8. सूचकांक INDEX NUMBER
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर
Q. 1. मदों के सापेक्षिक महत्त्व को बताने
वाले सूचकांक को-
(a) भारित सूचकांक कहते हैं।
(b) सरल समूहित सूचकांक कहते हैं।
(c) सरल मूल्यानुपातों का औसत कहते हैं।
Ans. (a) भारित सूचकांक कहते हैं।
Q. 2. अधिकांश भारित सूचकांकों में भार का
सम्बन्ध-
(a) आधार वर्ष से होता है
(b) वर्तमान वर्ष से होता है
(c) आधार एवं वर्तमान वर्ष दोनों से होता है
Ans. (b) वर्तमान वर्ष से होता है।
Q. 3. ऐसी वस्तु जिसका सूचकांक में कम भार
है, उसकी कीमत में परिवर्तन से सूचकांक में कैसा परिवर्तन होगा?
(a) कम
(b) अधिक
(c) अनिश्चित
Ans. (a) कम
Q. 4. कोई उपभोक्ता सूचकांक किस परिवर्तन को
मापता है?
(a) खुदरा कीमत
(b) थोक कीमत
(c) उत्पादकों की कीमत
Ans.
(a) खुदरा कीमत
प्र.5. औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत
सूचकांक में किस मद के लिए उच्चतम भार होता है?
(क) खाद्य-पदार्थ
(ख) आवास
(ग) कपड़े
Ans.
(a) खाद्य-पदार्थ
Q. 6. सामान्यत मुद्रा-स्फीति के परिकलन में
किसका प्रयोग होता है?
(a) थोक कीमत सूचकांक
(b) उपभोक्ता कीमत सूचकांक
(c) उत्पादक कीमत सूचकांक
Ans. (a) थोक कीमत सूचकांक
Q. 7. हमें सूचकांक की आवश्यकता क्यों होती है ?
Ans.
सूचकांक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। निम्न कारणों से सूचकांक की जरूरत
होती है-
(1)
मजदूरी दर तय करने, आय नीति का निर्धारण, लगान, कर कीनत निर्धारण एवं सामान्य आर्थिक
नीति बनाने के लिए सूचकांक का प्रयोग किया जाता है।
(2)
मुद्रास्फीति, समूहित कीमतों में परिवर्तन को मापने के लिए थोक मूल्य सूचकांक का प्रयोग
होता है।
(3)
उपभोक्ता सूचकांक, मुद्रा की क्रय शक्ति मापने के लिए प्रयोग किया जाता है।
(4)
औद्योगिक उत्पादन में होने वाले परिवर्तन के माप के लिए औद्योगिक उत्पादन की आवश्यकता
होती है।
(5)
कृषि क्षेत्र की प्रगति का जायजा लेने के लिए कृषि उत्पादन सूचकांक आवश्यक होता है।
Q. 8. आधार अवधि के वांछित गुण क्या होते हैं?
Ans.
आधार अवधि के वांछित गुण-
(i)
आधार वर्ष सामान्य वर्ष होना चाहिए-अकाल, प्राकृतिक आपदाओं एवं युद्ध वाले वर्षों को
आधार वर्ष नहीं बनाना चाहिए। (ii) आधार वर्ष अत्यधिक पुराना एवं नया नहीं होना चाहिए।
(iii) आधार वर्ष ऐसा होना चाहिए जिसके वास्तविक आँकड़े पर्याप्त मात्रा में आसानी से
मिल जाने चाहिए। (iv) आधार वर्ष अत्यधिक पुराना न हो। क्योंकि बहुत पुराना वर्ष लेने
से कई पुरानी वस्तुएँ बाहर हो जाती हैं एवं दूसरी कई वर्तमान वर्ष में नई आ जाती हैं।
इसके अलावा कीमत परिवर्तन
भी इतना ज्यादा हो जाता है कि तुलना करना अर्थहीन बन जाता है।
Q. 9. भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोक्ता कीमत
सूचकांकों की अनिवार्यता क्यों होती है ?
Ans. भारत में भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोक्ता सूचकांक बनाए जाते हैं,
जैसे-
(i) औद्योगक श्रमिकों के
लिए उपभोक्ता सूचकांक (ii) गैर मजदूर शहरी उपभोक्ता सूचकांक (iii) कृषि मजदूरों के लिए उपभोक्ता सूचकांक अलग सूचकांक
बनाना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि भिन्न श्रेणी के उपभोक्ताओं की उपभोग टोकरी
में भिन्न-भिन्न वस्तुएँ होती हैं। उनके उपभोग में बहुत विविधता पायी जाती है।
Q. 10. औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक
क्या मापता है ?
Ans. भारत में औद्योगिक श्रमिकों के लिए अलग से उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाया
जाता है। इस सूचकांक के निर्माण में 1982 को आधार वर्ष माना जाता है। यह सूचकांक
प्रति माह तैयार किया जाता है जिससे औद्योगिक श्रमिकों के निर्वाह पर कीमतों में
परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन किया जा सके। यह सूचकांक श्रम ब्यूरो शिमला द्वारा
प्रकाशित कराया जाता है। इस सूचकांक में निम्न मदों को मुख्य तौर पर शामिल किया
जाता है-
(i) खाद्य-सामग्री (ii) पान, सुपारी, तम्बाकू आदि (iii) ईधन एवं प्रकाश (iv)
कपड़े, विस्तर एवं जूते (v) विविध।
इस समूह में खाद्य सामग्री को सर्वाधिक भार प्रदान किया जाता है।
Q. 11. कीमत सूचकांक तथा मात्रा सूचकांक में क्या
अंतर होचा है?
Ans. कीमत
सूचकांक- जब दो अवधियों में हुए कीमत में परिवर्तन को ज्ञात करना हो तो जिस
सूचकांक का प्रयोग करते हैं, उसे कीमत सूचकांक कहते हैं।
मात्रा सूचकांक- जब दो अवधियों में हुए मात्रा में परिवर्तन को जानना हो तो जिस सूचकांक का प्रयोग करते हैं, उसे मात्रा सूचकांक कहते हैं।
सभी विधियों में p और q को अन्तः परिवर्तित करके कीमत सूचकांक की मात्रा
सूचकांक में बदला जा सकता है।
Q. 12. क्या किसी भी तरह का कीमत परिवर्तन एक
कीमत सूचकांक में प्रतिबिम्बित होता है?
Ans. कीमत सूचकांक खुदारा कीमतों में परिवर्तनों के औसत को मापता
है। यह विशिष्ट कीमत परिवर्तन को प्रदर्शित नहीं करता है। लेकिन प्रत्येक कीमत में
परिवर्तन कीमत सूचकांक के मान को प्रदर्शित करता है।
Q. 13. क्या शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के
लिए उपभोक्ता कीमत-सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व
कर सकता है?
Ans. नहीं, शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत
सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व नहीं कर
सकता है।
Q. 14. नीचे एक औद्योगिक केन्द्र के श्रमिकों
द्वारा 1980 एवं 2005 के दौरा निम्न मदों पर प्रतिव्यक्ति मासिक व्यय को दर्शाया गया
है। इन मदों का भार क्रमशः 75, 10, 5, 6 तथा 4 है। 1980 को आधार मानकर 2005 के लिए
जीवन निर्वाह लागत का एक भारित सूचकांक तैयार कीजिए।
|
मद |
वर्ष 1980 में कीमत |
वर्ष 2005 की कीमत |
|
खाद्य |
100 |
200 |
|
कपड़े |
20 |
25 |
|
ईंधन एवं बिजली |
15 |
20 |
|
मकान किराया |
30 |
40 |
|
विविध |
35 |
65 |
Q. 15. निम्नलिखित सारणी को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं अपनी टिप्पणी कीजिए-
औद्योगिक
उत्पादन सूचकांक (आधार वर्ष 1993-94)
|
उद्योग |
भार% में |
1996-1997 |
2003-2004 |
|
सामान्य सूचकांक |
100 |
130.8 |
189.0 |
|
खनन एवं उत्खनन |
10.73 |
118.2 |
146.9 |
|
विनिर्माण |
79.58 |
133.6 |
196.6 |
|
विद्युत |
10.69 |
122.0 |
172.6 |
Ans.
उपरोक्त तालिका से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं-
(i)
विभिन्न उद्योगों जैसे खनन एवं उत्खनन, विनिर्माण एंव विद्युत की संवृद्धि दर भिन्न भिन्न है। विनिर्माण क्षेत्र
की संवृद्धि सबसे अधिक तथा खनन एवं उत्खनन क्षेत्र की सबसे कम है।
(ii)
विभिन्न औद्योगिक श्रेणियों को भिन्न भार प्रदान किए गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र का
भार सबसे ज्यादा है।
(iii)
सामान्य संवृद्धि दर, खनन एवं उत्खनन तथा विद्युत क्षेत्र से ज्यादा है।
Q. 16. अपने परिवार में उपयोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची
बनाने का प्रयास कीजिए।
Ans.
हमारे परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची-
(i)
खाद्य-सामग्री, (ii) वस्त्र (iii) ईंधन एवं प्रकाश, (iv) मकान किराया, (v) शिक्षा,
(vi) स्वास्थ्य, (vii) परिवहन, (viii) जूते, (ix) मनोरंजन, (x) विविध
Q. 17. यदि एक व्यक्ति का वेतन आधार वर्ष में 4000 रु. प्रतिवर्ष था
और उसका वर्तमान वर्ष में वेतन 6000 रु. है। उसके जीवन स्तर को पहले जैसा ही बनाए रखने
के लिए उसके वेतन में कितनी वृद्धि होनी चाहिए। यदि उपभोक्ता कीमत सूचकांक 400 हो।
Ans.
वर्तमान वर्ष का CPI = 400
आधार
वर्ष का वेतन = 400 रु.
वर्तमान
वर्ष का वेतन = 6000 रु.
आधार
वर्ष का CPI = 100 रु.
CPI में वृद्धि `=\frac{\left(400-100\right)\times100}{100}\%`
`=\frac{300\times100}{100}=300\%`
आधार वर्ष की तुलना में आधार में समान जीवन-स्तर को कायम रखने के लिए उसके
वेतन में 300 प्रतिशत वृद्धि होनी चाहिए। अतः उसका वेतन होना चाहिए।
अतः उसका वेतन होना चाहिए = 4000 रु.`+\frac{4000\times360}{100}` रु.
वेतन में वृद्धि = 4000 रु. + 12000 रु. = 16000 रु.
वेतन में वृद्धि = 16000 रु. - 6000 रु. = 10000 रु.
