है।" अतः सांख्यिकी केवल स्वयं विज्ञान ही नहीं, अपितु अन्य सभी विज्ञानों का आधार भी है।

सांख्यिकी केवल विज्ञान ही नहीं अपितु कला भी है- कला के रूप में, सांख्यिकी हमें बताती है कि विशेष समस्याओं के समाधान के लिए सांख्यिकीय नियमों को किस प्रकार प्रयोग में लाया जाए अर्थात् विभिन्न प्राकृतिक तथा सामाजिक समस्याओं में उससे उत्तम समाधान क्या हो सकता है। सांख्यिकीय सामग्री के संकलन, कार्य तथा उसका उपयुक्त उपयोग एक कला है। इसके लिए विशेष कार्यकुशलता एवं अनुभव की आवश्यकता होती है। सांख्यिकी में केवल इसी बात का अध्ययन नहीं किया जाता कि विभिन्न सांचियकीय माध्यमों (Statistical Averages) को कित्त प्रकार ज्ञात किया जाए, अपितु इस बात का ज्ञान कराया जाता है कि किस माध्य का प्रयोग किन विशेष उद्देश्यों के लिए और किन रीतियों के द्वारा होना चाहिए। सारणीपन (Tabulation) तथा रेखाचित्रों एवं चित्रों द्वारा उपलब्ध सामग्री के प्रदर्शन का कार्य स्पष्ट रूप से कला के अन्तर्गत ही आता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों ही है। हॉलोज तथा पियर्सन (Halows & Pearson) ने भी सांख्यिकी को "तथ्यों को प्रयोग में लाने तथा विज्ञान तथा कला" कहा है। टिपेट (Tippett) ने भी कहा है, "सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों ही है।

अतः स्पष्ट है कि सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों ही है।

Q. 5. अर्थशास्त्र में सांख्यिकी के महत्त्व का वर्णन कीजिए।

Ans. प्रत्येक आर्थिक समस्या के अध्ययन में सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में, सांख्यिकीय रीतियाँ एवं अर्थशास्त्री की प्रयोगशाला के यन्त्र व उपकरण हैं। सांख्यिकीय तियों का प्रयोग अर्थशास्त्री उसी भाँति करता है जिस प्रकार एक चिकित्सक स्टेथेस्कोप का प्रयोग मनुष्य की बीमारी जानने के लिए करता है।

सांख्यिकीय विधियाँ आर्थिक समस्याओं को समझने तया आर्थिक नीति का निर्माण करने में बहुत उपयोगी होती हैं। अर्थशास्त्र की प्रत्येक शाखा में सांख्यिकीय रीतियों के प्रयोग के बिना काम नहीं चल सकता है।

1. उपभोग के समंक यह बताते हैं कि विभिन्न आय वर्ग किस प्रकार अपनी आय को खर्च करते हैं। इस प्रकार के सर्मक व्यक्तियों के रहन-सहन के स्तर तथा उनकी कर देय-क्षमता का पता लगाने में उपयोगी होते हैं। अर्थशास्त्र का 'माँग का नियम' तथा 'माँग की मूल्य सापेक्षता का विवार' आगमन तर्क प्रणाली के आकार पर ही आधारित है। आगमन तर्क प्रणाली में समंकों द्वारा घटनाओं का अध्ययन करके सर्वमान्य नियम प्रतिपादित किए जाते हैं। अध्ययन की सामग्री एकत्रित करना सांख्यिकी का कार्य है और सामग्री से नियम बनाना अर्थशास्त्री का कार्य है।

2. उत्पादन के समंक माँग तथा पूर्ति में समायोजन करने में सहायक होते हैं। ये समंक देश की उत्पादकता को मापते हैं। इन समंकों की सहायता से उत्पादन में विभिन्न घटकों की उत्पादकता की गणना एवं उनकी तुलना की जा सकती है। उत्पादन के क्षेत्र में होने वाली वार्षिक प्रगति को इन सर्मकों की सहायता से मापा जा सकता है। प्रत्येक प्रगतिशील देश में उत्पादन की गणना की जाती है। गणना के समंक महत्त्वपूर्ण जानकारी के भण्डार होते हैं।

