Class 11 Economics 9. सांख्यिकीय विधियों के उपयोग USES OF STATISTICAL METHODS

Class 11 Economics 9. सांख्यिकीय विधियों के उपयोग USES OF STATISTICAL METHODS

Class 11 Economics 9. सांख्यिकीय विधियों के उपयोग USES OF STATISTICAL METHODS

9. सांख्यिकीय विधियों के उपयोग USES OF STATISTICAL METHODS

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. क्या साक्षात्कार विधि प्रश्नावली विधि का एक रूप है ?

Ans. हाँ, साक्षात्कार प्रश्नावली विधि का एक रूप है।

Q. 2. पूर्व प्रकाशित आँकड़ों को क्या कहा जाता है ?

Ans. द्वितीयक आँकड़े।

Q.3. एक परियोजना प्रतिवेदन (Report) का क्या अर्थ है ?

Ans. अनुसंधान कार्य के अन्त में अनुसंधानकर्ता द्वारा जो एक पत्र तैयार किया जाता है उसे परियोजना प्रतिवेदन कहते हैं।

Q. 4. किसके पश्चात् प्रतिवेदन तैयार किया जाता है ?

Ans. समंकों के निर्वचन के पश्चात् ।

Q. 5. अनुसंधान का अन्तिम कार्य क्या होता है ?

Ans. प्रतिवेदन लिखना।

Q. 6. एक उत्तम प्रश्नावली के तीन गुण लिखें।

Ans. (1) कम, सरल तथा स्पष्ट प्रश्न, (2) प्रश्नों का उचित क्रम तथा (3) अनुचित प्रश्नों का अभाव।

Q. 7. एक प्रतिवेदन तैयार करने तक किन स्तरों से गुजरना पड़ता है?

Ans. (1) समस्या अथवा मान्यता जिसे सिद्ध करना है-निश्चित की जाये, (2) ज्ञात किए। जाये कि उस पर क्या कार्य हो चुका है, (3) आवश्यक समंकों का निर्धारण करना, (4) समंको का संकलन, (5) समंकों का विश्लेषण, (6) संक्षिप्तीकरण तथा निष्कर्षों को प्रस्तुत करना, (7) परिणामों का निर्वचन तथा निष्कर्ष तथा (8) कार्यवाही का सुझाव।

Q. 8. सांख्यिकीय अनुसंधान कार्य के प्रमुख चरण कौन-से हैं ?

Ans. सांख्यिकीय अनुसंधान कार्य के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

(1) सांख्यिकीय अनुसंधान का आयोजन, (2) समंकों का संकलन, (3) समंकों का विश्लेषण तथा (4) समंकों का निर्वचन तथा प्रतिवेदन तैयार करना।

Q. 9. सांख्यिकीय विधियाँ किसके लिए महत्त्वपूर्ण हैं ?

Ans. सांख्यिकीय विधियाँ हमारे दैनिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

Q. 10. सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग क्या है ?

Ans. सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग आर्थिक विश्लेषणों में किया जाता है।

Q. 11. परियोजना निर्माण हमारी किस प्रकार सहायता करता है ?

Ans. परियोजना निर्माण से यह पता चलता है कि सांख्यिकीय विधियों के विश्लेषणों में किस प्रकार प्रयोग होता है।

Q. 12. उत्पाद अथवा व्यवस्था के लिए आप सूचना कैसे प्राप्त कर सकते हैं और सुधार के लिए सुझाव ?

Ans. परियोजना निर्माण एवं रिपोर्ट तैयार करके।

Q. 13. प्रश्नावली के लिए प्रश्न बनाते समय क्या महत्त्वपूर्ण हैं ?

Ans. लक्ष्य समूह का चुनाव।

Q. 14. आप आँकड़ों के संकलन का चयन किस प्रकार करोगे ?

Ans. सर्वेक्षण के उद्देश्य के आधार पर आँकड़ों के संकलन का चयन आश्रित होता है।

Q. 15. दो प्रकार के आँकड़ों के नाम लिखिए।

Ans. दो प्रकार के आँकड़े इस प्रकार हैं

(i) प्राथमिक आँकड़े एवं

(ii) द्वितीयक आँकड़े।

Q. 16. प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़ों के प्रयोग का आधार क्या है ?

Ans. सर्वेक्षण का उद्देश्य ।

Q. 17. आप प्राथमिक आँकड़े किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं ?

Ans. व्यक्तिगत साक्षात्कार, डाक, फोन, ई-मेल आदि के माध्यम से प्राथमिक आँकड़े प्राप्त कर सकते हैं।

Q. 18. द्वितीयक आँरुड़े किस प्रकार सूचना प्रदान करते हैं ?

Ans. द्वितीयक आँकड़े प्रकाशित अथवा अप्रकाशित स्रोतों से सूचना प्रदान करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. ग्रंथ सूची का संक्षेप में अर्थ बताइए।