वेतन में प्रतिशत वृद्धि `=\frac{10000\times100}{6000}` = 166.67%
इसलिए जीवन-स्तर का सामान्य स्तर कायम रखने हेतु वेतन में 166.67 प्रतिशत
वृद्धि होनी चाहिए।
Q. 18. जून, 2005 में उपभोक्ता कीमत सूचकांक 125 था। खाद्य
सूचकांक 120 तथा अन्य मदों का सूचकांक 135 था। खाद्य पदार्थों को दिया जाने वाला
भार कुल भार का कितना प्रतिशत है?
Ans.
Q. 19. किसी शहर में एक मध्यवर्गीय पारिवारिक बजट में
जाँच-पड़ताल से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है:
1995 की तुलना में 2004 में निर्वाह सूचकांक का माना क्या
होगा?
उत्तर : परिवार बजट विधि द्वारा जीवन निर्वाह लागत सूचकांक का निर्माण :
जीवन निर्वाह लागत सूचकांक 2004 का
अतः 195 की तुलना में 2004 में 34.499 की शुद्ध वृद्धि हुई है।
Q. 20. दो सप्ताह तक अपने परिवार के (प्रति इकाई) दैनिक
व्यय, खरीदी गई मात्रा और दैनिक खरीददारी को अभिलेखित कीजिए। कीमत में आए परिवर्तन
आपके परिवार को किस तरह से प्रभावित करते हैं?
स्रोत-
आर्थिक सर्वेक्षण, भारत सरकार, 2004-2005.
(क)
विभिन्न सूचकांकों को प्रयुक्त करते हुए मुद्रास्फीति की दर का परिकलन कीजिए।
(ख)
सूचकांकों के सापेक्षिक मानों पर टिप्पणी कीजिए।
(ग)
क्या ये तुलना योग्य हैं?
उत्तर :
(क)(i)

(iv)

(ख) औद्योगिक श्रमिकों के लिए आधार वर्ष 1982 के साथ उपभोक्ता
कीमत सूचकांक सबसे अधिक है। थोक मूल्य सूचकांक पूरी अवधि में सबसे कम है। (1993-96
से 2003-04 तक)
(ग) तालिका में दिए गए सूचकांक निम्नलिखित कारणों से तुलनात्मक
नहीं हैं
1.आधार वर्ष अलग-अलग हैं।
2.विभिन्न सूचकांकों की मदें भिन्न हो सकती हैं।
3.अलग-अलग सूचकांकों के लिए विभिन्न मदों को भिन्न भार प्रदान
किए जा सकते हैं।
अन्य महत्त्वपर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. सूचकांक के स्तर
में लगातार वृद्धि होने पर मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है या घटती है?
Ans. बढ़ती है।
Q. 2. भारतवर्ष में सूचकांक
का निर्माण करने के लिए किस वर्ष को आधार वर्ष माना जाता है?
Ans. 1993-94
Q. 3 मूल्य सूचकांक में
वृद्धि से मुद्रा की क्रय शक्ति बढ़ती है या घटती है?
Ans. घटती है।
Q. 4. सूचकांक का निर्माण
करने के लिए आधार वर्ष कैसा होना चाहिए?
Ans. सामान्य वर्ष।
Q. 5. संयुक्त सूचकांक
का निर्माण में एक बस्तु शामिल की जाती है या दो वस्तुएँ?'
Ans. दो वस्तुएँ।
Q. 6. थोक मूल्य सूचकांक
का प्रकाशन भारत में किस आधार पर होता है?
Ans. साप्ताहिक आधार पर।
Q. 7. सूचकांक किसे कहते
हैं?
Ans. सूचकांक सम्बन्धित तथ्यों के मूल्यों
के आकार में होने वाले अन्तरों का माप करने का साधन है।
Q. 8. साधारण सूचकांक
तथा भारित सूचकांक में क्या अंतर है?
Ans. साधारण सूचकांक में सभी मदों को
समान महत्त्व दिया जाता है। भारित सूचकांक में विभिन्न मदों को विभिन्न भार दिए जाते
हैं।
Q. 9. मूल्य सूचकांक
कितने प्रकार के होते हैं?
Ans. मूल्य सूचकांक दो प्रकार के होते
हैं जो हैं- (1) साधारण सूचकांक, (2) भारित सूचकांक।
Q. 10. आधार वर्ष किसे
कहते हैं?
Ans, आधार वर्ष उस वर्ष को कहते है।
जिसकी कीमतों से वर्तमान वर्ष की तुलना की जाती है।
Q. 11. लेस्पेयर की सूचकांक
विधि को लिखिए।
Ans. `\P_{01}=\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times100`
Q. 12. पाश्चे की सूचकांक
विधि को लिखें।
Ans. `\P_{01}=\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_1}\times100`
Q. 13. फिशर की सूचकांक विधि लिखें।
Ans.`\P_{01}=\sqrt{\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_1}}\times100`
Q. 14. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को परिभाषित कीजिए।
Ans. किसी स्थान से सम्बन्धित वर्ग विशेष पर पड़ने वाले मूल्य
परिवर्तनों के प्रभाव का माप करने के लिए जो सूचकांक बनाए जाते हैं उन्हें उपभोक्ता
मूल्य सूचकांक कहते हैं।
Q. 15. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों का दूसरा नाम
क्या है?
Ans. निर्वाह-व्यय सूचकांक।
Q. 16. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मापने का सामूहिक
व्यय रीति का सूत्र लिखें।
Ans. सूचकांक `=\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times100`
Q. 17. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मापने का परिवार
बजट रीति का सूत्र लिखें।
Ans. पारिवारिक बजट रीति `=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
Q. 18. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं?
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किसी स्थान के वर्ग विशेष के व्यक्तियों
पर पड़नेवाले फुटकार मूल्य परिवर्तनों के प्रभाव को मापते हैं।
Q. 19. औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक का सूत्र
क्या है?
Ans. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक `=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
`=\frac{\Sigma\left[\left(\frac{q_1}{q_0}\times100\right)w\right]}{\Sigma W}`
क्योंकि `R=\frac{q_1}{q_0}\times100`
यहां , q1 = चालू वर्ष में उत्पादन , q0
= आधार वर्ष में उत्पादन , W = भार
Q. 20. औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक का मुख्य
उद्देश्य क्या है?
Ans. यह औद्योगिक उत्पादन की मात्रा की कुल मात्रा में सामूहिक
रूप से हुए परिवर्तन की माप करता है।
Q. 21. सूचकांक बनाने के मुख्य तत्व क्या हैं?
Ans. सूचकांक बनाने के मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं-
(i) आधार वर्ष का चयन, (ii) वस्तुओं का चयन, (iii) वस्तुओं की
कीमतों का चयन, (iv) कीमतों का औसत निकालना, (v) सूचकांक का उद्देश्य, (vi) भार निर्धारित
करना
Q. 22. सूचकांकों से जनसाधारण को क्या लाभ हैं?
Ans. विभिन्न प्रकार के निर्देशांकों से जनसाधारण को अनेक प्रकार
की सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। इनके आधार पर-(ⅰ) बैंक अधिकारी मुद्रा की माँग, जमा आदि
का पता लगाकर व्याज की दरें निश्चित करतें हैं, (ii) बीमा कम्पनी
प्रीमियम की दर निर्धारित करती हैं, (iii) रेल भाड़े की दरें निश्चित करती हैं,
(iv) सट्टेबाज अपने अनुमान लगाते हैं, (v) राजनीतिज्ञ एवं समाज-सुधारक आर्थिक स्थिति
का अनुमान लगाकर सरकार की नीति की उचित आलोचना कर सकते हैं।
Q. 23. सूचकांकों की तीन सीमाएँ कौन हैं?
Ans. 1. केवल सापेक्ष माप-सचकांक केवल सापेक्ष माप ही करते हैं। इनके द्वारा
परिवर्तनों का पूर्ण अथवा निश्चित (Absolute) माप नहीं किया जा सकता।
2. वस्तुओं की किस्म व गुण की अपेक्षा-सूचकांकों को तैयार करते
समय वस्तुओं की किस्म अथवा गुण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
3. शुद्धता एवं गणितीय सत्यता का अभाव सूचकांक न्यादर्श के आधार
पर बनाये जाते हैं। अतः इस कारण इनमें शुद्धता एवं गणितीय साम्यता का अभाव रहता है।
Q. 24. मूल्य अनुपात का क्या अर्थ है?
Ans. किसी वस्तु का मूल्य अनुपात चालू वर्ष तथा आधार वर्ष की
कीमत का प्रतिशत अनुपात होता है।
या, मूल्य अनुपात वर्तमान वर्ष में किसी वस्तु की कीमत तथा किसी
आधार वर्ष में उसी वस्तु की कीमत के अनुपात और 100 का गुणनफल होता है।
Q. 25. मूल्यानुपात सूचकांक का सूत्र लिखें।
Ans. मूल्यानुपात `P_{01}=\frac1n\Sigma\left[\frac{P_1}{P_0}\times100\right]`
or, `P_{01}=\frac{\Sigma R}n`
जहां,
R = मूल्यानुपात
P1
= वर्तमान वर्ष के मूल्य
P0
= आधार वर्ष के मूल्य
n = वस्तुओं की संख्या
Q. 26. भारित सूचकांक का सूत्र लिखिए।
Ans. `P_{01}=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
R=`\Sigma\frac{P_1}{P_0}\times100`
W= P0q0
जहां,
P1
= वर्तमान वर्ष के मूल्य
P0
= आधार वर्ष के मूल्य
q0 = आधार वर्ष में वस्तुओं की मात्रा
R = मूल्यानुपात
W = भार
Q. 27. उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाने की भारांकन विधियों के नाम लिखिये।
Ans.
भारांकन की विधियों के आधार पर उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाने की दो विधियाँ होती हैं-1.
समूहीकृत व्यय विधि, 2. पारिवारिक बजट विधि।
Q. 28. थोक कीमत सूचकांक की परिभाषा दीजिए।
Ans.
