4. आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण PRESENTATION OF DATA
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
Q. 1. दंड-आरेख :
(a) एक विमी आरेख है
(b) द्विविम आरेख है
(c) विम रहित आरेख है
(d) इनमें से कोई नहीं है
Q. 2. आयत चित्र के माध्यम से प्रस्तुत किए
गए आँकड़ों से आलेखी रूप से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं:
(a) माध्य
(b) बहुलक
(c) माध्यिका
(d) उपर्युक्त सभी
Q. 3. तोरणों के द्वारा आलेखी रूप में निम्न
की स्थिति जानी जा सकती है:
(a) बहुलक
(b) माध्य
(c) माध्यिका
(d) उपर्युक्त कोई भी नहीं
Q. 4. अंकगणितीय रेखा चित्र के द्वारा प्रस्तुत
आँकड़ों से निम्न को समझने में मदद मिलती है :
(a) दीर्घकालिक प्रवृत्ति
(b) आँकड़ों में चक्रीयता
(c) आँकड़ों में कालिकता
(d) उपर्युक्त सभी
Q.5. दंड-आरेख के दंडों की चौड़ाई का एक समान
होना जरूरी नहीं है (सही/गलत) ।
Ans. सही
Q. 6. आयत चित्र में आयतों की चौड़ाई अवश्य
एक समान होनी चाहिए (सही/ गलत) ।
Ans. गलत
Q. 7. आयत चित्र की रचना केवल आँकड़ों के संतत
वर्गीकरण के लिए की जा सकती है (सही/गलत) ।
Ans. सही
C. 8. आयत चित्र एवं स्तंभ आरेख आँकड़ों को
प्रस्तुत करने के लिए एक जैसी विधियाँ हैं (सही /गलत) ।
Ans. सही
Q.9. आयत चित्र की मदद से बारंबारता वितरण
के बहुलक को आलेखी रूप में जाना जा सकता है (सही/ गलत) ।
Ans. सही
Q. 10. तोरणों से बारंबारता वितरण की माध्यिका
को नहीं जाना जा सकता है (सही/गलत) ।
Ans. गलत
Q. 11. निम्नलिखित को प्रस्तुत करने के लिए
किस प्रकार का आरेख अधिक प्रभावी होता है ?
(क) वर्ष विशेष की मासिक वर्षा
Ans.
वर्ष-विशेष की मासिक वर्षा को प्रस्तुत करने के लिए सरल दंड-आरेख ज्यादा उपयुक्त है
क्योंकि यहाँ एक चर को प्रस्तुत करना है।
(ख) धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन
Ans.
धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन प्रस्तुत करने के लिए सरल दंड-आरेख या
घटक दंड आरेख दोनों उपयुक्त हैं। सरल दंड आरेख ज्यादा उपयुक्त है।
(ग) एक कारखाने में लागत-घटक
Ans.
एक कारखाने में लागत घटक को प्रस्तुत करने के लिए बहुगुणी दंड-आरेख अथवा घटक दंड-आरेख
उपयुक्त हैं।
Q. 12. मान लीजिए आप भारत में शहरी गैर-कामगारों की संख्या में वृद्धि
तथा भारत में शहरीकरण के निम्न स्तर पर बल देना चाहते हैं, जैसा कि उदाहरण 4.2 में
दिखाया गया है, तो आप उसका सारणीयन कैसे करेंगे ?
Ans.
भारत में शहरी कामगारों एवं गैर-कामगारों का हिस्सा-
|
शहरी
कामगार (करोड़ में) |
शहरी
गैर कामगार (करोड़ में) |
कुल
(करोड़ में) |
|
9 |
19 |
28 |
सारणी
में गैर-कामगार शहरी ज्यादा हैं जो यह दर्शाता है कि भारत में शहरीकरण निम्न स्तर का
है।
Q. 13. यदि किसी बारंबारता सारणी में समान वर्ग अंतरालों की तुलना में
वर्ग अंतराल असमान हों, तो आयत चित्र बनाने की प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न होगी ?
Ans.
जब वर्ग अंतराल समान होते हैं, तो आयत चित्र का आधार एक समान होता है। आयतों की तुलना
संगत आवृत्ति के आधार पर की जाती है। जब वर्ग अंतराल असमान होते हैं, तब आयत चित्रों
के आधार असमान होते हैं, इस स्थिति में आयतों की ऊँचाइयों को समायोजित करके तुलना की
जाती है, समायोजन के लिए आवृति घनत्व को वर्ग अन्तराल की चौड़ाई से विभाजित किया जाता
है। निरपेक्ष आवृति का प्रयोग नहीं किया जाता है।
Q. 14. भारतीय चीनी कारखाना संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर
2001 के पहले पखवाड़े के दौरान 3,87,700 टन चीनी का उत्पादन हुआ, जबकि ठीक इसी अवधि
में पिछले वर्ष (2000 में) 3,78,700 टन चीनी का उत्पादन हुआ था। दिसम्बर 2001 में घरेलू
खपत के लिए चीनी मिलों से 2,83,000 टन चीनी उठाई गई और 41,000 टन चीनी निर्यात के लिए
थी, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में घरेलू खपत की मात्रा 1,54,000 टन थी और निर्यात
शून्य था।
(क) उपर्युक्त आँकड़ों के सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत करें।
Ans.
शीर्षक-भारत में चीनी का उत्पादन, उपभोग व निर्यात
|
वर्ष |
चीनी
का उत्पादन (टन) |
चीनी
का आंतरिक उपभोग (टन) |
चीनी
का निर्यात (टन) |
|
2000
(दिसम्बर का पहला पखवाड़ा) |
3,78,000 |
1,54000 |
- |
|
2001
(दिसम्बर का पहला पखवाड़ा) |
3,87,000 |
2,83,000 |
41,000 |
(ख) मान लीजिए, आप इस आँकड़े को आरेख में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो
आप कौन-सा आरेख चुनेंगे और क्यों ?
Ans.
इन आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण करने के लिए बहुगुणी दण्ड चित्र का प्रयोग करके बहुगुणी दण्ड चित्र के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार के और अलग-अलग
वर्षों के आंकड़ों को अधिक आकर्षक रूप से दर्शाया जा सकता सकता है।
(ग) इन आँकड़ों को आरेखी रूप में प्रस्तुत करें।
Ans.
Q. 15. निम्नलिखित सारणी में कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद में क्षेत्रकवार
अनुमानित वास्तविक संवृद्धि दर को (पिछले वर्ष से प्रतिशत परिवर्तन) प्रस्तुत किया
गया है :
|
वर्ष
(1) |
कृषि
व सम्बद्ध क्षेत्रक (2) |
उद्योग
(3) |
सेवाएँ
(4) |
|
1994-95 |
5.0 |
9.2 |
7.0 |
|
1995-96 |
-0.9 |
11.8 |
10.3 |
|
1996-97 |
9.6 |
6.0 |
7.1 |
|
1997-98 |
-1.9 |
5.9 |
9.0 |
|
1998-99 |
7.2 |
4.0 |
8.3 |
|
1999-00 |
0.8 |
6.9 |
8.2 |
उपर्युक्त
आँकड़ों को बहु काल-श्रेणी ग्राफ आरेख द्वारा प्रस्तुत करें।
अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. शीर्षक क्या होता है ?
Ans. शीर्षक संक्षेप में सारणी की विषय-वस्तु को दर्शाता
है। इसकी सहायता से सारणी की महत्वपूर्ण विशेषताओं का पता चलता है। इसे सारणी के ऊपर
या नीचे कोने में लिखा जाता है।
Q. 2. स्तम्भ शीर्षक का अर्थ लिखें।
Ans. स्तम्भ शीर्षक छोटे उपशीर्षक होते हैं। ये संक्षिप्त
विवरण प्रस्तुत करते हैं।
Q.3. सारणीयन किसे कहते हैं ?
Ans. सांख्यिकी आँकड़ों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करने
की क्रिया को सारणीयन कहा जाता है।
Q.4. समंकों को स्तम्भों तथा पंक्तियों में
क्रमबद्ध करने की विधि को सांख्यिकी में क्या नाम दिया जाता है ?
Ans. सारणीयन।
Q. 5. सारणीयन प्रस्तुतीकरण का अर्थ स्पष्ट
करें।
Ans. संक्षिप्त टिप्पणी के साथ-साथ पंक्तियों तथा स्तम्भों
में आँकड़ों को दर्शाना सारणीबद्ध प्रस्तुतीकरण कहलाता है।
Q. 6. स्त्रोत टिप्पणियों का क्या अर्थ है
?
Ans. सारणी में प्रस्तुत आँकड़े कहाँ से लिये गये हैं, इस
बात की जानकारी स्रोत टिप्पणी से मिलती है। स्रोत टिप्पणी सारणी के नीचे लिखी जाती
है।
Q. 7. पाद टिप्पणी का क्या अर्थ है ?
Ans. सारणी की विशेषता बताने के लिये सारणी के नीचे दी गई
टिप्पणी को पाद टिप्पणी कहते हैं।
Q.8. कालिक चित्र में आँकड़ों को किस रूप में
दर्शाया जाता है ?
Ans. यथातथ्य रूप में।
Q. 9. एक अच्छी सारणी की क्या-क्या विशेषता
है ?
Ans. एक अच्छी सारणी की विशेषता है- (i) सुन्दर, स्वयं परिचायक
तथा संक्षिप्त।
Q. 10. चित्रमय प्रदर्शन का सबसे सरल रूप क्या
है?
Ans. सरल दण्ड चित्र।
Q. 11. वृत्तीय चित्र क्या होते हैं ?
Ans. सांख्यिकी आँकड़ों को वृत्तखण्ड के रूप में व्यक्त करने
को वृत्तीय चित्र कहते हैं।
Q. 12. चित्रमय प्रदर्शन का क्या अर्थ है
?