Ans. ग्रंथ सूची परियोजना निर्माण का भाग है। इस भाग में द्वितीयक स्रोतों जैसे पत्रिका, अखबार, अनुसन्धान पत्र आदि को लिखा जाता है।

Q. 2. परियोजना निर्माण के चरण लिखिए।

Ans. परियोजना निर्माण के चरण ये हैं

(1) अध्ययन के क्षेत्र या समस्या को पहचानना । (2) लक्ष्य समूह का चुनाव (3) आँकड़ों का संकलन। (4) आँकड़ों का संगठन एवं प्रस्तुतीकरण । (5) विश्लेषण एवं व्याख्या । (6) उपसंहार। (7) ग्रंथ सूची।

Q. 3. परियोजना निर्माण में उपसंहार का महत्त्व बताइए।

Ans. परिणामों का विश्लेषण एवं विवेचना के बाद उपसंहार निकाला जाता है। इससे भावी परिदृश्य के पूर्वानुमान लगाने तथा सुझाव देने का काम किया जाता है।

Q. 4. परियोजना रिपोर्ट के विश्लेषण एवं व्याख्या के लिए किन-किन सांख्यिकीय उपकरणों की आवश्यकता होती है।

Ans. विश्लेषण एवं व्याख्या के लिए निम्नांकित उपकरणों की जरूरत होती है-

(i) केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप (माध्य, मध्यिका, एवं बहुलक) (ii) अपकिरण के माप (माध्य विचलन, विस्तार, मानक विचलन) (iii) सहसंबंध ।

Q. 5. परियोजना निर्माण में लक्ष्य समूह का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।

Ans. लक्षित समूह का चुनाव या पहचान करना रिपोर्ट तैयार करने के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसके आधार पर प्रश्नावली के लिए प्रश्न तैयार किए जाते हैं। लक्ष्य समूह के आधार पर उन व्यक्तियों या समूहों की पहचान की जाती है जिनसे सूचना एकत्र करने के लिए प्रश्न पूछे जाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Q. 1. उपभोक्ता जागरूकता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें ।

Ans. आधुनिक युग उपभोक्तावाद का युग है। उपभोक्ताओं के उपयोग एवं सुविधा के लिए प्रतिवेदन नये उपभोक्ता पदार्थों की पूर्ति की जा रही है। नये प्रकार के खाद्य पदार्थों, नये फैशन के कपड़ों, सजावट के सामान, गृहस्थी के उपयोग के लिए नये उपकरणों, परिवहन के नये साधनों, मनोरंजन के नये यंत्रों आदि का निरन्तर आविष्कार तथा उत्पादन किया जा रहा है। इन वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए विज्ञापन तथा प्रचार का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। आज का उपभोक्ता आकर्षक विज्ञापनों तथा अनेक उत्पादकों के प्रचार के आधार पर अपने उपभोग की सामग्री का चुनाव करता है। इस सम्बन्ध में उसका कई प्रकार से शोषण किया जाता है।

उपभोक्ता संगठित रूप से जागरूक न होने के कारण अपने-अपने अधिकारों के प्रति उदासीन रहते हैं। फलतः उत्पादक, व्यापारी वर्ग द्वारा पग-पग पर ठगे जाते हैं और शोषण का शिकार होते हैं। व्यापार में पनपी अनैतिकता ने जहाँ एक ओर उपभोक्ता शोषण को जन्म दिया तथा बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता अपने शोषण के लिए स्वयं भी उत्तरदायी है। (1) उपभोक्ताओं का संगठित न होना, (2) अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ, (3) उपभोक्ता संरक्षण की समुचित व्यवस्था का न होना, (4) शिक्षा की कमी, (5) हीन भावना, (6) परम्परावादी दृष्टिकोण, (7) निर्धनता, (8) सूचना की कमी आदि उपभोक्ता शोषण के लिए उत्तरदायी हैं।

उपभोक्ता की समस्याएँ- (1) मिलावट की समस्या, (2) घटिया वस्तु की समस्या, (3) निर्धारित कीमत से अधिक कीमत की समस्या, (4) कम नाप-तौल की समस्या, (5) गारण्टी की शर्तों का पालन न करना, (6) उत्पादन के गुणों के विषय में झूठी सूचनाएँ देना, (7) एडवान्स लेने के बाद भी वस्तु की समय पर पूर्ति न करना तथा (8) सेवा की उपेक्षा।

उपभोक्ता के अधिकार- उपभोक्ता की उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं- (1) सुरक्षा का अधिकार, (2) सूचना प्राप्त करने का अधिकार, (3) सुनवाई का अधिकार, (4) चयन का अधिकार, (5) हर्जाना प्राप्त करने का अधिकार, (6) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार।

उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ-उपभोक्ताओं को काला बाजारी, मिलावट, नकली माल देकर असली माल की कीमत वसूलने, निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य वसूल करने जैसे समाज विरोधी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिलाना ही उपभोक्ता संरक्षण है। संक्षेप में, शोषित उपभोक्ताओं को न्याय दिलाना उपभोक्ता संरक्षण का मुख्य उद्देश्य है।