थोक कीमत सूचकांक वह सूचकांक होता है जो थोक बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं की थोक
कीमतों में होने वाले तुलनात्मक परिवर्तनों को मापता है।
Q. 29. सरल सामूहिक विधि से सूचकांक बनाने का सूत्र लिखें।
Ans. `P_{01}=\frac{\Sigma P_1}{\Sigma P_0}\times100`
Q. 30. मूल्यानुपात माध्य विधि से सूचकांक का सूत्र
लिखे।
Ans. मूल्यानुपात माध्य विधि `P_{01}=\frac{\Sigma\left[\frac{P_1}{P_0}\times100\right]}n`
Q. 31. इस समय भारत में प्राय: किस वर्ष को आधार वर्ष माना जाता है?
Ans. इस समय भारत में प्रायः वर्ष 1993-94 को आधार वर्ष माना
जाता है।
Q. 32. महँगाई-भत्ता किसे कहते हैं?
Ans. यह वह राशि है जो श्रमिकों को इसलिए दी जाती है ताकि कीमत
वृद्धि के कारण रुपए की क्रय-शक्ति में गिरावट को पूरा कर सकें ताकि वे पहले जैसी वस्तु
खरीद सकें।
Q. 33. मुद्रास्फीति की दर का क्या अर्थ है?
Ans. इसका अभिप्राय है कि किसी वर्ष में वस्तुओं की कीमतों में
कितनी प्रतिशत वृद्धि हुयी है।
Q. 34. रुपए की क्रय-शक्ति का अर्थ बताएँ।
Ans. इसका अभिप्राय है कि किसी समय में एक रुपए के बदले कितनी
वस्तुएँ और सेवाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
Q. 35. डारबिश व बाउले विधि से सूचकांक का सूत्र
लिखें ।
Ans. `P_{01}=\frac{L+P}2`
अथवा, `P_{01}=\frac{\left(\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}+\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_1}\right)}2\times100`
Q. 36. मार्शल व एजवर्थ विधि से सूचकांक बनाने का
सूत्र लिखें ।
Ans. `P_{01}=\frac{\Sigma P_1\left(q_0+q_1\right)}{\Sigma P_0\left(q_0+q_1\right)}\times100`
Q. 37. भारित औसत अनुपात से
सूचकांक का सूत्र लिखें ।
Ans. `P_{01}=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
लघु उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. सूचकांकों की विशेषताओं
को संक्षेप में लिखें ।
Ans. सूचकांकों की मुख्य विशेषताएँ
इस प्रकार हैं-
1. परिवर्तनों की सापेक्ष माप- सूचकांकों
की मदद से मदद से पूरे समूह के तुलनात्मक परिवर्तनों का माप किया जाता है। उदाहरण के
लिए कीमत सूचकांक वस्तुओं वस्तुओं की कीमतों में होने वाले अंतरों को प्रकट नहीं करते
बल्कि वे आधार वर्ष की तुलना में चालू वर्ष के कीमत स्तर के प्रतिशत परिवर्तनों का
सामान्य माप भी बताते हैं। यदि 1991 में कीमत सूचकांक 100 है और 2001 में बढ़कर
244 हो जाता है तो इसका अर्थ यह होगा कि 1991 की तुलना में 2001 में कीमतों में दुगुनी
से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है।
2. संख्यात्मक रूप दर्शाया जा सकता
है- सूचकांकों द्वारा परिवर्तनों को संख्या के रूप में दर्शाया जाता है। ये परिवर्तनों
को शब्दों के रूप में व्यक्त नहीं करते हैं। इसके सूचकांक यह नहीं कहेंगे कि कीमतें
घट या बढ़ रही हैं, औद्योगिक उत्पादन बढ़ रहा है या राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि हो
रही है।
3. औसत- सूचकांकों द्वारा आर्थिक परिवर्तनों
की दिशा को औसत के रूप में व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, जब हम कहते हैं कि
2000 और 2001 के मध्य में कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि कुछ वस्तुओं
की कीमतें स्थिर रह सकती हैं, कुछ की 10 प्रतिशत से कम भी हो सकती हैं तथा कुछ की
10 प्रतिशत से अधिक भी बढ़ सकती हैं।
Q. 2. भारांकन की समूहीकृत
व्यय विधि को उदाहरण सहित लिखें।
Ans. इस विधि में यदि P₁ = चालू वर्ष
की कीमत; Po = आधार वर्ष की कीमतः q0 = आधार वर्ष की मात्रा , आधार वर्ष में उपभोग की गई वस्तु की
मात्रा (q0) और आधार वर्ष के मूल्यों (Po) को गुणा करके गुणनफलों का योग (ΣPoqo) ज्ञात किया जाता है। यह आधार वर्ष का समूहीकृत व्यय होता है। आधार वर्ष की मात्रा (q0) तथा चालू वर्ष की कीमत (P₁) को गुणा करके गुणनफलों का योग
प्राप्त करते हैं। इस प्रकार ΣP1q0 की जाती है। यह चालू वर्ष का समूही व्यय होता है। निम्नलिखित सूत्र द्वारा उपभोक्ता मूल्य सूत्र द्वारा
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की गणना की जानी चाहिए।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक = ×100
`\P_{01}=\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times100`
Q. 3. भारांकन की पारिवारिक बजट
विधि का संक्षेप में वर्णन
करें।
Ans. इस विधि में निम्नलिखित सूत्र द्वारा उपभोक्ता
मूल्य सूचकांक की गणना की जाती है-
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक `=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
(यहाँ R = प्रत्येक वस्तु का मूल्यानुपात `=\frac{\Sigma P_1}{\Sigma P_0}\times100` , W = भार )
पारिवारिक बजट विधि द्वारा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की
गणना इस प्रकार से करते हैं-
1. प्रत्येक वस्तु की चालू वर्ष की कीमत (P1)
को आधार वर्ष की कीमत (P0) से भाग देकर 100 से गुणा करके मूल्यानुपात
(R) ज्ञात करते हैं-
मूल्यानुपात = ×100
या, `R=\frac{P_1}{P_0}\times100`
2. प्रत्येक वस्तु पर किए गए कुल व्यय को भार के रूप
में प्रयोग करते हैं। अतः भार ज्ञात करने के लिए आधार वर्ष की कीमत (P0)
तथा उस वर्ष की गई उपभोग की मात्रा (q0) को गुणा करते हैं। इस प्रकार P0
q0 का प्रयोग भार के रूप में ज्ञात किया जाता है।
3. प्रत्येक वस्तु मूल्यानुपात (R) को उसके कुल व्यय
सम्बन्धी भार (W = P0 q0) से गुणा करके उसके गुणनफलों के योगफल को ज्ञात करते हैं।
4. भारों का जोड़ ΣW या (ΣPoqo) ज्ञात किया जाता
है।
5. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक प्राप्त करने के लिए
निम्नलिखित सूत्र को प्रयोग करते हैं-
उपभोक्ता कीमत सूचकांक =
या, `P_{01}=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
Q. 4. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों को
बनाने में आने वाली परेशानियों का संक्षेप में वर्णन करें।
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों को
बनाने में मुख्य परेशानियाँ निम्न हैं-
1. व्यय के अनुपात में अंतर- एक वर्ग के सभी सदस्य एक
समय में विभिन्न वस्तुओं पर अलग-अलग अनुपात में खर्च करते हैं। व्यय अनुपात
उपभोक्ताओं की रुचि, जरूरतों, आदतों आदि पर निर्भर हैं।
2. जीवन-स्तर में अंतर- सभी उपभोक्ताओं का जीवन स्तर
एक जैसा नहीं होता है। अतः समाज के सभी वर्गों या सभी स्थानों के लिए एक उपभोक्ता
मूल्य सूचकांक नहीं बनाया जा सकता है। समाज के अलग-अलग वर्गों तथा स्थानों के लिए
अलग-अलग सूचकांक बनाने की जरूरत है जो एक जटिल कार्य है।
3. कीमतों में परिवर्तन-उपभोक्ता मूल्य सूचकांक फुटकर कीमतों
के आधार पर बनाए जाते हैं लेकिन विभिन्न स्थानों पर फुटकर कीमतें तय पायी जाती हैं।
इसके फलस्वरूप एक प्रतिनिधि कीमत ज्ञात करने में कठिनाई आती है।
4. आधारवर्ष के चयन में मुश्किल- इन सबको ध्यान में रखकर कीमत
सूचकांक बनाना मुश्किल है। सामान्य या स्थिर वर्ष के चयन के काम में बहुत सावधानी की
जरूरत होती है।
Q. 5. औद्योगिक उत्पादन के सचकांक बनाने की विधि
स्पष्ट कीजिए।
Ans. औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना निम्न रूप से की जाती
है-
1. उद्योगों का वर्गीकरण औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक बनाने
के लिए उद्योगों को निम्न प्रकार वर्गीकृत करते हैं-
(i) खनन, (ii) विनिर्माण, (iii) बिजली।
2. उद्योगों के उत्पादन संबंधी आँकड़े उद्योगों के उत्पादन संबंधी
आँकड़ें मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक आधार पर एकत्रित किये जाते हैं।
3. भार-विभिन्न उद्योगों को भार दिए जाते हैं। विभिन्न उद्योगों
को दिए गए भार उनके शुद्ध उत्पादन के मूल्य पर आधारित होते हैं।
उपरोक्त उद्योगों को निम्नलिखित भार दिए जाते हैं-
|
समूह |
भार |
|
1.
खनन |
10.47 |
|
2.
विनिर्माण |
79.36 |
|
3.