Ans, आँकड़ों को वर्ग, आयत, वृत्त, दण्ड आदि रूपों में दर्शान
को चित्रमय प्रदर्शन करा जाता है।
Q. 13. कालिक चित्र का अर्थ बताइये ।
Ans. काल मालाओं को दर्शाने वाले चित्र को कालिक चित्र कहते
हैं।
Q. 14. ज्यामितीय आरेख के विभिन्न प्रकार बतायें।
Ans. ज्यामितीय आरेख निम्नलिखित प्रकार के होते हैं- (i)
दण्ड आरेख, (ii) बहुदण्ड आरेख, (iii) वृत्त आरेख।
Q. 15. आवृत्ति आरेख के विभिन्न प्रकार बताइये
।
Ans. आवृत्ति आरेख के प्रकार हैं- (i) आयत चित्र, (ii) आवृत्ति
बहुभुज, (iii) आवृत्ति वक्र, (iv) तोरण।
Q. 16. आवृत्ति वितरण आयत चित्र किस श्रृंखला में बनाये जाते हैं ?
Ans.
अखंडित श्रृंखला में।
Q. 17. आवृत्ति आयत चित्र में आवृत्तियों को किस अक्ष पर दर्शाया जाता
है ?
Ans.
Y-अक्ष पर।
Q. 18. आवृत्ति आयत चित्र बनाते समय X-अक्ष पर किसे दर्शाया जाता है
?
Ans.
वर्ग-अन्तराल ।
Q.19. आवृत्ति आयत चित्र में वर्ग अन्तराल किस पर दर्शाया जाता है
?
Ans.
X-अक्ष पर।
Q. 20. आवृत्ति आयत चित्र बनाते समय किन बातों का ध्यान रखा जाता है
?
Ans.
जवृत्ति आयत चित्र बनाते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है उपयुक्त शीर्षक, पैमाना,
कृत्रिम आधार रेखा।
Q. 21. काल श्रेणी आरेख के X-अक्ष पर क्या दर्शाया जाता है ?
Ans.
समय ।
Q. 22. 'से अधिक' आवृत्ति वक्र का ढाल क्या होता है ?
Ans.
ऋणात्मक।
Q. 23. 'से कम' आवृत्ति वक्र का ढाल क्या होता है ?
Ans.
धनात्मक।
Q. 24. किसी वक्र या आरेख बनाने के लिए किस प्रकार के कागज की आवश्यकता
होती है ?
Ans.
वक्र या आरेख बनाने के लिए ग्राफ पेपर का प्रयोग उपयुक्त रहता है। इस पर किसी बिन्दु
की स्थिति दो अक्षों (X-अक्ष एवं Y-अक्ष) के संदर्भ में बताया जा सकता है।
Q. 25. मूल बिन्दु का क्या अर्थ है ?
Ans.
X- अक्ष (क्षतिज रेखा) एवं Y-अक्ष (उर्ध्व रेखा) ग्राफ पेपर पर जिस बिन्दु पर काटती
है उसे मूल बिन्दु कहते हैं।
Q.26. भुज तथा कोटि का अर्थ क्या है ?
Ans.
भुज- मूल बिन्दु से X-अक्ष पर किसी बिन्दु की दूरी को भुज कहते हैं। भुज को
मापने के लिए बिन्दु से X-अक्ष पर लम्ब खींचते हैं। मूल बिन्दु से लम्ब के पाद की दूरी
को भुज कहते हैं।
कोटि-
मूल विन्दु से Y-अक्ष पर किसी विन्दु की दूरी को कोटि कहते हैं। कोटि को मापने के लिए
बिन्दु से Y-अक्ष पर लम्ब खींचते हैं। मूल बिन्दु से लम्ब पाद की दूरी को कोटि कहते
हैं।
चित्र
में बिंदु P की भुज = OQ या PR
कोटि
= OR या PQ
Q. 27. 'से कम' तथा 'से अधिक' तोरण की विशेषता लिखिए ।
Ans.
'से कम' तोरण कभी घटता हुआ नहीं होता है और 'से अधिक' तोरण कभी बढ़ता हुआ नहीं होता
है।
Q. 28. 'से कम' तथा 'से अधिक' तोरणों से माध्यिका कैसे ज्ञात की जाती
है ?
Ans.
'से कम' तथा 'से अधिक' तोरण जिस बिन्दु पर काटते हैं, उस बिन्दु पर x का मान माध्यिका होती है।
Q. 29. आवृति वक्र के अन्दर का कुल क्षेत्रफल व आवृति में संबंध बताइए
।
Ans.
आवृत्ति वक्र के अन्दर का कुल क्षेत्रफल, कुल आवृत्ति के अनुपात में होता है।
Q. 30. आवृत्ति आयत चित्र किसे कहते हैं ?
Ans.
किसी आवृत्ति वितरण का रेखा चित्रीय प्रदर्शन, आवृत्ति आयत चित्र कहलता है। आवृत्ति
आयत चित्र की दो स्थितियाँ हो सकती हैं वे हैं
1.
वर्ग अंतराल समान हों, 2. वर्ग अंतराल असमान हों।
Q. 31. आनुपातिकता स्थिरांक का अर्थ बताइये ।
Ans.
प्रत्येक आवृत्ति का क्षेत्रफल वर्ग अंतराल एवं आवृति के गुणनफल के समान होता है। यदि
वर्ग अंतराल सभी वर्गों के लिए समान होता है, तो वर्ग अंतराल कहते हैं। अंतराल को आनुपातिकता
स्थिरांक
Q. 32. आवृति वक्र क्या होता है ?
Ans.
आवृति वक्र आवृति बहुभुज के बिन्दुओं से होकर जाने वाला मुक्त हस्त से बनाया गया ऐसा
बक्र होता है जो आवृत्ति बहुभुज के निकटतम बिन्दुओं से होकर गुजरता है।
Q.33. क्या अपवर्जी श्रृंखला के आवृत्ति वितरण से आप आवृत्ति आयत बना
रुकते हैं ?
Ans.
नहीं, अपवर्जी श्रृंखला को पहले समावेशित श्रृंखला में बदलेंगे और फिर आवृत्ति आयत
बनाएँगे।
Q. 34. सारणी का कार्य क्या होता है ?
Ans.
सारणी का कार्य, सारणी का मुख्य भाग होता है। इसमें आँकड़ों को दर्शाया जाता है। पंक्ति
व स्तंभ के द्वारा किसी भी संख्या की पहचान की जा सकती है।
Q. 35. आँकड़ों के विवरणात्मक प्रस्तुतीकरण से आप क्या समझते हैं ?
Ans.
प्रेक्षणों का शब्दों में वर्णन आँकड़ों का विवरणात्मक प्रस्तुतीकरण कहलाता है। जैसे-जनगणना
प्रतिवेदन 1991 के अनुसार भारत में कुल साक्षरता, पुरुष साक्षरता, महिला साक्षरता प्रतिशत
क्रमशः 52, 64, 39 प्रतिशत था। केरल व उत्तर प्रदेश में कुल साक्षरता प्रतिशत 90 व
42% था। इन राज्यों में पुरुष व महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत क्रमशः 94 व 86 तथा
56 व 25% था।
Q. 36. आँकड़ों को प्रस्तुत करने की दो विधियों के नाम लिखें ।
Ans.
सारणीयन एवं बिंदु-रेखीय प्रदर्शन।
Q. 37. जटिल सारणी किसे कहते हैं ?
Ans.
जटिल सारणी वह है जिसमें एक से अधिक विशेषताओं के आधार पर समंकों को प्रस्तुत किया
जाता है।
Q. 38. दण्ड-चित्र किसे कहते हैं ?
Ans.
जो चित्र दण्डों के माध्यम से किसी चर अथवा चरों के मूल्यों को प्रदर्शित करता है,
दण्ड-चित्र कहलाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. किसी सारणी का निर्माण करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए
? स्पष्ट करें।
Ans.
किसी सारणी का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-
1.
सारणी संक्षिप्त तथा एक नजर में पढ़ने योग्य होनी चाहिए। यह भारी-भरकम और बोझिल नहीं
होनी चाहिए।
2.
जिन संख्याओं पर बल देना है उन्हें मोटे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए, या उनके चारों
और एक वृत्त बना देना चाहिए।
3.
सारणी ऐसी हो कि दूसरे द्वारा आँकड़ों की तुलना संभव हो सके। जिन संख्याओं की तुलना
करनी हो उन्हें आसपास की पंक्तियों व स्तंभों में रखा जाना चाहिए।
4.
यदि संख्याएँ बहुत बड़ी हों तो उनका सन्निकटन किया जाना चाहिए (निकटतम करोड़ या लाख
तक), क्योंकि बड़ी संख्याओं को पढ़ना और उनकी तुलना करना कठिन होता है।
5.
यदि कोई प्रविष्टि शून्य प्रविष्टि शून्य हो तो इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। ताकि यह
न समझा जागे कि वहाँ पर कोई प्रविष्टि है ही नहीं।
Q. 2. वर्गीकरण तथा सारणीयन में अन्तर बतायें ।
Ans.
वर्गीकरण तथा सारणीयन में अन्तर इस प्रकार हैं-
|
वर्गीकरण |
सारणीयन |
|
1.
वर्गीकरण सर्मकों के संकलन (Collection) के बाद किया जाता है। |
1.
सारणीयन समंकों के वर्गीकरण के पश्चात् होता है। |
|
2.
वर्गीकरण में विभिन्न समंकों को भिन्न-भिन्न वर्गों में रखा जाता है। |
2.
सारणीयन में विभिन्न समंकों को भिन्न-भिन्न खानों में तथा पंक्तियों में रखा जाता
है। |
|
3.
वर्गीकरण समंकों के विश्लेषण में सहायक है। |
3.