विश्व उपभोक्ता आन्दोलन से प्रेरित होकर भारतीय संसद ने उपभोक्ताओं को शीघ्र एवं सुलभ न्याय प्रदान करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण एक्ट 1986 पारित किया।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत परामर्शदाता मण्डल एवं अर्द्ध-न्यायिक मंच की स्थापना का प्रावधान रखा गया है। केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना की गई है, जिनका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देना तथा उनकी रक्षा करना है। उपभोक्ताओं को शीघ्र तथा सस्ता न्याय दिलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग तथा राज्य स्तर पर राज्य आयोगों का गठन किया गया है। जिला स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण जिला मंच (फोरम) उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

यदि माल सेवाओं का मूल्य तथा हर्जाने की माँगी गई रकम 1 लाख रुपये से कम है तो सम्बन्धित जिले के लिए गठित जिला मंच में शिकायत प्रस्तुत की जा सकती है। यदि माल/सेवाओं का मूल्य तथा हर्जाने की माँगी गई राशि 1 लाख से 10 लाख रुपये तक हो तो शिकायत राज्य आयोग को प्रस्तुत की जा सकती है। यदि माल/सेवाओं का मूल्य तथा हर्जाने की माँगी गई राशि 10 लाख रुपये से अधिक है तो इसकी शिकायत राष्ट्रीय आयोग को प्रस्तुत करनी होती है।

सामान्यतया शिकायत का निस्तारण विपक्षी को सूचना प्राप्त होने की तिथि से 90 दिन में अपेक्षित है। शिकायत सादे कागज पर की जा सकती है। किसी वकील की आवश्यकता नहीं है। दूसरे शब्दों में, शिकायत सम्बन्धी पत्र जिला मंच को देने से बिना वकील की सहायता से उपभोक्ता के हित में कार्यवाही की जाती है। उपभोक्ता द्वारा माँगी गई राहत के स्वरूप तथा तथ्यों को देखते हुए जिला मंच/आयोग द्वारा निम्नलिखित में से एक या अधिक राहत देने के लिए आदेश दिया जा सकता है- (क) माल की त्रुटि दूर करना, (ख) माल को बदलना, (ग) अदा किया गया मूल्य वापस करना तथा (घ) उपभोक्ता द्वारा सहन की गई हानि या क्षति के लिए मुआवजा दिलाना।

जिला फोरम के निर्णय के विरुद्ध अपील राज्य आयोग के समक्ष 30 दिन की अवधि के भीतर की जा सकती है। राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के समक्ष अपील करने के लिए कोई शुल्क नहीं है। सुनवाई की पहली तारीख से 90 दिन में अपील का निर्णय अपेक्षित होता है।

उपभोक्ता संरक्षण सम्बन्धी सरकारी प्रयत्न- उपभोक्ता संरक्षण हेतु भारत सरकार प्रयत्नशील है। उपभोक्ताओं में उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने के लिए सरकार संगोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं प्रदर्शनियों का सहारा ले रही है तथा इसी हेतु आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर विशेष कार्यक्रम भी प्रसारित किये जा रहे हैं।

Q. 2. एक उत्तम प्रश्नावली कैसे तैयार की जाती है ? उदाहरण देकर समझायें ।

Ans. प्रश्नावली तैयार करना (Drafting the Questionnaire) - प्रश्नावली विधि की सफलता मुख्यतः प्रश्नावली की उत्तमता पर निर्भर करती है। एक अच्छी प्रश्नावली तैयार करने के लिए उच्चकोटि की योग्यता एवं अनुभव की आवश्यकता है। प्रश्नावली तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष रूप से ध्यान देना आवश्यक है-

1. कम प्रश्न - यथासम्भव प्रश्नों की संख्या कम-से-कम रखी जाए। प्रश्नों की सही संख्या अनुसंधान के उद्देश्य एवं क्षेत्र पर निर्भर करेगी। पन्द्रह से बीस तक प्रश्नों की संख्या उचित संख्या मानी जा सकती है। यदि प्रश्नावली लम्बी है तो उसे दो या तीन भागों में विभाजित करना चाहिये।

2. उचित क्रम - प्रश्न यथोचित क्रम में होने चाहिए ताकि उनका उत्तर ठीक ढंग से दिया जा सके। एक विषय सम्बन्धित प्रश्न आगे या पीछे न देकर एक ही स्थान पर दिये जाने चाहिए। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति से यह पूछे बिना कि वह विवाहित है या नहीं उसके बच्चों की संख्या पूछना मूर्खता होगी। इसी प्रकार किसी व्यक्ति की आय पूछने से पहले उससे यह पूछना उचित होगा कि वह नौकरी करता है या नहीं।