बिजली |
10.17 |
|
कुल |
100 |
निम्नलिखित सूत्र के द्वारा सूचकांक ज्ञात करते हैं-
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक `=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
`=\frac{\Sigma\left[\left(\frac{q_1}{q_0}\times100\right)w\right]}{\Sigma W}`
क्योंकि `R=\frac{q_1}{q_0}\times100`
यहां , q1 = चालू वर्ष में उत्पादन , q0 = आधार वर्ष में उत्पादन , W = भार या विभिन्न औद्योगिक उत्पादन का सापेक्षिक महत्त्व
Q. 6. भारत में सभी वस्तुओं के समूह एवं उनके
भारों को बताइए।
Ans. भारत में सभी वस्तुओं को जिन समूहों में वर्गीकृत किया
गया है, वे निम्नलिखित हैं-
1. प्राथमिक वस्तुएँ-इसमें 98 वस्तुएँ शामिल हैं। जैसे-चावल,
दालें, फल, सब्जियाँ तथा गैर-भीज्य वस्तुएँ जैसे-कच्ची कपास, जूट, धातुएँ आदि। प्राथमिक
वस्तुओं को 22.02 भार दिया जाता है।
2. विनिर्मित उत्पाद-इसमें 318 वस्तुएँ शामिल हैं। जैसे कपड़ा,
चीनी, कागज, मशीनरी, रसायन, खाद, चमड़ा आदि विनिर्मत उत्पाद को 63.75 भार दिया जाता
है।
3. ईंधन, बिद्युत, बिजली और स्नेहक-इसमें 19 वस्तुएँ शामिल की
जाती है। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम, उत्पाद, बिजली, LPG आदि। ईंधन, विद्युत बिजली और
स्नेहक को 14.23 भारं दिया जाता है।
Q. 7. थोक मूल्य सूचकांक पर टिप्पणी लिखिये।
Ans. थोक मूल्य सूचकांक 'सामान्य कीमत स्तर' में परिवर्तन की
माप करते हैं। हमारे देश में थोक मूल्य सूचकांक का प्रकाशन साप्ताहिक आधार पर उद्योग
मंत्रालय, भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के कार्यालय से किया जाता है। अब 1981-82 के
स्थान पर 1993-94 को आधार वर्ष माना जाता है।
इस सूचकांक में निम्नलिखित वस्तुओं को शामिल करते हैं-
(i) प्राथमिक वस्तुएँ-खाद्य एवं गैर-खाद्य वस्तुएँ।
(ii) ईंधन, ऊर्जा, प्रकाश, लुब्रिकेंट तथा
(iii) विनिर्मत वस्तुएँ।
प्रत्येक समूह को उचित भार देकर थोक मूल्य सूचकांक का निर्माण
किया जाता है।
Q. 8. उपभोक्ता कीमत सूचकांक पर टिप्पणी कीजिए।
Ans. उपभोक्ता कीमत सूचकांक को निर्वाह सूचकांक भी कहते हैं।
यह खुदरा कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है।
उपभोक्ता कई वस्तुओं का उपभोग करते हैं। अतः सभी वस्तुओं को
शामिल नहीं किया जा सकता है। अतः उपभोक्ता जिन वस्तुओं का उपभोग करते हैं उनके विशेष
समूह का चुनाव करने की जरूरत पड़ती है। यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि उपभोक्ताओं
द्वारा उपभोग की गई वस्तुओं को ही शामिल करना चाहिए।
उपभोक्ताओं के भारत में निम्नलिखित समूहों के लिए सूचकांक का
निर्माण किया जाता है-(i) औद्योगिक श्रमिक, (ii) शारीरिक श्रम करने वाले शहरी श्रमिक,
(iii) खेती करने वाले श्रमिक।
हमारे देश में औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक
सबसे ज्यादा प्रचलन में है। आधार वर्ष के तौर पर 1993-94 की कीमतों का प्रयोग किया
जाता है। निश्चित समयावधि में विशेष समूह के परिवारों के कुल पारिवारिक व्यय में से
विभिन्न वस्तुओं पर होने वाले व्यय की जानकारी के लिए निदर्शन सर्वेक्षण कराया जाता
है।
निश्चित समयावधि में विशेष समूह के परिवारों के कुल पारिवारिक
व्यय में से विभिन्न वस्तुओं पर होने वाले व्यय की जानकारी के लिए निदर्शन सर्वेक्षण
कराया जाता है। प्रतिनिधि पारिवारिक बजट का प्रयोग उपभोक्ता कीमत सूचकांक के निर्माण
के लिए बस्तुओं व सेवाओं तथा उनके सापेक्ष भारों के चुनाव के लिए करते हैं।
Q. 9. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के प्रयोगों का
संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Ans. खुदरा कीमतों में परिवर्तन होने पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक
में भी परिवर्तन होता है। इस सूचकांक के निम्नलिखित प्रयोग हैं-
1. उपभोक्ता कीमत सूचकांक का प्रयोग मुद्रा की क्रय शक्ति तथा
श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी तय करने में किया जाता है। 2. यदि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक
का स्तर किसी निश्चित स्तर से ऊपर हो जाता है तो सरकार श्रमिकों की मदद के लिए महँगाई
भत्ता अथवा नए वेतनमान की घोषणा करती है। 3. यदि अभाव की वजह से जरूरी चीजों के दाम
बढ़ जाते हैं तो सरकार उपभोक्ताओं को आर्थिक सहायता दे सकती है तथा राशनिंग व्यवस्था
लागू कर सकती है।
Q. 10. सूचकांकों के निर्माण में आधार अवधि के
चुनाव में किन बातों का ध्यान रखा जाता है? संक्षेप में लिखें
Ans. सूचकांकों के निर्माण में आधार अवधि के चुनाव में निम्नलिखित
बातों का ध्यान रखा जाता है-
1. आधार वर्ष एक सामान्य वर्ष होना चाहिए-प्राकृतिक आपदाओं जैसे
बाढ़, भूकम्प, अकाल अथवा युद्ध एवं राजनीतक तौर पर अस्थिर वर्ष को आधार वर्ष नहीं चुनना
चाहिए।
2. आधार- अवधि न तो बहुत छोटी हो और न ही बहुत लम्बी-आधार-अवधि
एक महीन से छोटी नहीं होनी चाहिए और न ही यह एक वर्ष से बड़ी होनी चाहिए।
3. यह ऐसी अवधि होनी चाहिए जिसके लिए बास्तविक आँकड़ें उपलब्ध
हों।
4. आधारवर्ष बहुत पुराना नहीं होना चाहिए-समय परिवर्तन के साथ
उत्पादन की किस्म, गुणवत्ता लोगों की रुचियों-अभिरुचियों में भी परिवर्तन होता है।
बहुत पुराने वर्ष से तुलना करना उचित नहीं होता है।
Q. 11. मूल्यों के भारित सूचकांकों के निर्माण
में (क) भारों तथा (ख) वस्तुओं के चुनाव में किन बातों का ध्यान रखा जाता है ?
Ans. (क) मूल्यों के भारित सूचकांकों के निर्माण में भारों के
चुनाव में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है-
(i) विभिन्न वस्तुओं को भार सापेक्ष महत्त्व के आधार पर दिया
जाना चाहिए।
(ii) विभिन्न वस्तुओं को भार प्रदान करने के लिए कुल व्यय में
उन वस्तुओं पर किए जाने वाले व्यय के अनुपात या प्रतिशत की गणना की जानी चाहिए।
(ख) मूल्यों के भारित सूचकांकों के निर्माण में वस्तुओं के चुनाव
में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है
(i) वस्तुओं का चयन सूचकांक के उद्देश्य के अनुसार किया जाना
चाहिए। (ii) सामान्य मूल्य स्तर में परिवर्तन की माप करने के लिए औद्योगिक वस्तुओं,
कृषि संबंधी वस्तुओं तथा अन्य वस्तुओं को शामिल किया जाना चाहिए। (iii) निर्वाह व्यय
में परिवर्तन की माप करने के लिए उपभोक्ता वस्तुओं का चुनाव किया जाना चाहिए। (iv)
कृषि सूचकांक के निर्माण हेतु कृषि वस्तुओं को शामिल किया जाना चाहिए। (v) औद्योगिक
सूचकांक के निर्माण हेतु औद्योगिक उत्पाद सम्मिलित किए जाने चाहिए।
Q. 12. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों में क्या विभ्रम
(Errors) पाए जाते हैं ?
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों में विश्वम (Errors in
Consumer Price Indexes)- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किसी वर्ग के जीवन-निर्वाह-व्यय में
होनेवाले परिवर्तनों के सामान्य अनुमान-मात्र होते हैं। उनमें निम्नलिखित विभ्रम पाये
जाते हैं-
(i) जिस वर्ग के लिए यह सूचकांक बनाया जा रहा है उस वर्ग के
व्यक्तियों के वर्गीकरण में विभ्रम हो जाते हैं। कुछ ऐसे व्यक्ति शामिल किये जा सकते
हैं जिनका उस वर्ग से सम्बन्ध न हो या उस वर्ग के प्रतिनिधियों को छोड़ा जा सकता है।
(ii) वस्तुओं के चुनाब में अशुद्धि होने की सम्भावना रहती है।
(iii) वस्तुओं की विविध किस्मों के कारण प्रतिनिधि मूल्य-उद्धरणों
के छाँटने में गलती रह सकती है। इसके अतिरिक्त, फुटकर मूल्यों में भिन्न-भिन्न स्थानों
व दुकानों पर अन्तर होते हैं।
(iv) भारांकन में भी विभ्रम की सम्भावना रहती है। अशुद्ध भारों
के प्रयोग से सूचकांक निर्वाह-व्यय का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करता।
(v) वस्तुओं की माँग, उनके उपभोग की मात्रा और उनके मूल्यों
में अत्यधिक परिवर्तन होने के कारण भी सूचकांक त्रुटिपूर्ण हो जाता है।
इन विभ्रमों को दूर करने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों की
रचना सावधानी से करनी चाहिए। समय-समय पर पारिवारिक बजट अनुसंधान करके इन सूचकांकों
की मान्यताओं में होनेवालें परिवर्तनों का विश्लेषण करते रहना परमावश्यक है।
Q. 13. औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक का क्या अर्थ
है ? वर्णन करें।
Ans. औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक का अर्थ- औद्योगिक उत्पादन
का सूचकांक एक देश में किसी आधार-वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में औद्योगिक उत्पादन
की मात्रा में होने वाली वृद्धि या कमी का माप करता है। इनकी सहायता से हम औद्योगिक
उत्पादन की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों को मापते हैं, मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों
को नहीं।
औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना- औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक
की रचना निम्नलिखित चरणों में की जाती है
1. उद्योगों को समान्यतया तीन वर्गों में बाँट लिया जाता है-
(i) खनन, (ii) विनिर्माण तथा (iii) विद्युत।
2. उत्पादन संबंधी आँकड़े मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक आधार
पर एकत्र कर लिए जाते हैं।
3. विभिन्न वर्गों को उपयुक्त भार दिया जाता है। भारत में वर्तमान
में इस प्रकार भार दिए गए हैं-
(i) खनन = 10.47
(ii) विनिर्माण = 79.36 तथा
(iii) विद्युत = 10.17
4. निम्नांकित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक `=\frac{\Sigma RW}{\Sigma W}`
`=\frac{\Sigma\left[\left(\frac{q_1}{q_0}\times100\right)w\right]}{\Sigma W}`
क्योंकि `R=\frac{q_1}{q_0}\times100`
यहां , q1 = चालू वर्ष में उत्पादन , q0 = आधार वर्ष में उत्पादन , W = भार
Q. 14. साधारण एवं भारित सूचकांक में भेद करें।
Ans. सूचकांक की साधारण एवं भारित दो प्रमुख श्रेणियाँ होती
हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है-
1. साधारण सूचकांक- साधारण सूचकांक वे सूचकांक होते हैं जिनमें सूचकांक के सभी मदों को समान महत्त्व प्रदान किया जाता है। उदाहरण के लिए, कीमतों के साधारण सूचकांक में सभी वस्तुओं को समान महत्त्व दिया जाता है। चाहे कुछ वस्तुओं का उपभोग अधिक मात्रा में हो रहा हो तथा कुछ का कम मात्रा में। यह विभिन्न वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों का एक साधारण औसत होगा। जैसे-
2. भारित सूचकांक - भारित सूचकांक सूचकांक होते हैं जिन श्रृंखला
की विभिन्न मदों को उनके सापेक्ष मद के आधार पर अलग-अलग भार प्रदान किए हैं। यह विभिन्न
वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों का साधारण औसत नहीं होता है। यह विभिन्न वस्तुओं की कीमतों
का भारित औसत होता है। उदाहरण के लिए, यदि गेहूँ पर किया गया खर्च, कपड़े पर किए जानेवाले
खर्च का दुगुना हो तो कीमत सूचकांक के निर्माण में गेहूँ की कीमत को 2 भार दिया जाता
है तथा कपड़े की कीमत को 1 भार दिया जाता है। हालाँकि भारित सूचकांक का निर्माण मुश्किल
होता है, परन्तु साधारण सूचकांक की तुलना में समय में होनेवाले परिवर्तनों को यह प्रभावी
ढंग से प्रस्तुत करता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Q. 1. सूचकांक क्या है? ये कैसे तैयार किए किये
जाते हैं ?