सारणीयन समंकों के प्रस्तुतीकरण में सहायक है। |
Q. 3. सारणीयन के तीन लाभ लिखें।
Ans.
1. समझने में आसानी- सारणीवन से जटिल समंक सरल हो जाते हैं जिनसे उनको समझने
में आसानी रहती है।
2.
बचत- सारणीयन की सहायता से अधिक-से-अधिक सूचना कम-से-कम
स्थान में दिखाई जा सकती है।
3.
तुलनाओं में सहायक- तुलनाओं का अध्ययन करना सांख्यिकी
का मुख्य उद्देश्य है। सारणीयन तुलना करने में सहायता देती है।
Q. 4. सारणीयन के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
Ans.
सारणीयन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(i)
सारणीयन के माध्यम से आँकड़ों को आसानी से समझा जा सकता है।
(ii)
सारणीयन ते अनुसन्धान उद्देश्य का पता चल जाना चाहिए।
(iii)
सारणीयन से आँकड़े तुलनात्मक हो जाते हैं।
(iv)
सारणीयन द्वारा आँकड़े विवरणात्मक प्रस्तुतीकरण की तुलना में कम स्थान घेरते हैं।
(v)
आंकड़ों की त्रुटियों का पता चलता है।
(vi)
आँकड़ों का योग एवं अन्य प्रकार की गणनाएँ सरल बन जाती हैं।
Q. 5. चित्रमय प्रदर्शन के नियम समझायें।
Ans.
चित्रमय प्रदर्शन के मुख्य नियम निम्नलिखित हैं-
(i)
चित्र आकर्षक, साफ और सुन्दर होने चाहिए।
(ii)
चित्र का प्रदर्शन आँकड़ों की गात्राओं के हिसाब से उचित पैमाने की सहायता से दर्शाया
जाना चाहिए।
(iii)
चित्र का शीर्षक जेटा, सरल व सूचनाप्रद होना चाहिए।
(iv)
ज्यादा महत्वपूर्ण बात को दर्शाने के लिए चित्र को रंगीन या छायांकित बनाना चाहिए।
(v)
चित्र के साथ आंकड़ों को भी अंकित करना चाहिए।
Q. 6. दण्ड चित्र का विवेचन करें।
Ans.
दण्ड से अभिप्राय एक आयत या आयताकार चित्र से लिया जाता है। इसके द्वारा किसी घर के
मूल्य प्रकट होते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1.
लम्बाई या ऊँचाई में मूल्यों के अनुसार परिवर्तन आता रहता है अर्थात् लम्बाई ज्यावा
या कम हो जाती है लेकिन चौड़ाई समान रहती है।
2.
ये दण्ड खड़े अथवा उदग्र या पड़े अथवा शैधिज दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं, परन्तु
खड़े वण्ड ज्यादा प्रचलित है।
3.
ये दण्ड
एक जैसी दूरी पर बनाए जाते हैं।
4.
सभी दण्ड एक ही आधार रेखा पर स्थित होने चाहिए।
5.
यदि आंकड़ों का कोई विशेष क्रम न हो तो उन्हें बढ़ते हुए क्रम या घटते हुए कम के अनुसार
प्रस्तुत करना चाहिए।
6.
दण्डों को सुन्दर तथा आकर्षक बनाने के लिए इनमें रंग भर देना चाहिए।
Q. 7. दण्ड चित्रों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।
Ans.
दण्ड चित्रों के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-
1.
सरल दण्ड-चित्र- ये दण्ड चित्र एक चर के संख्यात्मक मूल्यों
को दण्ड के रूप में व्यक्त करते हैं।
2.
बहुगुणी दण्ड-चित्र- दो या अधिक चरों के मूल्यों
को दर्शाने के लिए इनका प्रयोग, किया जाता है।
3.
उपविभाजित दण्ड-चित्र- ये दण्ड चित्र किसी चर के
कुल व उपविभाजित मूल्यों को दर्शाते हैं।
4.
प्रतिशत दण्ड-चित्र- किसी घर के विभिन्न मदों
के प्र. श. मूल्यों को इनकी सहायता से दर्शाया जाता है।
Q.8. उप-विभाजित दण्ड चित्र का वर्णन कीजिए
Ans. सांख्यिकी में दण्डचित्र का विशेष स्थान है। उप-विभाजित दण्ड चित्र वह चित्र होते है जो किसी तथ्य के कुल मूल्य तथा उपविभाजन को प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार के वित्र में में विभिन्न भागों सम्पूर्ण मूल्य का एक दण्ड बनाकर उसका उपविभाजन कर दिया जाता है। दण्ड में को भिन्न-भिन्न दर्शाने के लिए उनमें विभिन्न रंग भर दिये जाते हैं। प्रत्येक दण्ड के विभिन्न मार्गो को एक ही क्रम में रखना चाहिए। इसे अन्तर्विभक्त दण्ड भी कह सकते हैं। जैसे उपविभाजित दण्ड चित्र को प्रकट किया गया है।
Q.9. x का एक आवृत्ति वितरण नीचे दिया गया है।
|
वर्गातराल |
आवृत्ति |
|
10-20 |
15 |
|
20-40 |
35 |
|
40-80 |
65 |
|
80-100 |
5 |
|
कुल |
120 |
(क) 'से कम' संचयी आवृत्तियाँ निकालें ।
(ख) 'से अधिक' आवृत्तियाँ निकालें
(ग) एक ग्राफ पर 'से कम' तथा 'से अधिक' तोरण बनाएँ।
(घ) दोनों तोरण एक-दूसरे को कहाँ काटते हैं ?
(ङ) का माध्यिका मूल्य निकालें ।
Ans.
(क) 'से कम' संचयी आवृत्ति सारणी-
|
से
कम |
आवृत्ति |
|
20
से कम |
15 |
|
40
से कम |
15+35=50 |
|
80
से कम |
50+65=115 |
|
100
से कम |
115+5=120 |
(ख)
'से अधिक' संचयी आवृत्ति सारणी -
|
से
अधिक |
आवृत्ति |
|
10
से अधिक |
120 |
|
20
से अधिक |
120-15=105 |
|
40
से अधिक |
105-35=70 |
|
80
से अधिक |
70-65=05 |

(घ) दोनों तोरण x (वर्गातराल) = 45,
y संचयी आवृत्ति 60 पर काट रहे हैं।
कटान बिन्दु के निर्देशांक = (45, 60)
(ङ) x का
माध्यिका मूल्य = 45
माध्यिका मूल्य x अक्ष पर वह मूल्य होता है जहाँ दोनों तोरण
एक-दूसरे को काटते हैं।
Q. 10. स. क. वि.-2 पालम गाँव न. दि. 45 स्कूल
की छात्राओं को एक परीक्षा में निम्नलिखित अंक प्राप्त हुए, जिन्हें कि आवृत्ति वितरण
में प्रस्तुत किया गया है-
|
अंक |
छात्रों की संख्या |
अंक |
छात्रों की संख्या |
|
0-5 |
13 |
25-30 |
14 |
|
5-10 |
17 |
30-35 |
10 |
|
10-15 |
23 |
35-40 |
17 |
|
15-20 |
25 |
40-45 |
14 |
|
20-25 |
40 |
45-50 |
12 |
उपरोक्त आँकड़ों से आवृत्ति बहुभुज बनाइए ।
Ans.
Q. 11. दण्ड आरेख तथा आयत चित्र में अंतर को रेखांकित कीजिए ।
Ans.
दण्ड आरेख तथा आयत चित्र में निम्नलिखित अंतर पाये जाते हैं-
(1)
दण्ड आरेख के लिए साधारण कागज का प्रयोग किया जाता है जबकि आयत चित्र ग्राफ पेपर पर
बनाने चाहिए।
(2)
दण्ड आरेख भौगोलिक आधार आँकड़ों का प्रदर्शन करने के लिए उपयुक्त होते हैं जबकि आयत
चित्र आवृत्ति वितरण के लिए उपयुक्त होते हैं।
(3)
दण्ड आरेख सरल होते हैं अतः इनका प्रयोग आम आदमी भी कर सकता है, परन्तु आयत चित्र समझने
में मुश्किल होते हैं, इन्हें समझने के लिए योग्य होना जरूरी है।
(4)
दण्ड आरेखों की सहायता से कई चरों का प्रदर्शन एक साथ किया जा सकता है लेकिन आयत चित्रों
में ऐसा संभव नहीं होता है।
(5)
दण्ड आरेखों में अंतर्गणना एवं बाहरी गणना नहीं की जा सकती है जबकि आयत चित्रों की
सहायता से यह संभव होती है।
(6)
दण्ड आरेखों की सहायता से केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप नहीं की जा सकती है परन्तु आयत
चित्रों की सहायता से केन्द्रीय प्रवृत्तियों की माप की जा सकती है।
Q. 12. निम्नलिखित सारणी में भारत में खाद्यान्नों के निरपेक्ष मूल्य
(लाख टन में) दिए गए हैं-
|
वर्ष |
खाद्यान्नों
का उत्पादन (लाख टन में) |
|
1966-67 |
1994 |
|
1997-98 |
1923 |
|
1998-99 |
2030 |
|
1999-00 |
1091 |
आँकड़ों
को उपयुक्त दण्ड-आरेख द्वारा दिखाएँ ।
Ans.

Q. 13. (क) एक अच्छी सारणी के अपेक्षित गुण क्या हैं ?
Ans.
एक अच्छी सारणी के अपेक्षित गुण इस प्रकार हैं-
(i)
सारणी सुसंबद्ध, संक्षिप्त तथा एक दृष्टि में पढ़ने लायक होनी चाहिए।
(ii)
सारणी के द्वारा आँकड़ों की ठीक प्रकार से तुलना की जा सके।
(iii)
जिन संख्याओं पर जोर देना होता है उन्हें आकर्षक बनाया जाना चाहिए।
(iv)
बहुत बड़ी संख्याओं के लिए निकटतम मानों का प्रयोग करना चाहिए।
(v)
शून्य प्रविष्टियों को भी दर्ज करना चाहिए।
(ख) आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण के लिए आरेख सारणियों की तरह सही तो नहीं
होते पर उनसे अधिक प्रभावशाली होते हैं। व्याख्या करें।
Ans.
आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण के लिए आरेख सारणियों की तरह सही तो नहीं होते पर अधिक प्रभावशाली
इसलिए होते हैं क्योंकि आरेख की सहायता से आँकड़ों की तुलना सरलता व शीघ्रता से की
जा सकती है।
Q. 14. निम्नलिखित तालिका में रा.व.मा.बा.वि. नं. 1 पालम गाँव के कुछ
छात्रों के मासिक व्यय के आँकड़े दिए गए हैं। इसे आवृत्ति आयत चित्र द्वारा दर्शाइए
।
|
वर्गातर
(रु.) |
छात्रों
की संख्या |
|
0-10 |
50 |
|
10-20 |
110 |
|
20-30 |
190 |
|
30-40 |
210 |
|
40-50 |
160 |
|
50-60 |
100 |
|
60-70 |
80 |
|
70-80 |
60 |
|
80-90 |
30 |
|
90-100 |
10 |
Ans.

Q. 15. भारतवर्ष में वर्ष 1998-99 में आयातों के स्त्रोत (प्रतिशत रूप
में) निम्न सारणी में दिए गए हैं—
|
(1) |
स्रोत
(2) |
प्रतिशत
(3) |
|
क |
संयुक्त
राष्ट्र अमेरिका |
8.7 |
|
ख
|
जर्मनी |
5.1 |
|
ग |
अन्य
यूरोपियन यूनियन सदस्य |
12.4 |
|
घ
|
इंग्लैण्ड |
6.1 |
|
ङ |
जापान |
5.7 |
|
च |
रूस |
1.3 |
|
छ |
अन्य
पूर्वी यूरोप |
0.4 |
|
ज |
तेल
उत्पादक राष्ट्र (ओपेक) |
18.7 |
|
झ |
एशिया |
15.7 |
|
ञ |
अन्य
अल्प विकसित देश |
5.6 |
|
ट |
अन्य |
20.3 |
उपरोक्त आँकड़ों को वृत्त आरेख द्वारा प्रस्तुत करें।
Ans.
|
(1) |
स्रोत (2) |
प्रतिशत (3) |
केन्द्र से कोण (4) |
|
क |
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका |
8.7 |
8.7x3.6 = 31.32 = 31 |
|
ख |
जर्मनी |
5.1 |
5.1 x 3.6 = 18.36 = 18 |
|
ग |
अन्य यूरोपियन यूनियन सदस्य |
12.4 |
12.4 x 3.6 = 44.65 = 45 |
|
घ |
इंग्लैण्ड |
6.1 |
6.1 x 3.6 = 21.96 = 22 |
|
ङ |
जापान |
5.7 |
5.7 x 3.6 = 20.5 = 21 |
|
च |
रूस |
1.3 |
1.3 x 3.6 = 4.68 = 5 |
|
छ |
अन्य पूर्वी यूरोप |
0.4 |
0.4 x 3.6 = 1.44 = 1 |
|
ज |
तेल उत्पादक राष्ट्र (ओपेक) |
18.7 |
18.7 x 3.6 = 67.32 = 67 |
|
झ |
एशिया |
15.7 |
5.7 x 3.6 = 56.52 = 57 |
|
ञ |
अन्य अल्प विकसित देश |
5.6 |
5.6 x 3.6 = 20.16 = 21 |
|
ट |
अन्य |
20.3 |
20.3 x 3.6 = 73.08 = 73 |
|
|
योग |
100 |
360° |
Q. 16. निम्न सारणी में 1998-99 में भारत में निर्यातों (प्रतिशत) की
दिशा दिखाई गई है-
|
(1) |
गंतव्य
(2) |
प्रतिशत
(3) |
|
क |
संयुक्त
राष्ट्र अमेरिका |
21.8 |
|
ख
|
जर्मनी |
5.6 |
|
ग |
अन्य
यूरोपियन यूनियन सदस्य |
14.7 |
|
घ
|
इंग्लैण्ड |
5.7 |
|
ङ |
जापान |
4.9 |
|
च |
रूस |
2.1 |
|
छ |
अन्य
पूर्वी यूरोप |
0.6 |
|
ज |
तेल
उत्पादक राष्ट्र (ओपेक) |
10.5 |
|
झ |
एशिया |
19.0 |
|
ञ |
अन्य
अल्प विकसित देश |
5.6 |
|
ट |
अन्य |
9.5 |
कुल निर्यात 33658.5 मिलियन
विभिन्न स्रोतों से निर्यातों के प्रतिशत वितरण को वृत्त आरेख द्वारा
दिखाएँ।
Ans.
|
(1) |
गंतव्य
(2) |
प्रतिशत (3) |
केन्द्र से कोण (4) |
|
क |
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका |
21.8 |
21.8x3.6 = 78.48 = 78 |
|
ख |
जर्मनी |
5.6 |
5.6x 3.6 = 20.16 = 20 |
|
ग |
अन्य यूरोपियन यूनियन सदस्य |
14.7 |
14.7 x 3.6 = 5.3 = 5 |
|
घ |
इंग्लैण्ड |
5.7 |
5.7 x 3.6 = 20.5 = 21 |
|
ङ |
जापान |
4.9 |
4.9 x 3.6 = 17.6 = 18 |
|
च |
रूस |
2.1 |
2.1 x 3.6 = 7.5 = 8 |
|
छ |
अन्य पूर्वी यूरोप |
0.6 |
0.6 x 3.6 = 2.2 = 2 |
|
ज |
तेल उत्पादक राष्ट्र (ओपेक) |
10.5 |
10.5 x 3.6 = 37.8 = 38 |
|
झ |
एशिया |
19.0 |
19.0 x 3.6 = 68.4 = 68 |
|
ञ |
अन्य अल्प विकसित देश |
5.6 |
5.6 x 3.6 = 20.15 = 20 |
|
ट |
अन्य |
9.5 |
9.5 x 3.6 = 34.42 = 34 |
|
|
योग |
100 |
360° |
Q. 17. रेखाचित्रीय प्रदर्शन की कुछ मुख्य सीमाएँ क्या हैं? लिखिए।
Ans.
रेखाचित्रीय प्रदर्शन की कुछ मुख्य सीमाएँ निम्नलिखित हैं-
1.
अपर्याप्त सूचना- किसी श्रृंखला के निश्चित मूल्यों का ज्ञान
ग्राफ पर केवल दृष्टि डालने से नहीं हो सकता। इसलिए कई बार ग्राफ से पर्याप्त सूचना
प्राप्त नहीं हो पाती है।
2.
कम महत्व- रेखाचित्र सब लोगों के लिए समान महत्व के नहीं
हैं। जिन लोगों को रेखाचित्र का ज्ञान नहीं है उनके लिए इनका कोई महत्व नहीं होता है।
3.
प्रवृत्ति का प्रदर्शन- रेखाचित्रों द्वारा मात्र
प्रवृत्ति का पता चलता है। इससे वास्तविक मूल्यों की जानकारी नहीं मिलती है। अतः ये
अधिक शुद्ध नहीं होते हैं।
4.
गलत निष्कर्ष- रेखाचित्र से गलत निष्कर्ष निकाले जा सकते
हैं। रेखाचित्र कई बार भ्रम उत्पन्न कर देते हैं। इससे गलत निष्कर्ष निकाले जा सकते
हैं। मापदण्ड में थोड़ा-सा परिवर्तन करने पर भी रेखा के आकार में ज्यादा बदलाव आ जाता
है।
Q. 18. बहुगुणी दण्ड चित्र पर टिप्पणी लिखें।
Ans.
दण्ड-चित्र विभिन्न प्रकार के होते हैं जिनमें बहुगुणी दण्ड-चित्र भी एक है। बहुगुणी
दण्ड चित्र वे चित्र होते हैं जो दो या दो से अधिक तथ्यों के आँकड़ों को प्रस्तुत करता
है। इनका प्रयोग विभिन्न तथ्यों जैसे- जन्म-दर तथा मृत्यु-दर की तुलना के लिए किया
जाता है। प्रत्येक तथ्य के मूल्य को प्रस्तुत करने के लिए अलग-अलग दण्ड बनाए जाते हैं।
विभिन्न तथ्यों से सम्बन्धित दण्डों को विभिन्न रंग भर कर दिखाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. सारणीयन से आप क्या समझते हैं? इसके उद्देश्य बताइए ।
Ans.
सारणीयन का अर्थ- सांख्यिकीय सामग्री को वर्गीकरण के पश्चात् सारणी (Table)
के रूप में प्रदर्शित किया जाता है जिससे संकलित सामग्री को सरल, सुविधाजनक एवं संक्षिप्त
बनाया जा सके। सारणीयन द्वारा एकत्रित सामग्री को सरल, संक्षिप्त व बोधगम्य बनाया जाता
है। सांख्यिकीय आँकड़ों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करने की किया को सारणीयन कहते
हैं।
ब्लेयर
(Blair) के शब्दों में, "सबसे विस्तृत अर्थ में समंकों की खानों और पंक्तियों
में क्रमबद्ध व्यवस्था को सारणीयन कहते हैं।"
उपर्युक्त
परिभाषा द्वारा स्पष्ट होगा कि सारणीयन उपलब्ध आँकड़ों की खानों तथा पंक्तियों में
सुचारु रूप से क्रमबद्ध करने की क्रिया है।
सारणीयन
के उद्देश्य - सारणीयन के विभिन्न उद्देश्य हैं जो इस
प्रकार हैं-
1.