3. विनिमय के क्षेत्र में, समको के माध्यम से बाजार माँग तथा पूर्ति की विभिन्न दशाओं पर आधारित मूल्य-निर्धारण के नियम, लागत मूल्य आदि का अध्ययन किया जाता है। इन सब बातों का अध्ययन समकों के प्रयोग के बिना असम्भव होता है। अधिकतम लाभ कमाने के लिए एक एकाधिकारी को अपने उत्पादन का क्या मूल्य निश्चित करना चाहिए ? किस वस्तु-विशेष की कीमत क्या होगी ? यदि उसकी पूर्ति में कमी या वृद्धि कर दी जाती है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग के बिना नहीं दिए जा सकते।

4. वितरण के क्षेत्र में भी समंक महत्त्वपूर्ण होते हैं। समंकों की सहायता से ही राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। देशवासियों के मध्य राष्ट्रीय आय का वितरण किस प्रकार है, इसको ज्ञात करने में भी सांख्यिकी रीतियाँ सहायक होती हैं। राष्ट्रीय आय व धन के असमान वितरण की समस्या का अध्ययन एवं समाधान समकों की सहायता से ही किया जा सकता है।

5. किसी भी आर्थिक समस्या को समकों द्वारा हल करने के प्रयत्न से न केवल उसका सच्चा वर्णन ही होता बल्कि यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि उसका समाधान किस प्रकार होगा।

6. सांख्यिकी आर्थिक नीतियों के निर्माण में बहुत सहायक होती है। आर्थिक नीतियों के मूल्यांकन करने के लिए आँकड़ों की आवश्यकता होती है।

Q. 6. आधुनिक समय में सांख्यिकी के महत्त्व का वर्णन कीजिए ।

Ans. आजकल चारों ओर अनेक तरह के परिवर्तन हो रहे हैं। हमलोगों के सामाजिक, औद्योगिक और आर्थिक जीवन के विभिन्न पक्ष भी इससे वंचित नहीं हैं। इसमें सांख्यिकी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। वास्तव में, आधुनिक समय में सांख्यिकी का बहुत अधिक महत्त्व है। निम्न विचार-विन्दुओं द्वारा इसके महत्त्व को स्पष्ट किया जा सकता है-

सामाजिक जीवन (Social life)- किसी भी समाज में अनेक तरह के लोग होते हैं और उनकी अपनी अलग-अलग समस्याएँ होती हैं। शिक्षित और अशिक्षित, दोनों तरह के बेरोजगारों की संख्या बड़ी होती है। दैनिक मजदूरी करके जीनेवाले लोगों को भी सभी दिन काम नहीं मिलते। अधिकांश लोग गरीबी रेखा के नीचे होते हैं और अपने बच्चे को प्राइमरी स्कूल में भी नहीं भेजते। कुछ कृषि योग्य भूमि है भी तो आधुनिक ढंग से खेती करने के साधन नहीं हैं। अपशुधन और अन्य स्रोतों से कुछ उत्पादन होता भी है, तो यातायात की असुविधाएँ और महाजनी दाँव-पेंच के कारण उसका उचित लाभ नहीं मिलता है। अनेक तरह की परपरागत सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक अघविश्वास, मद्यपान आदि जैसी अन्य आदतों का प्रकोप अलग रहता है। प्रश्न उठता है कि इसमें सुधार कैसे लाया जाए तथा गरीबी रेखा से अधिकांश लोगों को कैसे ऊपर उठाकर उनके जीवन को विकासोन्मुख बनाया जाए। यह काम सीधे इधर-उधर से कुछ रुपया खर्च कर देने से नहीं हो सकता।