Ans. सूचकांकों का अर्थ - सूचकांक एक प्रकार के औसत होते हैं
जो किसी आर्थिक स्थिति की केन्द्रीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। यह स्मरण रहे
कि सभी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में जो परिवर्तन होते हैं वे एक साथ एक ही दिशा
में समान रूप से नहीं होते हैं। यदि कुछ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में गिरावट आती
है कीमतों में गिरावट आती है तब अन्य कुछ वस्तुओं व तब अन्य कुछ वस्तुओं व सेवाओं की
कीमतों में सेवाओं की कीमतें ऊँची होती हैं और कुछ ऐसी भी वस्तुएँ निकल आती हैं जिनकी
कीमतें स्थिर रहती हैं। परन्तु यदि हम अनेक वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले
परिवर्तनों का औसत प्राप्त कर लें तो यह ज्ञात हो सकेगा कि किस औसत में बढ़ने की प्रवृत्ति
या घटने की प्रवृति
है अर्थात मुद्रा के मूल्य अथवा कीमत स्तर को सामान्य प्रवृत्ति
क्या है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सूचकांकों का मुख्य आशय केद्रीय प्रवृत्ति
की ओर संकेत करना है।
घोष और चौधरी (Ghosh and
Choudhary) के शब्दों में, "निर्देशांक एक ऐसी संख्या है जो किसी निश्चित तिथि पर निश्चित
प्रवृत्ति के स्तर को दूसरी प्रारम्भिक तिथि पर निश्चित प्रवृति के
स्तर से तुलना करते हुए संकेत करती है।"
सूचकांक बनाने की रीति-सूचकांक बनाने के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों का
विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है-
1. निर्देशांक का उद्देश्य-हम जानते हैं कि सूचकांक अनेक प्रकार
के होते हैं तथा अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। किसी भी सूचकांक बनाने के
पूर्व उसका उद्देश्य निश्चित करना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, यदि हमारा उद्देश्य
उत्पादकों की क्रय-शक्ति में परिवर्तन का अध्ययन करना है तो उसके लिए थोक कीमतों
का सूचकांक उपयुक्त होगा। किन्तु यदि
मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन
का प्रभाव उपभोक्ताओं पर देखना है, तो फुटकर कीमतों पर आधारित जीवन निर्वाह व्यय सूचकांक
अधिक उपयोगी होगा। हैबलर के अनुसार, 'कीमत-स्तर की आर्थिक दृष्टि से एक उपयोगी परिभाषा
हमारे मस्तिष्क में उद्देश्य के लिए भिन्न प्रकार का सूचकांके तैयार करना चाहिए।"
2. आधार वर्ष का चुनाव- सूचकांक के निर्माण में हमें एक आधार
वर्ष का चुनाव करना पड़ता है, जसकी तुलना में प्रचलित कीमतों में परिवर्तनों का माप किया जाता है।
आधार वर्ष का औसत सूचकांक 100 के बराबर मान लिया जाता है। यों तो किसी भी वर्ष को आधार
माना जा सकता है, परन्तु सही जानकारी के लिए यह आवश्यक है कि सामान्य वर्ष हो। अभिप्राय
यह है कि आधार वर्ष आर्थिक तथा राजनीतिक अस्त-व्यस्तता से मुक्त हो। न तो यह किसी विशेष
मुद्रा प्रसार अथवा संकुचन का वर्ष हो और न ही युद्ध काल का। वास्तव में एक उपर्युक्त
आधार वर्ष एक जल विभाजन के समान दो आर्थिक युगों का मध्य-स्थल होता है। भारत
में थोक कीमतों के सूचकांक 1980-81 के आधार वर्ष मानते है।
3. वस्तुओं व सेवाओं का चयन- सूचकांक में किन वस्तुओं व सेवाओं
को शामिल किया जाए इस सम्बन्ध में भी सावधानी की आवश्यकता है। ये वस्तुएँ ऐसी होनी
चाहिए जिससे सूचकांक बनाने का हमारा उद्देश्य पूरा हो सके। वस्तुओं तथा सेवाओं का चयन
इस प्रकार होना चाहिए कि वे सूचकांकों के उद्देश्य के अनुसार प्रत्येक वर्ग की समस्त
आवश्यक वस्तओं का प्रतिनिधित्व कर सकें। उदाहरणार्थ यदि श्रमिकों के जीवन स्तर के अंतर
को हम जानना चाहते हैं तो वस्तुएँ ऐसी हों जो अधिकतर श्रमिकों के उपयोग में आती हों
और यदि सामान्य जनता का जीवन-स्तर जानना हो तो जन-साधारण के उपभोग की वस्तुओं को ही
सूचकांक बनाने के लिए लेना होगा।
4. वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों की सूची-वस्तुओं का चयन करने
के पश्चात् उनकी कीमतों का चयन करना आवश्यक है। वस्तुओं की कीमतें थोक हों या फुटकर,
यह बात सूचकांक के उद्देश्य पर निर्भर होती हैं। यदि श्रमिकों के जीवन-निर्वाह व्यय
का सूचकांक तैयार करना है तो हमको फुटकर कीमतों को उन बाजारों से प्राप्त करना पड़ेगा
जहाँ श्रमिक वस्तुओं तथा सेवाओं का क्रय करते हैं। वस्तुओं की कीमतें सही हों तो यह
वात ध्यान में रखना आवश्यक है।
5. वस्तुओं की संख्या-सूचकांक विश्वसनीय होने के लिए यह भी आवश्यक
है कि वस्तुओं की संख्या इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि सूचकांक बनाने में कठिनाई हो
या सूचकांक बनाने का व्यय बढ़ जाए। वस्तुओं की संख्या कितनी हो इस सम्बन्ध में निश्चित
रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता अपितु वस्तुओं की संख्या साधारणतया सूचकांक के उद्देश्य
पर निर्भर करती है।
6. मूल्य सूची निकालना-विभिन्न वस्तुओं के आधार वर्ष और चालू बर्ष की कीमतों को लेने के पश्चात् आधार वर्ष के मुकाबले में चालू वर्ष की मूल्य सूची तैयार की जाती है। इसको निकालने का ढंग अत्यंत सरल होता है। मूल्य सूची का अर्थ होता है आधार वर्ष की तुलना में चालू वर्ष के मूल्य में प्रतिशत परिवर्तन। इस मूल्य को जानने के लिए चालू वर्ष के मूल्यों को 100 से गुणा किया जाता है और आधार वर्ष के मूल्य से भाग दे दिया जाता है।
मूल्य
सूची = अथवा `\frac{P_1\times100}{P_0}`
उदाहरण-यदि आधार वर्ष में गेहूं 20 रुपये क्विंटल है जिसको कि 100 मान लिया जाता है जो दूसरे वर्ष में गेहूँ की कीमत 100 रुपये क्विंटल हो जाती है तो वह 500 `=\frac{100\times100}{10}` कहलाएगा। इसी प्रकार अन्य वस्तुओं के सम्बन्ध में भी करना चाहिए।
7. औसत- अन्तिम काम यह है कि प्रत्येक वर्ष में प्रत्येक वस्तु के
औसत अंक निकाले जाते है आधार वर्ष की औसत तो 100 ही होगी, किन्तु दूसरे वर्ष की
औसत मूल्य स्तर के बढ़ने या घटने के अनुसार क्रमशः 100 से अधिक या कम होगी। परस्पर
तुलना करने के लिए उन सब कीमतों की औसत कीमत निकाली जाती है।
8. भार निर्धारित करना-यदि सूचकांक बनाने में भार का प्रयोग करना आवश्यक समझा
जाए तो उनकी मात्रा निर्धारित करने में उचित सावधानी काम में ली जानी चाहिए। भार
यदि कुल व्यय के अनुसार लेते हों तब तो कोई कठिनाई नहीं होती, परन्तु यदि महत्त्व
के अनुसार भार देने हों तो उनका सापेक्षिक महत्त्व निश्चित कर दिया जाता है।
जैसे-गेहूँ और चावल 3:2; चीनी चाय 2:1 आदि। कभी-कभी भार प्रत्यक्ष रूप में ही
निश्चित कर दिए जाते हैं। जैसे-गेहूँ, 3, चावल 2, चीनी 3, वस्त्र 1 आदि। इस रीति
को प्रत्यक्ष भार रीति कहते हैं।
Q. 2. सूचकांकों की विशेषताओं का वर्णन करें।
Ans. सूचकांकों की विशेषताएँ इसकी विशेषताएँ निम्न हैं-
1. संख्या द्वारा व्यक्त-सूचकांक हमेशा संख्या में व्यक्त किये जाते हैं। अन्य
प्रकार के परिवर्तन को केवल शब्दों में ही व्यक्त किया जा सकता है। जैसे-मूल्य में
वृद्धि, उत्पादन में कमी आदि लेकिन परिवर्तन की इस दशा को निर्देशांक संख्या के
रूप में व्यक्त करते हैं।
2. सापेक्ष माप-सूचकांक हमेशा सापेक्ष रूप में होते हैं। परिवर्तन की मात्रा
निरपेक्ष रूप में प्रस्तुत नहीं की जाती, क्योंकि उस दशा में वह तुलना योग्य नहीं
होती। इसलिए उन्हें तुलना के योग्य बनाने के लिए सापेक्ष बनाया जाता है। इसके लिए
आधार को 100 मानकर प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
3. प्रतिशतों का माध्य-प्रो. ब्लेयर के अनुसार, सूचकांक एक विशेष
प्रकार के माध्य होते है। इसके लिए
सबसे पहले आधार वर्ष के मूल्य को 100 मान लिया जाता है और इसके आधार पर प्रचलित
वर्षों के मूल्यों को प्रतिशतों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है जिन्हें
मूल्यानुपात कहते हैं। तत्पश्चात् सभी मूल्यानुपातों का माध्य ज्ञात किया जाता है।
इस तरह प्रतिशतों का यह माध्य ही सूचकांक कहलाता है।
4. तुलना का आधार-तुलना दो आधारों पर की जाती है, प्रथम समय
के आधार पर एवं द्वितीय स्थान के आधार
पर। समय को आधार मानते समय किसी विशेष वर्ष, माह या अन्य किसी समय के अंश को आधार
मानते हैं। स्थान को आधार मानते समय किसी विशेष स्थान या भू-भाग को आधर मानकर
परिवर्तन की मात्रा का मापन करते हैं। सामान्यतः, तुलना का आधार समय ही होता है।
5. सार्वभौमिक उपयोगिता-सूचकांकों की सार्वभौमिक उपयोगिता है।