व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण- सारणीयन का प्रमुख उद्देश्य
समंकों की स्तम्भों एवं पंक्तियों के रूप में क्रमबद्ध व्यवस्था करना है।
2.
तुलना में सरलता लाना- सारणीयन का उद्देश्य समंकों
को क्रमबद्ध ढंग से रखकर तुलना करने में सरलता लाना है।
3.
निर्वचन में सुविधा- समंकों को सारणीबद्ध करने
का उद्देश्य उनका सुविधाजनक निर्वचन करना भी होता है।
4.
प्रश्नों के उत्तर एक ही स्थान पर प्राप्त हो जाना- समंकों
को सारणी में प्रस्तुत करने से समस्त प्रश्नों के उत्तर एक ही स्थान पर सुगमता से मिल
जाते हैं।
5.
विशेषताओं का स्पष्टीकरण- समंकों को सारणीयन के रूप
में प्रस्तुत करने से उनकी विशेषताएँ प्रकट हो जाती हैं, जिससे समंक स्पष्ट रूप से
दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
6.
न्यूनतम स्थान- सारणी की सहायता से न्यूनतम स्थान में
अधिकतम एवं व्यवस्थित ढंग से समंकों को प्रस्तुत किया जा सकता है।
Q. 2. चित्रमय प्रस्तुतीकरण के लाभ समझाइए ।
Ans.
चित्रमय प्रस्तुतीकरण के विभिन्न लाभ इस प्रकार हैं-
1.
सरल व सुबोध सूचना- चित्रों की मदद से जटिल आँकड़ों
को सरल, साधारण एवं समझने योग्य बनाया जा सकता है। इनको देखते ही आँकड़ों की विशेषताएँ
समझ में आ जाती हैं।
2.
अधिक समय तक याद रहना- इनके द्वारा प्रस्तुत किए
गए आँकड़े मस्तिष्क पर लम्बे समय तक अंकित रहते हैं। उनको शीघ्रता से भुलाया नहीं जाता
है।
3.
आकर्षक और प्रभावशाली साधन- ग्राफ व चित्र आकर्षक और प्रभावशाली
होते हैं। यह मन और मस्तिष्क पर सीधा प्रभाव डालते हैं। एक तथ्य जो एक सामान्य व्यक्ति
अंकों द्वारा आसानी से नहीं समझ पाता उसे वह ग्राफ व चित्रों की सहायता से आसानी से
समझ पाता है। इसलिए कहा जाता है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है।
4.
समझने के लिए विशेष प्रशिक्षण एवं ज्ञान की आवश्यकता नहीं-
आँकड़ों को जब चित्रों द्वारा दर्शाया जाता है तो उनको समझने के लिए किसी विशेष ज्ञान
व ट्रेनिंग की जरूरत नहीं पड़ती। चित्रों को सहज स्वभाव से व साधारण ढंग से समझा जा
सकता है।
5.
एक ही दृष्टि से तुलना में सहायक- चित्रों से विभिन्न
प्रकार के आँकड़ों, की तुलना आसानी से की जाती है। दो विशेष क्षेत्रों में किए गए निवेश
को अगर चित्र के रूप में दर्शाया जाये तो उन दोनों का अन्तर आसानी से समझा जायेगा।
6.
सूचना के साथ मनोरंजन- चित्रों को देखने में मनोरंजन
होता है और इस मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। चित्रों के द्वारा
विभिन्न सूचनाओं के गहन अध्ययन में कोई रुकावट नहीं आती।
वास्तव
में समंकों का चित्रमय प्रदर्शन करने से सांख्यिकी निष्कर्ष आकर्षक रूप से प्राप्त
होता है।
Q. 3. वृत्तीय चित्र बनाने के महत्वपूर्ण चरण बतायें ।
Ans.
वृत्तीय चित्र बनाने के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-
1.
दिए हुए तथ्य के विभिन्न मूल्यों को कुल मूल्य के प्रतिशत में बदला जाना चाहिए। जैसे
ग्यारहवीं कक्षा में 50 विद्यार्थी हैं। इनमें से 30 विद्यार्थियों ने मैट्रिक प्रथम
श्रेणी में पास की है तथा 20 ने द्वितीय श्रेणी में पास की है।
अतएव
प्रथम श्रेणी में पास होने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत = (30÷50)×100=60%
और
द्वितीय श्रेणी में पास होने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत =(20÷50)×100=40%
2.
परकार तथा पेंसिल की मदद से वृत्त बनाइए।
3.
हर वृत्त के केन्द्र में कोणों का जोड़ 360° होता है। अथवा किसी आँकड़े से सम्बन्धित
विभिन्न मूल्यों को 360° के अंश के विभिन्न भागों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
हर मूल्य का अंश निकालने के लिए उसे 360 से गुणा करके 100 से भाग कर दिया जाता है।
जैसे ग्यारहवीं कक्षा में प्रथम श्रेणी में विद्यार्थियों का अंशों के रूप में मूल्य
निम्न प्रकार से निकाला जा सकता है-
प्रथम
श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थी = (60 ÷100)×360=216
द्वितीय
श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थी =(40÷100) x360=144
4.
प्रत्येक भाग को प्रस्तुत करने में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सबसे अधिक अंश बाले
तथ्य के ऊपरी भाग में दिखाया जाता है। उससे कम अंश वाले भागों को घड़ी की सूई के अनुसार
गिरते हुए क्रम में दिखाया जाना चाहिए।
5.
प्रत्येक भाग के निर्माण में शुद्धता का ध्यान रखने के लिए इनका माप प्रोटेक्टर की
मदद से किया जाना चाहिए।
6.
वृत्तीय चित्र के प्रत्येक भाग को स्पष्ट करने के लिये उनमें भिन्न-भिन्न रंगों को
भरना चाहिए। वास्तव में, इन नियमों को अपनाते हुए वृत्तीय चित्र बनाये जाते हैं।
Q. 4. निम्नलिखित तालिका को एक काल श्रेणी के आलेख के रूप में दर्शाइए-
भारत
का निबल घरेलू उत्पाद (हजार करोड़ रुपये)
|
वर्ष |
घरेलू
उत्पाद |
|
1950-51 |
130 |
|
1960-61 |
190 |
|
1970-71 |
230 |
|
1980-81 |
290 |
|
1990-91 |
400 |
|
2000-01 |
480 |
Ans.
X-अक्ष पर समय तथा Y-अक्ष पर घरेलू उत्पाद के आँकड़े दिये गये हैं। उन्हें सापेक्षित
रूप से ज्ञात करके चित्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है।

Q. 5. दो या दो से अधिक चरों का रेखाचित्र क्या है ? समझायें ।
Ans.
दो या दो से अधिक चरों वाले रेखाचित्र वे रेखाचित्र हैं जो विभिन्न समय से संबंधित
दो या दो से अधिक चरों से संबंधित संख्यात्मक आँकड़े प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के
लिए किसी शहर में एक वर्ष के विभिन्न महीनों में वर्षा व तापमान से संबंधित रेखाचित्र
को दो चरों का रेखाचित्र कहा जाता है। उदाहरण-
एक
शहर के विभिन्न महीनों में वर्षा (सेमी. में) तथा तापमान °C से संबंधित आँकड़े निम्नलिखित
तालिका द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं। इन्हें एक रेखाचित्र द्वारा प्रकट करें।
|
मास |
वर्षा
(सेमी.) |
तापमान
(°C) |
|
जनवरी |
5 |
22 |
|
फरवरी |
7.5 |
25 |
|
मार्च |
5 |
27 |
|
अप्रैल |
10 |
32 |
|
मई |
12.5 |
39 |
|
जून |
15 |
42 |
Q. 6. निम्नलिखित 200 व्यक्तियों की आय का लेखा आवृत्ति वितरण द्वारा
दिया गया है। इनके आधार पर 'से अधिक' संचयी आवृत्ति वक्रों का निर्माण कीजिए ।
|
आय
(रु. में) |
पुरुषों
की संख्या |
|
0-100 |
17 |
|
100-200 |
25 |
|
200-300 |
45 |
|
300-400 |
38 |
|
400-500 |
40 |
|
500-600 |
35 |
Ans.
आवृत्ति वितरण की 'से अधिक' संचयी आवृत्ति के आधार पर-
|
से
अधिक |
लोगों
की संख्या |
|
0
रुपये से अधिक आय |
200 |
|
100
रुपये से अधिक आय |
183 |
|
200
रुपये से अधिक आय |
158 |
|
300
रुपये से अधिक आय |
113 |
|
400
रुपये से अधिक आय |
75 |
|
500
रुपये से अधिक आय |
35 |
|
600
रुपये से अधिक आय |
0 |
Q. 7. कालिक श्रृंखला ग्राफ बनाने की विधि का वर्णन करें।
Ans.
जब किसी चर का मूल्य, समय से संबंधित होता है तो ऐसे आँकड़ों की श्रृंखला को कालिक
श्रृंखला कहते हैं। उदाहरण के लिए 1951 से 2002 तक की भारत की राष्ट्रीय आय से संबंधित
आँकड़ों की श्रृंखला कालिक श्रृंखला है। कालिक श्रृंखला के आधार पर बनाए गए रेखाचित्रों
को कालिक श्रृंखला रेखाचित्र या कालिक चित्र कहा जाता है। इन चित्रों को बनाते समय
X-अक्ष पर समय -अक्ष पर संबंधित आँकड़ों को दर्शाया जाता है। कालिक श्रृंखला रेखाचित्र
कई प्रकार के हैं। दो प्रकार के काल श्रेणी श्रृंखला चित्रों या निरपेक्ष कालिक चित्रों
का वर्णन इस प्रकार है-
1.
एक चर से संबंधित आँकड़ों का रेखाचित्र।
2.
दो या दो से अधिक चरों से संबंधित आँकड़ों का रेखाचित्र।
I.