योजनाबद्ध रूप से किसी समाज को ऊपर उठाना तभी संभव है जबकि उसकी सारी कुरीतियो, आर्थिक एवं अन्य विषम परिस्थितियों और उपलब्ध साधनों का सही तौर पर लेखा-जोखा किया जाए। यह काम सांख्यिकीय रीतियों से ही पूरा होता है। संगणना (census) या प्रतिदर्श सर्वेक्षण (sample survey) की रीतियों से समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से सपर्क स्थापित करके सभी तरह के आँकड़े इकट्ठे किए जाते हैं। ऐसे आँकड़ों के अध्ययन के बाद ही सामाजिक उत्थान के लिए योजनाबद्ध रूप में कोई कार्यक्रम तैयार करने से ही सही माने में सफलता मिलती है। योजना आयोग और अन्य संस्थाओं का कार्यक्रम भी इसी तरह बनता है। सामाजिक जीवन के उत्थान में सांख्यिकी का यही सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रौद्योगिकी जीवन (Industrial life)- किसी भी उद्योग-धंधे के सफल संचालन में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान शुरू से अंत तक रहता है। पूँजी, आपूर्ति, माँग, कच्चे माल की उपलब्धि, श्रम, शक्ति, पानी आदि के आँकड़े का अध्ययन करके पहले यह तय किया जाता है कि कितनी पूँजी से, कौन वस्तु के उत्पादन के लिए कहाँ पर किस आकार का छोटा बड़ा माल खरीदने की जरूरत पड़ती है। जाँच-पड़ताल करके अच्छे माल ही खरीदे जाते हैं और इसके लिए उनके गुण-दोष का विश्लेषण करके मूल्य तय करना होता है। माल तैयार करते समय उनके रूप, रंग, आकार, रासायनिक तत्त्व आदि को एक मानक स्तर पर रखने की जरूरत पड़ती है ताकि बाजार में खरीदकर उन्हें पसन्द कर सके। सांख्यिकी में प्रतिपादित प्रतिदर्श निरीक्षण (sample inspection) और गुण-नियंत्रण की रीतियों से इन कामों में काफी सहायता मिलती है।

अंत में तैयार माल को देश-विदेश के बाजारों में खपाने की जरूरत पड़ती है। इस काम के लिए बाजार सर्वेक्षण और शोध की रीतियों का सहारा लेना पड़ता है। इस तरह शुरू से अंत तक प्रौद्योगिकी जीवन की सफलता बहुत कुछ सांख्यिकी पर भी निर्भर करती है। अंदाज से कहीं पर कोई कारोबार खोल लेने से बर्बाद होने का डर हमेशां बना रहता है।

आर्थिक जीवन (Economic life)- आर्थिक जीवन की पूरी गतिविधि का आधार सांख्यिकी है। अर्थशास्त्र में मानव कल्याण के लिए आर्थिक व्यवस्था से संबद्ध अनेकानेक सैद्धान्तिक नियम प्रतिपादित किए जाते हैं। खनिज, विद्युत, श्रमशक्ति, पूँजी आदि उत्पादन के विभिन्न साधनों, कृषि, उद्योग आदि के वास्तविक उत्पादन स्तर, तकनीकी शिक्षा, जनसंख्या, यातायात, मुद्रा-स्फीति आदि से संबद्ध, आँकड़ों का सहसंबंधों के अध्ययन से देश की पूरी अर्थव्यवस्था को समझने में काफी मदद मिलती है। सांख्यिकी रीतियों से एक हद तक इनका अध्ययन करके ही सरकार को विभिन्न माध्यमों से यथोचित सुझाव दिए जाते हैं ताकि देश में किसी तरह का अभाव और असंतोष नहीं रहे और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती रहे। ऐसे सुझावों के आधार पर ही योजना आयोग अनेक तरह के विकास कार्यक्रमों को पंचवर्षीय योजनाओं में शामिल करता है। सरकार के वार्षिक बजट भी मुख्यतः इन सभी पर आधारित होते हैं। सांख्यिकीय गवेषणा (statistical investigation) के महत्त्व को समझते हुए राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण और अन्य कई संस्थाएँ विभिन्न समस्याओं को लेकर निरंतर आँकड़ों के संग्रहै और विश्लेषण में जुटी रहती हैं और समय पर प्रतिवेदन सरकार के सामने पेश करती हैं। प्रति दस वर्षों के बाद जनसंख्या-गणना भी इस उद्देश्य से की जाती है।