आर्थिक एवं व्यावसायिक समसयाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए सूचकांकों का बहुत
अधिक प्रयोग किया जाता है। आधुनिक युग में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जहाँ पर सूचकांकों
का प्रयोग न होता हो।
Q. 3. सूचकांक बनाने में कौन-सी कठिनाइयाँ आती
हैं-
Ans. सूचकांक बनाने में कठिनाइयाँ-सूचकांक बनाने में अनेक कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है। इन कठिनाइयों के कारण ही सूचकांक की सहायता से निकला हुआ परिणाम
गलत हो सकता है। इसलिए मार्शल ने कहा
है, क्रयशील का पूर्णतः सही माप लेना सम्भव ही नहीं किन्तु विचारणीय भी नहीं है।
सूचकांक के निर्माण में निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है-
1. आधार वर्ष के चुनाव में कठिनाई- आधार वर्ष का चयन करना सूचकांक के
निर्माण कार्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। सभी पहलुओं को ध्यान में
रखते हुए सामान्य वर्ष का चयन करना सरल कार्य नहीं है क्योंकि एक ऐसा वर्ष चुनना
जिसमें कोई असाधारण घटना न घटी हो बड़ा कठिन कार्य है।
2. वस्तुओं के चयन में कठिनाई - प्रतिनिधि वस्तुओं के चयन में भी कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है। समय के परिवर्तन के साथ-साथ लोगों के फैशन, स्वभाव, आदत आदि
में परिवर्तन होता है, अतः प्रतिदिन वस्तुओं के चयन में भी कठिनाई आ खड़ी होती है।
3. भार देने की कठिनाई- भारयुक्त सूचकांक का निर्माण करने के लिए वस्तुओं को भार
देना पड़ता है, वस्तुओं के पारस्परिक महत्त्व मालूम करने के लिए उन पर किए गए व्यय
को मालूम करना पड़ता है। साधारणतया वस्तुओं को जो भार दिए जाते हैं वे अनुमानजनक
(Guess) ही होते हैं और यथार्थ से भिन्न हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त जीवन-स्तर तथा
रुचियों में परिवर्तन के साथ-साथ राष्ट्रीय उपभोग में वस्तुओं का महत्त्व निरन्तर
बदलता रहता है। इसलिए आंधार वर्ष में वस्तुओं को जो भार दिए जाते हैं, अन्य वर्षों
के लिए उनका उपयुक्त होना आवश्यक नहीं है।
4. कीमत सम्बन्धी कठिनाई - वस्तुओं के चयन की तरह कीमतों के चयन में भी कठिनाई
उत्पन्न होती है। सूचकांक बनाने के लिए थोक अथवा फुटकर कीमतों का प्रयोग किया जाना
चाहिए। अतः यह निश्चित करना कि वस्तुओं की कीमत किस बाजार से मालूम की जाए थोक या
फुटकर सरल कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त यह कठिनाई भी उपस्थित होती है कि किस
बाजार की कीमतों को प्रतिनिधि रूप से स्वीकार किया जाए, क्योंकि एक ही वस्तु की एक
ही समय में भिन्न-भिन्न कीमतें होती हैं।
5. औसत निकालने में कठिनाई सूचकांक बनाते समय किस औसत का प्रयोग किया जाए यह
निश्चित करना भी कठिन है। किस रीति से औसत निकाली जाए, यह एक जटिल प्रश्न है।
साथ-साथ ही ये केवल औसत ही बदलते हैं।
6. समय में अन्तर के साथ-साथ वस्तुओं में परिवर्तन की कठिनाई-दो
विभिन्न वर्षों की तुलना करते समय एक
कठिनाई जो सामने आती हैं, यह कि समय के अन्तर के साथ-साथ बहुत-सी नई वस्तुएँ उपभोग
में आती हैं अथवा महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं जबकि कुछ अन्य वस्तुएँ उपभोग से निकल
जाती हैं। उदाहरण के लिए नायलोन के बने वस्त्र तथा अन्य वस्तुएँ आज जितनी अधिक
उपभोग की जाती हैं, कुछ वर्ष पहले नहीं थीं। आदत, अभिरुचि, आविष्कार तथा आय व
कीमतों में परिवर्तनों के फलस्वरूप प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं के प्रकार मात्रा
तथा गुण बदलते रहते हैं, जिसके कारण उसकी तुलना आधार वर्ष से करना कठिन होता है।
इस कठिनाई को कम करने के लिए मार्शल ने श्रृंखलाबद्ध सूचकांक (Chain Index Number)
के निर्माण का सुझाव दिया था जिसके द्वारा दो वर्षों की कीमतों की तुलना बीच के
वर्षों की कीमतों के साथ कर सकते हैं। परन्तु यह भी कोई सरल पद्धति नहीं है, इसमें
भी अनेक कठिनाइयाँ हैं।
Q. 4. सूचकांकों के क्या लाभ हैं ? वर्णन करें
।
Ans. सूचकांकों की उपयोगिता - सूचकांकों की सहायता से उन आर्थिक
तथ्यों को मापने का प्रयत्न किया जाता है जो साधारणतः संख्याओं में व्यक्त नहीं किए
जा सकते। सूचकांकों की सहायता से आर्थिक घटनाओं की शक्ति तथा दबाव को नापा जा सकता
है। यही कारण है कि यह आर्थिक जगत् का दबाव नापने वाला यन्त्र (Economic
Barometer) कहलाता है। विशेष रूप से उनकी उपयोगिता निम्नलिखित क्षेत्रों में है-
1. महँगाई भत्तों का निर्धारण-निर्देशांक देश के कीमत स्तर में
होने वाले परिवर्तनों की ओर संकेत करते हैं जिनके आधार पर महँगाई भत्ते, विशेष वेतन
आदि निर्धारित किए जाते हैं।
2. मुद्रा के मूल्य का माप-सूचकांकों की सहायता से हम मुद्रा
की क्रय-शक्ति के वास्तविक परिवर्तनों को ज्ञात कर सकते हैं। ये परिवर्तन अर्थशास्त्र
के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं क्योंकि इनसे किसी भी देश की आर्थिक स्थिति और जीवन-स्तर
का पता लगा सकते हैं।
3. वास्तविक मजदूरी व आय का सूचक - सूचकांकों की सहायता से हम यह पता लगा सकते हैं कि जीवन-स्तर व्यय बढ़ रहा है या घट रहा है अर्थात् मजदूरों की
वास्तविक मजदूरी में परिवर्तन हो रहा है, तब यह परिवर्तन पहले किसी आंधार वर्ष की
तुलना में किस अनुपात में हो रहा है। इस प्रकार की जानकारी से जीवन-स्तर में
समायोजन (Adjustment) करना सम्भव होता है।
4. विदेशी व्यापार में सहयोग- इन सूचकांकों की सहायता से विदेशी व्यापार की दशा का पता चल जाता है और इस जानकारी से भुगतान-सन्तुलन की स्थिति को सुधारा जा सकता है।
5. उत्पादन-सम्बन्धी जानकारी- सूचकांक से हमें यह जानकारी प्राप्त हो जाती है कि किसी उद्योग का कितना विकास हो रहा है अर्थात् किसी उद्योग में उत्पादन बढ़ रहा है या कम हो रहा है। इस जानकारी के आधार पर ही राज्य कृषि तथा उद्योगों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता सम्बन्धी नीति निर्धारित करता है।
6. मौद्रिक नीति-सूचकांक तथा वस्तुएँ मुद्रा के मूल्यों में होनेवाले परिवर्तनों की ओर संकेत करते हैं जिनकी जानकारी से देश की सरकार या केन्द्रीय बैंक उचित मुद्रा नीति का निर्धारण करने, में सफल हो सकती है तथा मुद्रा के मूल्यों में स्थायित्व लाया जा सकता है।
7. कर-नीति का निर्धारण- सूचकांक कर-नीति के निर्धारण में भी सहायता प्रदान करते हैं क्योंकि यदि वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि नहीं हो रही है तो आरामदायक तथा आवश्यक वस्तुओं पर कर-वृद्धि की जा सकती है।
8. व्यापारी वर्ग को लाभदायक-सूचकांक की सहायता से व्यापारी वर्ग यह पता लगा सकता है कि उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री घट रही है या बढ़ रही है।
9. दीर्घकालीन ऋणों के भुगतान में सहायक दीर्घकालीन ऋणों के भुगतान (Pay-ment) में समता लाने के लिए सूचकांक अधिक उपयोगी है क्योंकि इसके द्वारा क्रय-शक्ति की कमी या बढ़ोतरी का माप मिलता है।
10. राजनीतिज्ञों के लिए महत्त्वपूर्ण- आधुनिक युग में राजनीति का देश की आर्थिक समस्याओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है और सूचकांक बहुत कुछ आर्थिक समस्याओं के सूचक होते हैं।
Q. 5. सूचकांकों की क्या सीमाएँ हैं ? उल्लेख करें ।
Ans. सूचकांकों के दोष या सीमाएँ- सूचकांकों में उपयोगिता होते हुए भी मूल्य तथा अन्य सूचकांक बहुत विश्वसनीय नहीं होते। लॉर्ड केन्ज ने सूचकांकों के दोषों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि मुद्रा की क्रय-शक्ति सम्बन्धी सूचकांक सन्तोषजनक नहीं होते हैं। किसी भी राष्ट्र में इस प्रकार के सूचकांक तैयार नहीं किए गए हैं जिनको मुद्रा की क्रय-शक्ति का संतोषजनक माप कहा जा सकता है। सूचकांकों के कुछ महत्त्वपूर्ण दोष तथा सीमाएँ निम्नलिखित हैं-
1. अन्तर्राष्ट्रीय तुलना सम्भव नहीं- निर्देशांकों के आधार विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का
उपयोग होता है। अतः इनकी सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय तुलना करना सम्भव नहीं होता
है।
2. विभिन्न समयों में मूल्यों की तुलना करना कठिन है-सूचकांकों द्वारा विभिन्न समयों में मूल्यों की तुलना करना भी सफल नहीं होता क्योंकि समय के अन्तर हो
जाने से वस्तुओं को उपभोग की प्रकृति भी बदल जाती है। पुरानी वस्तुओं का उपभोग
होना कम हो जाता है या बन्द हो जाता है तथा नई वस्तुओं का उपभोग अधिक मात्रा में