3. सरलता तथा स्पष्टता - प्रश्न संक्षिप्त, सरल तथा आसानी से समझने योग्य होने चाहिए। जटिल एवं लम्बे प्रश्न उत्तरदाता को दुविधा तथा असमंजस में डाल देते हैं। फलस्वरूप, दह ठीक उत्तर नहीं दे पाता। यथासंभव ऐसे प्रश्न नहीं पूछने चाहिए। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनका उत्तर 'हाँ' या 'नहीं' में दिया जा सके। यदि प्रश्नों का उत्तर लम्बा हो तो सूचना देने वाले व्यक्ति से सहयोग की आशा बहुत कम होगी।

4. अनुचित प्रश्न- ऐसे प्रश्न प्रश्नावली में शामिल नहीं किये जाने चाहिए जिनका उत्तर देने में सूचकों के आत्म-सम्मान व उनकी आर्थिक व सामाजिक भावनाओं को ठेस लगे। उदाहरण के लिए, आय के साधन, गुप्त बीमारियों आदि प्रश्नों के उत्तर देने में लोग बहुत हिचकिचाते हैं। जहाँ पर ऐसी सूचना प्राप्त करनी आवश्यक हो वहाँ पर प्रश्नावली के स्थान पर अनुसंधानकर्ता प्रत्यक्ष व्यक्तिगत विधि से ऐसे उत्तर प्राप्त करें। तब भी ऐसे प्रश्न केवल अन्त में ही पूछे जाने चाहिए अन्यथा सारी प्रश्नावली का उत्तर पाना कठिन हो जाएगा।

5. निर्देश- प्रश्नावली में सूचना देने वाले के लिए आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए। उदाहरणार्थ, कितने समय में प्रश्नावली वापस भेजी जाये तथा किस पते पर भेजी जाये, इत्यादि। माप की इकाई के विषय में भी स्पष्ट निर्देश दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि वजन सम्बन्धी प्रश्न पूछा गया है तो यह स्पष्ट हो कि वजन किलोग्राम में देना है अथवा सेरो या पौण्डों में आदि।

6. टिप्पणी - यदि किसी विशेष प्रश्न में व्याख्या की आवश्यकता है तो उस पर निशान अंकित करके उसकी व्याख्या टिप्पणी के रूप में दे देनी चाहिए।

7. प्रश्नों की प्रकृति - प्रश्न चार प्रकार के हो सकते हैं-

(i) सामान्य विकल्प प्रश्न- ऐसे प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' या 'नहीं', 'गलत' अथवा 'सही' में दिया जाता है। उदाहरणार्थ, क्या आपके घर में टेलीविजन है ? इसका उत्तर 'हाँ' या 'नहीं' में बड़ी सुगमता से दिया जा सकता है।

(ii) बहु-विकल्प प्रश्न- इस प्रकार के प्रश्नों के कई सम्भव उत्तर होते हैं। ये उत्तर प्रश्नावली में ही छपे होते हैं, सूचक उनमें से किसी एक पर निशान लगा देता है, उदाहरणार्थ,

(अ) आपकी मासिक आय कितनी है ?

(क) 5000 तथा इससे कम ---

(ख) 5001-10,000 ---

(ग) 10,001-15,000 ---

(घ) 15,001 से अधिक ---

(ब) जिस भवन में आप रहते हैं उसकी दशा कैसी है ?

(क) भवन अच्छी स्थिति में है ---

(ख) साधारण मरम्मत की आवश्यकता है ---

(ग) विशिष्ट मरम्मत की आवश्यकता है ---

(घ) रहने के अयोग्य है ---

अथवा

(क) आपकी वैवाहिक स्थिति क्या है ?

(अ) विवाहित ---

(ब) अविवाहित ---

(स) विधुर ---

(द) पृथक् ---

(य) तलाकशुदा ---

(ख) आप आने कार्य स्थल किससे जाते है ?

(अ) निजी वाहन से ---

(ब) बस अथवा किराये के वाहन से ---

(स) लोकल रेलगाड़ी से ---

(द) पैदल ---

इस प्रकार के प्रश्न न केवल उत्तर देने में सरल होते हैं बल्कि इनका सारणीयन भी बहुत सुगम हो जाता है।

(iii) विशिष्ट जानकारी देने वाले प्रश्न -इन प्रश्नों द्वारा विशिष्ट जानकारी प्राप्त की जाती है जैसे आपकी आयु का है, आपके कितने पच्चे हैं ? आदि।

(iv) खुले प्रश्न - ऐसे शब्दों का उत्तर सूचक अपने शब्दों में देता है। प्रश्नावली में उत्तर के लिए काफी जगह छोड़ दी जाती है। उदाहरणार्थ, बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए आप अपने विचार दीजिए। यह प्रश्न खुला प्रश्न है। प्रायः ऐसे प्रश्नों का बहुत कम उत्तर मिलता है क्योंकि इसके उत्तर में काफी समय लगता है और सोचना भी पड़ता है।