अनेक तरह के मूल्य सूचकांक भी बरावर प्रकाशित होते रहते हैं और देश के आर्थिक जीवन पर इनका भी काफी प्रभाव पड़ता है। इनसे ही किसी समय देश की आर्थिक गतिविधि के झुकाव (trend) का पता चलता है। इनका निर्माण भी सांख्यिकी रीतियों से ही आँकड़ों का विश्लेषण करने से होता है। इस तरह हमलोगों का आर्थिक जीवन सांख्यिकी में पूर्णतः आच्छादित है।

इस प्रकार, उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक समय में सांख्यिकी का बहुत अधिक महत्त्व है।

Q. 7. सांख्यिकी के कार्य को बताएँ।

Ans. सांख्यिकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

1. तथ्यों को संख्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना- तथ्यों को दो रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है गुणात्मक और संख्यात्मक। गुणात्मक तथ्यों में सूक्ष्मता और तुलना का गुण नहीं होता। यही कारण है कि सांख्यिकी उनका अध्ययन नहीं करती। सख्यात्मक तथ्य एक ओर तो समझने में सरल होते हैं और दूसरी ओर ये तथ्य तुलनात्मक रूप में व्यक्त किए जा सकते हैं।

2. जटिल तथ्यों को सरलता प्रदान करना- मनुष्य का मस्तिष्क विशाल, तथ्यों एवं संख्याओं को याद नहीं रख सकता। सांख्यिकी रीतियों से उन तथ्यों को सरल व सुबोध बनाकर ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिससे साधारण व्यक्ति भी उन्हें आसानी से समझ सके। माध्य, अपकिरण आदि द्वारा तथ्यों को सरलता प्रदान की जा सकती है।

3. तथ्यों में सम्बन्धों का अध्ययन करना- सांख्यिकी दो या दो से अधिक तथ्यों के बीच संबंध का अध्ययन करती है। सहसंबंध एक सांख्यिकीय विधि है जो कि यह बतलाती है कि दो या अधिक तथ्यों में कितनी मात्रा में सहसंबंध है।

4. तथ्यों को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करना- सांख्यिकीय आँकड़ों का तब तक कोई प्रयोजन नहीं जब तक कि उनमें तुलना का गुण न हो 1998-99 में 200.00 मिलियन टन अनाज का उत्पादन हुआ इस तथ्य का तब तक कोई महत्त्व नहीं जब तक कि इसकी तुलना गत वर्षों के उत्पादन के आँकड़ों से न की जाए।

5. नीति-निर्धारण में सुविधा प्रदान करना- सांख्यिकीय आँकड़ों द्वारा नीति-निर्धारण में सहायता मिलती है। आयात और निर्यात के आँकड़ों के आधार पर विदेशी व्यापार नीति का निर्धारण किया जाता है। प्रो. एंजिल का उपभोग नियम, माँग का नियम, कर-नीति, ब्याज नीति, बीमा प्रीमियम आदि का निर्धारण भी सांख्यिकी पर आधारित होता है।

6. पूर्वानुमान में सहायता करना- सांख्यिकीय विधियों द्वारा केवल वर्तमान तथ्यों का ही नहीं वरन् भविष्य में होने वाले सम्भावित आँकड़ों का भी अनुमान लगाया जा सकता है। काल-मालाओं के अध्ययन, बाह्यगणन की विधियों आदि के अध्ययन से भविष्य में प्राप्त होने वाले सम्भावित आँकड़ों का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

7. व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान में वृद्धि- व्यक्ति का ज्ञान क्षेत्र बढ़ाने में मदद करती है क्योंकि सांख्यिकीय विधियों द्वारा कठिन तथ्यों का समझना सरल हो जाता है।

संक्षेप में, सांख्यिकी के मुख्य कार्य हैं- आँकड़ों का संकलन, प्रस्तुतीकरण, संक्षिप्तीकरण, सहसंबंध, पूर्वानुमान और नीति-निर्धारण आदि।