होना लगता है। जिस प्रकार का कपड़ा 1947 में उपयोग में आता था उस प्रकार का कपड़ा
अब उपभोग में नहीं आता।
3. मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन की सही सूचना ज्ञात नहीं होती-सूचकांक प्रायः थोक मूल्यों के आधार पर बनाए जाते हैं क्योंकि इस प्रकार के मूल्य की जानकारी आसानी से हो जाती है, परन्तु अधिकांश व्यक्ति वस्तुओं को फुटकर
मूल्यों पर खरीदते हैं। अतः थोक मूल्यों पर आधारित सूचकांक मुद्रा में परिवर्तन की
सही सूचना नहीं देते।
4. सूचकांक अनुमानजनक- सूचकांक केवल अनुमानजनक ही
होते हैं। अतः इनसे एक से अधिक परस्पर भिन्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
5. सीमित उपभोग-सूचकांकों का निर्माण किसी विशेष
उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। अतः इसका उपयोग अन्य आर्थिक समस्याओं
के अध्ययन के लिए नहीं किया जा सकता।
6. भार निर्धारण अव्यावहारिक-यह निश्चयपूर्वक नहीं
कहा जा सकता कि विभिन्न वस्तुओं पर तुलनात्मक व्यय यथास्थिर है अथवा उसमें कितना
परिवर्तन हुआ है। इस प्रकार वस्तुओं में भार निर्धारण में कठिनाई उठ खड़ी होती है।
7. सत्यता का अभाव सूचकांकों में गणितात्मक सत्यता
नहीं पाई जाती है। ये केवल अनुमानित होते हैं।
8. भूतकाल पर आधारित-सूचकांकों का एक दोष यह भी है
कि यह सदैव भूतकाल के अंकों पर आधारित होते हैं और इन्हीं अंकों से निष्कर्ष
निकालते हैं। इन निष्कर्षों को आधार मान कर वर्तमान नीतियों का निर्धारण किया जाता
है। कभी-कभी तो सूचकांक प्रकाशित होने में इसका समय लग जाता है प्रकाशित होते-होते
वस्तु स्थिति ही बदल जाती है। समय के बीतने पर मानव की उपभोग की आदतों में भी
परिवर्तन हो जाता है।
Q. 6. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक क्या
है? इसके लाभ तथा मान्यताएँ लिखिए।
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का अर्थ-सामान्य मूल्य
सूचकांकों से यह ज्ञात नहीं होता कि सामान्य मूल्य-स्तर में होनेवाले परिवर्तनों
को समाज के विभिन्न वर्गों के रहन-सहन के व्यय पर क्या प्रभाव पड़ता है यों तो जब
वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है तब वर्गों के व्यक्तियों का निर्वाह व्यय बढ़ जाता है
और जब मूल्य घटता है तब सभी का निर्वाह व्यय घट जाता है, परन्तु यह घट-बढ़ सभी के
लिए समान नहीं होती-किसी वर्ग पर इसका कम प्रभाव पड़ता है और किसी पर अधिक। इसका
प्रमुख कारण यह भी है कि विभिन्न वर्ग के व्यक्ति विभिन्न वस्तुओं का अलग-अलग
मात्रा में उपभोग करते हैं और इसलिए इनका उनके लिए अलग-अलग महत्त्व होता है। अतः
यह जानने के लिए कि किस वर्ग के व्यतियों पर मूल्यों के घट-बढ़ का कितना प्रभाव
पड़ा है यह आवश्यक हो जाता है कि सामान्य मूल्य सूचकांक के स्थन पर ऐसे सूचकांक
बनाये जाएँ जो स्थिति का सही ज्ञान करा सकें। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक इस उद्देश्य
की पूर्ति करते हैं। परिवर्तनों के प्रभाव का माप करने के लिए बनाए जाते हैं। ये
सूचकांक किसी स्थान विशेष या वर्ग विशेष या दोनों व्यक्तियों के निर्वाह-व्यय में
होनेवाले परिवर्तन की दिशा और मात्रा को प्रकट करते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों
का एक और पुराना नाम निर्वाह-व्यय सूचकांक (Cost of Living Index Numbers) भी है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के लाभ-उपभोक्ता मूल्य
सूचकांक की उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं-
1. व्यय के परिवर्तन की मात्र का अनुपात - इसकी
सहायता से उस वर्ग के व्यक्तियों के रहन-सहन के व्यय में परिवर्तन की मात्रा का
अनुमान किया जा सकता है।
2. मूल्यों का नियंत्रण-व्यय में परिवर्तन का
अनुमान होने पर आवश्यकता के अनुसार मूल्यों को नियंत्रित किया जा सकता है अर्थात्
यदि अधिक हैं तो कम किया जा सकता है और यदि कम हैं तो बढ़ाया जा सकता है। अनुमान
करके महँगाई भत्ता या न्यूनतम वेतन आदि को निश्चित किया जा सकता है।
3. महँगाई भत्ता, न्यूनतम वेतन आदि को निश्चित
करना-निर्वाह-व्यय के परिवर्तन का
4. राशनिंग व्यवस्था चलाना-इसी के आधार पर राशनिंग
व्यवस्था चालू की जा सकती है और उचित मूल्यों की दुकानें खोली जा सकती हैं।
मान्यताएँ-उपभोक्ता मूल्य सूचकांक कुछ मान्यताओं पर
आधारित् होते हैं जो निम्नलिखित प्रकार के हैं-
1. आवश्यकताएँ समान-सर्वप्रथम मान्यता यह है कि जिस
वर्ग का सूचकांक बनाया जा रहा है उसकी आवश्यकताएँ समान हैं। अगर यह मानकर न चला
जाए तो फिर प्रत्येक परिवार और फिर प्रत्येक व्यक्ति के निर्वाह-व्यय सूचकांक
अलग-अलग बनेंगे।
2. वस्तुएँ समान-उपभोग की जानेवाली वस्तुएँ भी आधार
वर्ष व चालू वर्ष में समान हैं।
3. वस्तुओं की समान मात्रा-सामान्यतः यह मान्यता
लेकर भी चलना पड़ता है कि आधार वर्ष और चालू वर्ष में उपभोग की जानेवाली वस्तुओं
की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
4. विभिन्न स्थानों पर एक ही भाव-यदि सूचकांक
विभिन्न स्थानों के लिए है तो यह मान्यता है कि सभी स्थानों पर लगभग वही भाव है और
उनमें कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं हुआ है।
5. औसत रूप से सत्य-सूचकांक प्रत्येक व्यक्ति अथवा
परिवार के लिए पूर्ण रूप से सत्य नहीं होते बल्कि औसत रूप से सत्य होते हैं।
6. वस्तुएँ प्रतिनिधि-शामिल की जानेवाली वस्तुएँ
प्रतिनिधि हैं।
Q. 7. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के
निर्माण की क्रियाओं का उल्लेख कीजिए।
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के निर्माण में
निम्नलिखित क्रियाएँ अपनाई जाती हैं-
1. वर्ग का निर्धारण-सर्वप्रथम, यह निश्चित कर लेना
चाहिए कि सूचकांक किस वर्ग विशेष के लिए बनाया जा रहा है।
2. बजट अनुसंधान-जो वर्ग चुना जाता है फिर उस वर्ग
के सदस्यों के परिवार बजट के बारे में अनुसंधान किया जाता है। इस अनुसंधान का
उद्देश्य यह पता लगाना है कि उपभोग के विभिन्न मदों पर इस वर्ग के औसत परिवार
द्वारा उपभोग किये गये पदार्थों पर कितना व्यय होता है। इससे हमें यह ज्ञात हो
जाता है कि किस-किस वर्ग के लोग किन-किन वस्तुओं का उपयोग कितनी मात्रा में करते
हैं। सुविधानुसार उपभोग की वस्तुओं को पाँच प्रमुख श्रेणियों में बाँट लिया जाता
है- (i) खाद्य सामग्री, (ii) वस्त्र, (iii) ईंधन और प्रकाश, (iv) मकान का किराया,
(v) विविध व्यय ।
3. मूल्य निर्धारण-जो वस्तुएँ सूचकांक में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई हैं, उनके फुटकर मूल्य उन स्थानों के विश्वस्त सूत्रों में ज्ञात किये जाते हैं जहाँ से उस वर्ग के व्यक्ति उन्हें खरीदते हैं।
4. भारांकन-जो वस्तुएं सूचकांक में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई हैं, उनके फुटकर मूल्य उन स्थानों के विश्वस्त सूत्रों में ज्ञात किये जाते हैं जहाँ से उस वर्ग के व्यक्ति उन्हें खरीदते हैं।
(i) आधार वर्ष में उपभोग की गई वस्तु की मात्रा (q0) के अनुपात में तथा (ii) आधार वर्ष में प्रत्येक वस्तु पर किये जाने वाले व्यय के मूल्य (w या P०q०) के अनुपात में।
Q. 8. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाने की रीतियों का उल्लेख करें।
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाने की निम्नलिखित दो रीतियाँ हैं-
1. समूही व्यय रीति या भारित समूह रीति (Aggregate Expenditure
Method of Weighted Aggregative Method) तथा 2. पारिवारिक बजट या भारित मूल्यानुपात रीति (Family Budget Method or
Weighted Average of Price Relatives Method)
1. समूही व्यय रीति-सूचकांक ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार है-
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक `=\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times100`
यह रीति लेस्पेयर रीति (Laspeyres Method) के नाम से प्रसिद्ध है।
गणन क्रिया-(i) आधार वर्ष में वस्तु की मात्रा (q०) और प्रचलित वर्ष का मूल्य (p1) को गुणा करके उनका योग (Σp1q0)
निकाल लिया जाता है। यह प्रचलित वर्ष का समूही व्यय है।
(ii)
आधार वर्ष में उपयोग की गई वस्तुओं की मात्रा (q०)
और आधार वर्ष के मूल्यों (p0) को
गुणा करके उनका योग (Σp0q0)निकाल
लिया जाता है। यह आधार वर्ष का समूही व्यय है।
(iii)
(Σp1q0)
को (Σp0q0) से
भाग दिया जाता है और भागफल को 100 से गुना कर दिया जाता है।
2.