जहाँ तक हो सके, पहली तथा दूसरी प्रकार के प्रश्नं अधिक-से-अधिक होने चाहिए।

8. सत्यता की जाँच - प्रश्नावली में कुछ ऐसे प्रश्नों का भी समावेश होना चाहिए जिनसे उत्तरों की यथार्थता की परस्पर जाँच की जा सके और अशुद्धियों का ठीक-ठाक पता लगाया जा सके।

9. गणनीय कार्य- सूचना देने वालों से कोई गणनीय (calcu-lation) कार्य नहीं कराना चाहिए। उदाहरण के लिए, वार्षिक आय पर प्रश्न नहीं पूछना चाहिए क्योंकि अधिकांशतः आय मासिक होती है। इसी प्रकार ऐसे प्रश्न जिनमें अनुपात अथवा प्रतिशत निकालनी हो, नहीं पूछने चाहिए अन्यथा इसमें बहुत समय लगेगा और सम्भव है कि सूचना देने वाला प्रश्नावली ही वापस न करे।

प्रश्नावली भेजने से पहले कुछ व्यक्तियों पर उसका परीक्षण कर लेना चाहिए। इस क्रिया को प्रारम्भिक सर्वेक्षण कहते हैं। ऐसा करने से सम्भावित त्रुटियाँ सामने आ जाएँगी तथा उनमें आवश्यक परिवर्तन करना सम्भव होगा। प्रश्नावली के अन्त में सूचना देने दाले को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि उससे प्राप्त सूचना गुप्त रखी जायेगी तथा उसका दुरूप्योग नहीं किया जायेगा।

Q.3. एक अच्छी प्रश्नावली बनाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? संक्षेप में लिखें ।

Ans. प्रश्नावली तैयार करना एक विशिष्ट कला है। सांख्यिकीय अनुसंधान की सफलता अनुसूची या प्रश्नावली की श्रेष्ठता पर निर्भर करती है। वास्तव में, मानवीय जनसंख्या से, ऐते रूप में जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण सम्भव हो तथा पर्याप्त परिशुद्धता से जानकारी प्राप्त करना, एक कठिन समस्या है। मनुष्य की अपनी मनतरंग होती है और गौरव, इच्छा तथा द्वेष की भावनाएँ होती हैं, जिनका प्रभाव उसके द्वारा दिये गये उत्तरों पर पड़ता है। प्रश्नावली तैयार करते समय यह उचित होगा यदि अनुसंधानकर्ता उन आदर्श तथ्यों की व्यापक रूपरेखा बना ले जिन्हें वह प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त करना चाहता है। यह और भी अधिक अच्छा होगा यदि उन सारणियों का गठन भी कर लिया जाए जिनमें संकलित सांख्यिकीय तथ्यों को सारणीबद्ध किया जाएगा। सारणियों का ढाँचा बना लेने से प्रश्नों का गठन सुविधा से हो जाता है। आर्थर कोर्नहॉसर (Arthur Kornhauser) ने प्रश्नावली बनाने की प्रमुख समस्याओं को चार वर्गों में विभक्त किया है-

(1) प्रश्न के विषय से सम्बन्धित निर्णय,

(2) प्रश्न की भाषा से सम्बन्धित निर्णय,

(3) प्रश्नों के उत्तरों के स्वरूप से सम्बन्धित निर्णय,

(4) प्रश्न का क्रम में स्थान से सम्बन्धित निर्णय।

ये चारों बातें प्रश्नावली के आकार, विषय, क्रम आदि के निर्धारण में सहायता करती हैं!

प्रारम्भिक सर्वेक्षण प्रश्नावलियों का अनुसंधान कार्य में प्रयोग करने से पूर्व, एक 'प्रारम्भिक सर्वेक्षण' द्वारा उनकी जाँच की जानी चाहिए। यदि वास्तविक सर्वेक्षण एक बड़े पैमाने पर किया जाता है तब तो प्रारम्भिक सर्वेक्षण करना और भी अधिक वांछनीय होता है। प्रारम्भिक सर्वेक्षण मुख्यतः वास्तविक सर्वेक्षण का प्रतिरूप होता है तथा अनुसंधान में लगे व्यक्तियों को वास्तविक कार्य की रिहर्सल कराता है। इस प्रकार के सर्वेक्षण की उपयोगिता उससे प्राप्त परिणामों में न होकर उससे सीखे गये अनुभवों में होती है। इससे प्रश्नावलियों एवं अनुसंधान विधि की कमियों और उनके दोषों का पता चल जाता है। ज्ञात कमियों तथा दोषों के आधार पर प्रश्नावली तथा विधियों में सुधार किये जाते हैं। प्रारम्भिक सर्वेक्षण करने में लगने वाले अतिरिक्त समय व लागत का लाभ मिल जाता है, क्योंकि यदि मूल सर्वेक्षण शुरू कर देने के बाद उसकी कमियों का पता लगता है और तब उसे छोड़ा या उसमें सुधार करना अधिक खर्चीला पड़ता है। जो बातें अनुसंधानकर्ताओं या प्रगणकों को स्पष्ट हों, सम्भव है कि वे सूचकों को स्पष्ट न हों। इन सब बातों के प्रति आश्वस्त होने के लिए वास्तविक दशाओं में उसकी जाँच करना उचित रहता है।