एक चर से संबंधित आँकड़ों का रेखाचित्र- कालिक
श्रृंखला एक चर से संबंधित आँकड़ों का रेखाचित्र है जिसमें विभिन्न समय से संबंधित
किसी एक चर जैसे किसी शहर में विभिन्न महीनों में वर्षा के आँकड़ों का रेखाचित्र।
एक
शहर के जनवरी से जून तक महीने के वर्षा (सेमी. में) को निम्नलिखित तालिका द्वारा
दर्शाया गया है। इसे एक बिन्दु रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत करें।
|
मास |
वर्षा
(सेमी.) |
|
जनवरी |
5 |
|
फरवरी |
7.5 |
|
मार्च |
5 |
|
अप्रैल |
10 |
|
मई |
12.5 |
|
जून |
15 |
Q. 8. आयत चित्र बनाने की प्रक्रिया का वर्णन करें, जब वर्ग अंतराल-
(क) समान हो ।
(ख) समान न हो।
Ans.
(क) जब वर्ग अंतराल समान होते हैं तो आयत चित्र बनाने की प्रक्रिया निम्नलिखित होती
है-
(i)
वर्ग अंतराल OX-अक्ष पर दर्शाए जाने चाहिए।
(ii)
आवृत्तियों को QY-अक्ष पर दर्शाए जाने चाहिए।
(iii)
आयत का निर्माण इस प्रकार करना चाहिए जिससे प्रत्येक आयत का क्षेत्रफल, वर्गान्तराल
की आवृत्ति के अनुपात में होना चाहिए। जैसे-
सांख्यिकी
के अंकों का आवृत्ति वितरण
|
वर्गांतराल |
छात्रों
की संख्या |
|
0-10 |
6 |
|
10-20 |
5 |
|
20-30 |
33 |
|
30-40 |
14 |
|
40-50 |
6 |
|
50-60 |
11 |
(ख)
असमान वर्गातराल वाले आयत चित्र का निर्माण निम्न प्रकार होता है-
(i)
वर्गांतराल OX-अक्ष पर दर्शाए जाने चाहिए।
(ii)
f' (आवृत्तियों) को OY-अक्ष पर दर्शाया जाना चाहिए।
(iii)
f' की गणना करने के लिए प्रत्येक वर्ग की आवृत्ति को वर्गांतराल या वर्ग की चौड़ाई
से भाग देना चाहिए।
इस
प्रकार बनाए गए प्रत्येक आयत का क्षेत्रफल वर्गांतराल में आवृत्तियों के समान होगा।
जैसे-
सांख्यिकी
के अंकों का आवृत्ति वितरण
|
वर्गातराल
अंक |
आवृत्ति
(f) छात्र संख्या |
f'
= f' ÷वर्गातराल |
|
0-15 |
161 |
161÷15=11 |
|
15-25 |
152 |
152÷10=15 |
|
25-50 |
60 |
60÷25=2 |
|
50-100 |
27 |
27÷50=1 |
Q.9. 450 श्रमिकों की दैनिक मजदूरी आय (रु. में) का आवृत्ति वितरण नीचे
दिया गया है-
|
दैनिक
आय (रु. में) |
व्यक्तियों
की संख्या |
|
70-80 |
44 |
|
80-90 |
120 |
|
90-100 |
80 |
|
100-110 |
76 |
|
110-120 |
50 |
|
120-130 |
45 |
|
130-140 |
25 |
|
140-150 |
10 |
|
|
कुल
450 |
निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(क) एक आवृत्ति आयत चित्र बनाकर उस पर एक आयत बहुभुज तथा एक आवृत्ति
वक्र को अध्यारोपित करें।
Ans.
आवृत्ति बहुभुज गहरी लाइनों की सहायता से दर्शाया गया है। आवृत्ति वक्र हल्की (पेंसिल)
लाइनों से दर्शाया गया है।

(ख) संचयी आवृत्तियाँ निकालें तथा तोरण बनाएँ।
Ans.
|
दैनिक
आय (रु. में) |
व्यक्तियों
की संख्या |
संचयी
आवृत्ति |
|
70-80 |
44 |
44 |
|
80-90 |
120 |
44+120=164 |
|
90-100 |
80 |
164+80=244 |
|
100-110 |
76 |
244+76=320 |
|
110-120 |
50 |
320+50=370 |
|
120-130 |
45 |
370+45=415 |
|
130-140 |
25 |
415+25=440 |
|
140-150 |
10 |
440+10=450 |
|
|
कुल
450 |
|
(ग) 'माध्यिका' दैनिक मजदूरी निकालें ।
|
से
कम |
संचयी
आवृत्तियाँ |
|
80
से कम |
44 |
|
90
से कम |
44+120=164 |
|
100
से कम |
164+80=244 |
|
110
से कम |
244+76=320 |
|
120
से कम |
320+50=370 |
|
140
से कम |
370+45=415 |
|
130
से कम |
415+25=440 |
|
150
से कम |
440+10=450 |
|
से
अधिक |
संचयी
आवृत्तियाँ |
|
70
से अधिक |
450 |
|
80
से अधिक |
450-44=406 |
|
90
से अधिक |
406-120=286 |
|
100
से अधिक |
286-80=206 |
|
110
से अधिक |
206-76=130 |
|
120
से अधिक |
130-50=80 |
|
130
से अधिक |
80-45=35 |
|
140
से अधिक |
35-25=10 |
दैनिक
आय (रु. में) की माध्यिका 100 रु.
Q. 10. एक सारणी के भागों की व्याख्या संक्षेप में करें।
Ans.
सांख्यिकीय सारणी के प्रमुख भाग इस प्रकार हैं-
1.
सारणी संख्या- सारणी को सर्वप्रथम एक संख्या (सारणी संख्या)
दी जाती है। एक अध्याय में अनुसूचियाँ जिस क्रम में बनाई जाती हैं; उसी के अनुसार उसकी
संख्या दी जानी चाहिए। सारणी संख्या से उन्हें ढूँढने में सहायता मिलती है।
2.
शीर्षक- प्रत्येक सारणी में संख्या के पश्चात सबसे ऊँचा
शीर्षक दिया जाता है। शीर्षक मोटे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए ताकि तुरंत ही ध्यान
आकर्षित कर सके। शीर्षक सरल, स्पष्ट और छोटा होना चाहिए ताकि उसे पढ़ते ही पता लग जाए
कि
(i)
आँकड़े किस समस्या से सम्बन्धित हैं,
(ii)
आँकड़े किस समय से संबंधित हैं,
(iii)
आँकड़े किस स्थान से संबंधित हैं,
(iv)
आँकड़ों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है।
3.
शीर्ष टिप्पणी- यदि शीर्षक से सारी सूचना प्रकट नहीं होती,
तो उसके तुरन्त नीचे शीर्ष टिप्पणी दी जानी चाहिए। इसमें वह अतिरिक्त सूचना दी जाती
है जो शीर्षक में नहीं दी जाती है। जैसे शीर्षक टिप्पणी में यह बताया जाता है कि आँकडे
किस इकाई लाख टन में व्यक्त किए गए हैं। इन्हें ब्रेकेट्स में लिखा जाता है।
4.
पंक्ति शीर्षक- सारणी की पंक्तियों के शीर्षक को पंक्ति
शीर्षक कहते हैं। इसके द्वारा सरल भाषा में पता चलता है कि पंक्तियों द्वारा क्या दिखाया
जा रहा है।
5.
उप-शीर्षक- सारणी के खानों के शीर्षक को उप-शीर्षक कहते
हैं। इससे पता चलता है कि हर कॉलम में कौन-से आँकड़े दर्शाए जा रहे हैं। उप-शीर्षक
के अंतर्गत कई अन्य शीर्षक भी होते हैं। जैसे विद्यार्थियों वाले उप-शीर्षक को लड़कों
या लड़कियों में विभाजित किया जाता है।
6.
कलेवर या क्षेत्र- सारणी का सबसे महत्त्वपूर्ण
भाग कलेवर या क्षेत्र है। इसके द्वारा सारणी में दी गई सारी सूचना को दर्शाया जाता
है। प्रत्येक आँकड़े को कॉलम तथा पंक्ति द्वारा बनाए गए खाने में अलग-अलग लिखा जाता
है।
7.
टिप्पणी- सारणी में दिए गए आँकड़ों के स्पष्टीकरण के
लिए टिप्पणी देने की जरूरत होती है। यह टिप्पणी सारणी के नीचे लिखी जाती है। टिप्पणी
तभी दी जानी चाहिए जब कोई आँकड़े या सूचना स्पष्ट न हो या उसके विषय में कोई विशेष
सूचना देनी हो।
8.
स्रोत- यदि सारणी में द्वितीयक आँकड़ों को प्रकट किया
गया है, तो उन आँकड़ों का स्रोत अर्थात् वे आँकड़े कहाँ से लिए गए हैं, सारणी के नीचे
दिया जाता है। स्रोत के विषय में ऐसी जानकारी दी जानी चाहिए जैसे उसका नाम, प्रकाशन
वर्ष, पृष्ठ संख्या, प्रकाशन का पता आदि।
Q.11. सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के क्षमता प्रयोग का आवृत्ति वितरण
नीचे दिया गया है-
|
क्षमता
प्रयोग (%) |
इकाइयों
की संख्या |
|
50
से कम |
14 |
|
50.1-60 |
14 |
|
60.1-70 |
5 |
|
70.1-80 |
10 |
|
80.1-90 |
10 |
|
90.1-100 |
7 |
|
100
से अधिक |
20 |
|
कुल |
80 |
(क) एक आयत चित्र बनाएँ तथा उस पर एक आवृत्ति बहुभुज तथा एक आवृत्ति
वक्र को अध्यारोपित करें। ध्यान रहे कि उत्तरोत्तर वर्ग अंतरालों के अंतिम बिन्दुओं
के बीच अंतर है। हम वर्ग अंतरालों का अंतर दूर करने के लिए इस प्रकार सुधार कर सकते
हैं-
50.5, 50.5-60.5, 60.5-70.5.....100.5
Ans.