पारिवारिक बजट रीति-जब इस रीति द्वारा सूचकांक का निर्माण किया जाता है तो सूत्र इस
प्रकार होता है-
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक `=\frac{\Sigma PV}{\Sigma V}`
गणन
क्रिया- (i) प्रत्येक वस्तु का प्रचलित वर्ष का मूल्यानुपात ज्ञात करते हैं।
मूल्यानुपात `=\frac{P_1}{P_0}\times100`
(ii)
प्रत्येक वस्तु के मूल्यानुपात को उस पर आधारित वर्ष में किए जाने वाले व्यय
(Value weight or V) से गुना करके भारित मूल्यानुपात (PV) ज्ञात किये जाते हैं।
(iii)
भारित मूल्यानुपातों का जोड़ (ΣPV) ज्ञात किया जाता है।
(iv)
भारों का जोड़ ΣV जो कि (Σp0q0)
के बराबर होता है ज्ञात कर लिया जाता है।
(v)
ΣPV
को ΣV
से भाग दे दिया जाता है।
Q. 9. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों की रचना करने में बरती जाने वाली सावधानियों
का वर्णन कीजिए ।
Ans. उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों की रचना करने में बरती जाने
वाली सावधानियों का वर्णन इस प्रकार है-
1. उपभोक्ता वर्ग का चयन-उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाते वक्त
सबसे पहले यह तय करना पड़ता है कि यह सूचकांक किस उपभोक्ता वर्ग के लिए बनाया
जाना है। उपभोक्ताओं को कई वर्गों जैसे औद्योगिक श्रमिक, सरकारी कर्मचारी, कृषि श्रमिक,
शिक्षक आदि में बाँटा जा सकता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग में उन लोगों को
ही सम्मिलित किया जाता है जिनकी आय, उपभोग, आदतें तथा व्यवसाय लगभग एक जैसी हों।
2. पारिवारिक बजट का ज्ञान - उपभोग वर्ग का चुनाव करने के
बाद उस वर्ग के कुछ परिवारों के बजट के बारे में निम्नलिखित सूचनाएँ एकत्र करनी चाहिए।
(i) उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की किस्म एवं प्रकार।
(ii) वस्तुओं की उपभोग की मात्रा।
(iii) संबंधित वस्तुओं की कीमत ।
(iv) उन पर खर्च की मात्रा।
उपभोक्ता वस्तुओं के निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है-
(i) खाद्य सामग्री। (ii) वस्त्र । (iii) ईंधन व प्रकाश ।
(iv) मकान का किराया । (v) शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन। (vi) विविध ।
3. आधार वर्ष- आधार वर्ष सामान्य एवं स्थिर वर्ष होना चाहिए।
आधार वर्ष तथा चालू वर्ष में अधिक अन्तर उचित नहीं माना जाता है।
4. कीमतों की जानकारी-चुनी हुई वस्तुओं की फुटकर कीमतों की
सूचना उन स्थानों से एकत्रित की जानी चाहिए जहाँ से चयनित वर्ग के ज्यादातर उपभोक्ता
वस्तुएँ खरीदते हैं।
5. भार-उपभोग की विभिन्न वस्तुओं का उपभोक्ता वर्गों के लिये
अलग-अलग महत्व होता है। इसलिए चयनित वस्तुओं को उनके तुलनात्मक महत्व के अनुसार भार
दिये जाते हैं। भार दो प्रकार से दिये जाते हैं।
(i) मात्रा भार-आधार वर्ष में उपभोग की गई वस्तु की मात्रा
(q०) के अनुपात में दिया जाता है।
(ii)
व्यय भार-आधार वर्ष में प्रत्येक वस्तु पर किये गये कुल व्यय (p0q0)
के अनुपात में दिया जाता है।
Q. 10. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक या जीवन निर्वाह लागत सूचकांकों के महत्व
का वर्णन करें ।
Ans.
1. जटिल तथ्यों की व्याख्या- अर्थव्यवस्था में कई ऐसे परिवर्तन घटित होते हैं जिनका
माप सूचकांकों के बिना संभव नहीं होता है। सूचकांक तथ्यों में होने वाले परिवर्तनों
का सापेक्ष माप बना देते हैं।
2.
वास्तविक मूल्यों का माप-इन सूचकांकों का प्रयोग करेन्सी के वास्तविक मूल्य या मुद्रा
की क्रय शक्ति तथा वास्तविक आय आदि का मापन करने के लिए भी किया जाता है।
(i)
वास्तविक आय = ×100
(ii)
वास्तविक मज़दूरी = ×100
3.
मूल्य नीति के निर्धारण में सहायक- सरकार उपभोक्ता कीमत सूचकांक का प्रयोग मूल्य नीति
तय करने के लिए करती है। इन सूचकांकों के आधार पर सरकार यह तय करती है कि कीमतों पर
नियंत्रण करें या दोहरी कीमत नीति अपनाएँ या राशनिंग की व्यवस्था करें। इसके अतिरिक्त
सरकार का किराया नियंत्रण, कराधान, सामान्य आर्थिक तथा राजकोषीय नीतियाँ काफी सीमा
तक उपभोक्ता कीमत सूचकांक के आधार पर बनाई जाती हैं।
4.
मजदूरी निर्धारण एवं समायोजन निर्वाह-जीवन सूचकांकों का प्रयोग मजदूरी समायोजन के आधार
के रूप में किया जाता है। सरकार महँगाई भत्ते को इन सूचकांकों के मूल्यों में होने
वाले परिवर्तनों के आधार पर तय करती है। इन सूचकांकों का प्रयोग मजदूरी ठेका एवं मजदूरी
के लिए किये गये समझौते के आधार के रूप में भी सरकार प्रयोग करती है।
5.
बाजारों का विश्लेषण- हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों का प्रयोग विशेष वस्तुओं एवं सेवाओं
के बाजारों या उनकी माँग एवं पूर्ति के विश्लेषण के लिए भी करते हैं।
6.
राष्ट्रीय आय की तुलना-इन सूचकांकों से कीमत वृद्धि के कारण चालू वर्ष की राष्ट्रीय
आय की तुलना आधार वर्ष की कीमतों के आधार पर की जा सकती है।
Q. 11. फिशर का निर्देशांक
आदर्श निर्देशांक क्यों कहलाता है ?
> फिशर का आदर्श सूचकांक
‘समय उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
> फिशर का आदर्श सूचकांक
‘तत्त्व उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
उत्तर :- निर्देशांक के
सूत्र भिन्न भिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार प्रतिपादित किया गया है। फिशर ने इन सूत्रों पर
विस्तृत शोध के बाद यह निष्कर्ष दिया की एक आदर्श निर्देशांक के सूत्र को निम्नलिखित
दो परिक्षणों पर खरा उतरना चाहिए। (1) समय उत्क्राम्यता परीक्षण (2) तत्त्व उत्क्राम्यता परीक्षण
फिशर के निर्देशांक इन दोनों परीक्षणों को संतुष्ट करता है। इसलिए इसे
आदर्श निर्देशांक कहा जाता है।
(1) समय उत्क्राम्यता परीक्षण (Time Reversal Test) :- निर्देशांक का यह पहला परीक्षण है। इसके अन्तर्गत निर्देशांक का सूत्र ऐसा होना चाहिए जो सापेक्षिक विचलन के दोनों समय बिन्दुओं के बीच एक नियत अनुपात व्यक्त करें अर्थात निर्देशांक के सूत्र को समय की दोनों दिशाओं में कार्यशील होना चाहिए।
P01 . P10 = 1
जहां P01 = आधार वर्ष की अपेक्षा जांच वर्ष में मूल्य अनुपात
P10 = जांच वर्ष की अपेक्षा आधार वर्ष में मूल्य अनुपात
फिशर के सूत्र में
P01 = `\sqrt{\frac{\SigmaP_1q_0}{\SigmaP_0q_0}\times\frac{\SigmaP_1q_1}{\Sigma P_0q_1}}`
P10 = `\sqrt{\frac{\SigmaP_0q_0}{\SigmaP_1q_0}\times\frac{\SigmaP_0q_1}{\Sigma P_1q_1}}`
`P_{01}.P_{10}=\sqrt{\frac{\Sigma P_1q_0}{\Sigma P_0q_0}\times\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_1}\times\frac{\Sigma P_0q_0}{\Sigma P_1q_0}\times\frac{\Sigma P_0q_1}{\Sigma P_1q_1}}`
`P_{01}.P_{10}=\sqrt1`
P01 . P10 = 1
अतः फिशर का सूत्र समय उत्क्राम्यता परीक्षण (Time Reversal Test) को संतुष्ट करता है।
(2) तत्त्व उत्क्राम्यता परीक्षण (Factor Reversal Test) :- यह दूसरा सूत्र है।इसके अनुसार आधार मूल्य निर्देशांक को परिमाण निर्देशांक
से गुणा किया जाए तो सम्बंधित कुल मूल्य निर्देशांक ज्ञात होना चाहिए।
`P_{01}.Q_{01}=V_{01}=\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_0}`
P01 = `\sqrt{\frac{\SigmaP_1q_0}{\SigmaP_0q_0}\times\frac{\SigmaP_1q_1}{\Sigma P_0q_1}}`
Q01 = `\sqrt{\frac{\SigmaP_0q_1}{\SigmaP_0q_0}\times\frac{\SigmaP_1q_1}{\Sigma P_1q_0}}`
`P_{01}.Q_{01}=\sqrt{\frac{\SigmaP_1q_0}{\SigmaP_0q_0}\times\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_1}\times\frac{\Sigma P_0q_1}{\Sigma P_0q_0}\times\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_1q_0}}`
`P_{01}.Q_{01}=V_{01}=\sqrt{(\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_0})^2}=\frac{\Sigma P_1q_1}{\Sigma P_0q_0}`
Group -A सांख्यिकी के सिद्धान्त
JCERT/JAC REFERENCE BOOK
Group -A सांख्यिकी के सिद्धान्त
Group-B भारतीय अर्थव्यवस्था
JCERT/JAC प्रश्न बैंक - सह - उत्तर पुस्तक (Question Bank-Cum-Answer Book)
विषय सूची
क्र०स० | अध्याय का नाम |
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी | |
1. | |
2. | |
3. | |
4. | |
5. | |
6. | |
7. | |
8. | |
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास | |
1. | |
2. | |
3. | |
4. | |
5. | |
6. | |
7. | |
8. | |
Economics Group-A
Objective Question
Most Important Group-B
Economics Group-B
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा (Indian Economy on the Eve of Independence)
भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy)
5.भारत में मानव पूँजी का निर्माण (Creation of Human Capital in India)
6. ग्रामीण विकास (Rural Development )
7. रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे(Employment Growth, Informalization and Other Issues)
8. आधारिक संरचना (Infrastructur)
9. पर्यावरण और धारणीय विकास (Environment and Sustainable Development)
Objective Question
Useful Link
Class 9th & 10th | |
Class 11th & 12th | |
University Economics | |
11th & 12th Model Question Solution | |
Hindu Mythological Secrets | |
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JAC Exam. Question & Solution | |
Department Letter, Exam. & NEWS | |
TGT-PGT-JPSC | |
Department Letter, Exam. & NEWS. | |
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