अनुसंधान के परिणामों की श्रेष्ठता प्रश्नावली के गुणों पर निर्भर रहती है, अतः प्रश्नावली तैयार करने में । नेम्नलिखित बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए-

(1) सर्वेक्षक को अपना परिचय देना चाहिए और सर्वेक्षण का उद्देश्य स्पष्ट करना चाहिए। उद्देश्य स्पष्ट होने पर यह सरल हो जाता है कि किन प्रश्नों को प्रश्नावली में रखा जाए।

(2) प्रश्नावली का आकार छोटा हो।

(3) प्रश्न सरल, स्पष्ट व सूक्ष्म हो।

(4) प्रश्नों में उचित शब्दों का प्रयोग हो।

(5) प्रश्नों में उत्तरों का ज्ञान सूचकों को हो।

(6) प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देना सम्भव हो।

(7) सूचकों की भावनाओं को ठेस न पहुँचे।

(8) प्रश्नों को उचित प्रकार से क्रमबद्ध किया जाए।

(9) प्रश्नावली भारत सम्बन्धी आवश्यक निर्देश।

(10) प्रश्नावली का गठन।

(11) टिप्पणी (Footnotes) ।

(12) सत्यता की जाँच।

(13) गणनीय कार्य न कराना।

(14) प्रश्नावली आकर्षित होनी चाहिए।

Q.4. समंकों का निर्वचन कैसे किया जाता है और प्रतिवेदन कैसे तैयार किया जाता है?

Ans. समंकों का निर्वचन करना तथा प्रतिवेदन तैयार करना (Interpretation and Preparation of the Report)- समंकों के संकलन व विश्लेषण के पश्चात् उनसे उचित या निष्पक्ष निष्कर्ष निकाले जाते हैं। श्रम या धन जो अनुसंधान में लगाया गया है, उसकी उपयोगिता परिणामों के सही निर्वचन पर ही निर्भर रहती है। हार्पर (Harper) के अनुसार, "सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि निष्कर्ष उन मौलिक समंकों, जिन पर वह आधारित है, से श्रेष्ठ नहीं हो सकता। यदि मौलिक समंकों का संकलन उचित रूप से नहीं किया जाता हो तो विश्लेषण समय का अपव्यय होगा और सम्भव है कि वह बर्बादीपूर्ण हो क्योंकि यह गुमराह कर सकता है जिसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं।" सांख्यिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समंकों का निर्वचन करते समय अनुसंधान अंतर्गत समस्या को निष्पक्ष रूप से तथ्यानुरूप से देखेगा। रीचमैन (Reichmann) के शब्दों में, "निर्वचन, निर्वचनकर्त्ता पर भी उतना ही निर्भर करता है जितना निर्वाचित समंकों पर तथा उसे अवास्तविकता, द्वेष तथा कुतर्क से बचना चाहिए।" जार्ज सिम्पसन तथा फ्रिट्रज काफ्का ने निर्वचन के चर सिद्धान्तों का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार हैं- (i) सत्य निर्वचन के लिए यह आवश्यक है कि निर्वचनकर्त्ता, समकों में क्या है, यह देखने का इच्छुक हो, (ii) समंकों के सत्य निर्वचन के लिए यह आवश्यक है कि निर्वचनकर्त्ता संख्याओं की पृष्ठभूमि में क्या है यह जानने का प्रयत्न करे। (iii) समंकों के अर्थपूर्ण विवेचन के लिए तर्कपूर्ण-चिन्तन का नियम अनिवार्य है। (iv) स्पष्ट तथा निश्चित भाषा ठोस निर्वचन का अंग होती है।