(क) समायोजित श्रृंखला
|
वर्गांतराल |
इकाइयों
की संख्या |
|
50
से कम |
14 |
|
50.1-60 |
14 |
|
60.1-70 |
5 |
|
70.1-80 |
10 |
|
80.1-90 |
10 |
|
90.1-100 |
7 |
|
100
से अधिक |
20 |
|
कुल |
80 |
1.
आवृत्ति बहुभुज गहरी लाइनों से दर्शाया गया है।
2.
आवृत्ति वक्र हल्की लाइनों (पंसिल) से दर्शाया गया है।
(ख) पहला तथा अंतिम वर्ग अंतराल यदि विवृत हो तो क्या होगा ? आप कैसे
इस स्थिति को हल करेंगे ?
Ans.
पहला तथा अंतिम वर्ग यदि विवृत होता है तो इस स्थिति को हल करने के लिए समान वर्ग अंतराल
वाले वर्गों को समायोजित कर लेते हैं। जैसे 50.5 से पूर्व 40.5 अर्थात्
(40.5-50.5) वर्ग तथा अंतिम वर्ग के लिए 100.5 से अगला वर्ग लेते हैं
(100.5-110.5)
इस
प्रकार का समायोजन उस स्थिति में ही किया जाता है जब सभी वर्ग अंतरालों में समान अंतराल
होता है। अतः प्रश्न में दी गई तालिका को हम इस प्रकार लिख सकते हैं-
|
वर्ग
अन्तराल |
इकाइयों
की संख्या |
|
40.5-50.5 |
14 |
|
50.5-60.5 |
14 |
|
60.5-70.5 |
5 |
|
70.5-80.5 |
10 |
|
80.5-90.5 |
10 |
|
90.5-100.5 |
7 |
|
100.5-110.5 |
20 |
|
कुल |
80 |
Q. 12. आवृत्ति वनों की विभिन्न आकृतियों के बारे में चित्र सहित वर्णन
करें।
Ans.
आवृत्ति वितरणों की आकृतियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं। इनके द्वारा वितरण की आधारभूत
किस्में व्यक्त होती हैं। निम्नलिखित रेखाचित्रों द्वारा विभिन्न प्रकार के आवृत्ति
वक्र दिखाए गए हैं-

1.
सामान्य वक्र- रेखाचित्र में दर्शाए गए वक्र को सामान्य
वक्र कहा जाता है। इस वक्र में आवृत्ति पहले धीरे-धीरे उच्चतम सीमा तक बढ़ती है उसके
बाद उसी दर से घटती है। इस वक्र की अधिकतम आवृत्ति केन्द्रीय वर्ग है जो प्रत्येक सिरे
की ओर बिल्कुल एक ही तरह से घटती AY →
सामान्य आकार वक्र है। इस वक्र को घटाकार वक्र भी कहा जाता है। ये वक्र व्यावहारिक
जीवन में बहुत कम पाए जाते हैं। परन्तु सांख्यिकी के अध्ययन में इनका विशेष महत्व है।
इनके द्वारा निदर्शन से संबंधित समस्याओं को समझने में सहायता मिलती है।
2.
अंग्रेजी अक्षर- रेखाचित्र में U अक्षर का वक्र प्रदर्शित
किया गया है। इस वक्र का आकार अग्रेजी अक्षर U शब्द होता है। इस प्रकार का वक्र उस
स्थिति में बनता है जब सबसे छोटी व सबसे बड़ी मद में अधिकतर आवृत्तियाँ होती हैं अर्थात्
वितरण के शुरू तथा अन्त में अधिकतर आवृत्तियाँ होती हैं। वितरण के मध्य में कम आवृत्तियाँ
होती हैं।
3.
धनात्मक विषम वक्र- यह एक असममित वक्र है। असमितता
आवृत्ति वाले वक्र की एक ओर, दूसरी ओर की अपेक्षा ज्यादा विस्तार होता है अर्थात् उसका
दाईं ओर का सिरा या बायीं ओर का सिरा अधिक लम्बा होता है। इन वक्रों का एक सिरा लम्बा
व दूसरा छोटा होता है। इन वक्रों के आँकड़ों में न्यूनतम मूल्यों की आवृत्ति ज्यादा
होती है व उच्चतम मूल्यों की आवृत्ति कम होती है। इस वक्र का लम्बा सिरा दायीं ओर होता
है। इसे चित्र द्वारा प्रकट किया गया है।
4.
ऋणात्मक विषम वक्र- यह वक्र भी असममित वर्ग वाले
वक्र की तरह है। इसे रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है। इसका लम्बा सिरा बायीं ओर होता
है। इस वक्र में उच्चतम आवृत्तियाँ बड़ी संख्या के साथ संबंधित होती हैं व थोड़ी आवृत्तियाँ
छोटी संख्या के साथ संबंधित होती हैं।
5. अंग्रेजी अक्षर J- यह वक्र उस समय बनता है जब उच्चतम आवृत्तियाँ बड़ी मदों से संबंधिन होती हैं। यह वक्र अंग्रेजी भाषा के J अक्षर जैसा है। इस प्रकार के वक्रों में मूल्यों की उच्चतम आवृत्तियाँ एक सिरे पर होती हैं। वे बीच में नहीं होतीं। यह वक्र न्यूनतम मूल्यों से उच्चतम मूल्यों की ओर जाता है।
6.
विपरीत J-वक्र - इस प्रकार का वक्र उस स्थिति में बनता
है जब न्यूनतम मूल्यों पर उच्चतम आवृत्तियाँ तथा बड़े मूल्यों पर कम आवृत्तियाँ होती
हैं।

7.
द्विभूयिष्ठक वक्र-द्विभूयिष्ठक वक्र को रेखाचित्र
में दर्शाया गया है। इस चित्र को उस स्थिति में बनाया जाता है जिसमें दो वर्गान्तरों
या मूल्यों की आवृत्तियाँ उच्चतम होती हैं। ऐसे वक्र को द्विभूयिष्ठक वक्र कहते हैं।

Q. 13. रेखाचित्र बनाने के नियम की व्याख्या कीजिए ।
Ans.
रेखाचित्र बनाने में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है
1.
शीर्षक- रेखाचित्र का एक स्पष्ट व उपयुक्त शीर्षक होता
है। शीर्षक को पढ़ते ही यह पता लगाना चाहिए कि रेखाचित्र किस विषय से संबंधित हैं।
2.
पैमाना पता- रेखाचित्र बनाते समय एक उपयुक्त पैमाने
का चुनाव करना पड़ता है। उपयुक्त पैमाने के द्वारा सभी आँकड़ों को प्रदर्शित किया जा
सकता है।
3.
प्रदर्शन का तरीका-आर्थिक तथा व्यावसायिक आँकड़े
ज्यादातर धनात्मक होते हैं। अतः मूल बिन्दु ग्राफ पेपर के नीचे और बायीं ओर रखा जाता
है। OX अक्ष पर बिन्दुओं की गति बायें से दार्थी ओर तथा OY अक्ष पर नीचे से ऊपर की
ओर होती है।
4.
विभिन्न प्रकार की सेवाएँ- यदि एक ही ग्राफ में एक से
अधिक रेखाओं को दर्शाना हो तो विभिन्न प्रकार की रेखाएँ खींची जानी चाहिए जैसे हल्की
रेखा (-), गहरी काली रेखा (-), खण्डित रेखा (-----), बिन्दु रेखा (.......) आदि।
5.
आँकड़ों की सारणी- वक्रों की शुद्धता की जाँच
के लिए रेखाचित्र के साथ-साथ आँकड़ों की सारणी भी देनी चाहिए।
6.
कृत्रिम आधार रेखा का प्रयोग- यदि तत्वों के मूल्य बहुत
बड़े हों अर्थात् शून्य और उनके न्यूनतम मूल्य में अन्तर बहुत ज्यादा है तथा उन मूल्यों
को ग्राफ के Y-अक्ष पर प्रकट किया जाता है। इस अवस्था में कृत्रिम आधार रेखा का प्रयोग
करना चाहिए।
7.
रेखा खींचना- ग्राफ पेपर पर विभिन्न बिन्दुओं को दर्शाने
के बाद उन्हें पैमाने से मिला देना चाहिए। बिन्दुओं को मिला देने वाली रेखा उनके बीच
से होकर जानी चाहिए। यह रेखा शुरू से आखिर तक एक समान रहनी चाहिए। यह रेखा कहीं मोटी
तथा कहीं पतली होनी चाहिए।
Q. 14. रेखाचित्रीय प्रदर्शन के गुणों का वर्णन कीजिए ।
Ans.
रेखाचित्रीय प्रदर्शन आँकड़ों को प्रस्तुत करने का आकर्षक, सरल व प्रभावशाली तरीका
है। इसके परिणामस्वरूप आँकड़ों के अर्थ समझने और उनकी तुलना करने में मदद मिलती है।
इससे श्रम और समय की बचत होती है। रेखाचित्रीय प्रदर्शन के कुछ विशेष लाभ हैं जो निम्नलिखित
हैं
1.
औसत का निर्धारण- विशेष प्रकार की रेखाचित्रों की सहायता
से भूयिष्ठक, माध्यिका आदि की गणना की जा सकती है। चित्रों द्वारा यह संभव नहीं है।
2.
पूर्व अनुमान में आसानी- रेखाचित्रों की मदद से आँकड़ों
का आन्तरिक, बाहरी गणना तथा पूर्व अनुमान आसानी से तथा शीघ्रता से लगाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, 1901 से 1991 तक की जनगणनाओं के आँकड़ों की सहायता से 1951 या 1981
की जनसंख्या का अनुमान लगाया जा सकता है।
3.