Q.8. आर्थिक विश्लेषण में किन सांख्यिकीय यन्त्रों का प्रयोग होता है ? उनका वर्णन करें।

Ans. आर्थिक विश्लेषण में मुख्यतः निम्नलिखित सांख्यिकीय यन्त्रों का प्रयोग होता है-

1. आँकड़ों का संकलन और आर्थिक विश्लेषण- आँकड़ों के संकलन का मतलब होता है तथ्यों को इकट्ठा करना। आँकड़े दो प्रकार के होते हैं- प्राथमिक आँकड़े और द्वितीयक आँकड़े। प्राथमिक आँकड़ों को अनुसंधानकर्ता संगणना विधि या निदर्शन विधि के द्वारा स्वयं एकत्र करता है या गणकों से एकत्र करवाता है। आँकड़े एकत्र करने में संगणना या निदर्शन विधियों का प्रयोग किया जाता है। द्वितीयक आँकड़े प्रकाशित आँकड़े होते हैं। ये किसी और के द्वारा एकत्र करवाये जाते हैं।

2. आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण और आर्थिक विश्लेषण- एकत्र किए गए आँकड़े अव्यवस्थित होते हैं। उन्हें सख्त और ज्यादा सूचनाप्रद बनाने के लिए समय, स्थान, गुण आदि के आधार पर बाँटा जाता है। सारणीयन और चित्र प्रदर्शन द्वारा आँकड़ों को प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तुतीकरण के माध्यम से आँकड़े सुगम, सरल एवं आकर्षक हो जाते हैं।

3. आँकड़ों का विश्लेषण और आर्थिक विश्लेषण- आर्थिक विश्लेषण में सांख्यिकीय विश्लेषण का बहुत महत्त्व होता है। सांख्यिकीय विश्लेषण निम्न प्रकार के होते हैं-

(i) केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप और आर्थिक विश्लेषण- केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों को औसत भी कहा जाता है। ये कई प्रकार के होते हैं-जैसे समान्तर माध्य, माध्यिका आदि। केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का आर्थिक विश्लेषणों में विशिष्ट योगदान होता है।

(ii) अपकिरण के माप और आर्थिक विश्लेषण- यदि केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप समान होते हैं तो ऐसी स्थिति में आर्थिक विश्लेषणों में अपकिरण की माप का प्रयोग किया जाता है। माध्य विचलन, प्रमाप विचलन आदि अपकिरण की माप हैं।

(iii) सहसम्बन्ध प्रतिगमन और आर्थिक विश्लेषण- आर्थिक विश्लेषण में सहसम्बन्ध का विशेष स्थान होता है। मूल्य और वस्तु की माँग में ऋणात्मक सहसम्बन्ध वस्तु की माँग और कीमत में विपरीत सम्बन्ध होता है।

4. आँकड़ों का निर्वचन और आर्थिक विश्लेषण- आँकड़े अपने आप में गूंगे होते हैं। ये कुछ नहीं बोलते। इनसे कुछ निष्कर्ष निकालने के लिए निर्वचन करना पड़ता है। निर्वचन आर्थिक विश्लेषण में नीति-निर्धारण का आधार होता है। जैसे-जनसंख्या के आँकड़ों का निर्वचन करके सरकार कई प्रकार की नीतियाँ अपनाती हैं।

5. पूर्वानुमान और आर्थिक विश्लेषण- अर्थव्यवस्था में अनेक आर्थिक नीतियाँ पूर्वानुमानों पर आधारित होती हैं। जैसे-बजट उद्योग नीति, मौद्रिक नीति आदि। पूर्वानुमान लगाने के लिए सांख्यिकीय विधियों जैसे प्रतिगमन और न्यूनतम वर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।

निष्कर्ष: सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग आर्थिक विश्लेषण में बढ़ता जा रहा है। सांख्यिकी और गणित के ज्यादा प्रयोग की वजह से अर्थशास्त्र में एक नए विज्ञान का जन्म हुआ है जिसे अर्थमिती कहते हैं। वास्तव में, आर्थिक विश्लेषण में सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

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