अनुसंधान के परिणामों को अन्य व्यक्तियों तक संचारित करना होता है, अतः समंकों के निर्वचन के पश्चात् अनुसंधान का एक प्रतिवेदन (Report) तैयार करना पड़ता है। अतः अनुसंधान का अन्तिम परन्तु महत्त्वपूर्ण कार्य प्रतिवेदन लिखना होता है जो पाठक को यह ज्ञात करना होता है कि अनुसंधान से क्या उत्पन्न किया-अर्थात् उसके परिणाम व अर्थ क्या रहे। "अनुसंधान कार्य तब तक पूरा नहीं होता जब तक उसका प्रतिवेदन न लिखा जाये। चाहे कितनी ही योग्य मान्यताएँ हों, अध्ययन चाहे कितनी ही सावधानी से संचारित व पूरा किया गया हो, उसके निष्कर्ष कितने ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों, यदि अन्य व्यक्तियों को प्रतिवेदन के माध्यम से उन्हें संचारित नहीं किया जाता है तो उनका कोई महत्त्व नहीं है। अनेक समाजशास्त्र-वेत्ता यह मानते हैं कि प्रतिवेदन लिखना एक अप्रिय कार्य है जो अनुसंधान-विवरण के अन्त में अनेक करना पड़ता है उसका एक अंग नहीं है। सत्य यह है कि इस चरण के लिए एक ऐसे कौशल की आवश्यकता होती है जो अनुसंधानों के अन्य चरणों में अपेक्षित कौशल से बिल्कुल भिन्न होता है.... यह अनुसंधान के दायित्वों का ही एक अंग है जिनमें उसी प्रकार का सावधानीपूर्ण ध्यान देना चाहिए जितना पूर्व के चरणों में दिया गया है।" प्रतिवेदन में अनुसंधान के लक्ष्य एवं उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित रूप में अनुसंधान के लक्ष्य एवं उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित करके दिये जाने चाहिए। समंकों का संकलन किस प्रकार किया गया है तथा समंक संकलन में किस रीति का पालन किया गया है, का संक्षिप्त उल्लेख भी प्रतिवेदन में किया जाना चाहिए। सम्पूर्ण अनुसंधान के परिणामों के संक्षिप्त से प्रतिवेदन प्रारम्भ होना चाहिए। संक्षेप में, प्रतिवेदन एक सुरचित प्रलेख होना चाहिए। "एक सुसंगठित संख्यात्मक प्रतिवेदन प्रारम्भिक परिचय से अन्तिम संक्षिप्त तक इस प्रवाहित ढंग से प्रस्तुत करता है जिसमें एक-दूसरे से सम्बन्धित समंक, स्वाभाविक रूप से निकाले गये निष्कर्ष एवं अनुमान, महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में रुचि एवं सम्बन्ध प्रतिवेदन के विषय से तर्कपूर्ण ढंग से एकीकृत होते है जिससे सम्पूर्ण प्रतिवेदन का पूर्ण अवयव (coherent whole) प्रतीत होता है।" इस प्रकार का प्रतिवेदन तैयार करने एवं प्रस्तुत करने के लिए, "सांख्यिंक में सांख्यिकीय रीतियों के व्यवहार का तकनीकी कौशल, विषय-सम्बन्धी गहरा ज्ञान, पूर्णता एवं धैर्य, सत्यता, दूरदर्शिता तथा सामान्य सांख्यिकीय सिद्धान्तों के प्रतिवेदन में विवेचित विशिष्ट परिस्थितियों में व्यवहार करने की योग्यता और अन्तिम, निष्पक्षता तथा व्यक्तिगत विश्वास एवं भावनाओं की उपेक्षा करके सत्य को संचारित करने की इच्छा के गुण उपेक्षित होते हैं।"

इस प्रकार अनुसंधान-कार्य में अन्तिम चरण या कार्य, रिपोर्ट देने का होता है। रिपोर्ट अनुसंधानकर्ता के द्वारा अत्यन्त सोच-समझ व विचार-विमर्श के बाद दी जानी चाहिए। यद्यपि रिपोर्ट देने का काम कोई तकनीकी प्रकृति का नहीं होता फिर भी रिपोर्ट देते समय की गयी लापरवाही निष्कर्षों को गलत बनाने में बहुत कुछ उत्तरदायी हो सकती है। इसलिए रिपोर्ट के महत्त्व, उसके स्वरूप तथा उसकी शुद्धता पर अनुसंधानकर्ता को पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए।

Q. 5. प्रोजेक्ट रिपोर्ट (परियोजना) क्या है? यह कैसे तैयार की जाती है?

Ans. सभी व्यापारिक एवं उत्पादन फर्में लाभ कमाने की दृष्टि से वस्तु का उत्पादन व बिक्री करती हैं। इसलिए, वस्तु के उत्पादन अथवा बिक्री करने से पूर्व वे ये जानना चाहती हैं कि ऐसा करना लाभदायक रहेगा या नहीं। दूसरे शब्दों में, उनकी यह आर्थिक क्रिया लाभ की दृष्टि से ठीक है या नहीं। यदि वे पहले से ही किसी वस्तु का उत्पादन कर रहे हैं या बेच रहे हैं तो वे ये जानना चाहेंगे कि उनका लाभ पहले से अधिक होगा और हानि की स्थिति में वे ये जानना चाहेंगे कि हानि पहले से कम होगी। इन बातों को जानने के लिए सर्वेक्षण के माध्यम से वे प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते हैं। प्रोजेक्ट रिपोर्ट से वस्तु के प्रति उपभोक्ता की प्रतिक्रिया ज्ञात हो जाती है।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट (Project Report) - प्रोजेक्ट रिपोर्ट किसी उपभोक्ता वस्तु की बिक्री अथवा उत्पादन से सम्बन्धित एक रिपोर्ट है जो सम्बन्धित वस्तु के प्रति उपभोक्ता की जानकारी अथवा प्रतिक्रिया को व्यक्त करती है। यह प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित होती है जिन्हें प्रश्नावली द्वारा सैम्पल सर्वेक्षण की व्यवस्था कर एकत्रित किया जाता है। उपभोक्ता की जानकारी वस्तु के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित हो सकती है, जैसे-

(i) क्या उपभोक्ता पहले से उस वस्तु का या वैसी ही वस्तु का प्रयोग करता है ?