सहसंबंध का अध्ययन-रेखाचित्रों की मदद से आँकड़ों
के सह-संबंध जैसे मांग एवं कीमत, उत्पादन व लागत, पूर्ति व कीमत आदि का आसानी से अध्ययन
किया जा सकता है।
4.
विविध माप वाले आँकड़ों की तुलना-रेखाचित्र द्वारा विविध
माप वाले बहुगुणी आँकड़ों की आपस में आसानी से तुलना की जा सकती है। जहाँ कहीं भी आँकड़ों
का रिकार्ड रखना हो, निष्कर्ष निकालने हों, तथ्यों का वर्णन करना हो वहाँ रेखाचित्र
एक ऐसा महत्वपूर्ण तरीका उपलब्ध कराते हैं जिसकी शक्ति का अनुभव व प्रयोग करना हम अभी
शुरू कर रहे हैं।
5.
काल श्रृंखला तथा आवृत्ति वितरण का प्रदर्शन- काल
श्रृंखला तथा आवृत्ति वितरण को दर्शाने के लिए विन्दु रेखाचित्र अत्यन्त उपयोगी तथा
प्रभावशाली तरीका है।
Q. 15. आवृत्ति बहुभुज की रचना कैसे की जाती है ? समझाइए ।
Ans.
आवृत्ति आयत चित्र के प्रत्येक आयत के शीर्ष के मध्य बिन्दुओं को पैमाने की सहायता
से मिलाकर बनाया जाता है।
आवृत्ति
आयत चित्र बनाए बगैर भी आवृत्ति बहुभुज बनाया जा सकता है। इस प्रकार आवृत्ति वाहुभुज
बनाने के लिए प्रत्येक वर्ग अंतराल के मध्य बिन्दुओं X-अक्ष पर दर्शाते हैं तथा आवृत्तियों
को Y-अक्ष पर। मध्य बिन्दुओं एवं संगत आवृत्तियों के संयोग से ग्राफ पेपर बिन्दुओं
को अंकित करके आपस में जोडने से आवृत्ति बहुभुज बनाया जाता है। आवृत्ति बहुभुज के दोनों
किनारों को X-अक्ष (आधार-रेखा) तक बढ़ाया जाता है।
|
वर्ग-अंतराल |
बारम्बारता |
|
0-10 |
10 |
|
10-20 |
20 |
|
20-30 |
15 |
|
30-40 |
12 |
|
40-50 |
5 |
Q. 16. अन्तर्विभक्त दण्ड-चित्र किसे कहते हैं ? इसका निर्माण कैसे
किया जाता है ?
Ans.
अन्तर्विभक्त दण्ड-चित्र (Sub-Divided Bar Diagram) - ऐसी दशा में जब समंकों के योग
तथा उनके विभिन्न विभागों (sub-divisions) का प्रदर्शन करना आवश्यक हो तो अन्तर्विभक्त
दण्ड-चित्र का प्रयोग किया जाना चाहिए। रचना की दृष्टि से सर्वप्रथम दिए हुए पद-मूल्यों
के अनुसार विभिन्न दण्ड बनाए जाते हैं और प्रत्येक दण्ड को उसके विभागों के अनुपात
में विभक्त कर दिया जाता है।
उदाहरण
- निम्नलिखित समंकों का अन्तर्विभक्त चित्र द्वारा प्रदर्शन :
|
वर्ष |
निर्यात |
आयात |
व्यापार
शेष |
|
1993 |
73 |
70 |
3 |
|
1994 |
80 |
72 |
8 |
|
1995 |
85 |
74 |
11 |
|
1996 |
80 |
85 |
-5 |
व्यावहारिक
प्रश्न
Q. 1. निम्नलिखित तालिका के विभिन्न देशों के प्रति हजार जन्म-दर दिए
गए हैं। एक उचित रेखा चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए ।
|
देश |
जन्म-दर: |
|
चीन |
40 |
|
भारत |
33 |
|
न्यूजीलैंड |
30 |
|
इंग्लैण्ड |
20 |
|
जर्मनी |
16 |
|
स्वीडन |
15 |
Ans.

Q. 2. वर्ष 2003-2004 में एक यूनिवर्सिटी से सम्बन्धित विभिन्न विषयों
के बारे में उपलब्ध निम्नलिखित सूचना को रेखा चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए ।
|
विषय |
विद्यार्थियों
की संख्या |
|
कला |
1500 |
|
विज्ञान |
1450 |
|
कॉमर्स |
1400 |
|
कानून |
1350 |
|
शिक्षा |
1300 |
|
इंजीनियरिंग |
1200 |
|
मेडिकल |
1100 |
Ans.

Q.3. भारत के विदेश व्यापार से सम्बन्धित आँकड़ों को रेखाचित्र का रूप
दें।
(करोड़
रु.)
|
वर्ष |
आयात |
निर्यात |
|
1993-94 |
961 |
640 |
|
1994-95 |
1087 |
643 |
|
1995-96 |
958 |
677 |
|
1996-97 |
981 |
709 |
Ans.
भारत के आयात एवं निर्यात

Q. 4. 1994-95 से 1997-99 के समय से सम्बन्धित डी. ए. वी. कॉलेज के
चार विषयों में विद्यार्थियों की संख्या में परिवर्तन किए गए हैं। उन्हें बहुगुणी दण्ड
चित्र द्वारा दर्शाएँ।
विद्यार्थियों
की संख्या
|
विषय |
1994-95 |
1995-96 |
1996-97 |
|
कला |
1200 |
1100 |
900 |
|
विज्ञान |
800 |
900 |
1200 |
|
वाणिज्य |
400 |
500 |
350 |
|
कानून |
300 |
400 |
350 |
Ans.

Q. 5. निम्नलिखित समंकों को पाई चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
|
मदें |
व्यय
(प्रतिशत) |
|
मजदूरी |
25 |
|
ईंटें |
15 |
|
सीमेन्ट |
20 |
|
लोहा |
15 |
|
लकड़ी |
10 |
|
देख-रेख |
15 |
Ans.

Q. 6. निम्नलिखित आँकड़ों को ग्राफ द्वारा प्रदर्शित करें-
|
वर्ष |
उत्पादन
(प्रति हेक्टेयर क्विंटल) |
|
1991 |
13.9 |
|
1992 |
12.8 |
|
1993 |
13.9 |
|
1994 |
12.8 |
|
1995 |
6.5 |
|
1996 |
2.9 |
|
1997 |
14.4 |
Ans.
Q. 7. भारतीय औद्योगिक लाभ से सूचकांक दिए गए हैं, इन्हें काल श्रेणी
आलेख द्वारा दिखाइए ।
|
वर्ष |
भारतीय
औद्योगिक लाभ का सूचकांक |
|
1991 |
187 |
|
1992 |
222 |
|
1993 |
246 |
|
1994 |
239 |
|
1995 |
234 |
|
1996 |
229 |
|
1997 |
192 |
|
1998 |
260 |
|
1999 |
182 |
|
2000 |
247 |
Ans. उपर्युक्त आँकड़ों के मध्य उतार-चढ़ाव बहुत कम हैं। इसलिए अनुमानित आधार रेखा का प्रयोग करें।
Q. 8. निम्नलिखित समंकों को आवृत्ति-चित्र द्वारा प्रदर्शित करें-
|
अंक |
आवृत्ति |
|
0-10 |
4 |
|
10-20 |
10 |
|
20-30 |
16 |
|
30-40 |
22 |
|
40-50 |
20 |
|
50-60 |
18 |
|
60-70 |
8 |
|
70-80 |
2 |
Ans.
Q. 9. निम्नलिखित समंकों का आवृत्ति आयत-चित्र (Histogram), आवृत्ति
बहुभुज (Frequency Polygon) तथा आवृत्ति वक्र (Frequency Curve) बताइए।
|
फैक्टरी
में श्रमिकों की संख्या (X) |
फैक्टरियों
की संख्या (F) |
|
0-10 |
8 |
|
10-20 |
20
|
|
20-30 |
36 |
|
30-40 |
15 |
|
40-50 |
6 |
Ans.
Q. 10. निम्नलिखित समंकों की सहायता से संचयी आवृत्ति बनाइए-
|
अंक: |
छात्रों
की संख्या |
|
0-10 |
5 |
|
10-20 |
12 |
|
20-30 |
14 |
|
30-40 |
10 |
|
40-50 |
8 |
Ans.
|
इतने
से कम रीति |
छात्रों
की संख्या |
|
10
से कम |
5 |
|
20
से कम |
17 |
|
30
से कम |
31 |
|
40
से कम |
41 |
|
50
से कम |
49 |
Q. 11. एक क्षेत्र के 30 परिवारों का मासिक व्यय निम्नलिखित है-
115 159 196 205 212 223
256 271 310 129 335 169
184 234 245 241 265 298
144 135 172 173 229 243
220 238 278 243 220 238
निम्नलिखित वर्गांतरों का प्रयोग करके एक आवत्ति बंटन बनाइए-
100-150,
150-200, 200-250, 250-300 और 300-350
Ans.
|
वर्गान्तर |
कुल
आवृत्ति |
|
100-150 |
4 |
|
150-200 |
7 |
|
200-250 |
12 |
|
250-300 |
5 |
|
300-350 |
2 |
|
|
30 |
JCERT/JAC REFERENCE BOOK
Group -A सांख्यिकी के सिद्धान्त
Group-B भारतीय अर्थव्यवस्था
JCERT/JAC प्रश्न बैंक - सह - उत्तर पुस्तक (Question Bank-Cum-Answer Book)
विषय सूची
क्र०स० | अध्याय का नाम |
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी | |
1. | |
2. | |
3. | |
4. | |
5. | |
6. | |
7. | |
8. | |
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास | |
1. | |
2. | |
3. | |
4. | |
5. | |
6. | |
7. | |
8. | |




