(ii) यदि वस्तु पहली बार उत्पादित की जा रही है, क्या उपभोक्ता उस वस्तु का प्रयोग करेगा ?

(iii) वस्तु की गुणवत्ता तथा कीमत के बारे में उपभोक्ता की क्या प्रतिक्रिया है।

(iv) क्या उपभोक्ता उस फर्म की वस्तु का प्रयोग नहीं करता, तथा अन्य फर्मों की वैसी ही वस्तु का प्रयोग करता है ?

अतः हम देखते हैं कि प्रायः अनेकों उपभोक्ता वस्तुओं के ऐसे सर्वेक्षण होते रहते हैं जिनकी प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार होती है जैसे टी. वी., फ्रिज, डिटर्जेन्ट, मंजन, बर्तन साफ करने के पाउडर आदि।

प्रोजैक्ट रिपोर्ट का निर्माण (Preparation of a Project Report)- प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाते समय निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है-

(i) प्रोजैक्ट का उद्देश्य-प्रोजैक्ट का उद्देश्य और प्रकृति पूर्णतया स्पष्ट होनी चाहिए।

(ii) प्रोजैक्ट का कार्य - यह बात पूर्णतया स्पष्ट होनी चाहिए कि प्रोजैक्ट रिपोर्ट किन व्यक्तियों और किस क्षेत्र से संबंधित हैं।

(iii) प्रश्नावली-प्रश्नावली में प्रश्न सरल भाषा में स्पष्ट होने चाहिए जिनके उत्तर जहाँ तक संभव हो, 'हाँ' या 'नहीं' में होने चाहिए। ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए जिनसे उपभोक्ता की भावना को ठेस पहुँचे। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनके उत्तर अधिक लम्बे न हों।

(iv) यदि संभव हो तो प्रोजैक्ट रिपोर्ट बनाते समय रेखाचित्रों और सारणियों का प्रयोग किया जाए।

Group -A सांख्यिकी के सिद्धान्त









JCERT/JAC प्रश्न बैंक - सह - उत्तर पुस्तक (Question Bank-Cum-Answer Book)

विषय सूची

क्र०स०

अध्याय का नाम

अर्थशास्त्र में सांख्यिकी

1.

परिचय

2.

आँकड़ों का संग्रह

3.

आँकड़ों का संगठन

4.

आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण

5.

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप

6.

सहसंबंध

7.

सूचकांक

8.

सांख्यिकीय विधियों के उपयोग

भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास

1.

स्वतंत्रता के पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

2.

भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-90)

3.

उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण एक समीक्षा

4.

भारत में मानव पूँजी का निर्माण

5.

ग्रामीण विकास

6.

रोजगार संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे

7.

पर्यावरण और धारणीय विकास

8.

भारत और उसके पड़ोसी देशों के तुलनात्मक विकास अनुभव

Jac Board Class 11 Economics (Arts) 2023 Answer key

Jac Board Class 11 Economics (Sci._Comm.) 2023 Answer key


Economics Group-A





























Objective Question












 Economics Group-B

स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा (Indian Economy on the Eve of Independence)

उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्ष (Liberalisation Privatisation and Globalisation An Appraisal)

भारतीय अर्थव्यवस्था  (Indian Economy)

4. निर्धनता (Poverty)

5.भारत में मानव पूँजी का निर्माण (Creation of Human Capital in India)

6. ग्रामीण विकास (Rural Development )

7. रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे(Employment Growth, Informalization and Other Issues)

8. आधारिक संरचना (Infrastructur)

9. पर्यावरण और धारणीय विकास (Environment and Sustainable Development)

10. भारत और इसके पड़ोसी देशों के तुलनात्मक विकास अनुभव (Comparative Development Experiences of India and its Neighbours)

Objective Question











Useful Link

Class 9th & 10th

Click Here

Class 11th & 12th

Click Here

University Economics

Click Here

11th & 12th Model Question Solution

Click Here

Hindu Mythological Secrets

Click Here

Quiz

Click Here

JAC Exam. Question & Solution

Click Here

Department Letter, Exam. & NEWS

Click Here

TGT-PGT-JPSC

Click Here

Department Letter, Exam. & NEWS.

Click Here

JAC BOARD NEWS

Click Here

Online Test

Click Here

YouTube

Click Here

Post a Comment

Hello Friends Please Post Kesi Lagi Jarur Bataye or Share Jurur Kare